Saturday, 29 July 2023

141

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
141-

इन चकल्लसियों को पहुँचते देर न लगेगी, फिर तो जैसा अस्सी घाट वैसी ही कपिलधारा।”
“हम कहते हैं कि तुम मेघा भाई के साथ क्यों नही रहतें ? भदैनी में जयराम साहू की बगीची में रहो और निश्चिन्त होकर अपना महाकाव्य रचो। वहाँ तुम्हें कोई सता नहीं सकेगा।”
कुछ देर तक विचार करने के बाद तुलसी ने कहा- “तुम्हारे इस प्रस्ताव में दम हैं। मेरा लेखन कार्य वहाँ शांतिपूर्वक हो सकेगा। तब फिर तुम एक बार भदैनी चले जाओ कैलास, मेघा भाई से सही स्थिति बतलाना और कहना कि कल ब्रह्मबेला में मैं भदैनी पहुँच जाऊँगा। कोई यह जान भी न पाएगा कि तुलसी कहाँ गया।”
तुलसी के भदैनी आ जाने से मेघा भगत बड़े ही प्रसन्न हुए।ऐसा लगता था कि उनके आगमन की प्रतीक्षा में वे रात भर नींद भी नही सो पाए थे। देखते ही बड़े उन्मत्त उल्लास से भगत जी ने उन्हें आालिंगनबद्ध कर लिया, फिर एकाएक फूट फूटकर रो पड़े। उस रूदन में तुलसी को भगत जी के अन्तर्मन की शांति और आनन्द का अनुभव ही अधिक हुआ। उन्हें लगा जैसे लूँ भरे मैदान में कोसों चलकर वे ऐसी घनी अमराई में आ गए हों जहाँ आम के बौरों की गंध से लदी शीतल बयार डोल रही है। आलिंगन में बँधे  बँधे ही वे बोले- “राम जी ने इस बार कठिन परीक्षा ली मेघा भाई, परन्तु उन्हीं की कृपा से उबर भी गया।”
घीरे धीरे आलिंगन मुक्त हो कर अपने आपको संयत करते करते मेघा भाई फिर रो पड़े, कहा - “अरे अभी तेरी परीक्षाओं का अंत कहाँ आया है भैया, यही सोच सोचकर तो दु.खी हो रहा हूँ।” 
तुलसी हँसे, बोले- “आपके इस दु.ख में भी सुख ही झलक रहा है भाई।”
सुनकर रोते रोते ही मेघा हँस पडें, कहा- “एक जगह पर अब मुझे दुःख सुख में अंतर ही नही दिखलाई पड़ता। वासना, बिंब ध्वनि और उसका बहिर्प्रसार बहिर्चेतना है, जितना गहन उतना ही विस्तृत और उतना ही उच्च। कहाँ भेद, करूँ। पहले तीनों अलग अलग समझ पड़ते हैं।अब सब एकाकार हैं।”
तुलसी गंभीर हो गए, कुछ क्षणों तक चुप रह कर कहा- “एक राम, एक कवि, एक रामबोला, तुलसीदास, परन्तु राम तुलसी तक आते आते अनेक रूपरूपाय हो जाते हैं। मेरे जप तप सारे साधन अभी तक आपके समान एकाकार नहीं हो सके। क्या करूँ?” तुलसी के स्वर में उदासी छा गई।
“माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आए फल होय।” कहकर मेघा भगत भीतर की ओर बढ़ चले।चौखट पर रुककर तुलसी के कंधे पर हाथ रखकर कहा- “घास के फूल जल्दी विकसित हो जाते हैं, चंपक देर से खिलता है। इतिहास मेघा को कहाँ देख पाएगा रे? मेरा तुलसी तो राम बनकर घट घट में रमेगा।ना ना, संकोच न करो भैया।अपने यथार्थ को पहचानो। तुम्हारे अहँकार की बहिर्चेतना और तुम्हारा अंत: कवि दोनों ही राममय बनने की उत्कंठ लालसा में एक सिरे पर तप रहे हैं और दूसरे सिरे पर तुम्हें अपनाने के हेतु स्वयं राम हैं। तुम्हारे महाकाव्य की रचना के लिए यही अंतर्द्धन्द्व कदाचित आवश्यक है।तपे जाओ मेरे भैया, यही तो दु.ख में सुख है।”
♦️♦️♦️♦️♦️♦️♦️

एक राम, एक कवि और एक रामबोला। वेनीमाधव जी अपने भीतर इस गुरू वाक्य को घुनते रहे। असल में उनके राम और काम में ही इन्द्र है। उनका कवि और वेनीमाधब दोनों ही चाहते राम को हैँ, वही तो महिमा की वस्तु है लेकिन कामेच्छा राह में रोड़े डाल देती है। क्यों? तृप्ति पाई तो है फिर अतृप्ति क्यों? गुरू जी को भी ब्रह्मचर्य धारण करने के बाद वर्षो तक काम से संघर्ष करना पड़ा है। तब मैं क्यो डरता हूँ? गुरू जी ने अपने भक्त और कवि के अन्तर्द्वद्व का भी सुन्दर निरूपण उस दिन मेरे सामने किया था। अयोध्याकाण्ड की रचना करते समय वे अपनी काव्यात्मक निपुणता के प्रति जितने निष्ठावान रहे उतने राम भक्ति में लीन न रहे। उन्होंने अयोध्या में अपनी रचना के पाए जाने वाले प्रसँग से यों यथार्थ बोध ग्रहण किया था। अपने काशी के अनुभवों में भी उनके लिए नियति से तीखी टकराहटें ही मिलीं। फिर भी वे अपने महाकाव्य  की रचना में लगन के साथ लगे रहे। वह निष्ठा जो इनके मन को व्यर्थ संघर्ष रत बनाकर रचनात्मक कार्य में जुटाए रखती है, मुझे क्यों नहीं मिलती? कैसे पाऊँ? वेनीमाधव का सरल बाल सम मन चंद्रखिलौना पाने के लिए मचल रहा था। गुरुजी की बात पूरी हो जाने के बाद वे अपने ही गुंताड़े में लीन गए। 

बाबा बोले- “अच्छा जाओ, बाहर देख आओ, स्नानादि का समय हुआ कि नहीं। कल फिर तुम्हें आगे की कथा सुनाऊँगा। तुम्हें अपने प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा।” 
दूसरे दिन फिर वें अपनी कथा सुनाने लगे- “मैंने एक को ले लिया और उस एक के पीछे ही दीवाना बन गया।धन वैभव सत्ता आदि लोक में लुभाने वाला सब कुछ मेरे राम के पास था और इतना था जितना कि मनुष्य की कल्पना में आने वाले कोटि कोटि ब्रह्माण्डों में किसी भी जीव के पास नहीं था।मैं उसे ठेठ भाषा में कहूँ वेनीमाधव कि अपने आदर्श की ऊंचाई के आगे मुझे ये बादशाह, सिपहसालार, राजे-महाराजे, सेठ-साहुकार मिट्टी के खिलौनों के समान लगते थे।मेरे सृजनशील अहं को जो शक्तियाँ हीनता का बोध करा सकतीं थीं वे तुच्छ बन गईं। ऐसे ही कामादि वृत्ति रूपी असुर भी मेरे सृजन शील अहं को तुच्छ नहीं बना सकता था। मेरे कवि का साहब परम न्यायी और करुणानिधान है,फिर मैं भला लोक की रावणी व्यवस्था से क्‍यों घबराता? मुझे परस्पर विरोधों के बीच से चलकर अपना राममार्ग प्रशस्त बनाना था।इसके बिना मैं अपनी सृजनशीलता को जिस धरातल पर ढालना चाहता था वह ढल न पाती। मेरा कवि अपने साहब के प्रति निष्ठावान था और मेरा साहब घट-घट में रमा हुआ है इसलिए मैं मानव मन के दर्शन करने का योग ही जीवन भर साधता रहा।” 
बेनीमाधव बोले - “आपने क्‍या राम के प्रत्यक्ष दर्शन पाए गुरू जी?”
बाबा हँसे, कहा- “जानते हो, रामचरित मानस लिखते समय मुझे बराबर यही विश्वास होता था कि जिस महाकाव्य को स्वप्न में जगदम्वा जानकी, कपीश्वर और कवीश्वर की आज्ञा पाकर रच रहा हूँ उसके पूरा होते ही राम जी मुझे अवश्य ही प्रत्यक्ष दर्शन देगें।
क्रमशः

142

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
142-

मुझे प्रत्यक्ष दर्शन मिले किन्तु जन जन के रूप में। यो रामचरितमानस रचकर मेरे घट घट व्यापी राम मुझे निश्चय ही मिल गए। मैंने उन्हें निराकार साकार रूप में बहुत सीमा तक पहचान लिया। उनका पूर्ण रूप देखने की लालसा यों मुझमें अब भी शेष है। कदाचित अंतिम साँस के साथ ही पूरी हो कि न हो।नहीं नहीं, राम कृपा से होगी। इस कलिकाल में तुलसी जैसी लगन से प्रीति निभाने वाले अधिक नहीं हैं। मेरे साहब अब मुझे नवाजेंगे।”
बाबा का अडिग अगाध आत्मविश्वास भरा गौर मुख वेनीमाधव के मन में उत्साह का संचार करने लगा। कैसा साहसी है यह रणबाँकुरा। भाव से भावपूर्ण होकर प्रश्न कर बैठे-“अरण्य काण्ड तो आपने अस्सीघाट पर ही रच डाला था न गुरू जी?”
बावा की स्मृति झनझना उठी,संघर्ष भरे, रचना की लीला भरे, वे पुराने दिन वेनीमाधव को दिखाने के लिए उनकी वाणी पर शब्द चित्र बनकर सँवरने लगे।
♦️♦️♦️♦️♦️♦️♦️

अरण्यकाण्ड अति  संघर्ष के क्षणों में रचा गया। हनुमान फाटक और अस्सी
घाट पर विशेष रूप से ब्रह्महत्यारे को भोजन कराने के बाद उन्हें अत्यधिक त्रस्त होना पड़ा। तुलसी आठों पहर सतर्क रहकर अपनी वीतरागता को सिद्ध करते रहते थे और इसके लिए अरण्यवासी तापस श्रीराम का ध्यान उन्हें बल देता था। बल ही नहीं वे आंनद और एक अवर्णनीय तरावट सी पाते थे। उनके मान सरोवर में, बिम्ब शब्दों के कमल बनकर खिलने लगते थे ओर फ़िर वे लिखे बिना रह नही पाते थे किन्तु कितने विध्नों के झटके उन्हें लगते थे। लिखने का तार बार बार टूटता था। यहाँ भी तुलसी को अब तक अयोध्या से कुछ कम संघर्ष नहीं झेलना पड़ा था। अहंता पर चोटें सी पड़ी। यह सचमुच रामकृपा ही थी कि अपने आध्यात्मिक जीवन के प्रथम संघर्ष काल में उन्हें महाकाव्य रचने की प्रेरणा मिली। अयोध्याकाण्ड फिर भी निर्बाध गति से लिखा, यद्यपि भक्ति से अधिक वे काव्यनिष्ठा से बँधे। काशी में काव्य और भक्ति दोनों के प्रति वे अपनी निष्ठा को वैराग्य से संतुलित रखने में सतत‌ जागरूक रहे, यह महाकाव्य तुलसी का होकर भी उसका नहीं था, स्वयं हनुमान जी उससे लिखा रहे हैं। वह जितने सुघड़ ढंग से काम करेगा, जितनी सच्ची लगन से करेगा उतने ही उसके मालिक संतुष्ट होगें। जाति प्रपत्र, निन्दात्मक प्रचार आदि विरोधी पक्ष के तीखे से तीखे प्रहार तुलसी ऊपर से तो सफलतापूर्वक झेल जाते थे पर भीतर कहीं कचोट लगती थी। सद्चिन्ता विहीन शुद्ध दम्भयुक्त सत्ता या धन से मंडित दुश्चरित्र लोग मुझे नीचा कहें और मुझे सुनना पड़े।पीतल सोने को मुंह चिढ़ाए और सोना चुप रह जाय।यह विडम्बना न्याययुक्त मानकर कैसे सही जाय? पर सहनी ही पड़ेगी। रामबोला, राम तेरी परीक्षा ले रहे हैं। इधर से वीतराग वन। महाकाव्य पूरा करते ही राम तुझे प्रत्यक्ष दर्शन देंगे। अपने को अभागा न समझ। ऊपरी मान अपमान के चोंचले छोड़कर रामकथा रस में डूब -गहरे से गहरा डूब।

भदैनी मे घायल गृद्धराज जटायु से राम की भेंट होने का प्रसँग उठाया। गृद्धराज के बहाने राम वन्दना की और फिर बह चले। किष्किन्धाकाण्ड में, रामकथा में हनुमान के प्रवेश करते ही तुलसी का कार्यभार मानों मन से हल्का हो गया। काव्य रचना में उनकी तन्मयता और गति स्फूर्तिवत्‌ हो उठी। सारा सुन्दरकाण्ड एकरस होकर लिखा।हनुमान जी इस काण्ड के नायक थे। काण्ड रचते समय जब स्वयं राम-सीता अथवा राम के भाइयों के प्रसंग आ जाते हैं, तब तो उन्हें समुद्री तैराक की तरह अधिक सचेत रहना पड़ता है परन्तु हनुमान तो निरे बचपन से ही उनके लिए गंगा के समान हैं। वे उनके बड़े भाई है, सखा हैं, आड़े समय के सहारे हैं इसलिए उनका शौर्य, और उनकी द्रुत कर्म कुशलता का बखान करते हुए उनका काव्य चातुर्य लगन भरे चाकर की तरह उनकी हनुमद्भकिर्ति की सेवा में ऐसा लीन रहा कि जैसा पहले कभी इतनें दिनों तक नही हुआ था। यों घड़ी दो घड़ी, अधिक से अधिक एकाघ दिन तक ऐसी तल्लीन तरंगो के बहाव में तो प्रायः ही बहते रहे थे। सुन्दर काण्ड की रचना करते हुए उन्हें अपने प्रति नया विश्वास सिद्ध हुआ। यों भी मेघा भगत से वे अपने लिए हनुमतवत्‌ संकेत पाया ही करते थे। मेधा भगत ने उन्हें स्वच्छंद जीवन बिताने के लिए व्यवस्था भी बहुत अच्छी कर रखी थी।केवल साँयकाल को छोड़कर कोई उनसे मिलता न था।टोडर और कैलाश नित्य, गंगाराम कभी कभी और जयरामसाहू तीसरे चौथे दिन चक्कर लगा जाया करते थे।सबेरे स्नान पूजा से छुट्टी पाकर तुलसी दास एक बार मेघा भगत से मिलने अवश्य जाते थे।
अशोक बाटिका में हनुमान और जगदम्बा की भेंट का चित्रण करते हुये उन्हें एक गुपचुप आनन्द यह रहा कि वे हनुमानजी की कृपा से जानकी मैया को देख रहें हैं।उनके मुख से राम जी की बातें सुन रहे हैं।जैसे जैसे इस कथा प्रसँग का शब्द चित्र उभरता जाता था, वैसे वैसे उनका आत्म विश्वास अपनी सरल भोली निष्ठा में प्रबल और प्रौढ़ होता जा रहा था।भक्ति के क्षेत्र में उन्होंने पहली बार अपने आपको वयस्क अनुभव किया।पहली बार रत्नावली के प्रति अपनी अनन्य चाह वे राम जी के बहाने सीताजी को अर्पित करके अपने भीतर की अतिरंजित झिझक तोड़ कर मन के नातों में सहज हुये।
♦️♦️♦️♦️♦️♦️♦️

वेनीमाधव ने पूछा- “किसी जीवन चरित्र को रचते समय प्रत्येक पात्र या पात्री की कल्पना आप कैसे करते थे गुरू जी? मैं पहले अपना उदाहरण दूँ, मैं जिस जीवन चरित की रचना कर रहा हूँ, उसमें केवल आप ही नायक के रूप में मेरे जाने पहचानें हैं, किंतु रामकथा रचते समय तो आपके पास एक भी ऐसा पात्र नहीं था जिसे आपने मेरे समान प्रत्यक्ष देखा और भोगा हो,फिर उनके भाव चित्रों की….।”
“क्या बचपने का प्रश्न करते हो वेनी माधव, मैनें अपने राम को तुम्हारे तुलसी दास से अधिक प्रत्यक्ष देखा है।मानस रचते समय मैं जिस ललक के साथ अपने जीवन मूल्यों के पूर्ण समुच्चय स्वरूप श्रीराम कल्पना के साथ आठों पहर तल्लीन रहता था, तुम अपने तुलसी दास में क्या रह पाते हो।सभी पात्रों में जीवन के देखे हुये अनेक चरित्र अपनी व्यक्तिगत छाप मेरे आग्रह से अवश्य ही छोड़ते थे।
क्रमशः

Wednesday, 26 July 2023

140

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
140-

वेनीमाधव कहने लगे- “भोजन और कामसुख यह दो अनुभव ऐसे है कि जिन्हें मनुष्य क्या प्राणिमात्र बार बार अनुभव करके भी जनम भर नहीं अघाता।जब वह इतना व्यापक सत्य है तब इसे नकारना क्‍या उचित है?” अपने बेझिझकपन से वेनीमाधव स्वयं ही कुछ कुछ भय स्तंभित होकर भी बड़ा हल्कापन अनुभव कर रहे थे। जो बात गुरू जी के सामने उनके मुख से कभी निकल ही न पाती थी वह आज अकस्मात्‌ फूट पड़ी।
बाबा बोले- “मेरा यथार्थ तुम्हारे यथार्थ से भिन्‍न है। तुम गली में खड़े होकर जहाँ तक देख पा रहे हो, मैं छत पर खड़े होकर उससे कहीं अधिक दूर तक देख रहा हूँ। यह कहो कि तुम या तो कायर हो अथवा आलसी।”
बेनीमाधव, का माथा फिर झुक गया, बोले- “मैं दोनों हूँ । मैने एक मिथ्या सम्मान की चादर में अपना मुँह लपेटकर अपने आपको को अंधा भी बना लिया हैं।गुरू जी, मैं महामूर्ख हूँ।”
बाबा ने स्नेहपूर्वंक कहा- “यदि यह चेतना तुम्हारे भीतर व्यापक रूप से प्रकट हुई है तो तुमनें कुछ नही गँवाया। मैं जानता हूँ कि तुम आजकल अपने से हार रहे हो, पर मैं नही चाहता कि तुम हारो। अपने को उठाओ,  तनिक अपने विराट स्वरूप को देखों तो सही।वह अपने आप में ही एक ऐसा अनुभव है जिसे पाकर मनुप्य को और कुछ पाने की चाह नही रह जाती।” कुछ क्षण चुप रहकर वे फिर कहने लगे- “मैं जिन दिनों मानस रचना कर रहा था उन दिनों बराबर इसी उत्साह में रहा करता था कि यदि मैं निष्ठापूर्वक इस महाकाव्य को लिख गया तो राम जी मुझे निश्चय ही प्रत्यक्ष दर्शन देंगे। काशी में जब मेरी जाँति पाँति को लेकर मिथ्या प्रचार बड़े जोर से चला तो मुझे यह लगता था कि अपने आपको सत्ता, कुल अथवा धन के मद में नशा किए हुए जो लोग आज मेरी निन्दा मे व्यस्त है वे यहीं के यहीं रह जाएँगें और मैं राम सानिध्य पा जाऊँगा। इस विचार ने मुझे कभी भी हीन बोध का अनुभव नहीं होने दिया। हीन दीन जो कुछ था वह केवल अपने राम के सम्मुख था और किसी के आगे नहीं।”
गुरु जी की बातों से वेनीमाधव फिर अपनी पकड़ में आ गए।भोला मन अब फिर से सधने लगा था। बोले- “उस ब्रह्म हत्यारे को भोजन कराने के कारण आपको बहुत निन्‍दा सहनी पड़ी। पहले जब मैं यहाँ रहता था तब कइयों से सुना था कि आप यह अस्सी घाट का स्थान छोड़ कर कहीं गुप्तवास करने लगे थे?” तुलसी बोले- “यहाँ से उठकर भदैनी चला गया था।”
♦️♦️♦️♦️♦️♦️♦️

तुलसी के लिए अस्सी घाट पर रहना दूभर हो गया था। उनके विरोधियों के द्वारा भेजे जानेवाले भाड़े के निंदक दिन रात उनकी कोठरी के आसपास मडँराया ही करते थे। निंदक ऐसे मँजे हुए लोग थे कि टोडर के पहलवान और हनुमान अखाड़े के नौजवान ऐसा मौका खोजते ही रहे गए जब वे लोग कोई उत्पात या गालीगलौज करें और यह लोग उनकी ठुकम्मस कर पाएँ किन्तु निंदा बडे़ भक्ति भाव के आडम्बर के साथ की जाती थी। ब्रह्महत्यारे के चरण पखार कर उसे भोजन कराने की बात ने इतना तूल पकड़ लिया था कि बहुत से भक्त भी तुलसीदास के ब्राह्मण होने मे थोड़ा बहुत सन्देह करने लगे थे।
तुलसीदास ने बडे़ धैर्य और संयम से काम लिया, पर वे कहाँ तक एक ही बात को चलाते रहते। उनकी मानस रचना के काम में व्याघात पड़ता था। अरण्यकाण्ड की रचना लगभग पूरी हो चुकी थी। सीताहरण की योजना में रावण कपट मृग का जाल फैला चुका था, किन्तु यहीं आकर तुलसीदास की लेखनी स्तम्भित हो गई थी। न लिखने का अवकाश मिलता है, न सोचने का। एक दिन वे दु:खी हो गए। बड़ी शांति बरतते हुए भी मन की खीझ आखिर उभर ही पड़ी। उन्होंने अपने छद्म निन्दकों और प्रशंसकों की भीड़ से कहा- “भाई, अब इस प्रश्न को समाप्त कीजिए।समझ लीजिए कि न तो कोई मेरी जाँति पाँति है और न मैं किसी की जाँति पाँति से कोई प्रयोजन ही रखना चाहता हूँ। न मैं किसी के काम का हूँ और न कोई मेरे काम का है। मेरा लोक-परलोक सब कुछ रघुनाथ जी के हाथ है।उन्हीं के नाम का भारी भरोसा है।”
बात चल ही रही थी कि एक शहद लिपटी हुई छुरी सा प्रश्न फिर उनके कलेजे के आर पार हुआ। एक व्यक्ति ने हाथ जोड़कर सविनय कहा- “अरे महाराज, आपकी अटल राम भक्ति पर भला कौन सन्देह कर सकता है और मैं समझता हूँ कि यहाँ बैठे हुए किसी भी जन के मन में आपके ब्राह्मण होने में भी सन्देह नही है। ब्राह्मण आप अवश्य हैं, बाकी रहा कुल गोत्र वगैरा सो…….”

निन्दा की नई चाल के इस जहर को तुलसी नीलकंठ की तरह पचाने का प्रयत्न करते करते भी बिफर ही पड़े, बोले- “अरे आप बड़े नासमझ हैं। इत्ती सी बात भी नही जानते कि गुलाम का गोत्र भी वही होता है जो उसके साहब का गोत्र होता है। पर अब दया करके मेरी भी एक विनय सुन लें, मैं साधु होऊँ या असाधु, भला आदमी होऊँ या बुरा आदमी, आपको इसकी चिंता क्यों सताती है? क्‍या मैं किसीके द्वार पर जाके पड़ा हूँ, जो यह आप लोग बे बात की बात फैलाते ही चले जाते है। अरे मैं जैसा भी हूँ अपने राम का हूँ।“ 
उसी दिन शाम को संयोग से कैलासनाथ आ गए। टोडर भी बैठे हुए थे। तुलसी बोले- “कैलासनाथ, अब हम यहाँ से चले जाएँगें।”
“कहाँ”
“दो ही जगह मन में आ रहीं हैं, या तो अयोध्या जाऊँगा या फिर चित्रकूट। समझ में नहीं आता कहाँ जाऊँ।”
“परन्तु तुम यहाँ से जाना ही क्यों चाहते हो?  क्या नगर के कुत्तों की भौं भौं से डर गए?”
“डरा तो नहीं पर दु:खी अवश्य हो गया हूँ। इन निदंकों और प्रश्न कर्ताओं की की चकल्लस में मेरा जप तप ध्यान लेखन कार्य, सब कुछ चौपट हो रहा है। मन को चैन ही नही मिलता तो स्फूर्ति कैसे आए?”
“महात्मा जी, आप कहें तो कपिलधारा पर आपके रहने का प्रबन्ध करा दूँ।” टोडर ने कहा।
“वहाँ जाने में भी मुझे कोई लाभ न होगा। आसपास के गाँवों की भीड़ आ जाएगी।
क्रमशः

139

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
139-

संयोग से अधिक समय न बीत पाया था और जयराम साहु तथा काशी के दो चार बड़े बड़े धनी धोरियों के साथ महान्‌ पण्डित नारायण भट्ट और उनके महामहिम शिष्य राजा गोवर्धनधारी दास टण्डन बारहदरी में पधारे। सभा में बड़ी रौनक भर गई। 
भोजनोपरान्त सभा फिर जुड़ी | कुछ कवियों ने अपनी संस्कृत भाषा की कविताएँ सुनाईं। मेघा भगत ने किसी दूसरे कवि का नाम लिए जाने से पूर्व ही नारायण भट्ट जी को सम्बोधित करते हुए कहा- “आचार्य प्रवर, हमारे अनुज सम प्रिय रामभक्त तुलसीदास की कविता अब सुनने की कृपा करें। आज हमारी रामलीला का प्रथम प्रदर्शन भी श्रीराम जन्म प्रसँग को लेकर ही आरम्भ हो रहा है। तुलसीदास कृपा करके सभा को अपनी कोई रम्य रचता सुनाएँ ।”
नारायण भट्ट जैसे उद्भट और परम प्रतिष्ठित विद्वान के लिए काशी के कवि समाज में एक नया चेहरा कोई विशेष आकर्पण नहीं रखता था किन्तु तुलसी के स्वर और काव्य प्रतिभा ने उन्हे क्रमशः अपनी ओर खींच लिया। तुलसी दास सभा में तन्मय होकर गा रहे थे-
“श्रीरामचन्द्र कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणम्‌॥”
भजन के समाप्त होने पर सभा कुछ क्षणों तक तुलसी के जादू से बँधी हुईं
मौन बैठी रह गई। सामने मंच से उसी समय जवनिका हटा दी गई श्रीर राम- लीला का प्रदर्शन आरंभ हो गया। लीला प्रदर्शन के बाद लौटते समय दुष्ट युवक मण्डली में से एक बोला- “भई, कुछ भी कहो, सब मिलाकर यह तुलसीदास नाम का प्राणी है चमत्कारी और दमदार भी है।इसीलिए इसे इसी समय उखाड़ फेंकना चाहिए।”
“उसकी एक चाभी तो आज हम लोगों को मिल ही गई है, जातँ पातँ पूछने से चिढ़ता है। घर चलो, बैठकर इसके
मुण्डन संस्कार पर विचार किया जाएगा।”
♦️♦️♦️♦️♦️♦️♦️

गुरु कथा धीरे घीरे बेनीमाधव जी के लिए एक ऐसी प्रेरणा भरी चुनौती बनती जा रही थी, जिसका सामना करने में उनका दिल दहलता था। उन्हें अपने लौकिक जीवन में अपने गुरु के समान विकट संघर्ष कभी नहीं झेलना पड़ा था। वे अभी तक काम को ही राम नही बना पाए और गुरू जी काम क्रोध लोभ मोहादि की शक्तियों को खींचकर कितने मनोयोग से अपनी रामनिष्ठा को प्रबल बना चके हैं और अधिकाधिक बनाते रहे हैं। यह उनके लिए आश्चर्यं जनक तो था ही, साथ ही उनका रहा सहा हौसला भी दिनों दिन पस्त होता चला जा रहा था।वेनीमाधव अपने भीतर बरावर लघुता अनुभव करते जा रहे थे।जब पहले जब वे इसी काशी में गुरु आश्रम के अंतेवासी थे तब भी गुरू जी के व्यक्तित्व के आगे उन्हें अपनी हीनता ने बेहद सताया था। तब गुरू जी ने ही उन्हें सूकर खेत जाकर अपना मुक्त विकास करने की सलाह दी थी। इन दिनों भी उनका एक मन फिर से भाग जाने को होता था। परन्तु दूसरे मन से वे अपनी इस इच्छा को बरजकर पीछे हटते थे। एक दिन जेठ की लूँ भरी दोपहरी में अपनी कोठरी मे बेनीमाधव जी उदास बैठे थे। आकाश उनके मन के आकाश के समान ही दूर-दूर तक सूना था । कोठरी उनके अंतर की तरह ही तप रही थी। माला जपने में मन नहीं लग रहा था, वे अपने आप से उबरना चाहते थे। गर्म हवा के तेज थपेड़ों से कोठरी का पुराना पर्दा फट गया था, हवा आ आकर आग की लपटों सी काया को छू जाती थी। पर्दे के निचले बाँस का दाहिना कोना सुतली टूट जाने से दीवाल मे जड़े कुण्डे से मुक्त होकर बार बार उड़कर दीवार से फदाफट लगता था। वह ध्वनि सीधे उनके मस्तिष्क की शिराओं पर ही वार करती थी। बेनी माधव बाहर भीतर से झुझँलाकर उठे, अपनी छोटी सी कोठरी मे दो चार बार तेज चहलकदमी की और फिर लूँ के झोंके की तरह ही कोठरी से बाहर निकल आए। बगलवाली कोठरी से पर्दे की झिरी से झाँककर देखा, राजा भगत सीधे तने बैठे गोमुखी में हाथ डाले माला जप रहे थे।उनकी आँखें मुँदी हुई थीं। किसी साधक को यह तल्लीनता इस समय वेनीमाधव के लिए शांति दायक न होकर लघुता, चिढ़ और झुँझलाहट उपजाने वाली थी। वे वहाँ से हट आए। नीचे उतरे, कुएँ वाले दालान में रामू दो विद्यार्थियों को पढ़ा रहा था। रामू से वे अब ईर्ष्या नहीं करना चाहते, किन्तु क्या करें, हो ही जाती है। राजा भगत तो खैर गुरू जी के सखा है, ऊँचे साधक हैं, किन्तु रामू आयु में उनके पुत्र समान होते हुए भी आत्मसंयम की दृष्टि से उनसे कहीं अधिक कसा हुआ है। वह छोटी सी आयु में ही ऐसा सध गया है और वे अब भी मानसिक झकोलों से नही उबरे। हीनतावश एक ठण्डी साँस उनके कलेजे से फूटकर निकल गई। भवन के बाहर निकल आए। एक बार जी चाहा कि घाट की ओर निकल जायें और किसी सीढ़ी पर गंगा में गले गले डूबकर बैठ जायें, फिर गुरू जी की कोठरी की ओर देखा। टोडर ने कोठरी के आगे छप्पर छवा दिया था, जो चारों और से एक प्रवेश द्वार को छोड़कर बन्द था, इसलिए लू की तपन बाबा की कोठरी में सीधे नहीं पहुँच पाती थी।बेनीमाघव उसी ओर चले गए।छप्पर में प्रवेश करने पर देखा कि कोठरी के दोनों द्वार खुले हुए थे और अँधेरे में उनके गुरू जी चौकी पर बैठे अपने घुटने पर थाप देते हुए आँखें मींचें कुछ गुनगुनाते हुए झूम रहे थे। वह सुदर्शन गौरवर्ण की तेजस्वी काया कोठरी के अँधेरे को प्रकाशवान कर रही थी। वेनीमाधव बाहर ही खड़े खड़े अपने गुरू जी को देखते रहे। उनके मन के नाचते बवण्डर बाबा को देखते हुए मानों थम गए थे। मरुस्थल में चलते चलते मानों वे हरियाली के सामने आ गए थे।
बाबा ने सहसा आँखें खोली, वेनीमाधव को देखा, बोले- “आओ वत्स, बड़े समय से आए।अभी कुछ देर पहले मुझे तुम्हारी याद भी आई थी।तुम आज अपने से बहुत उखड़े हुए हो, है न?”
वेनीमाधव जी के मन में एक क्षण के लिए भी झिझक न आई, वे वोले- “हाँ गुरू जी, लगता हैं कि एक यथार्थ को झुठलाया नही जा सकता।”- कहकर बेनीमाधव रुके। उन्होंने सोचा कि शायद गुरु जी प्रश्न करें, किन्तु वे मौन बैठे रहें।वेनीमाधव ने आप ही आप फिर बात को आगे बढ़ाया।
क्रमशः

138

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
138-

तुलसीदास बोले -“देश काल के अनुरूप ही धर्म बोध ढलता है। कबीर साहब ने जिस समय निर्गुण राम का प्रचार किया उस समय कैसा घोर अत्याचार हो रहा था। सारी मूर्तियाँ और मन्दिर ध्वस्त कर दिए गए थे। भद्र समाज कायर बनकर विजेताओं के तलवे चाटने लगा था और निर्धन दीन दुर्बल जन समाज बेचारा हाहाकार कर उठा था। अनास्था के ऐसे गहन अंधकार भरे भारत रूपी महल के खण्डहर में कबीरदास यदि निर्गुनिया राम का दिया न जलाते तो आज उसमें भूत ही भूत समा चुके होते।”
“तब आप गली गली में उनका तीव्र विरोध और सगुण का अन्ध प्रचार क्यों करते हैं।”- एक बुद्धिवन्त और सौम्य लगने वाले युवक ने पूरी शिष्टता में अपना तीखापन मिलाकर पूछा।
“मैं निर्गुण का विरोध कभी नहीं करता। सगुण निर्गुण दोनों एक ही ब्रह्म के स्वरूप हैं। वे श्रकथ, अगाघ, अनादि और अनूप हैं। मैं तो केवल उन लोगों का विरोध करता हूँ जो कबीर साहब के बचनों की आड़ लेकर समाज की धार्मिक आास्थाओं के निकम्मे आलोचक हैं। कबीर साहब को राम नाम लाभ हुए सौ डेढ़ सौ वर्ष बीत गए किन्तु तब से लेकर अब तक वे और उनके पथगामी तीखे प्रहार करके भी जन जन के हृदयमन्दिर से रावण हंता रामभद्र की मूर्ति भंजित नहीं कर पाए। चुस्त जन मानस के अडिग आधार सी उस सगुण भक्ति पर निकम्मे प्रहार करके बेचारी जनता को सताते हैं, मरे हुओं को मारते हैं। ऐसे निकम्मे आलोचक लोक देश समाज के शत्रु होते हैं। में इसका विरोध करता हूँ।”
“आप कृष्ण जी के भी तो विरोधी हैं?”
“मैंने कृष्ण प्रेम में गीत गाए हैं। राम श्याम में भेद नही है। पर इस समय मुझे इनका मुरलीधर गोपीरमण रूप नहीं लुभाता। मैं उन्हे धर्नुधारी, असुर संहारक और रामराज्य प्रतिष्ठापक के रूप मे निहारना चाहता हूँ।”
एक युवक ने बात का रंग बदलते हुए पूछा- “हमने सुना है महाराज कि विद्यार्थी काल में पण्डित बटेश्वर जी मिश्र से आपका कोई झगड़ा हुआ था?”
“हमसे उनका कोई झगड़ा कभी नहीं हुआ। हमारे हनुमान जी से उनके भूत अवश्य डरकर भाग खड़े हुए थे।” तुलसीदास के कहने के विनोदी ढंग से कुछ और लोग भी हँस पड़े।
युवक ने फिर कहा- “वह आपके ऊपर कोई मारण प्रयोग कर सकते हैं। महान तांत्रिक है।”
“मारने और जिलाने वाले तो राम है,फिर यह सब बाते निरर्थक हैं।”
फिर उसी युवक ने प्रशन किया-“अच्छा इसे छोड़िए, हमने सुना है कि इन्हीं मेघा भगत के दरबार में आपकी और यहाँ की किसी वेश्या की गायन कला में होड़ लगी थी? ”
तुलसीदास का चेहरा लज्जा और क्रोध से लाल हो गया, परन्तु अपने को संयत रखकर वे मुस्कराते हुए बोले- “हाँ, मेरे भीतर कला प्रदर्शन की होड़ जागी थी।”
हुलासराय ने तुरन्त टोका- “आप लोगों को एक महात्मा से ऐसे भद्दे सवाल नहीं करने चाहिए।”
एक युवक बोला- “इसमें भद्दा कुछ नहीं है। हमारी सहज जिज्ञासा है। महात्मा जी, क्या बतला सकते है कि वह मोहिनी बाई अब कहाँ रहती है? “ तुलसी के मन में  वह छवि अब अपमान की आशंकाएँ उभारने वाली बन गई थी। फिर भी तुलसीदास ने अपने मन को संयत रखा। क्रोध को दबाकर स्थिर स्वर में कहा-“नही ” 
“मिलेंगे उससे? मैं मिला सकता हूँ।” इस प्रश्न के साथ हर युवक के चेहरे पर हिंसात्मक आनन्द की चमक भर गई। तुलसीदास ने चतुर कनखियों से हर चेहरा भाष लिया। चट से मुस्कराकर प्रश्न का उत्तर बड़ी दीनतापूर्वक दिया-“मिला सके तो मुझे राम से मिला दें।” “राम से तो वह राम का प्यारा ब्रह्म पातकी चमार ही मिला सकता है। सुना है आपने उस ब्रह्महत्यारे के पैर भी धुलाए थे?”
“हाँ, दीन दुर्बल और रोगी की सेवा करना मैं राम की सेवा करना ही मानता हूँ।” 
“सुना है, आप जाति पाँति नही मानते?” “मानता हूँ और नहीं भी मानता।” 
“वह कैसे?”
“वर्णाश्रम धर्म को मानता हूँ परन्तु प्रेम धर्म को वर्णाश्रम से भी ऊपर मानता हूँ।” 
युवक मण्डली तुलसी की हाजिर जवाबी से अब चिढ़ उठी थी।उनमें से एक तीखा पड़ा, बोला- “आाप क्‍या अवधूत हैं?”
दूसरा बोला- “अजी अवधूत-वौघूत कुछ भी नहीं। विशुद्ध पाखण्डी हैं ये। जो एक नीच हत्यारे के पैर घोए, उसे भोजन कराए, वह ब्राह्मण भी कदापि नही हो सकता।” 
“तो इनको ब्राह्मण कहता ही कौन है। यह किसी ब्राह्मणी कुलटा के गर्भ से उत्पन्न राजपूत हैं।”
तुलसी भीतर ही भीतर उबलने लगे किन्तु चुप रहे। राम शब्द उनका सहारा था। दूसरे युवक ने तीसरे युवक की ओर कुटिलता से देख कर कहा -“भई, यह राजपूत वाजपूत की तो हम नहीं जानते, पर सुना है कि ये कबीरदास की कौम के हैं।” 
तुलसीदास उठ खड़े हुए।मन हाथ से छूट चला।उनका चेहरा क्रोध से तमतमा उठा, वे बोले- “धूत, अवधूत, रजपूत, जुलाहा जो जिसके मन में आए जी भरके कहें। मुझे न किसी की बेटी से अपना बेटा ब्याहना है और न किसी की जात ही बिगाड़नी है। तुलसी अपने राम का सरनाम गुलाम है, बाकी और जो जिसके मन में आए कहता फिरे। फकीर आदमी, माँग के खाना मस्जिद में सोना। न लेना एक न देना दो। फिर आप लोगों के फेर मे क्‍यों पड़ू?” कहकर वे उठ खड़े हुए।
एक युवक तुरंत उठा और उनकी राह रोक हाथ जोड़कर बोला- “हममें से कुछ लोगों ने नि: संदेह आपको अपमानित करने के लिए ही यहाँ बुलाया था, मैं जानता हूँ। आपके मत से मेरा विरोध भले ही हो पर मैं आपका सम्मान करता हूँ। हमारी मूर्खतापूर्ण और विद्रूप भरी बातों का बुरा न मानें।”
तुलसी शान्त स्वर में बोले- भैया, बुरा मानकर मेरा कुछ लाभ तो होने से रहा जो मानूँ।आप लोगों ने मेरे बहाने अपना थोड़ा सा मनोरंजन कर लिया, इसलिए अपने आपको धन्य मानता हूँ।” 

तुलसीदास तेजी से चले आए और भगत जी के पास आकर शांतिपूर्वक बैठ गए। सभ्रांतों की भीड़ अब पहले से अधिक जुड़ चुकी थी। तुलसीदास के उत्तेजित हो जाने से सभा में एक प्रकार का सन्नाटा सा छा गया था और संभ्रात समाज को बहुत रुचिकर नहीं लग रहा था। दोषी युवकों को ही बतलाया गया। 
क्रमशः

137

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
137-

मेघा भगत बोले- “आज के बाद भी काशी में तुलसीदास तथा आप लोग रहेगें। जब चाहें तब मिल सकते है।आज भरत को राम के पास ही रहने दीजिए।” 
एक तगड़े से पण्डित युवक ने, जिसकी समपन्नता का परिचय उसके गले में पड़ी सोने की सतलड़ी जंजीर, बाँहों का बंद और हाथ की नगीने जड़ी अँगूठियाँ करा रहीं थीं, बोला- "तो इसका तात्पर्य यह भैया कि आप अपने को राम का अवतार मानते हैं? मेघा भगत शांत रहे, मुस्कराकर कहा- “मैंने उपमा दी थी। वैसे राम तो मुझे आप में भी दिखलाई देते हैं।” 
वह युवक फिर बोला- “हमे आपके भरत जी से उस ब्रह्महत्यारे की चकल्लस नहीं करनी है। हमे तो ऐसे ही थोड़ा बहुत परिचय बढ़ाना है। सुना है, प्रात: स्मरणीय आचार्यपाद शेष सनातन जी महाराज के शिष्य है और अब महात्मा के रूप में निवास करने के लिए यहाँ आए हैं, तो अलाप सलाप कर के अपना परिचय बढ़ाना चाहते हैं।”
मेघा भगत की ओर देखकर तुलसी ने कुछ कहना चाहा किन्तु भगत जी पहले ही बोल पड़े-"आज के दिन वाद विवाद नही होगा। अभी थोड़ी देर में भट्ट जी राजा टोडरमल के साथ आएंगे।”
“वह टोडरमल नही टोडरमल जी के पुत्र हैं महात्मा जी।”
“पुत्र ही सही, उनके आने पर यहा सरस काव्य सुनिए,सुनाइएगा, फिर रामलीला देखिएगा।”
युवा पंडित मंडली निराश हुई। वे लोग अपनी जगह पर लौट गए, पर मन नहीं मान रहा था। मेघा के पास बैठे तुलसी को वे उसी तरह ललचाई दृष्टि से देख रहे थे जैसे बिल्‍ली कबूतर को ताकती है। तुलसी को देखकर उनके मन में पिछले बहुत दिनों से काफी रोष और उपेक्षा का भाव भरा था।कुछ ही दिनों में यह अनजाना व्यक्ति आकर काशी की जनता के हिये का हार बन गया है।अच्छे अच्छे संस्कृतज्ञों में भी कई लोग उसे श्रेष्ठ कवि मानतें हैं। सम्पन्न घरों के युवा कवि पंडित इस नये नामवर कवि से दो दो चोचें लड़ाने के लिए मचल रहे थे। एक ने कहा- “अरे अब तो रहा नही जाता। उसको मेघा भगत के पास से हटाकर यहाँ लाना ही चाहिए। कुछ मजा लेना चाहिए।फिर तो बड़े लोग जहाँ आए तहाँ मजा गया सारा।”
एक दुबला पतला चालाक सा युवक बोला- “अच्छा ठहरो। मैं ले के आता हूँ।”
वह युवक फर्ती से उठकर फिर मेघा भगत के पास गया और हाथ जोड़कर बोला- “महात्माजी, हमारी महात्मा तुलसीदास से वार्तालाप करने की तीव्र इच्छा है, यदि आप हमारी इस इच्छा को फलीभूत न होने देंगे दो हम लोग फिर भोजन नहीं करेंगे महाप्रभु।”
मेधा ने तुलसी को देखा, तुलसी मुस्करा कर बोले- “आज्ञा प्रदान करें। ब्राह्मणों को भूखे रखना उचित नहीं।”
“जैसी तुम्हारी इच्छा, शांति रखना।”मेघा भगत से स्वीकृति पाते ही तुलसी दास उठकर वहाँ आ गए जहाँ युवक मण्डली बैठी थी। इन्हें इधर आया देखकर बैठे हुए प्रौढ़ वृद्ध भद्रजन भी आस पास खिसक आए।
एक ने कहा-“महाराज इन दिनों आपका बड़ा यश फैला हुआ है।नाम तो नित्य ही सुनते थे, आज दर्शन का सौभाग्य भी मिल गया।”
तुलसी सविनय बोले- “भाई, यश राम जी का है, मैं तो उनका एक अकिंचन सेवक मात्र हूँ।”
युवकों मे से एक ने चहकाने वाला अंदाज साधकर दबे विनोद और ऊपरी गम्भीरता के स्वर में कहा- “सेवक तो आप अवश्य हैं।हमने सुना है कि आपने किसी अलखनिरंजन वादी साधु को उसकी राम के प्रति अवज्ञा के कारण लट्ठू मारा था।”
तुलसी हँसे, कहा- “मेरे पास राम नाम की लाठी है, उसी से मारा होगा।”
“हाँ हाँ, जब जड़ चेतन सभी में राम हैं तब लट्ठ में भी हैं।”
“आपके इस व्यंग्य में भी राम ही बोल रहे हैं।”
“कैसे ?” 
“मूढ़ में जैसे चेतना बोलती है और मूढ़ उसे सुनकर भी नहीं सुन पाता।” तुलसी दास का मीठा व्यंग्य भरा प्रत्युत्तर सुन कर वह युवक चुप हो गया किन्तु एक और व्यक्ति तुरन्त ही बोल पड़ा- “हाँ महाराज, आप की बात खरी है। युग का प्रभाव देखिए, लोग मुर्दों की सड़ी गली हड्डियों को पूजने लगे हैं, पर आपकी दृष्टि से देखा जाए तो वह भी राम ही का एक रूप है।”
“राम तो रावण में भी कहीं उसकी अन्तर्चेतना बनकर विराजमान थे। मूढ़ ने उसे तो न सुना और अपनी हाड़ माँस की काया का रव ही सुनता रहा इसीलिए वैसा अंत पाया।”
एक छोटे मोदे हाकिम, एक प्रौढ़ व्यक्ति आगे बढ़कर त्यौरियों पर बल डालते हुए बोले- “तब तो महाराज इन रूपों के झगड़े से वो अपने कबीरदास जी का सिद्धान्त ही क्‍या बुरा है? साकार के इतने भेद हैं कि हम लोगों के लिए भूल भुलैया सी बन गई है। किस रूप में राम है किस रूप में नहीं हैं, किस रूप में कहाँ राम छिपे हैं, भला बतलाइए, इन सब बातों को सोचते रहें तो अपनी रोजी रोटी किस समय कमाएँ? ” 
एक उदंड ब्राह्मण युवक ठठाकर हँस पड़ा, बोला- “हुलासराय जी, ये इनसें न पूछिए, बेपढ़ी लिखी गँवार भीड़ ही इनके जैसों को अपनी ठगहरी विद्या का चमत्कार दिखलाने के लिए मिलती है। ये कबीरदास को मान लेंगे तो इनका धन्धा कैसे चलेगा, ह ह ह ।” उसके साथ ही साथ सारी युवक मण्डली हँस पड़ी।
तुलसीदास अन्दर से तपे तो अवश्य किन्तु क्षणमात्र में अपने को अनुशासित कर लिया। लोक व्यवहार में इधर इधर खो जाने वाला राम शब्द उनकी छाती में बीचो बीच ऐसे आकर जड़ गया जैसे अँगूठी में नगीना। वे भी युवकों के साथ ही खुल कर हँस पड़े, कहा- “ये आपने धन्धे वाली बात अच्छी कही। आजकल धर्म के पास राज तो है नहीं, इसलिए बेचारा छोटे मोटे धन्धे करके ही जी पा रहा है। आप लोग सभी धर्म के धन्धेदार हैं।मुझसे बढ़ कर रहस्य जानते हैं। हम और कबीरदास जी महाराज तो राम जी की दुकान के चाकर हैं। पहले जमाने में आस्था से नंगी अपनी प्रजा को कपड़े पहनाने के लिए श्रीराम ने कबीरदास जी को भेजा। अब कपड़ो के साथ जेवर गहने पहनने के दिन भी आ गए हैं, तो राम जी की दुकान में हमारे मेघा भगत जैसी विभूतियाँ भी चाकरी बजा रही हैं।” 
हाकिम हुलासराय जी बोले-“ये आपकी वस्त्र और गहनें वाली बात हमारे समझ में नहीं आई। महाराज, तनिक फिर से समझाने की कृपा करें।”
क्रमशः

136

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
136-

दो उत्तेजित व्यक्तियों के बीच में तुलसी दास अपने आपको संयत रखने के लिए अपने मन में गूँजता राम शब्द सुनते रहे। जब कैलास अपने जी का उबाल निकाल कर थमें तब उन्होंने दोनों को सम्बोधित करते हुए कहा- “आप दोनों ही मेरे मित्र और शुभचिन्तक हैं।आप दोनों ही कृपा करके ध्यान से सुने। बेचारे वटेशवर स्वयं  ही अपने अंत के निकट आ गए हैं। आप उसके विरुद्ध कार्य करके व्यर्थ में अपने आपको कलंकित न करे। आप दोनों ही मित्र मेरे हाथ पर हाथ रखकर यह वचन दें कि इस संबध में शांत रहेगें। कुछ न करेगें।” तुलसी ने अपने दाहिने हाथ का पंजा आगे बढ़ाया। टोडर को अपना मन अनुशासित करते देर न लगी, किन्तु कैलासनाथ के चेहरे पर अभी ताप चढ़ ही रहा था। तुलसी की स्नेह दुष्टि से आँखें मिलते ही उन्होंने आँखें झुका लीं और भुनभुनाते हुए कहा- “तुम्हारी यह भद्गता मुझे अच्छी नहीं लग रही है। पापी और दम्भी को दण्ड मिलना ही चाहिए।”
तुलसी बोले- “कल तुम जिस मानव-मर्म को सहज भाव से मेरे भीतर पहचान कर सराह सके थे उसी को आज बुरा बतला रहे हो ? कवि बड़ा लहरी होता है। अपनी ही समर्थित तंरग को काटते हुए भी उसे देर नही लगती।” कहकर तुलसीदास सिलखिलाकर हँस पड़े। उनकी बच्चों जैसी मुक्त हँसी ने गंभीर और क्षुब्ध वातावरण पर वैसा ही प्रभाव डाला जैसे जेठ की धूप से तपी हुई धरती पर आषाढ़ की बौछारों का पड़ता है।
टोडर सहज ही हँस पड़े। कैलास के क्रोध ने आँखों में एक बार फिर पलटा
लेना चाहा, पर तुलसी की स्नेह और विनोद भरी मुद्रा ने उन्हें हल्का कर दिया
था।स्वयं भी व्यंग्य विनोद साधकर बोले- “तुम भी तो कवि हो। तुम क्या कुछ कम लहरी हो ” 
“हाँ, किन्तु मेरी लहरें अब सभी समीरण से अधिक संचालित होती है, यद्यपि अब भी वे पूरी तरह से मेरे वश में नहीं आईं। अच्छा छोड़ो यह प्रसँग। यह बताओ कि मेरे इस पाप से मेरा रामलीला देखने का पुण्य तो क्षीण नही हो गया? ” 
कैलास थोड़ा अकड़कर बोले- "मेरा मेघा भगत और चाहे जो हो पर इस संबंध मे बड़ा शेर निकला। मैं कल तक जितना खिन्‍न था उतना ही आज उनसे संतुष्ट हूँ।” 
सुखी मन से तुलसी वोले- “मैं तुम्हारी आज की इस मन मुद्रा से बडा संतुष्ट हुआ किन्तु यह बतलाओं कि नारायण भट्ट और राजा गोवर्धनधारी जैसे बड़े बडे़ लोग आ रहे है या…..।”
“वह भी बतला रहा हूँ। आज जैसे ही उनके पास यह सूचना आई, वैसे ही उन्होंने मुझसे कहा, कैलास, नारायण भट्ट जी से तुम स्वयं जाकर पूछो। तुम स्वानुभव से उन्हें यह बतला सकोगे कि तुलसी कैसा व्यक्ति है,फिर आगे उनकी जो हां-ना हो सो मुझे बतलाना।”
टोडर ने उत्सुकतापूर्वक पूछा- “भट्ट जी महाराज क्या बोले?”
“उन्होने कहा कि संतो-विरक्तों पर कोई सामाजिक प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता।संन्यासी शिखा और सूत्र का त्याग करके भी शुद्र नहीं कहलाता।तुलसीदास आनंद से हमारे साथ ही साथ रामलीला देखें। हमें कोई आपत्ति नहीं है।”
सुनकर तुलसीदास के मुख पर आनंद और संतोष की आभा आ गईं। कैलासनाथ अपने उत्साह के शिखर पर चढ़ने लगे, बोले- “तभी तो मैं सीघा उस वैशाख नन्दन के घर सुनाने जा पहुँचा।“
तुलसी ने तुरन्त ही अपने मित्र के उत्साह की यह दिशा काटी, कहा-“अब बटेश्वर के पीछे पड़ गए हो। घूम फिरकर तुम्हारी झक वहीं की वहीं पहुँच रही है।”
कैलास हँसकर बोले- “मैंने आज उसे खूब-खूब तपाया। मैंने कहा, तू अपने आपको बटेश्वर समझता है।अरे तू तो इमली के चिये बराबर भी नहीं है। वह उठकर मुझे गालियाँ देने लगा। (हंसी) पर वाह रे मेरे मेघा भगत, जब हमने उनसे प्रश्न किया कि मान लीजिए नारायण भट्ट ने आना अस्वीकार किया तो  क्या आप रामलीला नही दिखाएंगे? वे बोले- “मैं और मेरा रामबोला देखेगा। तुम लोग तो साथ रहोगे ही।रामलीला के प्रेमियों की कमी नही रहेगी।”
तुलसी बोले- “कैलास, नारायण भट्ट जी का संदेश तुमने अभी तक मेघा भाई को पहुँचाया है अथवा कोरमकोर वरगदनाथ को इमली का चिया बना करके ही चले आए हो? ”
“अब जाऊँगा वहाँ, तुम्हारे यहाँ भी आए बिना मुझे चैन थोड़े ही पड़ सकता था।चलो साथ ही साथ चलें। जैराम साहू के रथ की बाट देखना बेकार है। बाहर हमारे टोडर जी का रथ तो खड़ा ही हुआ है।”
टोडर बोले- “हाँ, हाँ, हम महात्मा जी तथा आपको भदेनी छोड़ आएँगें।”
सब लोग उठ पड़े। कुटिया से बाहर निकलकर कैलास ने उत्साह से टोडर की बाँह पकड़कर प्रेम से दबाई और कहा- "देखो राम जी की लीला, जो देश के सम्राट है उनका दीवान भी टोडर है और जो हृदय के सम्राट है उनके दीवान का नाम भी टोडर ही है।” और खिलखिला कर हँस पड़े। कुटी का ट्ट्टर बन्द करते हुए तुलसीदास भी हँसी के इस वातावरण मे घुले बिना रह न पाए। 

दोपहर ढलते ही भदैनी स्थित जैराम साहू की बगीची के सामने रथों और पालकियों का आगमन आरभ हो गया।नगर के चुने हुए चालीस पचास सेठ महाजन, हाकिम अमले और सुकवि पण्डित समाज के लोग वहाँ पर आमंत्रित थे। नौकरों चाकरों की सेना आमंत्रित अतिथियों की सँख्या से लगभग ढाई गुनी अधिक थी। द्वार पर केले के खम्भों से बनाए गए कलात्मक तोरण और भीतर की सजावट आदि देखते ही बनती थी। चुनार के पत्थर की बनी हुई कलात्मक बारहदरी में मखमली तोशक तकिये गलीचे बिछे थे। सजावट और धूपगंध से महकते हुए इस स्थान में मेघा भगत का आसन सबसे अलग लगा था। तुलसी को उन्होंने अपने पास ही बिठला रखा था।नगर के सभ्रांत नागरिक आते,मेघा भगत को प्रणाम करते और फिर अपनी जगह पर बैठ जाते। कइयों ने मेघा भगत के साथ तुलसी भगत को भी प्रणाम किया,कई उन्हें बिना पहचाने ही निकल गए। अपनी अपनी जगहों पर बैठकर उनमें तुलसी के संबध की ताजा चर्चा ही स्वाभाविक रूप से चल पड़ी। कुछ लोग आपस में कुछ बात पका कर भेधा भगत के पास आए और बड़ी विनय से कहा-“भगत जी, हमारा यही भाग्य है कि आप दो दो महात्माओं के दर्शन एक साथ पा रहें हैं। हम तुलसीदास जी से कुछ बातें करना चाहते हैं।
क्रमशः

135

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
135-

खाते खाते रुककर उस ब्रह्महत्यारे ने कहा-“मैं रैदास जी की बिरादरी का हूँ साहबों।” 
“हैं…  और ब्रह्महत्या करके फिर ब्राह्मणों से ही सेवा लेता है?”
तुलसी ने दोनों हाथ उठाकर कहने वाले को शांत किया, कहा- “भूख और निराशा की ऐसी स्थिति में तुम जरा अपनी कल्पना करके देखो, सुखदीन। जाति पाँति , वर्ण-वर्ग आदि सब कुछ अपनी जगह पर ठीक है, पर एक जगह मनुष्य केवल मनुष्य होता है। घट-घट में एक ही राम रमते हैं।अभी तो सब जने चुप रहो। चबूतरे पर चलकर बैठो। यह पहले संतोष से खा पी ले तो इसके पाप का कारण पूछेंगे।“
सब चुप तो हो गए किन्तु हर एक को यह बात थोड़ी या बहुत अखरी अवश्य थी। तुलसी भगत ने एक ब्रह्महत्यारे चमार को अपने कटोरे मे भोजन परोसा, उसके पैर धुलाएँ, यह धर्म और समाज के विरुद्ध काम किया। इसके बाद लोग सम्भवतः चले भी जाते किन्तु अपने मन की घृणा के बावजूद हर एक व्यवित अपराधी के अपराध की कथा सुनने को भी उत्सुक था, इसलिए सब लोग चबूतरे पर बैठ गए।आपस मे धीरे घीरे बतियाने लगे- “यह अच्छी बात नहीं हुई। भूखा भले ही हो पर है तो अखिर ब्रह्महत्यारा ही है ,और फिर ब्राह्मण ही पैर धोवे और ब्राह्मणों में भी इनके जैसा भगत-महात्मा। साला हौसला पा जाएगा तो दो चार ब्राह्मणों की हत्या और कर आवेगा।” 
“ठीक कहते हो, अरे हमारे ऋषि-मुनि जो धरम नियम बनाय गए वह कोई गलत थोड़े ही हैं। बिरमहत्या का पातकी जब तक ऐसे डोल डोलकर न मरे तब तलक उसका प्रायश्चित पूरा नही हुई सकत है।”
आगे आगे तुलसी भगत और पीछे पीछे वह ब्रह्महत्यारा चबूतरे की तरफ आते दिखलाई दिए। सब लोग चुप हो गए। चबूतरे पर चढ़कर तुलसीदास ने उसे नीचे ही खड़े रहने का आदेश दिया और कहा- “अब तुम हम सबको अपने अपराध का कारण बताओ।” कहकर तुलसी बैठ गए। हत्यारा हाथ जोड़कर कुछ कहने से पहले रो पड़ा, बोला-“क्या कहे पंचौ, आप रामको पता है कि दबत है तौ चिउटी भी काट लेत है।हमाने गाँव में दातादीन रहते रहे थे महाराज रहे। व्याज-बट्टा भी करते रहे।तौ महाराज, हम विपता में उनके अपने ऋणी भए। ई हमारी जवानी की बात है। तो उन्हें जैसे हमारी घर वाली पर हक ही मिल गया। हम चुपाए रहे पंचौ, सबल से निर्बल कैसे बोल? फिर हमरी बिटिया बड़ी भई।उसकौ पर हक जमावे का जतन किहिन, तब क्या कहें।फिर हमको करोध आय गया। करोध में हमरी उंगलिया तनिक सकत पड़ गईं। उनका गला दब गया। हम बड़े दुखी है महाराज।” कहकर बह फिर रोने लगा । तुलसीदास बोले- “वह जन्म से ब्राह्मण होते हुए भी कर्म से अधम था। तुम्हारी जगह और भी कोई व्यक्ति होता तो वह भी आवेश में ऐसा काम कर सकता था। खैर, अब तुम जाओ, कहीं दूर देश निकल जाओ।समझ लो कि तुम नया जन्म पा रहे हो। राम-राम जपो, मेहनत-मजूरी करो और जीवन में जो खोया है उसे फिर से पाओ।” 
उसके जाने के बाद एक व्यक्ति ने कहा- “उस बरामण का पाप तो बहुत बड़ा था, भगत जी, पर बरमहत्या तो उससे भी बडा पाप है।” 
“मर्यादा पुरुषोत्तम रामभद्ग ने भी ब्राह्मण रावण को मारा था। असुरघर्मी अपना वर्ण खो देता है। पापी सदा दण्ड के योग्य है।” 
सबेरे घाट पर यह चर्चा फैलते फैलते दिन चढ़े तक प्राय: नगर भर में फैल गई। क्या छोटे क्‍या बड़े सभी इसी की चर्चा कर रहे थे। काशी की जनता में तुलसीदास के इस काम के आलोचक अधिक निकले, प्रशंसक कम। उड़ते  उड़ते दोपहर तक तुलसीदास को भी यह समाचार मिल गया कि काशी के महान तांत्रिक बटेश्वर मिश्र तुलसीदास को दण्ड देने के लिए कोई योजना बना रहे है। टोडर ने भी यह सूचना पाई और सब काम छोड़कर तुलसीदास के पास आए। उन्होने कहा- “महात्मा जी, में और मेरी सारी बिरादरी आपकी सेवा में हाजिर है। हमारे रहते काशी मे कोई आपका बाल भी बाँका नही कर सक्ता। तुलसीदास मुस्कराए, कहा- “अरे भाई तांत्रिक तो मंत्र मारेगा।तुम लोग मुझे उससे कैसे बचाओगे? 
“अरे मैं उसी का सफाया कर डालूगा। ऐसे नीच को मारने से मुझे ब्रह्महत्या का पाप भी नही लगेगा।”
तुलसीदास खिलखिला कर हँस पड़े, कहा- “कौन ब्राह्मण तुम्हारे पक्ष में व्यवस्था देगा?”  
“कोई न दे। राम जी की दृष्ष्टि में मै निष्पाप रहूँगा,यह जानता हूँ।मैं आज ही बटेसुर महराज के यँहा कहला दूगा कि…..।”
“नही, बटेश्वर मेरे गुरु भाई हैं। खैर, छोडो इस प्रसँग को। गंगाराम कब आ रहे है?'' 
“जोतशी जी आज ही कल में आने वाले थे, यहाँ से लौटते समय मैं उनके घर जाकर पता लगा लूँगा।”
कवि कैलास ने उसी समय आंधी के झोंके की तरह प्रवेश किया और बड़े आवेश मे कहने लगे- “वह वैशाखनन्दन वटेश्वर तुम्हारे विरुद्ध जन मत को संगठित कर रहा है। वह तुम्हें यहाँ से निकलवाने के सपने देख रहा है। मैं अभी अभी उसके घर जाकर चलती गली में सबके सामने उसे चुनौती दे आया हूँ।मूर्ख कहीं का दम्भी।”-उत्तेजनावश कैलास जी काँपने लगे।
तुलसीदास ने उनका हाथ पकड़कर बैठाया। शांत होने को कहा बोले- “तुम तो जानते ही हो कैलास कि वटेश्वर मेरे अग्रज गुरु भाई हैं। मेरे प्रति उनका रोष पुराना है।” 
“यह भी तुम जानते ही हो कि मैं सब जानता हूँ और वह भी जानेगा कि किसी कड़े से पाला पड़ा है।आज सबेरे जब भगत जी के यहाँ बटेश्वर की यह‌ खबर आई तभी से मैं क्रोध में उबल रहा हूँ।”
टोडर बोले -"पण्डित्‌ जी, मेरी भी सचमुच यही दशा है। यदि उन्होंनें पण्डितों की पंचायत करके नगर की कुछ बिरादरियों के जोर पर महात्मा जी को यहाँ से निकलवाया तो नगर में हत्याकांड मच जाएगा। बहुत सी छोटी बड़ी जातियों के चौबेरी मेरे भी साथ होंगे।”
कैलास फिर उत्तेजित हो गए, बोले-“मैं उसके मुँह पर कह आया हूँ , टोडरजी, कि तू अपने बाप दादे के सात पीढ़ियों के पोथी-पत्रे निकालकर हमे और हमारे तुलसीदास को मारने का उपाय सोच ले।हे वैशाखनन्दन, कवि की भविष्यवाणी भी याद रखना कि तू जो करेगा वह तेरे ही ऊपर उलटकर पड़ेगा।”
क्रमशः

Friday, 21 July 2023

134

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
134-

तुम कवि हो, बेलाग बात कहना तुम्हारी प्रकृति में है किन्तु तुम्हें यह भी देखना चाहिए कि आलोच्य व्यक्ति अपनी सामर्थ्य भर सत्य को अपने जीवन में निभा रहा है या नहीं। यदि निभा रहा है तो उसके सत्य को देखो, उसकी सामर्थ्य को नहीं और यदि सामर्थ्य कीआलोचना करना ही चाहते हो तो रचनात्मक दृष्टि से देखो।”
“खरी आलोचना करने में कबीरदास जी मेरे आदर्श हैं। जहाँ झूठ को देखा वहीं खींच के ऐसा झापड़ मारते थे कि थोथे अहंकार की चमड़ी उतर जाती थी।”
“मैं महात्मा कबीरदास जी को उच्चतम आत्माओं में से एक मानता हूँ उन्होंने पराई बुराइयों की तीव्र आलोचना करके अपने को सवाँरा परन्तु मैं अपनी ओर समाज की खरी आलोचना करके दोनों को एक निष्ठा से बाँधकर उठाना चाहता हूँ। टूटी झोपड़ियों के बीच में अकेले महल की कोई शोभा नहीं होती है। वह अपनी सारी भव्यता और कलात्मकता में क्षुद्र और गँवार लगता है। फिर भी सच्चे सन्‍तों की बातों को हमें औसत स्तर पर लाकर नहीं सोचना चाहिए।”
“क्यों? न्‍याय की तुला पर सभी बराबर होते हैं।”
“तुम्हें देशकाल का भी ध्यान रखना होगा कैलासनाथ। कबीरदास जी ने जिस समय निर्गुण निराकार की वंदना की थी उस समय नगर नगर गाँव गाँव में हमारे मन्दिर तोडे़ जा रहे थे, लोक समाज की शुभ आस्था तोड़ी जा रही थी। कबीर से रामरूपी आस्था को निर्गुण बखानकर लोक मानस को पक्का बनाए रखा। यह क्‍या छोटी बात है। मैं कबीरदास जी का बडा आदर करता हूँ।”
“लेकिन उनके चेलों के पीछे तो लठ्ठ लेकर डोलते हो।” कैलास ने मुस्करा कर कहा।
“हाँ, आज के वातावरण में उनके गाल बजाऊ समर्थकों के पाखण्ड पर मैं करारे प्रहार करूँगा। यह लोग टूटे हुए समाज की पीड़ा को नहीं पहचानते। पेड़ से गिरे दम तोड़ते हुए प्राणी को यह दो लातें और मारते हैं।”
“तब मेघा भगत पर यदि मैं वही आक्षेप करता हूँ तो तुम चिढ़तें क्यो हो ? ”
“बुरा इसलिए लगता है कि तुम मेघा भाई का गलत मूल्यांकन करते हो। उनकी सामर्थ्य की सीमा कुछ छोटी भले ही हो पर वे पूर्ण भावनिष्ठ हैं। खैर छोड़ो यह प्रसँग , बोलो लीला किस समय होगी?”
उत्तर जैराम साहू ने दिया-“ब्यालू जीमने के बाद होगी महराज जी।मेरे ही बगीचे में आयोजन है। राजा गोवर्धन घारी और उनके गुरु पूज्यपाद नारायण भट्ट जी भी आपके इस दास के घर पर जूठन गिराने की कृपा करेंगें। हम लोग आपको लेने के लिए जल्दी चले आएगें।भैया कैलास जी आपको लिवाने इसी समय चले आँएगें। कहीं चले न जाइएगा। आपको अपनी बगीची मे देखने के बाद फिर चाहे हाकिमों, साहुकारों की दुनियादारी में रहें तो भी मेरे मन में सब हरा भरा रहेगा।”
जैराम साहू की बात ने तुलसीदास के मन को कहीं गहरे में स्पर्श किया, बोले-“जै राम जी, अपने प्रति आपके इस प्रेम भाव से में बड़ा ही आानंदित हुआ हूँ।राम आपका भला करें।”
जैराम साहू हाथ जोड़कर बोले-“महराज जी, सच्चा भाव आप ही में देखने को मिलता है। मैं पण्डित कैलासनाथ जी की इस बात से सहमत हूँ आपके बिना अब मुझे चैन नहीं आता।”
सुनकर तुलसीदास सचेत हो गए, मन कहने लगा कि सुन रे तुलमी, जब तक तेरे हृदय की बगिया में राम जी ऐसे ही नही रमेंगें तब तक तुझे अपनी काव्य और कथा आदि बाहरी क्रिया कलापों में खरी निश्चिन्तता नहीं प्राप्त होगी।
उन्होंने उठकर खड़े होते हुए जैराम साहू के कंधे पर हाथ रखा और बोले- “जै राम जी, आप और कैलास इस समय मेरे लिए गुरुवत सिद्ध हुए हैं, मैं आप दोनों के हृदयों में विराजमान ज्योति स्वरूप सियाराम को प्रणाम करता हूँ।”

उसी दिन झुटपुट समय में तुलसीदास अपनी कुटिया के आगे चबूतरे पर आठ दस आदमियों के बीच में घिरे बैठे बातें कर रहे थे। इतने में तनिक दूर पर एक आवाज सुनाई दी- “है कोई राम का प्यारा, जो इस विरमहतिया के पातकी को भोजन कराय दे? मैं तीन दिन से भूखा हूँ। है कोई राम का प्यारा? ”
किसी की बात सुनते न सुनते लपककर तुलसीदास उठे और तेजी से उस आवाज की ओर चल पड़े।
“है कोई राम का प्यारा जो इस विरमहत्तिया के पातकी को…….”
“आओ, भइया मैं तुम्हे भोजन कराऊँगा।”
थके लड़खडाते पैर, सूखा पिटा निराश चेहरा और बुझी हुई आँखें, फिर से अपने भीतर उमड़ती हुई विश्वास गंगा का बोझ सहसा न उठा पाईं। चाहा हुआ जीवन जब मिल रहा है तब काया से उसका भार उठाने की मानों शक्ति ही नहीं बची थी।तुलसीदास की बात सुनकर, उन्हे देखकर वह इतना आन्नदित हुआ कि गिरने गिरने को हुआ। तुलसीदास ने उसे दोनों हाथों से सँभाल लिया और कहा-“आओ,आओ। झोपड़ी के द्वार तक तुलसी के सहारे चलते हुए वह व्यक्ति रुदन भरे धीमे स्वर में यही दो वाक्य दोहराता चला गया-
“राम तुम बड़े दयालु हो,मैं बड़ा नीच हूँ। राम तुम बड़े दयालु हो।”
चबूतरे पर बैठे लोग बाग अचरज से यह तमाशा देख रहे थे। तुलसीदास ने उसे अपनी झोपड़ी के द्वार पर बैठाया और कहा- “यहाँ बैठों में पानी ले आऊ, हाथ मुँह घो लो तो रोटी दूँ।”
तुलसी भगत भीतर से लोटा भरकर जल लाए, उसके हाथ-पैर घुलाएँ।अपने काँपते हाथों से, चूंकि वह लोटा पकड़ नहीं सकता था इसलिए तुलसी ने स्वयं उसके हाथ धोए पैर घोए,  कुल्ला कराया, जैसे माँ छोटे बच्चे की सेवा करती है, फिर लाकर बिठलाया।भीतर गए। रोटी और दूध लाकर उसे दिया। आप ही उसे मींजकर उसके सामने रखी। वह खाता रहा और यह सामने बैठकर उसे देखते रहे। चबूतरे पर बैठे प्रायः सभी लोग इधर ही आकर खड़े हो गए थे। तुलसी भगत के इस काम पर कानों-कान कुछ आपसी बातें भी होने लगीं थीं। एक व्यक्ति के मन की उबलन बाहर निकलने को आतुर हो गई। वह तुलसी भगत के पास आकर वोला- “ये कौन जात है महाराज?” 
तुलसीदास मुस्कराए,कहा- “अभी तो यह केवल रामजन है, जब खा लेगा तब जात और पाप का कारण पूछूँगा।”  
पेट मे कुछ पड़ चुका था। मन में संतोष छाने लगा था। अपराधी के हाथ भी अब कांप नहीं रहे थे, वे सध गए थे।
क्रमशः

Wednesday, 19 July 2023

133

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
133-

कैलासनाथ बड़ी आत्मीयता भरी दृष्टि से अपने बाल्य बन्धु को देखते हुए
बोले- “जै, श्री शिवराम” 
“जै सियाराम, जै शंकर।” दोनों मित्र मुस्कराने लगे। बैठने पर तुलसीदास ने पूछा--“भाई जी के लिए तुम अभी क्या कह रहे थे कैलास?”  
“मैं झूठ नही कहता तुलसी, मैं इधर कई महीनों से भगत जी के स्वभाव में अन्तर पा रहा हूँ।”
“अभी कुछ ही दिन पहले मैं उनसे मिल आया हूँ,वे मुझे स्वस्थ दिखे।मन से भी चंगे लगे। उनकी बातों में रस था, प्राण थे।”
“हाँ, यह सब है, पर मैं अनुभव से कहता हूँ। मैं कवि हूँ। मैं जब चाहूँ किसी भी छन्द में रस और भावी को समान शक्ति  से बखान दूँगा परन्तु वह शक्ति मेरी पहले की कमाई हुई सिद्धि है, आज की नहीं। यदि मैं अपने काव्य के भीतर कोई नई बात नहीं कहता, अपनी थकी हुई शब्द योजना को ताजापन नही दे पाता तो सब कुछ बेकार है। मेघा भगत भी अब वैसे ही भगत हो गए हैं।”
तुलसी का चेहरा झुक गया। मन कह रहा था कि तेरा भी यही हाल होने वाला है। तुलसीदास, पहले उछाह के भरने मे भक्ति रुपिणी विद्युत संचार करने वाली जिस जलधार से तू नहाया था वह अब तुझसे दूर हो चुकी है।नही, नही, नही !तुलसी के चेहरे पर कम्प आ गया। जैराम साहु कैलास जी से कह रहे थे -“भाई मुझे तो उनकी भक्ति अब ऊँची बढ़ गई मालूम होती है । भक्ति न होती तो भला वे रामलीला की सोच सकते थे?”
“कैसी रामलीला, साहू जी ?” तुलसी ने उत्सुक होकर पूछा ।
कैलास बोले- “अरे उसी का तो निमंत्रण देने आए है हम। वाल्मीकीय रामायण के आधार पर उन्होंने नटों से रामलीला का प्रसँग प्रस्तुत कराया है। कहते है प्राचीन काल मे लीलाएँ होती थीं।उनका अब फिर से प्रचलन होना चाहिए। कल राम-जन्म होगा।”
सुनकर तुलसी की सच्ची ललक सहसा जागी। उत्सुकता भरे आत्मलीन स्वर में पूछा- “राम जन्म होगा?” 
“अरे आगरे वाले राजा टोडरमल है न, उनके बेटे राजा गोवर्धनवारी आज कल नगर में आए हुए है, सो उनको दिखलाने के लिए यह स्वाँग हो रहा है।”
कलास जी की इस बात से जैराम साहु के मुख पर खिन्‍नत चढ़ी, बोले- “कवि जी, आप तो जिसके विरुद्ध हो जातें हैं उसमे फिर किसी अच्छाई को देख ही नहीं पाते। (तुलसी की ओर देखकर) महाराज जी, गुण दोषों पर, हमारी नजर जब तक‌ काँटा तोल न सधे तब तक क्‍या हम सच को परख सकते हैं? ”
“वाह, वाह, यह खरी वैश्य बुद्धि की बात है। काँटा तोल बात आप ही कर सकते थे। मै स्वयं अपने भीतर इस समदृष्टि को पाने के लिए तड़प रहा हूँ। कल किस समय होगा राम-जन्म?”
स्नेह से अपने मित्र की ओर देखकर हँस कर कैलासनाथ ने कहा- “तुम्हारे अन्तर में तो प्रतिक्षण हो ही रहा है। उस दिव्य छवि की झाँकी मैं तुम्हारे नेत्रों में पा रहा हूँ किन्तु मेघा भगत……..।”
“अरे अब क्रोध छोड़ कर बात कर भाई।” तुलसी ने प्यार से भिड़कते हुए कहा- “जैराम जी ठीक कहतें हैं। तुम अब झक्की हो गए हो कैलास।”
कैलासनाथ ने मौन होकर सिर झुका लिया, पल दो पल के बाद ठण्डे स्वर में कहा- “अब की क्या, अब मैं अपनी पराई, सारी लोक लीला से ऊब उठा हूँ बंधु जो तुमको अपने बीच में न पाता तो सच कहता हूँ कि मैं अब तक गंगा में कूदकर अपने प्राण दे चुका होता। एक बडे़ मनसबदार आ रहें हैं तो मेघा भाई लीला दिखला रहें हैं। बाहरी भक्ति ढोंग की रजाई ओढ़…..।”
तुलसी हल्के हल्के चिढ़ गए, कहा-“बस बहुत बक लिए भाई, अब तुम्हारी यह बक बक मुझे चिढ़ाती है।”
कैलास कवि अपने स्वर को यथासाध्य शांत बनाकर बोले- "देखो तुलसी, तुम हमारे वहुत पुराने साथी हो। यही मेघा भगत जी हमारे तुम्हारे साथ का कारण बने। उनके प्रति मेरी श्रद्धा तुमसे छिपी नहीं है। पिछले बीस बाईस वर्षों में मैंने तुम्हें भी देखा है और उन्हें भी। कहो, हाँ।”
तुलसीदास ने हाँ तो न कहा किन्तु गम्भीर भाव से हाँ सूचक सिर हिलाया। कैलास जी बोले- “भगत जी की भक्ति-भावना तुमसे पहले चमकी। तुम्हारी चमक के बढ़ते चरण मैंने आरंभ के दिनों में भी देखे और अब यह विकसित रूप भी देख रहा हूँ, कहो हाँ।”
तुलसीदास गम्भीर रहे किन्तु मुस्कराहट की एक रेखा उनके होठों पर खिंच ही गई। आखो में विनोद की चमक भी आई, कहा- “हाँ ”
“इत्ते वर्षों में हमारे परमपूज्य मेघा भगत जी कोल्हू के बैल की तरह राजे रजवाड़े, सेठ, साहुकार उन्हीं के घेरे मे नाच रहे हैं और तुम गली गली बावले की तरह डोल डोलकर सबके अन्दर नैतिकता की आँधीं उठा रहे हो, उठा रहे हो कि नही?”
“नहीं, हवा”
“क्यों ”
“मैं व्यक्ति की भीतर वाली सगुण निर्गुण खण्डित आस्था को दशरथनन्दन राम की भक्ति से जोड़कर फिर खड़ा कर देना चाहता हूँ। मैं अकेले नहीं, पर समाज के साथ राममय होना चाहता हूँ। मेघा भाई का भी उद्देश्य यही है, पर मार्ग दूसरा है।” 
जैराम साहु और कैलास दोनों ही तन्मय होकर तुलसीदास की बातें सुन रहे थे, उनके स्वर के उतार चढ़ाव उनकी शांत गम्भीर उत्तेजना के बहाव को देख रहे थे। बात समाप्त होने पर कैलास तुलसी के पैर छूने के लिए आगे बढ़े।
“हैं हैं, ये क्या करते हो जी?” के उत्तर में तुलसी के हाथों से अपना हाथ छुड़ाकर पर छूने का हठ ठानते हुए श्रद्धा विगलित स्वर में कहा- “तुम हमारे मित्र भले हो पर तुम सचमुच महान आत्मा हो।तुम्हारी कथनी और करनी में द्व नहीं है। यह सबसे बड़ी बात है। भगत जी बैठे बैठे तो जीवमात्र को अपने कलेजे का बूँद बूँद भाव अर्पित कर देगें, पर कहो कि उठकर जाएँ तो नही।तुम्हारी तरह गली गली डोलना उन्हें एक अप्रतिष्ठित कार्य लगता है।” अपनी बात कहते कहते उत्तेजनावश कैलास जी तुलसी के पर छूने का स्वयं अपना ही आग्रह बिसार कर सीधे खड़े हो गए। उनकी बाँहे छोड़ कर तुलसी ने मुस्करा कर कहा- “देखो, कैलास मनुष्य अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही आगे बढ़ता है। फिर हर एक की प्रकृति में थोड़ा बहुत अन्तर भी होता ही है।
क्रमशः

132

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
132-

आठ दस दिन को कह गये थे।अब लगभग डेढ़ महीना पूरा होने को आया।”
“पण्डित जी चुनार में बीमार पड़ गए थे महात्मा जी। मैंने कल ही उनके घर आदमी भेजकर पुछवाया था। अब स्वस्थ हैं और बस दस पाँच दिनों के भीतर आने ही वाले हैं।”
“हाँ, हमारा विचार है कि एक बार यहाँ के विद्वान‌ समाज से भी हमारा नेह नाता बँध जाय। हमें न जाने क्‍यों भीतर ही भीतर यह आभास होता है कि वह वर्ग हमारे लिए व्यर्थ ही में संकटकारी भी हो सकता हैं।”
“अरे नहीं, महात्मा जी, आप चिंता न कीजिए। एक दिन जहाँ सबको दिव्य ठंडाई बूटी छनवाई, स्वादिष्ट भोजन छकाए, जरा इतर फुलेल, हार गजरे से मस्त किया नहीं कि सब हाँ जी, हाँ जी कहते डोलने लगेंगे।”
तुलसी मुस्कराए, कहा- “बात इतनी सरल नही है टोडर। खैर होगा, राम करे सो होय।”
टोडर के जाने के बाद एकांत मे चूल्हे पर अपनी खिचड़ी पकाते हुए ध्यानमग्न बैठे थे। मन कह रहा था- “यश की चाह,धन की चाह और कामिनी की चाह, यह तीनों एक ही हैं तुलसी। इनमे अंतर मत समझ। केवल स्त्री को ध्यान से हटा देने मात्र ही से तू निष्काम नहीं हुआ। यश की लालसा भी काम ही है। तू कुछ दिनों तक अपना कथा व्यापार बंद कर, नहीं तो तेरा दंभ फूल उठेगा।कथा व्यापार क्यो छोड़ू ? क्‍या इससे मेरी कीर्ति ही बढ़ती है? नहीं टूटे हुए दुखित नर नारियों को आस्था भी मिलती है।उनके जीवन में रस आता है। मैं जो काम केवल अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने की कामना से ही करूँगा वह कदापि सफलीभूत न होगा। मेरी भी ऐसे ही नाक कटेगी जैसे कथा प्रसँग में सूपर्णखा की नाक कटने वाली है।” 

तुलसीदास के चेहरे पर हँसी आ गई। हंडिया का ढक्कन उठाकर खिचड़ी की स्थिति देखी और उसे कलछुल से हिलाते हिलाते सहसा मन फिर बोला-“अच्छा, सूपर्णखा प्रसँग में रामजी जो जरा सी चकल्लस करें तो क्या बेजा होगा? मर्यादा पुरुषोत्तम जगदंबा के सामने स्वयं तो हँसी में भी किसी अन्य स्त्री को प्रोत्साहन न देंगे।”
तुलसी गुनगुनाने लगे-  “सीतहिं चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुमारे मोर लघु भ्राता॥
रे गइ लछिमन रिपु-भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी॥”

आँखों के सामने दृश्य आने लगे।कुटी के बाहर एक ओर सियाराम जी बैठे हैं। उनसे थोड़ी दूर पर लक्ष्मण जी वीरासन पर बैठे हैं। कामिनी शूपर्णखा रीझ भरी और ललचाई हुई दृष्टि से लक्ष्मण को देख रही है। लक्ष्मण कहतें हैं-
“सुन्दरि सुनु में उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा॥” 
गुनगुनाहट में पंक्तियों पर पंक्तियाँ बनती गई--सीतहिं समय देखि चतुराई।
राम लक्ष्मण को संकेत करते हैं। लक्ष्मण आगे बढ़कर सूपर्णखा को पकड़ कर गिरा देतें हैं और उसके नाक कान काट लेते हैं।
एकाएक तुलसी का ध्यान दूटता है।झोपड़ी की फूँस से बनी दीवारों का कोना, उसके आगे बना हुआ चूल्हा, उसके ऊपर चढ़ी हुई मिट्टी मढ़ी हंड़िया आँखों के सामने आ जाती है। तुलसी की नाक में अप्रिय गंध आ रही है। खिचड़ी से जलाँध उठने लगी थी। झट से हड़िया उतारी, उसका ढकना खोल- कर देखा। खिचड़ी की स्थिति देखकर हँसे और आप ही आप बोल उठे-“अच्छी सूपर्णखा की नाक की चिंता की, मेरी खिचड़ी ही जल गई। खैर अब इसकी चिंता छोड़ कर इन चौपाइयों को लिख डालूँ  फिर याद से उतर जाएँगी तो कठिनाई होगी।”

वेनीमाधव के बोलने से बाबा का ध्यान भूतकाल से वर्तमान में आ गया। संत जी ने पूछा- “पंडितों की वह सभा जो आप चाहते थे?”
बाबा हँसे और बोले -“वह न हो पाई। पण्डितों ने पण्डित गंगाराम और टोडर दोनों ही को, हमारा पक्ष लेने के कारण निंदित किया। वही अयोध्या जैसी दशा हुई। हमारी लोकप्रियता कवि पण्डित समाज की ईर्ष्या का कारण बन गई ।”
“इस प्रतिकूल वातावरण का प्रभाव आपके काम में निश्चय ही बाधक सिद्ध हुआ होगा गुरू जी।”
“बाधक नहीं साधक सिद्ध हुआ, क्योंकि हम खरे अर्थ में विरक्त होना सीख गए।”
वेनीमाघव बोले- “गुरू जी, इतना त्याग कर चुकने के बाद भी आपने अपने को क्या उस समय तक विरक्‍त नहीं माना था?”
“कैसे मानता वेनीमाधव, मैं अपने राम के प्रति अनुरक्त होते हुए भी अपनी काव्य प्रतिभा से ही अधिक लगाव रखता था। मुझे साधारण जन समाज से मिलने वाला स्नेह उतना नही रिझाता था जितना कि अभिजात वर्ग से प्रतिष्ठा पाने की लालसा। फिर भला बतलाओ कि मैं अपने आपको रामानुरागी वीतरागी क्योंकर मानता? यह तो अरण्यकाण्ड रचते हुए जब सीता जी के विरह में राम जी के विलाप का वर्णन करने लगा तो सहसा मुझे लगा कि-
♦️♦️♦️♦️♦️♦️♦️

रामायण रचते रचते तुलसीदास ने एकाएक अपनी कलम रख दी और गहरी चिंता की मुद्रा में सूनी उदास दृष्टि से अपनी कोठरी के बाहर चमकते प्रकाश को देखने लगे। मन कहता है, “रे तुलसी, प्रतिष्ठा का दशानन तेरी भक्ति को हर ले गया है। तू काव्य में जिस असीम भक्ति की बातें कर रहा है वह क्या सचमुच तेरे पास है?”
“नहीं, हाँ है। मैं सूने मन से भक्ति की बात नही कर रहा हूँ। मैं जन जन में राम के दर्शन करने के लिए सतत‌ प्रयत्नशील रहता हूँ।”
“फिर दम्भी रावण समाज मे प्रतिष्ठा पाने की लालसा तुझे क्यों सताती है?”तुलसीदास की प्रश्न भरी आँखों में लज्जा का बोध धलका, आँखें नीची हो गईं। एक गर्म उसाँस मुँह से निकल गई। वे अनमने होकर एकाएक उठ खड़े हुए और अपनी कोठरी में बावले से चक्कर काटने लगे। मन झिड़क रहा था, “कहाँ है तेरी राम दर्शन की चाह? तू भूठा है, लबार है।”
“मैं काव्य रचते हुए राम जी का ही तो ध्यान धरता हूँ।”
“झूठा है, तू केवल कथा प्रसँगों को जोड़ने की चिन्ता करता है। तेरे मन में राम का वास्तविक स्वरूप अब भी नहीं आया।”
“कैसा है वह रूप? कहाँ देखूँ , कहाँ खोजूँ , कहाँ पाऊँ?”
बाहर से कैलास जी का स्वर सुनाई पड़ने लगा। वह किसी से कह रहे थे- “मैं आपसे सच कहता हूँ कि अब मेघा भगत वह पहले के मेघा भगत नहीं रहे।”
जैराम साहू और कैलास कवि बातें करते हुए भीतर आ चुके थे। जैराम हाथ जोड़ कर जै सियाराम कहते हुए आगे बढ़े और तुलसी के चरण छूने को झुके।
क्रमशः

Tuesday, 18 July 2023

131

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
131-

तुलसीदास ने घड़े का पानी डालकर उसे बुझाया।अपनी झोली उठाई, बाहर निकल कर चौकन्‍नी दृष्टि से इधर उधर देखने लगे फिर प्रार्थना की- “हनुमान जी, मैं आपकी ही आज्ञा से यह काव्य रचना कर रहा हूँ। मु्झे सुचित्त होकर लिखनें दें।”
कहकर वे अधेंरी गलियों में चल पड़े। रात अभी पहर भर ही चढ़ी थी। नगर की सब गलियों में अभी पूरी तरह से सन्नाटा नहीं हुआ था। जिस समय वे गोपाल मन्दिर की गली से गुजर रहे थे, उस समय मन्दिर में आरती के घंटे घड़ियाल बज रहे थे। तुलसीदास मंदिर में चले गए।आरती समाप्त हुई। पट बंद हुए। भक्‍त जन अपने अपने घरों को चले। 
तुलसीदास ने तब वहाँ के एक कर्मचारी से कहा- “अयोध्या जी से आया हूँ। यहाँ हनुमान फाटक पर ठहरा था। कुछ दुष्ट प्रकृति के लोगों ने धर्म के नाम पर वहाँ मुझे तंग करना आरम्भ किया और आज तो कोठरी के किवाड़ों में आग तक लगा दी। क्या मुझ निराश्रित को यहाँ रात भर टिकने के लिए स्थान मिल सकेगा।” एक क्षण तक तो पुजारी उन्हें देखता रहा, फिर कहा- “आओ हम तुम्हें सोने की जगह बतला दें।”
♦️♦️♦️♦️♦️♦️♦️

“गोपाल मंदिर मे अधिक दिनों तक टिक न सका।” 
“क्या उन लोगों ने आपका विरोध किया गुरू जी”
“हाँ, परन्तु मैं किसी को दोष नहीं देता। बात यह कि मेरी कथा के प्रशंसक शीघ्र ही मुझे खोजते हुए वहाँ पहुच गए। उनमे टोडर सबसे पहले पहुँचे।” 
“हाँ गुरू जी मैं उन्हीं के बारे में सोच रहा था। वे बेचारे तो बहुत दु:खी हुए होगें?”
“पूछो मत, बहुत दु:खी थे। अस्तु यह भीड़ भाड़ और एक अपरिचित शरणार्थी
का यह महत्व स्वाभाविक रूप से मेरे प्रति ईर्ष्या का कारण बना। मैं उस समय अरण्यकाण्ड के लेखन में इतना तन्मय था कि तुमसे क्या कहूँ। मेरे सामने राम कथा के बिंबो को छोड़कर एक और भी चित्र आता था और वह था, कथा सुनने वाले भक्त नर-नारियों का। काल से पिटे, शासन से दुरदुराए, अपने भीतर से टूटे हुए निरीह नर-नारियों का समाज जब मेरी आँखों के सामने आता था तो ऐसा अनुभव करता था कि जब अपने साथ ही साथ इन मनुष्यों में रामभद्र के अवतार की कामना करूँगा, तभी मुझे श्री युगल कमल चरणो में खरी भक्ति मिलेगी।”
“आप ऐसा क्‍यों अनुभव करते थे गुरू जी?”
बाबा हँसे, बोले-  “जिसके पैरों में बिवाइयाँ फटती है न, वही दूसरों के दर्द को समझ सकता है।जीवन तत्त्व और है ही क्या? उदारता और स्वाधीनता मिल कर ही जीवन तत्त्व हैं। इन दोनों के मेल से प्रेम तत्त्व आप ही आप उमगता और निखरता है।”
“क्या फिर गोपाल मंदिर वाली कोठरी भी आपको छोड़नी पड़ी?”
“हाँ, टोडर बड़े ही प्रेमी जीव थे। यों तो केवल चार गाँवों के ही ठाकुर थे, पर उनका कलेजा किसी बड़े से बड़े साम्राज्य के विस्तार से कम न था।उन्होंने असी घाट पर तुरन्त ही यह जमीन खरीद ली। मेरे लिए पहले तो एक मडैया छवा दी। फिर धीरे धीरे मंदिर इमारत इत्यादि भी उन दिनों में बनवाईं।”
“जब हम अगली रामनवमी पर कुछ महीनों के लिए अयोध्या चले गए थे, परंतु…..”
“वह आगे की बात है। कथा प्रेमी भीड़ वहाँ भी, अर्थात असी घाट पर भी पहुँच गई। नगर में किसी तरह से ये किंवदंती फैल गई कि मेरे शत्रुओं द्वारा सताए जाने पर हनुमान जी अपना विराट रूप धारण करके प्रकट हो गए थे, जिससे दुष्टों की भीड़ भाग गई। मेरे संबंध में इतनी चमत्कारिक कथाएँ नगर में फैल गईं कि वहाँ पहुँचने के चौथे पाँचवे दिन एक विशाल समुदाय मेरे सामने था। इससे मैं भूल गया पंडितो के ईर्ष्या, द्वेष की बात, भूल गया आने वाले संकटो की बात।उस समय मैं अरण्यकाण्ड रचना में ही डूब रहा था। उसे ही तन्मय होकर सुनाने लगा।” 
♦️♦️♦️♦️♦️♦️♦️

तुलसीदास अरण्यकाण्ड सुना रहें हैं। जनता मंत्रमुग्ध होकर सुन रही है। उनके स्वर में ऐसा आकर्षण और वर्णन में ऐसी चित्रमयता है कि लोगों को लगता है कि मानों सारे दृश्य उनकी आँखों के आगे घट रहे हैं। महर्षि अत्री के आश्रम में सीता राम लक्ष्मण का स्वागत होता है। अनुसूईया सीता को उपदेश देतीं हैं। वन में रहने वाले ऋषि पुनि और तापस उनका अलौकिक रूप और बल देखकर उनमें परमब्रह्म के दर्शन पातें हैं। तुलसी दास ने राम का ऐसा मार्मिक रूप आँका कि सुनने वालों के मत में उस सुन्दरता को देखने की ललक उनके प्राणों की सारी शक्ति समेटकर उन्हें भाव रूप राम का दर्शन कराने लगी।टोडर तो ध्यानलीन हो गए थे। कथा में फल फूल अनाज पैसे चढ़ने लगे।
तुलसीदास भीड़ के जाने के बाद टोडर से बोले- “आज और कल सबेरे के लिए इतने दाल चावल रखे लेता हूँ। बाकी सब ग़रीबों को बँटवाने की व्यवस्था आप कर दें और इन रुपये टकों का उपयोग कुछ नि:सहाय विधवाओं और दीन दुःखियों में बाँट कर करें।”
टोडर बोले- “महात्मा जी, आप तो बस लिखिए और सुनाइए। बाकी सारी चिन्ताएँ मेरे ऊपर छोड़ दीजिए। हमने एक और प्रबंध भी कर दिया है कुछ पहलवान यहाँ रहेंगे।उनके लिए अखाड़ा भी बनवा दूँगा । फिर कोई टिर्र पिर्र करेगा तो….।”
“तुम मेरी सुरक्षा की चिन्ता छोड़ो। मेरे बल राम हैं और सहायक बजरंगबली। बाकी अखाड़ा बन जाने से हमें सचमुच बड़ी प्रेरणा मिलेगी। हम तो सोचते हैं कि नगर में जगह जगह अखाड़े बन जाएँ, अखाड़ों में हनमान जी की मूर्तियाँ स्थापित हो जाएँ और चारों वर्णों के तरुण सबल बनें। एक बार राम जी की वानरसेना तैयार हो जाए तो फिर उन्हें प्रगट होते देर नहीं लगेगी। (बच्चों की तरह मचलकर) टोडर, अखाड़ा तुम जल्दी से जल्दी बनवा दो मित्र। पहले एक अखाड़ा मेरे यहाँ बन जाए, हमारे जवान तगड़े बनने लगे तो फिर मैं इस शंकर जी के शहर में चारों ओर हनुमान अखाड़ों की गुहार लगाऊँगा। राम जी की सच्ची पूजा न्याय पक्ष की पूजा है। जब हमारे जवान हनुमान बली का आदर्श लेकर बली बनेंगे तभी न्याय की प्रतिष्ठा और रक्षा भी हो सकेगी।” तुलसीदास के मन में बड़ा उल्लास था। कुछ देर वे अपने ही में मगन रहे फिर एकाएक पूछा, “अरे भाई, हमारे गंगा राम की कुछ खैर खबर मिली?
क्रमशः

130

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
130-

वहीं इनकी कथा होगी। लौटते समय हमने टोडर से कहा- “टोडर जी आपने कथा का न्योता देकर मुझे बड़े असमंजस में डाल दिया है।”
“क्यों महात्मा जी?”
“कृपा करके आप मुझे महात्मा न कहें । मैं साधारण मनुष्य हूँ। थोड़ा बहुत राम जी का नाम जप लेता हूँ बस इससे अधिक और मेरी कुछ पहुँच नहीं है।”
टोडर हाथ जोड़कर बोले- “यदि मैंने आज आपका प्रवचन न सुना होता तो मैं मुख से यह शब्द आपके लिए एकाएक कभी न निकालता। महाराज मैं ठहरा दुनियादार लोक-व्यवहार में दिन-रात लगा रहता हूँ। भले बुरे सभी मिलते हैं। मैं सँभलकर मुँह से शब्द निकाला करता हूँ पर कथा के लिए स्थान बतलाकर मैंने क्या कुछ गलती की महात्मा जी?”
“नही, वैसे तो कथा बाँचना ही मेरी जीविका है और उसे छोड़ना भी नहीं चाहता। विरक्‍त के हेतु भी आज के समय मे स्वाभिमान से जीने के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी जीविका अवश्य कमाएँ। कबीर साहब अपने चरखे करघे के घन्धे से बँधे थे इसलिए उनकी वाणी मुक्त थी। मैंने भी अयोध्या में यही सबक सीखा। पर अभी कुछ दिनों यह करना नहीं चाहता था। उसी उद्देश्य से अयोध्या से कुछ धन भी ले आया हूँ।”
“अब अपनी दो रोटियों की चिंता का भार दया करके अपने इस दास पर ही छोड़ दें।आप आनन्द से अपनी रामायण लिखें और आपसे मेरी अरदास तो यही है कि कथा अवश्य सुनाएँ। हम जैसे प्राणियों का भी उद्धार होना चाहिए महात्मा जी।”

“मैं भला टोडर से यह कैसे कहता वेनीमाधव कि मेरा अहंकार, सिद्ध कथावाचक और भाषा के कवि के रूप में विख्यात होने से पहले काशी के पण्डित समाज में प्रतिष्ठित होने के लिए तड़प रहा है। देखी यह विडंबना कि एक ओर राम भक्ति पाने के लिए मन तड़पता है और दुसरी ओर पण्डितो से संस्कृत के कवि के रूप में वाह वाही पाने की छटपटाहट भी है। एक ओर दुनिया से वैराग भी है और दूसरी ओर यह वाह वाही का लोभ भी। इसी द्वंद्व से मेरी सच्ची चाहना को निकालने के हेतु नियति ने मानों मेरे लिए काशी में भी संघर्ष का एक वातावरण प्रस्तुत कर दिया।”
“कैसा संघर्ष हुआ गुरू जी?”
“टोडर ने अपने भद्र समाज में मेरी बड़ी प्रशंसा की। उघर मंगलू भगत और उनकी तरफ के लोग दूसरे दिन ही मेरे हनुमान फाटक वाले नये स्थान पर पहुँच गए। स्वाभाविक रूप से प्रवचन का आयोजन हुआ। बस, फिर तो तुलसी भगत तुलसी भगत की धूम मचने लगी।”
♦️♦️♦️♦️♦️♦️♦️

हनुमान फाटक पर तुलसी के निवास स्थान पर बड़ी भीड़ जमा है। तुलसीदास अभी कहीं पास ही में गए हुए है। जनता उनकी प्रतीक्षा में है। लोगों में बातें चल रहीं हैं।
“भाई, बहुत देखे, पर इनके ऐसा कोई नहीं देखा।”
“कैसा सरूप है और कसा मधुर कण्ठ पाया है। अरे प्रेम देखो उसका, सुनाते सुनाते कैसा अपने से रम जातें हैं। इनको राम जी जरूर दर्शन देते होगें भइया।”
“हाँ भाई, जिसकी जैसी करनी उसको वैसा ही फल मिलता है। हम तो इसी मोहल्ले में रहतें हैं।आठों पहर देखते हैं या तो बैठें-बैठे लिखा करतें हैं या फिर धर्म उपदेश दिया करतें हैं। कोई ऐब नहीं। औरतों की ओर तो आँखें उठाकर भी नही देखते। काशी में ऐसे-महात्मा हैं तो जरूर, पर बहुत कम दिखाई देते हैं।”
थोड़ी ही देर में तुलसीदास टोडर को साथ लिए आ गए। मजमा उनके सम्मान में उठ खड़ा हुआ। जै-जे सियाराम और हर-हर महादेव के जयकारे गूँजे। जैसे ही जयकारे गूँजे वैसे ही न जाने कहाँ से ढेले आने लगे। तड़ातड-तड़ातड़ ढेलों की बौछार होने लगी। भीड़ में कई लोग घायल हुए। कइयों ने उत्तेजनावश चीखना पुकारना आरभ कर दिया। थोड़ी ही देर में भीड़ ढेलों की बौछार से त्रस्त होकर भागी। ढेले आस पास की छतों से आ रहे थे। तुलसीदास शांत खड़े देखते रहे। उनके बाँयें कंधे पर एक लखौरी ईंट चोट करती हुई निकल गई थी। खून बह रहा था। टोडर अपने रूमाल से उसे पोंछते हुए बोले- “यहां कुछ लोगों ने अपना धर्म परिवर्तत कर लिया है। यह दुष्टता उन्होंने ही दिखलाई है।” तुलसीदास मौन रहे।
दूसरे दिन सबेरे ही सवेरे तुलसीदास जब गंगा स्नान से लौटकर आए तो उन्हें 
अपनी कोठरी की चौखट के आगे एक मरा हुआ कुत्ता, कुछ हड्डी के टुकड़े आदि पड़े दिखाई दिए। तुलसीदास के पैर ठिठक कर थम गए। मुँह से राम-राम शब्द निकला। तीसरे दिन जब भी कोई तुलसीदास के द्वार पर आता तभी, उसके ऊपर ढेले बरसने लगते। चौथे दिन तुलसीदास टोडर से बोले- “भाई मैं यहाँ नहीं रहूँगा।हनुमान जी मुझे यहाँ रहने की आज्ञा नही देते।”
टोडर अकड़कर बोले- “अरे महात्मा जी, चार दिन इन्होंने उत्पात मचा लिया, अब देखिए मैं भी इन्हें अपना तमाशा दिखाऊँगा। अकबर बादशाह का राज है, सबको अपने धरम करम की छूट है।ये लोग कोई सचमुच मुसलमान थोड़े ही हुए थे। बिरादरी में फूट पड़ गई, बस इन लोगो ने धर्म बदल दिया। बदला लेने के लिए हमें सताते हैं। मैं कल ही यहाँ के हाकिमों से मिलकर सारा प्रबध कर लूँगा। आप यहीं पर रहें।”

तुलसीदास रात में अपनी कोठरी बंद करके, दिये के सामने बैठे लिख रहे हैं। अत्रि ऋषि के आश्रम में सीता सहित राम लखन, दोनों भाई, विराजमान हैं। तुलसीदास दोहा लिख रहे हैं-

प्रभु आसन आसीन, भरि लोचन शोभा निरखि। 
मुनिवर वचन प्रवीन, जोरि पानि अस्तुति करत।

तुलसीदास तन्मय होकर लिख रहें हैं। अचानक देखते है कि बंद किवाड़ों के भीतर धुआँ और आग घुसी चली आ रही है। तुलसीदास घबराकर उठ खड़े होते, हैं। हे राम, यह कैसी परीक्षा। मेरी सारी काव्य रचनाएँ नष्ट हो जाएँगी। तुलसी दास क्षण भर तो मूढ़वत खड़े रहे, फिर झटपट अपनी झोली उतारी, अपने आगे फैले हुए कागज-पत्र जल्दी जल्दी समेट कर उसमे रखे, उस पर अपना धोती अंगौछा रखा और लोटे में दवात कलम डालकर झोली तैयार करके रखी।चौखट के एक कोने से लपटें भी निकलने लगीं और बंद कोठरी में धुँआ तो दम घोटने वाला हो गया था। कोने में पानी का घड़ा रखा था।उससे लपटों वाले स्थान पर पानी डालने लगे। लपट शांत हुई, कुण्डी खोली।पूरी चौखट धीरे धीरे आग पकड़ रही थी।
क्रमशः

Sunday, 16 July 2023

129

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
129-

गंगाराम बोले- “अरे भाई, तुम इन्हें अभी से चंग पर न चढ़ाओ टोडर जी, अभी कुछ दिनों तो मैं इन्हे अपने ही पास रखूँगा।” 
दो क्षण मौन रहा, फिर बात को नये सिरे से उठाते हुए गंगाराम टोडर से बोले- “तो भाई, हमारा प्रश्न विचार तो यही ठहरता है कि तुम्हारा और मंगल भगत का समझौता हो जाएगा। टोडर, मार पीट, खून खराबे की नौबत नहीं आएगी।”  
“यही बात मेरी समझ में नहीं आती है महाराज, यो तो मंगल भी भला है और मैं भी भला हूँ पर हठ में न वह कम है और न मैं। वही किस्सा है कि नाले के आर-पार जाते हुए दो बकरे बीच में रखे छोटे से पटरे पर खड़े हैं और जब तक एक बकरा दूसरे को टक्कर देकर नाले में गिरा न दे तब तक वह आगे नहीं बढ़ सकता।” 
तुलसी बोले- “बात पूरी न जानने के कारण मैं ठीक तरह से तो नहीं कह सकता, पर मुझे भाई गंगाराम की बात उचित ही जान पड़ती है। बकरे तो पशु थे किन्तु आप मानव हैं, राम चेतना युक्‍त हैं। आप दोनों को बकरों जैसी टकराने की स्थिति से बचना ही चाहिए।” गंगाराम बोले- “उचित बात कही।पर बात भी कुछ नहीं, मंगल अहिर भृगु आश्रम के पास रहता है। वहाँ उसकी दो-चार एकड़ भूमि है। इनके यहा बंधक पड़ी है। वह इनका रुपया चुका नही पाया। मियाद निकल चुकी है। अब मन में मोह है कि अपना यश बढाने के लिए यह उस स्थान पर एक धर्मशाला बनवा दें और फलों का बगीचा भी लगवा दें। इधर मंगल इनसे और मियाद चाहता है। वह स्वय भी उस भूमि पर अपने यश के लिए कोई काम करता चाहता है।”' टोडर बोले- “मैं जानता हूं महाराज कि उसे चाहे जितनी मियाद दे दी जाए, वह अव मेरा ऋण चुकाने लायक नही रहा। पिछले साल पशुओं की बीमारी में उसकी आधी से अधिक गायें मर चुकीं हैं, परन्तु वह अपनी हेकड़ी नहीं छोड़ता।”- तुलसी ने टोडर से कहा- “टोडर जी,मेरा विचार यह कहता है कि आपको किसी महात्मा की कृपा से अक्षय यश मिलेगा मेरे कहने से आप यह तकरार छोड़ दें।” टोडर थोडा असमंजस में पड़े, फिर बोले- “आपकी जैसी आज्ञा हो महाराज पर…….।”
“अब पर वर न निकालो टोडर। तुलसी की इस बात का समर्थन तुम्हारी जन्मकुण्डली से भी होता है। मेरा ध्यान अब इस वात पर गया। मंगलू से लड़ना ठीक नहीं होगा। वह हठी जरूर है पर बड़ा ही भला और परोपकारी व्यक्ति है।” 
“जब दो पण्डित एक ही मत के हों तो मुझे मानना ही चाहिए।” 
पण्डित गंगाराम जी उत्साह भरे स्वर में बोले- “अरे ये कोरे पण्डित ज्योतिषी या कवि ही नही, बड़े राम भक्त भी हैं। हो सकता है कि हमारें ये तुलसी ही आगे चलकर महात्मा सिद्ध हों और तुम्हें इनकी कृपा से यश मिले”

तुलसी खिलखिलाकर हँस पड़े। पण्डित गंगाराम के हाथ पर हाथ मारकर कहा-“तुम्हारी विनोद वृत्ति अभी वैसी ही बनी हुई है। मुझे याद है टोडर जी कि गंगा राम हम लोगों के साथ पढ़ने वाले एक भोजनभट्ट छात्र, घोड़ू फाटक को भी मेरे संबंध में ऐसे ही बहकाया करते थे।”
गंगाराम भी हँसे परन्तु फिर गम्भीर होकर बोले-“तुलसी, जब मनुष्य चाहता है तब कुछ नहीं होता है। जब ईश्वर चाहता है तब सब कुछ सिद्ध हो जाता है और जब मनुष्य और ईश्वर दोनों मिलकर चाहते हैं तब कुछ भी असम्भव नहीं होता। तुम्हारे संबध में मेरी भविष्यवाणी गलत नही होगी। अरे, इसी प्रसँग में याद आया, टोडर हम अपने मित्र के सम्मान में यहाँ के प्रसिद्ध पण्डितों और कवियों की एक गोष्ठी करना चाहते हैं।”
“मैं सारा प्रबंध कर दूँगा महाराज और जहाँ तक हो सके मंगल को यहाँ बुलवा कर आप ही समझौता करवा दीजिए।”
“तब तो भाई तुम्हें और दस दिन ठहरना पड़ेगा। मैं कल सबेरे चुनार जा रहा हूँ।” 
तुलसी एकाएक बोल उठे- “जब वह भी भला है और आप भी भले हैं तब बीच में बात चलाने के लिए आवश्यकता केवल एक तीसरे भले आदमी की ही है, चाहे उसकी जान पहचान हो या न हो । मैं आपके साथ चलने को तैयार हूँ टोडर जी। अनेक वर्षों से भृगु आश्रम की ओर गया भी नहीं हूँ। फिर यह निश्चित है कि रामकृपा से मेरी बात खाली नहीं जाएगी क्योंकि आप अपना दावा छोड़ रहे हैं।टोडर कुछ सोचकर बोले- “अच्छा, तो फिर मैं कल पहर भर दिन चढ़े तक
यहाँ आकर आपको साथ ले चलूँगा। पण्डित जी तो उस समय यहाँ होगें नहीं।”
“हाँ, इसी कारण से आप मेरे लिए, हनुमान फाटक वाले उस स्थान का प्रबंध भी आज ही कर लीजिएगा।” 
आश्वासन मिलने पर तुलसीदास को लगा कि अब वे एक अत्यंत अनुकूल वातावरण में पहुँच गए हैं। उनका काव्य निश्चय ही अब सुख से आगे बढ़ 
सकेगा। उन्हें संस्कृत भाषा के कवि समाज में अपनी संस्कृत काव्य रचनाए
सुनाने का अवसर मिलेगा। यह सब कल्पनाएँ उनके अहम को बड़ी तुष्टि दे रहीं थीं।

वेनीमाधव को अपनी पूर्व कथा सुनाते सुनाते तुलसीदास मौन हो गए फिर कहा- “देखो, नियति कैसा खेल खेलती है।हम चाहते थे कि काशी में अपनी कथा आरभ करने से पहले वहाँ के पण्डित समाज में एक बार अपना सिक्का जमा लें तो उसका परिणाम शुभ होगा। अयोध्या में पहले पण्डित समाज में हेल मेल नहीं बढ़ाया इसीलिए, उस समाज के कुटिल पुरुषों को हमारे विरुद्ध पैर जमाने का अवसर मिल गया। काशी में यह न करेंगें। परंतु प्रभु की वैसी इच्छा न थी। हम टोडर के साथ जो भृगु आश्रम गए तो वहा मंगल‌ अहिर से बड़ा प्रेम हो गया। वह सचमुच भक्त आदमी था। फैसला तो खैर तुरंत ही हो गया, कोई बात न थी? फिर उसने हम दोनों को रोक लिया। उसने हमसे कहा कि आपकी बातें बड़ी सुन्दर हैं। हम गाँव जवार के लोगों को बुलाए लेते हैं। कल सबेरे प्रवचन कीजिए तब जाइएगा और मेरा वह राम कथा प्रवचन ही काशी और उसके आस पास के क्षेत्रों में मेरे यश का कारण बन गया।बहुतों ने पूछा कि आप कहाँ कथा बाँचेगें। हम आया करेंगे। टोडर चट से बोल दिए कि हनुमान फाटक पर महात्मा जी रहेंगे।
क्रमशः

Saturday, 15 July 2023

128

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
128-

दरबान की बात काटकर यथासाध्य शान्त स्वर से कहा- “ठीक है, परन्तु तुम उनसे जाकर इतना अवश्य कह दो कि तुलसीदास आए हैं।”
दरबान विनय दिखाकर तुरन्त चला गया और उसकी विनय ने तुलसीदास को धक्का दिया। मन बोला, 'रे मूढ़ तुलसी, अभी तेरा अहंकार नही गया।बेचारे दरबान पर रोब दिखाता है।”
अपने अपराध के प्रायश्चित स्वरूप तुलसीदास वहीं चबूतरे पर बैठकर राम-राम जपने लगे। राम नाम उनकी मति को सही राह पर हाँकने वाला डण्डा था। कभी आन्नदमय बनकर वह उन्हें अपने भीतर किलोलें भी कराता था। वही उनका मोह भी बन चला था। जपानुज्ञासित होते ही तुलसी का मन शान्त हुआ।
तभी भीतर से गंगाराम तेजी से डग भरते आते दिखाई दिए तुलसीदास का चेहरा खिल उठा। वे अपने मित्र के सम्मानार्थ उठकर खड़े हो गए और दो डग आगे बढ़ आए।
“अरे, तुलसी”- दोनों मित्र एक दूसरे से आलिंगनबद्ध हो गए, फिर विस्मय झलकाते हुए गंगाराम ने पूछा- “यह क्या वेश बना रखा है? ” 
तुलसी की दोनों बाँहे गंगाराम की पीठ पर थी, दाहिनी हट गई। बाईँ के दबाब से उन्हें आगे बढ़ने का संकेत देकर स्वयं एक डग बढ़ाते हुए वे मुस्करा कर बोले- “भीतर चलो। सब बतलाऊँगा।”
दालान में नौकर खड़ा था। गंगाराम ने उसे उँगली और आँखों से तुलसीदास के पैर धुलाने का आदेश दिया और भीतर बैठके की ओर मुँह करके बोले- “अभी आया टोडर जी।” भीतर से आवाज आई- “हाँ, हाँ, महाराज, हमें जल्दी नहीं है। तुलसी बोले-“तुम भीतर चलो, मै आया।” आँगन में दालान के खम्भे से लगी संगमरमर की चौकी पर बैठकर तुलसीदास स्वयं अपने पाँव धोने के लिए उद्यत हुए किन्तु नौकर ने उन्हें ऐसा न करने दिया। हाथ मुँह धोकर ताजे हुए फिर अपनी झोली उठाने लगे। नौकर स्वयं उसे उठाने लपका किन्तु तुलसी ने बरज दिया- “मैं स्वयं ले जाऊँगा।” भीतर प्रवेश किया तो गंगाराम अपनी गद्दी पर बैठे बैठे ही हिले और टोडर जी उनके सम्मान में हाथ जोड़कर खड़े हो गए। तुलसीदास की आँखें टोडर से मिलीं। दोनों ओर नेह की कनी पुतलियों में चमकी। टोडर देखने मे सुदर्शन थे। बड़ी-बड़ी भव्य मूंछे, गले मे सोने का कण्ठा और मोती माला पड़ी थी। उँगलियाँ अँगूठियों से जड़ी थी-दुपट्टा प्रगरखा भी कीमती था। पण्डित गंगाराम ने हाथ बढाकर तुलसी को अपने पास ही बुला लिया। एक ही गावतकिये का टेका लेकर दोनों मित्र बैठ गये। गंगाराम ते कहा- “ये हमारे टोडर जी यहाँ के एक बड़े सम्पन्न और धर्मनिष्ठ व्यक्ति हैं।इनसे मेरा परिचय अब पुराना हो चुका है।” 
फिर टोडर से तुलसी का परिचय कराते हुये कहा- “टोडर जी, ये हमारे बचपन के साथी मेरे सहपाठी सुकवि पण्डित तुलसीदास जी शास्त्री कथा वाचस्पति हैं और ज्योतिष विद्या में तो मैं इन्हें अपने से श्रेष्ठ विद्वान मानता हूँ। 
“राम, राम टोंडर जी, हमारे मित्र की अतिशयोक्तियों पर ध्यान न दें। मैं यदि गंगा हूँ तो यह गंगासागर हैं।”
गंगाराम हँस पड़े और बोले- “तब तो मैं भी तुम्हारी तरह से कहूँगा कि मैं यदि तुलसीदास हूँ तो तुम साक्षात तुलसी का विरवा हो।” हंसी-विनोद के क्षण बीतने के बाद टोडर ने पूछा- “महाराज, कहाँ से पधारे हैं?  
“अयोध्या से आ रहा हूँ।अब यहीं रहने का विचार है।” फिर गंगाराम को ओर देखकर कहा- “आजकल सरस्वती देवी की मुझ पर असीम कृपा है। मुझे राम महिमामय बनाने के लिए वे मेरे सुमिरन करते ही दौड़ी चली आती है।” 
“कोई बड़ा काव्य लिख रहे हो तुलसी”
“हाँ, जब से तुम्हारे यहां बैठकर रामाज्ञा प्रश्न रचा था तभी से सरस्वती मैया मुझ पर दयालु बनी हुई हैं। कई फुटकर छन्द लिखे, “जानकी मंगल' नाम से एक प्रबन्ध काव्य की रचना भी कर डाली और इन दिनों सम्पूर्ण राम कथा लिखने की प्रेरणा मुझे बाँधे हुए हैं।“
टोडर प्रसन्‍न होकर, बोले- “अरे वाह महाराज, यह तो हमारे लिए बड़े ही आनन्द की बात है। कहाँ तक लिख डाली? ”
“अभी एक सोपान चढ़ा हूँ । विवाह के बाद राम जानकी अयोध्या आए तब से लेकर उनके वनवास लेने और राजा दशरथ की मृत्यु के बाद चित्रकूट में भरत भेंट होने तक का प्रसँग पूरा कर लिया।
“तो फिर यह प्रथम सोपान कैसे हुआ?” - गंगाराम ने पूछा और फिर कहा- “अरे भाई, राम-जन्म से लेकर राम-विवाह तक की कथा कायदे से प्रथम सोपान कही जानी चाहिए।” 
“हाँ, तुम्हारी बात ठीक है। असल में जानकी-मंगल की कथा सुनाते सुनाते “राम भक्‍तों के आग्रह से मैं आगे की कथा लिखने बैठ गया। अब स्वयं भी सोचने लगा हूँ कि इस महाकाव्य को 'जानकी मंगल’ से अलग कर दूँ और इसका एक बालकाण्ड भी रच डालूँ।अयोध्या में इस समय मुझे अनुकूल वातावरण न मिला। दुर्देववश इस समय वहाँ कोई श्रेष्ठ विद्वान अथवा कवि न होने से मुझे हीन प्रकार की ईर्ष्या द्वेष दम्भादि वृत्तियों से लड़ना पड़ता था। काव्यरचना के आनन्द में विध्न पड़ता था। इसलिए यहाँ चला आया।”
पण्डित गंगाराम बोले- “बस तो अब तुम मौज से अपने उसी चौबारे में बैठकर काव्यरस सिद्ध करो, जिसमें तुम्हे रामाज्ञा मिली थी।”
टोडर तुरन्त आग्रह दिखलाते हुए बोल उठे- “पण्डित जी आपके तो मित्र हैं, जब जी चाहे इन्हें अपने पास रख सकते है, पर इस समय तो मेरी इच्छा है कि मुझे इनकी सेवा करने का मौका मिले। आपको मैं परम शांत ओर सुरम्य स्थान दूँगा महाराज।”
तुलसी बोले- “आपके प्रस्ताव के लिए कृतज्ञ हूँ टोडर जी। यों गंगाराम का घर मेरा अपना ही घर है, पर इस समय मैं गृहस्थी के वातावरण में नहीं रहना चाहता। मुझे एक ऐसी स्वतंत्र कोठरी दिला दीजिए जिसमे मैं अपना काव्य-साधन भी करूँ और वैराग साधन भी।”
गंगाराम गम्भीर हो गए, बोले- “तुलसी, तुम्हारा यह नया रूप मेरे लिए अभी रहस्यमय है। तुम अभी से वैराग्य क्यों धारण कर रहे हो? ”
तुलसी ने मुस्कराकर कहा- “जब तक, राम-कृपा नहीं होती, वैराग्य नही आता।मैं अभी पूर्ण विरक्त नहीं बन सका। काव्य के सहारे अपने को वैसा बना अवश्य रहा हूँ। मुझे आप कोई स्वतंत्र एकांत कोठरी दिला दें टोडर जी।”
“ऐसा स्थान मेरी नजर में है महाराज। हनुमान फाटक पर में चौकस प्रबन्ध
कर दूँगा।चाहे तो आज ही कर दूँ। वह स्थान मेरे एक नातेदार का है, मेरा ही समझिए।"
क्रमशः

127

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
127-

आप जो नया काव्य लिख रहें हैं, हम उसी को सुनना चाहते है।”
“अच्छा गंगा दशहरे के दिन रामघाट पर सुनाऊँगा।”
“गंगा दशहरे के दिन वाली कथा ने एक ओर जहाँ मुझे अपार प्रोत्साहन दिया वहीं दूसरी ओर वह मेरे लिए नये संकटों का कारण भी बन गई।”
“वह कैसे गुरू जी?” सन्त वेनीमाधव ने पूछा।
बाबा बोले- “उसकी कुछ चौपाइयाँ और दोहे अयोध्या में जगह जगह गाए गुनगुनाएँ जाने लगे। मेरे विरोधियों को इससे कष्ट होना स्वाभाविक ही था। इसमें किसी का दोष न मानों वेनीमाघव, यह मनुष्य की प्रकृति ही है। आगे बढ़ने वाली शक्ति को ईष्यालु लोग पीछे ढकेलने का प्रयत्न करते ही हैं। राम घाट पर जहाँ मैं रहता था वहाँ कुछ बन्दर भी रहते थे। उनसे मेरा बड़ा नेह नाता था। जब मैं चबूतरे पर बैठता था तो बन्दरों के बच्चे मेरे आस पास ही ऊधम मचाया करते थे। एक दिन रात को मैं और मेरे   धर्मपिता कोठरी के बाहर सो रहे थे।

आधी रात का समय है, तुलसी और बूढ़े पण्डित धरती पर चटाई बिछाए सो रहे हैं। कोठरी के पीछे वाले भाग में एकाएक मनुष्यों की चीत्कारों और बन्दरों के चिचियानें खोखियानें के स्वर एक साथ उठे। तुलसी और बूढ़े पण्डित जी की नीद खुल गई। वे उसी क्षण भागे, देखा कि कोठरी की दीवार के पीछे एक व्यक्ति बेहोश पड़ा है। बन्दरों का सरदार दीवाल से सटकर बैठा हुआ गुर्रा रहा है और कुछ बन्दर चीं-ची करते हुए दूर भागे जा रहे हैं। उनके साथ ही भागते हुए मनुष्यों के पैरों की आहट भी आ रही है।मनुष्यों और बन्दरो की चीख पुकार ने घाट पर सोने वाले कुछ और लोगों को भी जगा दिया।बंदरों का सरदार बंदर बेहोश व्यक्ति के पास ही बैठा गुर्रा रहा था। तुलसीदास ने उसके सिर पर दो बार हाथ फेरा- “शांन्त हो जाओ भूरे शान्त हो।” कहकर तुलसीदास ने अपना बायाँ हाथ, जो पड़े हुए व्यक्ति की बाँह पर रखा तो वह खून से चिपचिपा उठा। तब तक दो तीन लोग वहाँ और आ गए थे। भूरा वहाँ से हटकर अलग बैठ गया। एक बोला- "चोर है, ससुरा सेंध काटिस है।” तुलसी बोले- “तभी तो भूरे ने इस पर आक्रमण किया। इसकी कलाई में बड़ी जोर से काटा है, उससे बड़ा लहू बह रहा है। मूर्च्छित भी हो गया है। दिया लाओ गुरूबचन।“
दिया आया, सेंध के अन्दर घुसी हुई चोर की गर्दन बाहर निकाली गई। कोई सेंध की काट देखने लगा, किसी ने पास ही पड़ी कुदाल भी खोज निकाली। कोई इसी मसले पर विचार करता रहा कि इस कोठरी में सेंध लगाने का भला अर्थ ही क्या है। चढ़त में चढ़ी हुई धनराशि तो उसी समय कंगलों को बांट दी गई जबकि गंगा दशहरे के दिन दो सम्पन्न भक्तों ने बूढे पण्डित जी की इच्छानुसार वहाँ एक छोटा सा कथामण्डप और हाता बनवा देने का भार अपने ऊपर ले लिया था। तुलसी उस समय चोर का उपचार कर रहे थे। उसके मुँह पर पानी के छींटे मार रहे थे। चोर होश में आया, पीड़ा से कराहा। तुलसी शांत स्वर में उससे बोले- “डरो मत, अब तुमसे कोई मार पीट नहीं करेगा। भूरे ने तुम्हें काफी दण्ड दे दिया है लेकिन यहाँ क्या चुराने आए थे भाई? फकीरों के घर में भला क्या धरा है?” 
चोर रोने लगा- “हमसे बड़ा पाप भया महाराज, वैदेहीबल्लभ महाराज ने हमें आपकी पोथी चुराने भेजा था, सो ये बन्दर जाने कहाँ से कूद पड़े। मेरा एक साथी लगता है भाग गया और मेरी ये दुर्गत भई।मुझे छिमा कीजिए महाराज मैंने बड़ा पाप किया।”
गुरवचन घाटवाला यह सुनकर चिढ़ भरे स्वर में बोला- “ये बैदेहीवल्लभ महा लंपट और कुचाली है।गेंदिया से भी उसी ने नाटक कराया था।अयोध्या जी में कुछ लोग तो बड़े ही दुष्ट हैं। चार बुरों के कारण और सब साधुओं को कलंक लगता है।” 
“भला बताओ, पोथी चुराने की क्या तुक है? ” 
बूढ़े पण्डित जी बोले- "ये पोथी रच जाएगी तो इन जैसों को कानी कौड़ी को भी कोई न पूछेगा। अरे कलयुग की माया बड़ी विचित्र है भइया।” 
तुलसी गम्भीर विचारमग्न मुद्रा में बैठे थे। उनका मन एक नये निश्चय पर पहुँच रहा था। वे बोले- “जब मधुकरी माँग कर खाता और पड़ा रहता था तब कोई बात न थी पर जबसे यह प्रतिष्ठा पापिनी बढ़ चली है तभी से रार भी बढ़ चली है।मैं अब यहाँ रहूँगा नहीं। काशी चला जाऊँगा।” 
“क्यों भैया, क्यों? अरे हम सबके रहते ये दुष्ट तुम्हारा एक बाल तक बांका नही कर सकते।” गुरुवचन बोला। 
“पर चिंता अपनी नहीं गुरुवचन, इस रचे जानेवाले महाकाव्य की है। सरस्वती ने मेरे जीवन में ऐसा अमृतवर्षण पहले कभी नही किया, अब तो इसी मोह में फँसा रहना चाहता हूँ भाई। रामायण रचते समय मैं पूर्ण शान्ति चाहता हूँ। यह झगड़ा संकट चोरी चकारी का भय मुझसे सहन नहीं होगा। आज हनुमान जी ने भूरे के रूप में इसकी रक्षा कर ली किन्तु कभी धोखा भी हो सकता है। मेरी विपत्ति पिताजी को भी घेर सकती है।”
बूढ़े पण्डित जी बोलें- “तुम तनिक भी चिन्ता मत करो बेटा, मैं किसी से मिल-जुल कर सुरक्षा का चौकस प्रबन्ध कर लूगाँ।
“नही पिताजी, मेरा मन कहता है कि कुछ दिनों के लिए मुझे यहाँ से टल जाना चाहिए। राम जी के घर में ईर्ष्या हमले आदि की आँधियाँ उठाना उचित नहीं।शंकर जी विषपायी हैं। वहाँ कवियों और पण्डितों का समाज बड़ा होने के कारण कदाचित मुझे ऐसी निम्नकोटि के ईर्ष्या द्वेष का सामना न करना पड़े। मैं कल भोरहरे ही काशी चला जाऊँगा।” 

जिस समय तुलसी भगत प्रह्लाद घाट पर अपने मित्र पण्डित गंगाराम के यहाँ पहुँचे उस समय डेढ़ पहर दिन चढ़ चुका था। गंगाराम जी का घर रंगा- पुता, पहले से कुछ बदला हुआ, अधिक भव्य लग रहा था। द्वार पर एक दरबान भी खड़ा था। कन्धें पर अपनी रचनाओं का झोला लटकाए थके मांदे तुलसीदास को देखकर दरबान ने हाथ जोड़कर कहा- “दानसाला बाँई ओर है बाबा, चले जाइए।”
“मुझे पण्डित गंगाराम जी से मिलना है, दान लेने नहीं आया हूँ।”
“वो तो महराज जी, इस समे काम कर रहे है। कोई बड़े जमीदार आए हैं, उनका।“
तुलसी की अहंता फूली।
क्रमशः

Thursday, 13 July 2023

126

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
126-

“जबते राम ब्याहि घर आए । नित नव मंगल मोद बधाये।”
काव्य तेजी से गतिमान था। अयोध्या में ऋद्धि-सिद्धि भरे सुखद दिन बीतने लगे।राजा दशरथ के दरबार की रौनक चौगुनी हो गई। भरत जी और शत्रुघ्न जी अपने मामा के साथ अपनी ननिहाल कैकय देश की सैर को चले गए। तभी एक दिन राजा दशरथ ने अपने कान के पास पके हुए केश को देखा। तुरन्त ही उन्होने राम को युवराज पद देने का निश्चय कर लिया। प्रजा में यह समाचार सुनकर आनन्द छा गया। रनिवास में रामचन्द्र की तीनों माताएँ हर्ष और उछाह‌ में भर कंचन थाल भर भर मोती मानिक लुटानें लगीं। गुरु वशिष्ठ ने तिलक की लगन शोधी।
काव्यगंगा मन्थर गति से बह रही थी।
तुलसीदास इन दिनों सबेरे से ही लिखने बैठ जाते और मध्याह्न तक उसी तरंग में डूबते उतरते रमते रहते थे। बूढ़े पण्डित जी कोठरी के बाहर अपने चबूतरे पर बैठते और तुलसीदास के नये भक्तों को कोठरी के पास जाकर उनके दर्शन करने से रोकते थे। बस्ती में यह बात बड़ी तेजी से फैली थी कि 'जानकी मंगल’ कथा के अन्तिम दिन जब भगत जी को यह बात मालूम हुईं कि अयोध्या में रामनवमी पर प्रतिबन्ध लगा है तो वे तड़प उठे और उन्होंने ध्यान लगाकर कहा कि घबराओ मत, सब मंगल ही मंगल होगा। सच्चे भगत के वरदान स्वरूप ही दिल्‍ली से रामनवमी मनाने का शाही हुकुम आ गया। तुलसी सच्चे भगत हैं। अब वे रामायण लिख रहे हैं जिसके पूरे होते ही राम जी फिर से अवतार लेंगे। तुलसी भगत की सच्ची झूठी महिमा भी उनके काव्य के साथ ही साथ क्रमशः आगे बढ़ रही थी।

रामनवमी के तीन चार दिनों के बाद ही दुष्टों की सभा फिर जुड़ी। इस बार सब लोग महंत वैदेहीवहलभ चरणकमल रजघूलिदास जी महाराज के ऊपर
वाले चौबारे में एकत्र हुए। महात्मा वैदहीवल्लभ बोले- “महंत जी, यह तुलसी भगत हम सबकी मान मर्यादाओं को फलाँगता भया और क्या नाम करके,अयोध्या वासियों के सिर पर चढ़ायेमान होता भया चला जा रहा है। ये वास्तव में बड़ी चिन्ता का विषय है।” 
कथावाचस्पति पण्डित शिवदीन बोले-“और तो सब ठीक ही है, पर वह जो अब रामायण लिख रहा है सो समझ लो कि हमारे विरुद्ध एक भीषणतम षड़यंत्र रच रहा है। उस दम्भी का दुस्साहस तो देखिए। आदिकवि महर्षि वाल्मीकि,जी के परमपुनीत काव्य के रहते, नये भाषा में काव्य रचना क्या उचित बात है? मतलब यह कि वह तो कथा बाँचने की सारी परिपाटी ही बदल डालेगा।” वैदेहीवल्लभचरणकमलरजघूलिदास जी ने कहा- “अभी से इतना अधिक भयभीत होने की आवश्यकता नही है शिवदीन जी। क्या नाम करके, देखना चाहिए कि वह काव्य सफल भी होता है या नही।”
पण्डित रासदत्त बोले- “कवि वह नि:संदेह उच्च श्रेणी का है। इसमें दो मत कदापि नहीं हो सकते।अरे, अपनी कवित्त शक्ति ही से तो उसने अयोध्या वासियों को आकर्षित किया है।”
वैदेहीबल्लभ जी ने मुँह बिचका कर कहा- “हाँ, सत्य मैं वह गाता मधुर ढंग से हैं।सारा जादू उसके गले में है।”
शिवदीन बोले -“अरे, तो फिर किसी तिकड़म से उसको सिन्दूर खिलाय देव, गला आप ही बैठ जाएगा।”
सुदर्शन पण्डित बोले- “यह असंभव है, हमने सुना है कि वह आजकल केवल फलाहार करता है। दूध पीता है।”
रामदत्त बोले - "देखिए, आप लोग तो घर बैठे बातें कर रहे हैं। मैंने उसे स्वयं सुना है। एक दिन बातें कर चुका हूँ। वह कवि श्रेष्ठ तो है ही किन्तु प्रकाण्ड पडित भी है। अरे आचार्य शेष सनातन जी का शिष्य है, भाई।”
शिवदीन बोते-“तुम तो उसके बड़े प्रंशसक बन गए हो जी। एक जरा से भुनगे को हाथी बनाकर हमारे सामने खड़ा कर रहे हो।यदि वह शास्त्रार्थ से ही उखाड़ा जा सके तो में उसका सामना करने को सहर्ष तैयार हूँ। मेरी तर्क शक्ति के आगे वह मच्छर भला कहाँ तक भिनभिना पाएगा।”
“आपके तकों का श्राधार क्या होगा?” महंत जी ने पूछा।
“राम के सगुण और निर्गुण रूप। मैं कबीर वाली चाल पकडूँगा- “दशरथ सुत तिहु लोक बयाना। राम नाम का मरम है आना”
रामदत्त हाथ बढ़ाकर बोले-”कथा वाचस्पति जी महाराज, अयोध्या में बैठके यह तर्क दोगे? तुम्हारी खोपड़ी में जितने बाल बचे हैं वे सभी एक ही दिन में झड़ जाएँगे।”
“तुमने हमें क्या पागल समझ रखा है जी? अरे, मैं इस अयोध्या को एकदम आध्यात्मिक रूप दे दूँगा। राजा दसरथ दस इन्द्रियो के प्रतीक बन जाएँगे और उनकी तीनों रानियाँ सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण के रूप मे बखानी जाएँगी । तुम समझते क्या हो?”
प्रायः उसी समय तुलसी भगत कुब्जा मंथरा की कुटिलाई का वर्णन कर रहे थे-
“देखि मंथरा नगर बनावा। मंजुल मंगल बाज वधावा।
पछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम-तिलक युनि भा उर दाहू ॥
करे विचारु कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाज कवनि विधि रातो।
देखि लागि मधु कुटिल किराती | जिमि गंव तकहि लेउ केहि भाती।”

राम-जन्मभूमि वाली मस्जिद में जब से "राम जी का चबूतरा बन गया था और लोगों को वहाँ जानें दिया जाता था, तब से अयोध्यावासियों को थोड़ा बहुत संतोष तो अवश्य ही हो गया था। मस्जिद के सिपाहियों का व्यवहार भी अब पहले से अधिक सुधर गया था। हिन्दू-मुसलमानों में कटुता कम हो गई थी। यद्यपि कुछ कट्टरपथी मुसलमान अकबर की इस नीति के घोर विरोधी थे, पर उनकी चल नही पाती थी। तुलसी दास अब नियम से लिखने के पहले, मस्जिद के भीतर चबूतरे पर विराजमान रघुनाथ जी के दर्शत करने जाया करते थे। एक दिन एक नागरिक ने उनसे कहा- “भगत जी, बहुत दिनों से आपने कथा नही बाँचीं। हमने रामघाट पर आपकी कथा जब से सुनी है तब से ही आपका गुणगान किया करता हूँ।”
तुलसी मुस्कराकर बोले- “मैं तो राम के ही गुणगान करता हूँ, भाई।आपको जो अच्छा लगत है वह राम का नाम ही है।” 
“अरे राम-राम तो सभी करते है, भगत जी, पर जैसा भाव आप में है वैसा और किसी में नहीं है।” 
पास में खड़े हुए कुछ अन्य व्यक्ति भी जोश के साथ इस बात का समर्थन करने लगे। बातों ही बातों में लोगों का यह आग्रह बढ़ा कि एक दिन फिर कथा सुनाइए।
क्रमशः

Wednesday, 12 July 2023

123

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
123-

तुलसीदास सबको शांत करते हुए बोले- “सज्जनो, मैं आठों पहर आपकी दृष्टि में रहता हूँ। यहाँ के बाद मेरा अधिक समय जन्मभूमि के पास बैठे ही बीतता है। जिसको शंका हो, वह कहीं भी किसी भी समय परीक्षा ले सकता है।”
बड़ी चेचामेची मचीं। गेंदिया ने बड़ा नाटक साधा, पर उसका जादू चल न सका। एक जवान व्यक्ति ने उठकर जब उसका झोंटा पकड़कर खींचा और धरती पर धक्का देने लगा तो तुलसीदास घबरा कर अपने आसन से खड़े हो गए और कहा- “ना भैया ना, नारी पर हाथ उठाने से सीता महरानी दुखी होंगी। वे आप इसे दण्ड देगी।छोड़ो, इसे छोड़ो।” कहते हुए वे उस व्यक्ति के पास आ गए और गेंदा को मारने के लिए उसका उठा हुआ हाथ पकड़ लिया।
गर्भावस्‍था में इस धक्का मुक्की से गेदा जोर से कराहकर मूछित हो गई। तुलसी दास आँखें मूँदकर हाथ जोड़ते हुए प्रार्थनारत हो गए, “हे जगदम्बे, यदि स्वप्न में भी अयोध्या की किसी नारी के लिए मेरे मन में विकार आया हो तो मुझे अवश्य दण्ड देना।”

इस घटता के बाद से अयोध्या में तुलसी भगत की महिमा अनायास ही बहुत बढ़ गई। लोगो में यह बात भी फैल गई कि रामलोचनशरण और वैदेही वल्‍लभ चरण कमलरज धूलिदास आदि ने पड्यंत्र करके तुलसीदास को अपमानित कराना चाहा था। यही नहीं, यह खबर भी फैली कि गेंदिया के पति ने उसे अपने घर से निकाल दिया है।
पूजे जानेवाले व्यक्तियों के चरित्र पर अयोध्या में दबी-ढकी बातें तो गली गली में हुआ ही करतीं थीं किन्तु इस घटना के बाद अयोध्या के जवान मुखर हो उठे थे।तुलसीदास का व्यक्तित्व, सदाचार के प्रति आस्था का प्रतीक बन गया। उनके प्रवचन में अधिक भीड़ होने लगी। होली के तीन दिन पहले जब ‘जानकी मंगल' पूरा हुआ तब अन्तिम दिन आरती में इतना अन्न-धन चढ़ा, जितना पहले कभी किसी कथावाचक की आरती में नहीं चढ़ा था।
एक प्रौढ़ श्रोता ने कहा- “भगत जी अब तो रामनौमी तक कथा वार्ताएं सब बन्द रहेगीं, पर रामनौमी के बाद आप फिर बराबर कथा सुनाइए। जैसा भाव आपकी कथा सुनकर हमारे मन में आता है वैसा और किसी की कथा में नहीं आता।”
कई लोगो ने प्रायः एक साथ ही इस प्रस्ताव का साग्रह समर्थन किया।तुलसी दास सुनकर आन्नदाभिभूत हो गए, बोले -“अच्छा, रामनवमी के दिन अवश्य सुनाएँगे। 
“उस दिन तो महाराज यहाँ कथा कहने की मनाही है।”
तुलसीदास के मन में यह बात चुभ गई। बूढ़े पण्डित जी से बोले- “पिताजी, राम जी के विवाह के उपलक्ष्य में अयोध्या वासियों की ज्योनार होनी चाहिए। जगदम्बा अन्नपूर्णा ने भण्डार भर दिया है।”
बूढ़े पण्डित जी ने उल्लसित होकर कहा- “हाँ बेटा, हो जाय। अयोध्या में मंगल तो मनाना ही चाहिए।”
एक विरक्त प्रौढ़ वय के ब्राह्मण वहाँ बैठे हुए थे, बोले- “भगत जी एक अरदास मैं भी करूँगा। आज्ञा है।”
“कहिए, कहिए, महाराज।” तुलसी ने मीठी वाणी में उनका उत्साह बढ़ाते हुए कहा।
“कहना यह है भगत जी, कि हमारे चारों राजकुमारों का ब्याह तो भया, पर अब बहुओं को अयोध्या भी तो लाइए, तभी ज्यौनार होय।” 
एक वृद्ध वणिक सुनकर गदगद हो गए, बोले- “वाह बाबा जी, धन्य हो, हमारे मन में भी उठ तो रही थी यह बात, पर हम कह नही पा रहे थे।भगत जी की कबिताई सुनकर चोला मगन हो जाता है। हमीं नहीं, सब लोग यही कहते हैं।”
बूढ़े पण्डित जी भी उल्लसित स्वर में बोले-“बड़ी शुभ बात है। सुनकर बड़ा हर्ष हो रहा है, तुलसी बेटा।
“हाँ, पिताजी।”
“देखा पुत्र, हम अयोध्या वासियों की यह इच्छा है। समझ लो कि साक्षात‌ राम जी की ही इच्छा है। राम जी के घर की बोली मे रामायण की रचना होनी ही चाहिए। हमने सुना है कि बंगभाषा में और द्राविड़ी भाषा में भी रामायणे लिखी गई है।” 
“हाँ पिताजी, यह सत्य है। काशी में पढ़ते समय मुझे महात्मा कंबन और कृत्तिवास जी की रामायणों के कुछ अंश सुनने को मिले थे।”
“बस तो महाराज, आप हमारी भी इच्छा पूरी कीजिए। अरे जब और गाँव के लोग अपनी अपनी बोली में गाते हैं तो हमें भी ऐसा अवसर जरूर मिलना चाहिए महाराज।” लाला जी ने गदगद भाव से कहा।
विरक्‍त जी भी बोल उठे- “हमारे भगत जी को राम जी ने भगती भी दी है और काव्यकला भी। सोने मे सुहागा है। आपको रामायण रचना करनी ही चाहिए महराज। उससे बड़ा लोक मंगल होयगा।”

“स्वयं मेरा भी मंगल होगा महाराज। पिताजी ने सच ही कहा कि यह राम जी की आज्ञा है। सीतामढ़ी में स्वयं जगज्जननी ने मुझे यह आदेश दिया, बजरंग वीर और वाल्मीकि जी भी मुझे यही आदेश दे चुके हैं।”- कहते हुए तुलसीदास की आँखें मुँद गईं। चेहरे पर मधुर भाव कम्प आ गया। हाथ जोड़कर बैठे ही बैठे सबके सामने भूमि पर मस्तक नवाया, फिर ज्ञान आनन्दमय मुद्रा में कहा- “रामायण रचकर मेरी मुक्ति होगी। आठों पहर राम के घ्यान में रमे रहने का बहाना मिल जायगा। मेरी भक्ति का रूप भी सवँरेगा।”
स्वयं तुलसी के मन में कई दिनों से बड़ा ऊहापोह मचता रहा था, लेकिन सबेरे जब उनके प्रवचन सुनने वाला भक्त समाज जुटता तो वे सव कुछ भूल जाते और तन्‍मय रामभक्ति रसमग्न होकर काव्य और प्रवचन सुनाते हुए स्वयं भी आत्म विभोर हो जाते थे। अपने मुख्य श्रोता के रूप मे उन्होंने बूढ़े पण्डित जी को बैठाया था। आरम्भ में वे केवल उन्हीं को सुनाते थे। पण्डित जी में उन्होंने अपनी भावना विशुद्ध ज्ञान स्वरूप कपीश्वर के रूप में परिलक्षित की थी। पंडित जी सचमुच सच्चे श्रोता थे।उनकी तन्मयता तुलसी को प्रेरित करती थी। फिर जनता भी उनके ध्यान में सुखद प्रेरणा बनकर समाने लगी। कथा सुनाने से अधिक आत्मलीनता का दिव्य सुख पाया। खाली समय में अपने बौद्धिक मन से लड़ते झगड़ते, हारते जीतते हुए वे मन के उस घरातल पर पहुँच गए जहाँ कहनेवाला और सुननेवाला एक ही हो गया था। तुलसी कहते और तुलसी ही सुनते थे। यह स्थिति उन्हें दिनों दिन अधिकाधिक तन्मय बनाने लगी थी।

एक दिन राम जन्म भूमि स्थल पर बनी हुई बाबरी मस्जिद की ओर चले गए। एक सूफी संत सिपाहियों और जन साधारण की भीड़ को मलिक मुहम्मद जायसी का “पद्मावत' काव्य सुना रहे थे।
क्रमशः

124

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
124-

दोहे-चौपाइयों में रची हुई वह दिव्य प्रेम कथा सूफी महात्मा के सुमधुर कण्ठ से सुनाई जाकर ऐसी मनोहर बन गई थी कि स्वयं तुलसी भी उस रस में बह गए और बड़ी देर तक सुनते रहे। वहाँ से लौटते हुए उनके मन मे पहला विचार यही आया कि यदि रामायण रचूँगा तो दोहे-चौपाइयों में ही। जन मन को बाँधने की शक्ति उनमें बहुत है।छंद से मन बँध जाने पर रामकथा आठों पहर तुलसी के मन में घुमड़ने लगी। मिथिला और सीतामढ़ी में उमगे हुए भावदृश्य और भी अधिक उमंग के साथ उभरकर तुलसी के मन को बाँघने लगे। चूँकि 'जानकी मंगल' रच चुके थे इसलिए स्वयंवर मंडप से ही रामकथा के दृश्य उनके मन में उभर रहे थे। राम लक्ष्यण जब स्वयंवर सभा में आतें हैं तो उसका वर्णन किस प्रकार हो? श्रीमद्‌- भागवत में कृष्ण जी जब, कंस के अखाड़े में उतरते हैं तब का वर्णन बड़े ही आलंकारिक ढंग से किया गया है। बड़ा सुन्दर लगता है। मुझे भी ऐसा वर्णन करना चाहिए। मुझे कथातत्व मूलरूप से वाल्मीकि रचित रामायण से ही ग्रहण करना चाहिए और अध्यात्म रामायण का प्रतीक तत्त्व भी उसमे जोड़ना चाहिए।
आठों पहर तुलसी को आँखों के आगे रामचरित्र के विभिन्‍न दृश्य ही दिखलाई पड़ते थे। इस प्रक्रिया में उन्हें यह अनुभव होने लगा कि राम का विम्ब भी अब कभी कभी उनके मन में स्पष्ट होकर झलकता है। कितने सुन्दर है राम।सौंदर्य उनकी काया में, बल में, गुणों में है। हाय, जो कहीं यह रूप साकार होकर पृथ्वी पर उतर आए तो पृथ्वी पर कैसा आनन्द छा जाय। हे राम जी पधारो, एक बार दीन दुखियों को दर्शन देकर कृतार्थ करो। आओ राम, आओ। बस अब आ ही जाओ। 
रामनवमी की तिथि निकट थी। अयोध्या में उसे लेकर हलचल भी आरम्भ हो गई थी। जब से जन्मभूमि के मन्दिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई है, तब से भावुक भक्‍त अपने आराध्य की जन्म भूमि में प्रवेश करने से रोक दिए गए हैं। प्रतिवर्ष यों तो सारे भारत में रामनवमी का पावन दिन आनन्द से आता है पर अयोध्या में वह तिथि मानों तलवार की धार पर चलकर ही आती है। भावुक भक्‍तों की विह्वलता और शूरवीरों का रणवाँकुरापन प्रति वर्ष होली बीतते ही बढ़ने लगता है। गाँव दर गाँव के लड़वैये न्योते जातें हैं, उनकी बड़ी बड़ी गुप्त योजनाएँ बनतीं हैं, आक्रमण होते हैं।राम-जन्मभूमि का क्षेत्र शहीदों के लहू से हर साल सींचा जाता है। ऐसी मान्यता है कि विजेताओं के हाथों से अपने परमब्रह्म की पावन अवतार भूमि को मुक्त कराने में जो अपने प्राण निछावर करतें हैं, उनके लिए स्वर्ग के द्वार खुल जातें हैं। इसलिए शासकों के द्वारा नवरात्रि आरभ होते ही किसी भी सार्वजनिक स्थान पर राम कथा सुनाने पर पाबंदी लगा दी जाती है। राम जी का जन्मदिन भक्‍तों के घरों मे गुपचुप मनाया जाता है। पहले तो वर्ष में किसी भी समय शहर में खुलेआम कोई धार्मिक  कृत्य करना एकदम मना था,पर शेरशाह के पुत्र के समय जब हेमचन्द्र बक्काल उनके प्रमुख सहायक थे तब से अयोध्या वासियों को थोड़ी सी छूट मिल गई थी। तुलसी के मन में यह बातें चुभीं, खौलन बन गईं। राम की जन्मभूमि में रामकथा न कही जाए यह अन्याय उन्हें सहन नहीं होता था। तुलसीदास के कानों में आगामी रामनवमी के दिन होने वाले संघर्ष की बातें पड़ने लगीं। उस दिन अयोध्या में बड़ा बखेड़ा होगा।ऐसा लगता था कि अबकी या तो राम जी की अयोध्या में उनकी भक्त जनता ही रहेगी या फिर बाबर की मस्जिद ही। लोगबाग अक्सर निडर और मुखर होकर यह कहते हुए सुनाई पड़ते थे कि उन्हें इस बार कोई भी शक्ति राम-जन्मभूमि में जाकर पूजा करने से रोक नही सकेगी। बस्ती मे फैली हुई यह दबी दबी अफवाहें तुलसीदास को एक विचित्र स्फूर्ति देतीं थीं। वे प्रतिदिन ठीक‌ मध्यकाल के समय बाबरी मस्जिद की ओर अवश्य जाया करते थे। मस्जिद के पीछे कुछ दूर पर उजड़ा हुआ एक प्राचीन टीला और था। तुलसी भगत उस पर एक ऐसी जगह बैठा करते थे जहाँ से जन्मभूमि वाली मस्जिद उन्हें स्पष्ट दिखलाई दिया करती थी।वे बड़ी देर तक वहाँ बैठे रहा करते थे। यों मस्जिद के सामने बैठने वाले मुसलमान फकीरों से भी उनका मेलजोल था। टीले से लौटते समय वे एक बार उनसे मिलने के लिए आते थे। इन दिनों मस्जिद के आसपास, उनके बैठने के स्थान, उस टीले तक मुगल फौज की छावनियाँ लगीं हुईं थीं।तुलसी दास एक सिपाही के द्वारा घुड़के जाकर अपने नित्य के ध्यान स्थान से हटा दिए गए। मस्जिद के सामने जाने का तो प्रश्न ही नही उठता था।भावुक तुलसी दास को यह बहुत अखरा। इस प्रतिबन्ध के विरुद्ध उनका मन खौलने लगा- “रामभद्र, आप साक्षी है, मैंने इस मस्जिद से अपने मन में कभी कोई दुर्भाव नही रखा। पूजा भूमि इस रूप में भी पूज्य है। अब भी वहाँ निर्गुण निराकार परब्रह्म के प्रति ही माथा झुकाया जाता है। रामानुजीय मठ से हठने पर मैं यही सोने आता था। यहाँ के लोगों से घुल मिल कर रहता था, तब मैं फकीर था।अब हिन्दू हो गया ! हे राम जी, इस अन्याय को मिटाने के लिए एक बार आप फिर अवतार लीजिए।”
प्रार्थना करते करते ही लोभ लगा, “मेरे जीवनकाल में ही पधारिये नाथ,एक बार मैं अपनी आँखों से आपको देख लूँ। आपके द्वारा छोड़े गए ताजे पदचिह्नों से अपने मस्तक का स्पर्श करने का अवसर पा जाऊँ।”
मन ऐसा तड़प उठा कि फिर चैन ही नही आता था। “राम जी आ जायें…. एक बार आ जायें। प्रत्यक्ष न आएँ त्तो काव्य रूप में ही मेरे मन में प्रकट हो जायें। भाषा में रामकाव्य का लोकमंगलमय रूप प्रकट हो।” 
इस प्रार्थना ही से यह विचार उमगा कि मैं रामनवमी के दिन ही अपनी काव्य रचना आरम्भ करूँगा। अयोध्या में बुधवार के दिन रामनवमी मनाई जाने वाली थी। तुलसीदास एक पण्डित जी के यहाँ पंचाग देखने गए। उन्होंने देखा कि नवमी मंगल के दिन मध्याह्न बेला में ही आ जाती है। उन्होंने ज्योतिषी से कहा- “राम जी का जम्म मध्याह्ल में हुआ था। तिथि जब उस समय आ जाती है तो फिर आप लोग मंगल को ही रामनवमी क्‍यों नही मनाते? ”
क्रमशः

125

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
125-

ज्योतिषी पंडित जी बड़ी ठसक के साथ बोले-“जिस दिन सूर्योदय से ही नवमी रहे उसी दिन हमें उसे मनाना चाहिए।” तुलसी ने अपने मन में कहा- “ तुम किसी दिन मनाओ, मैं तो मंगल को ही अपने राम का काव्यावतार होते हुए देखूँगा। बजरंगबली का वार है, उन्हीं के दिन से यह काव्यरचना करूँगा।अत:मेरी रामनवमी मंगल को ही मनेगी। उस दिन अयोध्या में मंगल ही मंगल होगा।” 
तुलसीदास ने मंगल के दिन ही रामायण रचना का शुभ संकल्प किया।दुर्गा अष्टमी के दिन तुलसीदास लिखने के लिए कागज, कलम, दवात आदि सामान खरीदने श्रृंगारहाट गए। नगर में सनसनी थी। दुकानें खुली थीं पर ग्राहक बहुत कम थे। हर दुकानदार अपनी दुकान के एक पट ही खोले हुए बैठा था। हरेक के चेहरे पर भय की आशंका और गुमसुम पन की छाप थी।लोगबाग आँखों आँखों में ही अधिक बात करते थे। यह दृश्य तुलसीदास के मन में चलते हुए चित्रों से एकदम विपरीत था। “जानकी मगंल' काव्य का रचयिता रामकथा का अगला प्रकरण जोड़ते हुए अपने मन में देख रहा था कि राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न दशरथ के चारों कुमार अपनी वधुओं के साथ राजघानी में प्रवेश कर रहें हैं । लौटती बरात का स्वागत करने के लिए पूरे नगर में सजावट हो रही है। तोरण सजे हैं। जगह जगह बन्दनवार सजे हैं। घर घर के आगे मंगल कलश लिए नारियाँ खड़ी हैं। जनता में अपार हर्षोल्लास है और उसके विपरीत यह मुर्दनी, यह सन्नाटा, हे राम।पीडा़ भीतर दर भीतर घुटी और उतनी ही गहराई से आशा का एक नया स्वर भी फूटा-“सब मंगल होगा, अवश्य मंगल होगा। तुलसी दास के मन पर अपनी आस्था का एक अजीब नशा सा छा गया। उन्हें उस समय किसी भय अथवा उदासी की छाया तक नही छू सकती थी। एक कागज वाले की दुकान पर गए- “जै सियाराम, साहु जी।”
“आइए, महाराज पघारिए, पधारिए।मेरे बड़े भाग जो आप आए। कहिए क्या आज्ञा है?” 
टेंट में बँधी चादी की एक मुहर निकाल कर उसे दुकानदार की ओर बढ़ाते हुए उन्होंने कहा- “हमे कागज, कलम, स्याही और मिट्टी की एक दवात दे दीजिए।इस राशि में जितने का कागज मिल सकें उतना दे दीजिए, कागज घुटा हुआ चिकना दीजिएगा।”
दुकानदार उठकर पेटी से कागज निकालते हुए एकाएक सिर घुमाकर पूछने लगा- “भगत जी, कविताई में कथा लिखेंगे न।”
तुलसी मुस्कराए, कहा- हाँ, साहुजी, यही विचार है।”
“जरूर लिखिए महाराज, जब आप सियाराम जी के ब्याह की कथा बाँच रहे थे, तो हम पहले के दो दिनों तक सुनने गए थे। फिर भाई को जर आ गया सो दुकान से मेरा उठना न हो सका। आप तो ऐसी कथा बाँचते हैं महाराज कि रस बरस बरस पडता हैं।” 
तुलसीदास बोले- “रामकथा का सच्चा भाव तो आप सबके मन में है साहू जी। मुझे उसी को देख देखकर तो सुनाने की स्फूर्ति मिलती है।”
दुकानदार ने कागज के पन्ने और उसकी नाप की दो लकड़ी की पट्टियाँ, लाल खारुवे कर एक बस्ता, पीतल की दवात, स्याही की पुड़िया और सेठे की दो कलम के साथ उनकी चाँदी की मुहर भी लौटा दी।”
“अरे, यह क्या साहू जी।”
दुकानदार हाथ जोड़कर बोला “महाराज, गाहक तो बीसियों आते हैं, पर मेरा खरा लाभ तो आप ही कराएँगे। इन पर आप राम की कथा लिखेंगे। उसे
मैं भी सुनँगा और सैकड़ौ दूसरे लोग भी रस पाएगें। आप मेरी यह छोटी सी भेंट स्वीकारें भगत जी।”
कागज आदि लेकर जब वे अपनी कोठरी में लौटे तो उन्हें लगा कि जैसे सामने सरयूजी से नहाकर राम जी घाट की तरफ बढ़ रहे हैं। उनका बलिष्ठ सुन्दर शरीर, उनका दिव्य तेजवान मुख, जल से भीगी हुई केशराशि, सब कुछ इतना स्पष्ट था कि तुलसीदास को लगता था जैसे राम सचमुच ही सामने खड़े हों। लाख प्रयत्न करने पर भी आज से पहले तुलसीदास राम का बिम्ब अपने मन में इतने स्पष्ट रूप से कभी नहीं देख सके थे वे आत्ममोहित होकर खड़े हो गए, उन्हें अपना भान तक नहीं रह गया था।
उसी समय किसी कारण से बूढ़े पण्डित जी अपनी कोठरी से बाहर निकले।सामने तुलसीदास को खड़े देखा, धीरे-धीरे चलकर वे पास आए, कहा, “अरे तुलसी, यों क्यों खड़ा है, बेटा?”
पोपले मुँह से निकली अस्पष्ट आवाज तुलसी के ध्यान में घक्के सी लगी, आँखों की स्थिर पुतलियाँ एकाएक डगमगा गईं। आंखों के आगे एक बार अंधेरा सा छा गया और जब उनमें फिर से देखने की शक्ति लौटी तो घाट के राम अलोप हो चुके थे।सामने बूढ़े पण्डित जी खड़े थे। उस दिन वे प्राय: गुमसुम ही रहे, अपने में तन्मय। रह रह कर उनके चेहरे पर आनन्द की लहरें सी दौड़ जातीं थीं। वे एक घुन मे रम गए थे। मंगलवार के दिन सबेरे से तुलसी दास ऐसे सचेत भाव से यह मध्याह्ल वेला के आरने की प्रतीक्षा कर रहे थे, जैसे बहुत दिनों बाद अपनी हवेली में लौटने वाले मालिक की अगवानी के लिए चतुर चाकर फुर्तीला और चाक चौबन्द होता है। 
कोठरी के पास ही एक छोटा सा चबूतरा था। तुलसीदास ने सवेरे ही से उसे अपने हाथ से लीपा पोता था। वहाँ उन्होंने कागज कलम दवात और कुशासन भी लाकर रख दिया था। काव्यतरंग सबेरे ही से हल्की हल्की लहराने लगी थी, लेकिन कवि संयमी साधक भी था। मध्याह्न से पहले वह अपने शब्दों को उभरने न देगा। राम जी स्वयं शब्द के रूप में अवतरित होगें।
मध्याह्न बेला के लगभग आधी पौन घड़ी पहले ही अयोध्या में जगह जगह डोंढी पिटी- “खल्क खुदा का, मुल्क हिन्दोस्तान का, अमल शाहंशाह‌ जलालुह्दीन अकवर शाह का। दिल्‍ली से सरकारी आदेश आया था कि बावरी मस्जिद के भीतर मैदान में चबूतरा बनाकर लोग उस पर नवमी के दिन राम जी की पूजा कर सकते है।” अयोध्या की गली गली मे आनन्द छा गया था। भगवान रामचन्द्र की जयकारों के साथ साथ अकबर शाह की जय जय कार भी सुनाई पड़ जा रही थी।तुलसी आनन्द से भर उठे।
सूर्य ठीक सिर पर आ गया था। मौसम गरम हो चुका था। धूप अब कुछ कुछ तपाने लगी थी, किन्तु तुलसीदास के लिए तो वह दिव्य आनन्द से भरी हुई थी। वे चबूतरे पर बैठ गए। शुरू वन्दना का दोहा लिखा और फिर कलम दौड़ने लगी।
क्रमशः

158 last

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी  158- फूटि-फूटि निकसत लोन राम राय को। कैलास फड़क उठे, बोले- "मित्र, तुम महात्मा तो हो ही पर खरे, कवि पहले ह...