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गोपी गीत
‘व्रजः सदा जयत्येव तव जन्मना तु अधिकं यथास्यात्तथा जयति’
स्वभावतः उत्कर्ष को प्राप्त व्रजधाम आपके आविर्भाव के कारण वैकुण्ठधाम से भी अधिक उत्कर्ष को प्राप्त हो रहा है। वैकुण्ठधाम में प्रभु की अनन्तकोटि व्रह्मण्डोत्पादकता, सर्वेश्वरता, सर्वशक्तिमत्ता एवं परमेश्वरता का ही प्रकाट्य है अतः वहाँ ऐश्वर्य संकुचित हृदय में भगवान के प्रति ममत्व की पूर्णाभिव्यक्ति हो ही नहीं पाती। व्रजधाम में भगवान की माधुर्य-शक्ति का ही अधिकाधिक प्रस्फुरण हुआ है; माधुर्यपूर्ण-स्वरूप में अनुराग सम्भव है क्योंकि प्रेमोत्कर्ष में कुछ धृष्टता आ ही जाती है। अतिशय अनुराग के कारण संकोच एवं भय का पूर्णतः तिरोधान तथा ममत्वपूर्ण अभिन्नता का प्रस्फुरण हो जाता है। कुरुक्षेत्र की युद्धस्थली में भगवान श्रीकृष्ण के विराट्-स्वरूप को देखकर उनका प्रिय सखा अर्जुन भी भयभीत हो क्षमा-याचना करने लगता है।
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं, हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि॥
अर्थात्, हे भगवन्! हे प्रभो! आपके इस महत् रूप को न जानकर मैंने आपको अपना सखा समझते हुए स्नेहाधिक्यवशात् ‘हे कृष्ण’ ‘हे सखा’, ‘हे यादव’ आदि असत्कारसूचक सम्बोधनों से सम्बोधित किया; ‘मैं अपराधी हूँ, क्षम्य हूँ।’
व्रजधाम में भगवान श्रीकृष्ण का बाल-सहचर, श्रीदामा तो मात्र इतना ही अनुभव करता है कि कृष्ण हमारा सखा है, वह भी गोपाल है गाय चराता है, हम भी गोपाल हैं, गाय चराते हैं, हम दोनों मिलकर खेल खेलें; मैं हार गया, मैं घोड़ा बना; वह हार गया, वह घोड़ा बने।
श्रीमद्भागवत’ में स्पष्ट उल्लेख है-‘उवाह कृष्णोः भगवान श्रीदामानं पराजितः’पराजित होकर भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीदामा को कन्धे पर बिठाया। श्रीदामा के अनुरागमय हृदय में श्रीकृष्ण के ऐश्वर्यपूर्ण-स्वरूप की कल्पना भी नहीं उठती; श्रीदाम भगवान श्रीकृष्ण के केवल माधुर्यपूर्ण-सख्य का ही अनुभव कर पाता है। भगवान की ऐश्वर्य शक्ति के विकसित होने पर यह माधुर्य पूर्ण लीला संकुचित हो असम्भव हो जाती।
गोलोक-धाम एवं वैकुण्ठधाम में भगवान की सर्वेश्वरता प्रत्यक्ष प्रख्यात रहती है। इन धामों में अनन्त ब्रह्माण्ड की महाधिष्ठात्री ऐश्वर्य-शक्ति स्वयं ही पूर्णतः व्यक्त रहती हैं; ब्रह्म-रुद्र इन्द्रादि देवगण भी करबद्ध हो श्रीमन्नारायण का सतत संस्तवन करते रहते हैं। साकेतधाम, द्वारकाधाम एवं मथुराधाम में ऐश्वर्य-शक्ति के साथ ही साथ माधुर्य-शक्ति का भी सम्मिश्रण होता है। यही कारण है कि इन धामों में भगवान के शंख, चक्र, गदा एवं पद्मधारी चतुर्भुज स्वरूप का ही दर्शन होता है और समय-समय पर अनेक अलौकिक ऐश्वर्यपूर्ण कार्यों का भी अनुभव होता है। व्रजधाम में ऐश्वर्यभाव का सर्वथा तिरोधान हो जाता है अतः ब्रजधाम में ही माधुर्य-भाव की पूर्णाभिव्यक्ति संभव होती है। भक्ति-मार्गानुयायी के लिए सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान् प्रभु का माधुर्य-पूर्ण स्वरूप ही सर्वातिशायी है।
सनातन गोस्वामी ने एक अत्यंत सुन्दर ग्रन्थ की रचना की है। यह ग्रन्थ श्लोकात्मक छन्दोबद्ध है। इस ग्रन्थ में एक गोपालसखा की कथा है। भगवान् श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण का गोपाल नामक एक सखा था। निस्संकोच निर्भर अनुराग का, शुद्ध स्नेह का प्रादुर्भाव कहाँ सम्भव है यह जानने के लिए उत्सुकतावशात् सखा गोपाल वैकुण्ठधाम, गोलोकधाम आदि लोक-लोकान्तरों में गया। वैकुण्ठधाम में वैकुण्ठनाथ भगवान् का अनन्त ऐश्वर्य, महामहिम वैभव, अतुलित प्रताप अनन्त यश छाया हुआ था; रुद्र-ब्रह्मादि देवगण तथा सनकादिक-शुकादिक महर्षिगण उनका संस्तवन कर रहे थे; अनन्त ब्रह्माण्ड की अनन्य-अधिष्ठात्री, भगवती, महालक्ष्मी भी श्रीमन्नारायण की आराधना में निरन्तर संलग्न थीं; जय-विजय, नन्द, सुनन्द आदि पार्षद भी सावधान होकर भगवान् की सेवा में संलग्न थे। इस अतुलित ऐश्वर्य से चकित हो सखा गोपाल ने वहाँ के अन्तरंग व्यक्त्यिों के सम्मुख अपनी जिज्ञासा रखी। वे सब भबवान् श्रीमन्नारायण की अनन्त महिमा एवं अनन्त ऐश्वर्य की स्तुति करते हुए भी प्रेमोत्कर्ष के प्रसंग में व्रजधाम को ही प्रशंसा करने लगते। वे लोग अपने ऐश्वर्याभिभूत हृदयों के कारण वैकुण्ठधाम अथवा गोलोकवासी भगवत् चरणारविन्दों के संस्पर्श की भी कल्पना नहीं कर सकते थे।
(‘गोपी गीत- करपात्री जी महाराज’)
क्रमश:
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