Tuesday, 15 August 2023

158 last

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
158-

फूटि-फूटि निकसत लोन राम राय को।

कैलास फड़क उठे, बोले- "मित्र, तुम महात्मा तो हो ही पर खरे, कवि पहले हो। वाह-वाह-वाह।” 
तुलसी मुस्कराए, कहा- “कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू - अब तो दो होकर भी दो नहीं रहा कैलास।” 
कहते कहते फिर एकाएक टीस उठी। आगे कुछ और कहने जा रहे थे कि एकाएक कराह कर राम राम पुकार उठे और फिर अचेत हो गए। आँखों में आँसू भरकर राजा भगत ने गंगा राम से कहा-“हमे लगता है कि अब तो भैया का दर्शन  मेला ही रह गया हैं।”
गंगाराम ने कुछ न कहकर एक गहरी नि:स्वास दी। राजा बोले- “भौजी गईं, इनके बेटे को भी अपने हाथों से ही मसान में ले गया था और अब ये भी जा रहें हैं।” कहकर वे रोने लगे।गंगाराम ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा- “अपने हृदय में मेरा भी हृदय देखो राजा। क्या किया जाय। कल सन्ध्या तक इनका मारकेश और है।वह समय बीत जाय तो फिर सब मंगल होगा।
 राजा टूटे हुए स्वर में बोले- “हाँ, वैसे तो जब तक साँस तब तक आस। बाकी क्‍या कहें?” 
रात में प्रायः सन्‍नाटा हो चुका था।सावन का महीना था,बादल गरज रहे थे।राजा, कैलास, बेनीमाधव और गंगाराम चुपचाप दीवार से टेका लगाए थके हारे बैठे थे। रामू अपने प्रभु जी की चौकी के पास बैठा टकटकी लगाकर उन्हें देख रहा था।
तुलसीदास स्वप्न देख रहे थे। हाथ में अरजी का लम्बा कागज लिए तुलसी दास राम जी के महलों की ओर जा रहें हैं। पहले गणेश जी मिलते हैं, उन्हें प्रणाम करते हैं फिर क्रमशः सूर्य, शिव-पार्वती, गंगा-यमुना, काशी, चित्रकूट आदि की झलकियाँ एक के बाद एक खुलती ही चली जाती हैं। भीतर की ड्यौढी पर खास दरवार के आगे हनुमान जी खड़े हैं। तुलसी उन्हें देखकर प्रसन्‍न होते हैं और अपनी अर्जी का कागज उनकी ओर बढ़ाते हुए कहते है- “इसे राम जी तक पहुँचा दीजिए।हनुमान जी मुस्कराकर लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न की ओर इशारा करके कहते हैं- “इनकी स्तुति करो। जगदम्बा को प्रणाम करो। उन्हीं की चिरौरी करने से तुम्हारी विनयपत्रिका साहब की सेवा मे पहुँच सकती हैं।”
तुलसी तीनों भाइयों की वन्दना करते हैं। माँ के चरणों मे नत होते हैं। सीता जी प्रसन्न होकर मुस्कराती हैं। हनुमान का मन और भरत का रुख देख कर लक्ष्मण तुलसीदास के हाथ से विनयपत्रिका ले लेते है और राम जी के सम्मुख उसे सविनय बढ़ा कर कहते हैं- “हे नाथ, इस कलिकाल से भी आपके एक अकिंचन सेवक ने आपके नाम के प्रति, अपनी प्रीति और प्रतीति को निबाहा है। कृपानिधान, अब इस पर कृपा करें।” भगवान रामचन्द्र विनीत भाव से हाथ बाँधे खड़े हुए तुलसीदास को बड़े स्नेह से देखकर कहते है- “हाँ , मेरे भी ध्यान में यह बात आई है।” 
यह कहकर राम जी हाथ बढ़ाते हैं। लक्ष्मण जी उन्हें कलम दवात देते हैं, राम जी अपने हाथ से कलम लेकर तुलसीदास की “विनयपत्रिका' पर सही कर देते हैं।
उसी समय आकाश में बादल गड़गडा उठते हैं, मानों रामकिंकर तुलसीदास का जयघोष कर रहे हों। बिजली बार बार कड़क उठती है मानों राम की भक्ति  माया के अन्धकार को मिटा रही हो। पानी ऐसे बरसता है कि जैसे भक्त के मन में अविरल राम रस धारा बहती है।

राम के पत्रिका पर सही करते ही स्वप्न भंग हो गया। बादलों की गड़गड़ाहट से तुलसीदास की आँखें खुल गई- “रामू”
“हाँ प्रभु जी”
“आज कौन तिथि है?”
गंगाराम मित्र को बातें करते देखकर तुरन्त बोल उठे- “श्रावण कृष्ण तीज, अब तो ब्रह्म बेला आ गई।”
तुलसीदास एक क्षण चुप रहे, फिर कहा- “पिछले वर्ष रत्नावली आज ही के दिन गई थी।”
राजा पास आ गए। उनके हाथ पर पोले से अपना हाथ रखकर कहा- “अब कैसा जी है भइया?”
“निर्मल गंगा जल जैसा। गाने को जी चाहता है, रामू।”
“जी, प्रभु जी ”
“आज स्वप्न में मैंने 'विनयपत्रिका' के अन्तिम छन्द को दृश्य रूप मे देखा है। मेरी काव्य स्फूर्ति अन्तिम बार उसे अंकित करने को ललक रही है। एक बार मुझे सब जने सहारा देकर बैठा तो दो।” झटपट सहारा दिया गया।रामू तत्पर बैठ गया। 
बाबा धीरे धीरे गाने लगे--
“मारुति-मन, रुचि भरत की लखि लखन कही है। 
कलिकालहु नाथ, नाम सो प्रतीति- प्रीति।
एक किंकर की निबहीं हैं॥१॥
सकल सभा सुनि लै उठी, जानी रीति रही है।
कृपा गरीब निवाज की, देखत 
गरीब को साहब बाँह गही है॥२॥
विहँसि राम कह्यो, सत्य है, सुधि मैं हूँ लही है।
मुदित माथ नावत, बनी तुलसी अनाथ की, 
परी रघनाथ हाथ सही है॥३॥

अंतिम पंक्ति उन्होंने स्वर खींचकर गाई, उसके पूरी होते ही गर्दन टेढ़ी हो गई। रामू उनके सिर को सहारा देने के लिए लपका।बेनीमाधव तलवे सहलाने लगे। कैलास ने नाड़ी पर हाथ रखा। बोले-“इन्हें लो भगत जी, जल्दी करो। मेरा यार चला।” कहते हुए उनक़ा गला भर आया, उसी भाव मे फिर कहा--
“राम नाम जस बरनि के, भयो चहत अब मौन। 
तुलसी के मुख दीजिए, अबहीं तुलसी सोन।”

रामू ने जल्दी जल्दी धरती पर कोने में पहले ही से रखा हुआ गोबर लाकर लीपा।गोस्वामी जी धरती पर ले लिए गए। तुलसी दल, गंगा जल उनके घरघराते कण्ठ में डाला गया।सब लोग मौन होकर उनकी ओर दृष्टि लगाए बैठे थे। गले की घरघराहट में भी मानों राम शब्द गूँज रहा था। आँखें एकाएक खुल गईं, सबके चेहरों को देखा, दीवार पर  हनुमान और सियाराम के चित्रों की ओर देखा। देखते ही रहे…. देखते रहे, देखते ही देखते चले गये।बाहर ऐसी बिजली चमकी कि उसकी कौंध भीतर तक आ पहुँची जोर से बरस रहा था।सबकी आँखें भी वैसी ही बरस रहीं थीं।
(जय जय सीताराम)
(समाप्त)

157

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
157-

“यह चिन्ता हमारी है महाराज। आप तो बस आज्ञा भर दें, काम हो जाएगा। मेरा धन और किस दिन काम आएगा।वैसे आपके रुपयों मे भी बड़ी राशि बाकी है।”
मित्रों से आश्वासन पाकर तुलसीदास उत्साह में आ गए। उन्होंने एक नये उत्साह की धूम बाँध दी। जगह जगह हनुमान जी के मन्दिरों की प्रतिष्ठा हुई। पूजा पाठ से वहाँ के लोगों मे उत्साह आता और तुलसी कहते- “घबराओ मत, हनुमान जी हर दिशा के पहरेदार बने बैठे हैं। वे हर जादूगर भूत प्रेत यक्षादि को मार डालेंगे। राम जी ने हनुमान जी को अब तुम्हारी सेवा के लिए यहाँ नियुक्त कर दिया है। घबराओ मत।”
मानसिक यंत्रणाओं से जड़ीभूत पागलों को होश में लाने वाला यह आस्था का महायज्ञ रचने में तुलसीदास स्वयं अपना आपा खोकर रमे हुए थे।
एक दिन टोडर और गंगाराम दोनों ने उनसे विनय की। गंगाराम ने कहा-“तुलसी दास, तुम निश्चय ही सिद्ध महात्मा हो, किन्तु तुम और तुम्हारा यह हनुमान दल जो इतना अधिक परिश्रम कर रहा है वह यदि…..।”
मुस्कराते हुए तुलसी ने बात काटकर कहा- “ज्योतिषाचार्य जी, तनिक प्रश्न कुण्डली बनाकर देख लो न। अरे यह राम का काम है। मेरी तो छोड़ दो, इन बच्चों का भी बाल बांका न होगा। श्रद्धा और विश्वास ऐसी संजीवन बूटी है कि जो एक बार घोलकर पी लेता है वह चाहने पर मृत्यु को भी पीछे ढकेल देता है, फिर भी देखते हो मैं कितना सतर्क हूँ , मैने केवल उन्ही बालकों और युवाओं को लिया है जो कसरत करते हैं। जब तक रक्‍त शुद्ध है तब तक कोई रोग छू नहीं सकता। यह भी देख रहे हो कि मैं नीम के काढ़े और पत्ती का कितना उपयोग करता हूँ।”
टोडर बोले- “राम जाने यह महामारी कब तक चलेगी। अभी तो इसका अंत नहीं दीखता।”
“अरे, चार दिन में गर्मी की ऋतु आते ही यह महामारी अपने आप चली जाएगी, और हनुमान जी की कृपा मान कर नर नारियों का श्रद्धा और विश्वास बढ़ेगा। राम रूपी नैतिकता का झण्डा भूत भावन की इस परम पावन नगरी से ही एक बार  सेतु से हिमाचल तक फिर फहराएगा। देख लेना।”
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बेनीमाधव गदगद होकर बोले- “पंडित गंगाराम जी ने स्वयं एक बार आपकी उस समय की भविष्यवाणी मुझे बतलाई थी। सचमुच शिव की काशी से ही इस बार राम की ज्योति जागी है।”
“बस, अब कोई विशेष बात तो हमारे जीवन में कहने को रह नही जाती पुत्र, फिर तो स्वयं तुम लोगों के देखते ही देखते जो तुलसी भाग्य से भी भोंडा था वह रामनाम के प्रताप से गोस्वामी तुलसीदास बनकर पुज रहा है। चलो आज मैं तुमसे भी उऋण हुआ। हमारी जीवनी कदाचित्‌ तुम्हें आस्था के संघर्ष की कथा बनकर प्रेरित करे। तुम्हारा उपकार होगा किन्तु एक बात ज्योतिषी तुलसीदास की भी गाँठ में बाँध लो।”
“वह क्‍या गुरू जी?” 
“कालांतर में तुम्हारा ग्रन्थ मेरे भक्तों के द्वारा वह न रह जाएगा जो तुम लिखोगे। वह कुछ का कुछ हो जाएगा। हाँ तुम अवश्य अमर हो जाओगे।” 
गुरू जी के चरणों में श्रद्धापूर्वक मस्तक नवाकर बेनीमाधव बोले- "अमरता मिलेगी तो मैं देखने नहीं आँऊगा।महाराज, किन्तु इस जीवन में आपके इस आस्था के महायज्ञ से प्रेरणा लेकर मैं अपने मन की काली छायाओं से मुक्त हो सका तो अपना अहोभाग्य मानूँगा। मैं एक बार अपने भीतर वह मन देखने के लिए तड़प रहा हूँ गुरू जी जिसकी निर्मलता से परम ज्योति आभासित होती है।आशीर्वाद दें कि इस जन्म में यदि उस दिव्य ज्योति को न देख पाऊँ तो भी मेरा मन निर्मल हो जाये। मेरे आस्था दुर्ग की नींव आपके चरणों के प्रताप से दृढ़ हो जाये।” 
सन्त जी के माथे पर हाथ फेरते हुए बाबा ने स्नेहपूर्वक कहा- “होगा, अवश्य होगा,जैसे ठग साहुकार के पीछे पड़ता है न, वैसे ही तुम राम जी के पीछे लग जाओ बेनीमाधव। उनका प्रसाद तुम्हे अवश्य मिलेगा। सत्य, आस्था और लगन जीवन सिद्धि के मूल हैं।”  “आपके कथा प्रसँग में केवल एक जिज्ञासा और है गुरू जी, आपके मित्र टोडर जी का क्या हुआ?”
यह प्रश्न सुनते ही बाबा की आँखें भर आईं। कुछ क्षणों के लिए वे भाव विगलित हो गए। फिर एक दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए 'राम' कहा और कुछ रुककर फिर बोले - “महामारी शांत होने के बाद मैं कुछ समय के लिए मथुरा चला गया था। लौटकर जाना कि कुचाली गोस्वामियों ने मेरे उपकारी को दण्ड देने के लिए धोखा देकर उसका वध कर डाला था। टोडर ऐसा परोपकारी मनुष्य इस कलिकाल में कम ही देखने में आता है। टोडर के स्मरणमात्र से ही मैं अब भी अपने आँसू नही रोक पाता भैया।” बाबा की आँखें फिर उलछला उठीं।

गोस्वामी तुलसीदास जी रोग शैया पर पड़े हैं। उनके सारे शरीर में फुंसियाँ ही फुंसियाँ निकल आई हैं। मवाद की कीलें सी पड़ जाती हैं। शरीर भर से निकलती है। आज चार दिन हो गए, न रातों की नींद आती है और न दिन को चैन पड़ता है। बीच बीच में मूच्छित हो जाते हैं। राजा, गयाराम, कैलास, जयराम साहु, स्व० टोडर के पुत्र और पौत्र तथा काशी के दो नामी वैद्य कोठरी के भीतर उन्हे घेरकर बैठे हैं। रामू नीम के उबाले पानी से उनके घाव धोता और एक लेप लगाता चल रहा है। झोपड़ी के बाहर दर्शनार्थियों की भीड़ खड़ी है। लोग उत्सुकतावश मना किए जाने पर भी दरवाजे से झाँक झाँक कर गोस्वामी जी के दर्शन करते हैं। कभी कभी वे जोर से कराहकर राम राम कह उठते हैं फिर पीड़ा शांत होने पर मुस्कराकर कहते हैं-“सुख से दु:ख भला जो राम को याद तो कराता रहता है।”
दरवाजे से झाँकते कई दर्शनाथियों की आँखों से आँसू बह रहे थे। बाबा उन्हें मुस्कराकर देखने लगे, कुछ देर तक टकटकी बाँधकर देखते रहे फिर गर्दन घुमाकर दीवार पर बनी सीताराम की छवि को देखते हुए हाथ बढ़ाकर कहतें हैं-“यह भी इनकी असीम करुणा है,

असन-बसन हीन, विषम-विषाद-लीन, 
देखि दीन दूबरों करै न हाय-हाय को? 
तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो, 
दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय
को।
नीच यहि बीच पति पाई भरुहाइगो, 
विहाय प्रभू-भजन बचन मन काय को। 
तातें तनु पेखियत घोर बरतोर मिस, 
क्रमशः

Friday, 11 August 2023

156

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
156-

वे खटिया से उठने का उपक्रम कर रहे थे कि तुलसीदास उनके पास पहुँच गए। एक हाथ पीठ और एक उनकी छाती पर रखकर धीरे धीरे सहलाते हुए वे बोले -“आप आयु में मुझसे बड़े हैं, ब्राह्मण हैं, बैठे बैठे मेरा प्रणाम स्वीकार करें।बस-बस, आपको आनन्द अवश्य हुआ है, यह माना, पर उसे रोग का कारण न बनाएँ। शांत हो जाइए मेरे लिए तो सबका घर अपना ही घर है। सहज रूप से सबके घर पहुँच जाता हूँ। इसमें आश्चर्य की क्या बात है।”
बुड्ढा रो पड़ा, उनके हाथ पर अपने दोनों हाथ रखकर बोला- “जैसा सुना था वैसा ही आपको पाया। सुना है गंगा आपके सहपाठी रहे।”
“हाँ, महाराज।” 
“तनिक दूर के नाते से वे हमारे भाई लगते हैं।”
“यह जानकर प्रसन्न हुआ। मैं आपसे आज एक भिक्षा माँगने आया हूँ। मुझे घर दिखाने के लिए जटाशंकर मिल गए हैं। उन्हीं के साथ यहाँ तक आ सका।”
“अरे महाराज, मैं निर्धन ब्राह्मण, अंधा अभागा। भला आपको क्या दे सकता हूँ? पुत्र- पुत्रवधु नौका से गंगा पार कर रहे थे सो गंगा जी में ही समा गए। उसके छह महीने बाद ही में अन्धा हो गया। यह पौत्र है, इसे थोड़ा बहुत पढ़ाता हूँ।यह मेरी सेवा करके फिर श्याम जी शास्त्री के यहाँ वेद पढ़ने जाता है। बस यही मेरा धन है, बल है, सहारा है।”
“मैं इसी बालक को आपसे माँगने आया हूँ।”
अंधे बाबा चौंके, कहा -“काहे के लिए महाराज?”
“राम जी की सेवा कराने के लिए।आज्ञा है? आपकी सेवा के समय यह सदा आपके पास रहेगा। या आप चाहे तो मेरे साथ अस्सी घाट चलें, वही रहे, मैं स्वयं आपकी सेवा करूँगा।” कहकर तुलसीदास बाबा की खाट पर ही बैठ गए।
बाबा गदगद हो गए, बोले- “आपकी मैं क्या बड़ाई करूँ गोसाईं जी महाराज, आप ऐसा प्रस्ताव लेकर इस समय पधारे हैं कि मेरी वाणी बोल करके भी भीतर से गूँगी हो गई है। पहले में अपने मन की बात आपसे कहता चाहता हूँ?”
“आप बड़े है महाराज, कहिए कहिए।”
“पिछले एक पखवारे से मेरा मन मुझे सचेत कर रहा है कि मेरा अन्तकाल अब निकट है।अपने जाने की चिन्ता नहीं किन्तु तब से रामू की चिन्ता मुझे अवश्य सता रही है। यही मेरे वंश का एकमात्र आशा दीप है।”
सुनकर तुलसीदास गंभीर हो गए, फिर उनके घुटने पर टिका हाथ अपने दोनों हाथों मे दबाकर उन्होंने कहा- “पण्डित जी, हानि-लाभ जीवन-मरण यश- अपयण विधि हाथ, फिर भी मैं वचन देता हूँ कि ऐसी स्थिति में यह बालक मेरे पास रहेगा और मैं स्वयं इसे पढ़ाऊँगा।”

कृतज्ञता के भावावेश में बुड्ढा बैठे ही बैठे उनके घुटने पर झुक के रो पड़ा, कहने लगा- “साक्षात्‌ परमात्मा ही मेरी चिन्ता हरने के लिए आ गए हैं। बस अब मुझे कुछ नहीं कहना है । रामू, इधर आ पूत।”
रामू आगे बढ़ा, उसने घुटने पर हाथ रख कर कहा- “हाँ बाबा।”
उसका हाथ तुलसीदास के हाथ में रखते हुए गद्गद वाणी में वृद्ध बोला-“अब आज से यही तेरे माता पिता गुरु सभी कुछ हैं। मैं नहीं जानता कि यह तुझे अपने किस काम के लिए मुझसे माँगने आए हैं, पर अब तू इन्हीं का है।अब चाहे जितने दिन जिऊँ मुझे चिन्ता नहीं है।”

जिन क्षेत्रों में प्लेग की महामारी फैली हुई थी उनमें लगभग पाँच सौ लड़के काम कर रहे थे।उनमें से अधिकाँश बारह से पंद्रह वर्ष तक की आयु के थे। घूरे साफ हो रहे हैं। नीम के काढ़े से रोगियों का उपचार हो रहा है ।शव उठाए जा रहे हैं। लड़के बारी बारी से परिश्रम कर रहे हैं।बड़ी लगन से सेवा कर रहे हैं। इस समय सभी का डेरा अस्सी घाट के पास खुले मैदान में झोंपड़ियों में पड़ा है। नियम से सबके व्यायाम, विश्राम और खाने का प्रबन्ध स्वयं गोस्वामी जी की देख रेख में उनके बरसों पहले गंगाराम के द्वारा जमा करवाए गए धन से हो रहा है। टोडर और जयराम साहु प्रबंधक हैं। बालकों के पुण्य ने नगर के अन्य पुण्यशीलों के भीतर भी उत्साह जगाया।तभी एकाएक गली गली में अफवाह उड़ी-
“अरे, मोहना, कुछ सुना?”
“क्या भया भगेलू ?”
“हमने सुना है किसी जादूगर ने अपने कुछ चेले छोड़ें हैं। वो भैया, कुप्पों में भरकर कोई रसायन अपने साथ लातें हैं और जहाँ छोड़ा नहीं, वहीं चूहे मरने लगते हैं और बस बीमारी फैलती चली जाती है।”
“अरे, नहीं भगेलू, किसी की उड़ाई हुई बात है।”
“उड़ाई हुई? अरे, मैं अपनी आँखों देखी कह रहा हूँ। मेरे सामने चार कुप्पे वाले पकड़े गए। उन्होंने सब कबूल दिया।”
“क्या कबूला? ”
“यही कि हमारे जादूगर उस्ताद ने कहा है कि बनारस भर में ये दवा छिड़क आओ, जिससे वहाँ के सब लोग मर जाएँ और उनके घरों का रुपया टका मालमता आसानी से लूट लें।”
“अरे नही, गप्प है।”
“गप्प, अच्छा तो गप्प ही सही। नाई नाई बाल कितने कि जिजमान आगे आएँगे। दो चार दिनों में आपहीं देख लेना। अब किसी की जिन्दगी का कोई भरोसा नहीं है।” 
सामने से एक खोमचे वाले को जाते देखकर भगेलू ने आवाज लगाई- “अरे ओ कचौड़ी वाले, यहाँ आना भाई। कौन जाने कल जिये कि मरें, आज कचौड़ी तो खा ही लें।” 
जादूगर के कुप्पों की अफवाह काशी में बड़ी तेजी से फैली। गली गली में घबराहट फैल गई। मौहल्ले मौहल्ले में रातों में पहरे बैठने लगे। दिन और रात में पचासों बार जहाँ तहाँ- वो आए, की भेड़िया गुहार मच जाती थी। बेचारे कई निरपराधी लोग जादुगर के शिष्य माने जाकर पीटे गए। नगर में एक आंतक सा छा गया।
तुलसीदास ने सुना, वे उत्तेजित हो गए। कहा- “यह निश्चय ही किसी दुष्ट बुद्धि के द्वारा उपजाई हुई बात है। अपने क्रूर विनोद से वह इन बेचारे मरे हुओं को मार रहा है।” लोगो का भयातंक देखकर तुलसी विचार में पड़े। जन जन की असीम निराशाजनित घोर अनास्था का उचित उपचार होना ही चाहिए। आस्था हीन मनुष्य का जीवन ही उसका असह्य बोझ बन जाता है। यह स्थिति भयावह है। गोस्वामी जी ने टोडर और जयराम साहु को बुलाकर कहा- “मै अब इस महामारी को बाँधूँगा। काशी की दसों दिशाओं में संकट-मोचन हनुमान जी की मूर्तियाँ स्थापित करूँगा। इसके निमित्त भी धन चाहिए कैसे जोगाड़ होगा साहू जी?”
क्रमशः

155

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
155-

“मैं बैठने नहीं, तुम्हें उठाने के लिए आया हूँ पुत्र। काशी में राम दुआ से अब हनुमान अखाड़ों की कमी नहीं रही।” “नहीं बाबा, अरे पचास से ऊपर अखाड़े वालों को तो मैं जानता हूँ। इनके सारे दगलं मैं ही कराता हूँ।”
तभी गोसाईं जी ने बातों की जटा बढ़ाने वाले जटाशंकर को बीच में ही टोककर कहा- “बेटा, इस शंकर शहर सरोवर के नर नारी रूपी मच्छ-मछलियाँ इस समय बड़ें ही व्याकुल हैं। जैसे नदी के जीवों में माजा की बीमारी पड़ती है न, और उतरा-उतरा कर तट पर मृत जीवों के ढेर के ढेर आकर बिछ जातें हैं, वैसी ही दशा है।” 
“हा बाबा, बचपन में अपने गाँव के तालाब में देखा था। आज वही हाल काशी के नर नारियों का है, आपने ठीक कहा।” 
“पुत्र, व्यायाम प्रिय युवकों के एक बहुत बड़े दल को तुम जानते हो। इसलिए मैं तुम्हारे पास आया हूँ।” 
“आज्ञा करें, बाबा।” 
“क्या कहें जटाशंकर। अपनी इस परम पावन पुरी की दशा तो देख ही रहे हो। घूरों पर चूहों के ढेर पड़े हैं। कहने को तो महामारी का आज दसँवा दिन है पर नगर में ऐसे कितने ही घर है जहाँ मरे हुए शवों को सद्गति करने वाला भी कोई नही बचा है। बेटा, तुम हनुमान अखाड़े के युवा लोग इस समय यदि राम जी की सेवा करोगे तो तुम्हें अपार पुण्य मिलेगा। बोलो, हनुमान जी के नाम की लाज रखोगे? है तुममे राम सेवा करने का साहस?”
हट्टा कट्टा पहलवान जटाशंकर यह सुनकर एक बार तो सिर से पाँव तक सिहर उठा, परन्तु दूसरे ही क्षण वह सिहरन स्फूर्ति बनने लगी, बोला- “यों तो बाबा, यह काम जान से खेलने जैसा है, पर जब आपकी आज्ञा है तो फिर कुछ सोचने का सवाल ही नहीं उठता।”
“जीते रहो पुत्र, राम तुम्हारा सब विधि भला करेंगें। मैं आठों पहर रामरक्षा कवच मंत्र का पाठ करता रहूँगा। हनुमान जी की कृपा से कोई भी युवक इस ज्वर से पीड़ित नहीं हो पाएगा।”
जटाशंकर बोला- “हम तो आपका नाम लेके आग में भी कूद पड़ेंगे। बाकी औरौं के जी की बात मैं कैसे कहूँ। दो चार लोगों से बातें करके बताऊँगा।”
“मैं देखा चाहता हूँ कि परम योगेश्वर महामृत्युँजय की इस नगरी में अभी कितना पुण्य शेष है।”
“अरे बाबा, यों कहने को तो राम-राम शिव-शिव सभी जपते है पर आप जैसी भक्‍ती न हम जवानों में है और न बूढ़ो में। बाकी, मैं आपकी सेवा में हाजिर हूँ।”
“हाँ, यहाँ तो ऊँचे नीचे, बीच के धनिक, रंक, राजा, राय सब श्रेणियों के लोगों को एक करके मैंने इतने दिनों में देख लिया। जब पीड़ा देखतें हैं तो पीठ फेर लेतें हैं। देखना चाहता हूँ कि इन पीड़ितों की सहायता करने का उत्साह तुम्हारे समान और कितनों लोगों के मनों में उमंगता है।” 
जटाशंकर बोला- “अच्छा तो ठहरिए, मैं घर मे अम्मां से कह आऊँ कि द्वार बन्द कर लें। आपको लेके कुछ अखाड़ों के गुरुओं के यहाँ चलूँगा। पहले एक बालक सरदार के यहाँ चलूँगा। आपके प्रभाव से लोगों को राजी करने में सुभीता होगा।” 
जटाशंकर कुप्पी लिए अपने घर की दहलीज तक गया और जोर से आवाज दी- “अम्मां, कुण्डी लगवाय लेव।हम गुसाईं बाबा के साथ एक काम से जाय रहे हैं।” कहकर वह उल्टे पावँ लौट आया। बाहर से किवाड़े उढ़का दिए और गुसाईं जी के साथ तीन चार छोटी छोटी गलियों को पार करके एक घर के सामने पहुँचा और जोर से आवाज लगाई- “ए राम ! रामचन्द्र ! ओ रामचंद्र!”तुलससीदास का मन मुदित हुआ।जब जटाशंकर के सहायक रामचंद्र हैं तो काम बना समझो। 
उसी समय भीतर से किसी पुरुष का स्वर आता है- “अरे कौन है?” 
“हम हैं बाबा, जटाशंकर, जरा राम को जगाय दीजै। अन्दर से खाँसते हुए पुरुष स्वर ने कहा- “अच्छा।” 
इतनी देर में जटाशंकर गोसाईं जी से कहने लगा- “है तो बाबा यह छोटा ही, चौदह पंद्रह बरस का लड़का ही पर ऐसा तेज और फुर्तीला है कि जब आपके सामने आवेगा तो आप भी कहेंगें कि वाह जटाशंकर क्या ततैया भिड़ छाँट के लाए हो।” गोसाईं जी ततैया भिड़ की उपमा सुनकर हँस पड़े।जटाशंकर बोला- “आपके चरणों की सौं बाबा, मैं झूठ नहीं कहता। ये लड़का दस बारह टोलों के लड़कों का मुखिया है समझ लीजिए।यदि यह हिम्मत दिखाजाए तो……।”
कुण्डी खुली, एक कसरती बदन का चौदह-पन्द्रह वर्ष की आयु का बालक मिट्टी की ढिबरी लिए एक हाथ से आँखें मींजते हुए आया।
“जे बजरंग दादा, अरे ! अरे ! अएरे ! ” कहकर ढिबरी वहीं पर रखकर दो सीढ़ियाँ उतरने के बजाय सीधे गली में ही कूद पड़ा और गोसाईं जी के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया।
झुककर उसे, उठते हुए गोसाईं जी बोले- “राम-राम ! आयुष्मान निष्ठावान हो। सुखी हो। अरे बस-बस, अब उठो बेटा। अभी जाड़ा गया नहीं तुम उधाड़े बदन हो। गली ठंडी है।”
गोसाईं जी के पीठ थपथपाकर उठने का आदेश देने से जिस समय रामू उठ रहा था, उसी समय जटाशंकर हसँकर कहने लगा- “आपके सामने बित्ता सा दिखा रहा है, हमको भी मानता है पर ऐसा विकट है कि जिससे भिड़ जाये…”
“जाओ दादा, पर गोसाईं बाबा हमारे घर आए, कैसा अचम्भा-सा लग रहा है। भीतर पधारें महाराज। घर में हमारे बाबा को छोड़कर और कोई नहीं है।” कहकर वह चौखट से ढिबरी उठाकर मुस्तैदी से खड़ा हो गया। उन्हें प्रकाश दिखाते हुए भीतर एक अंधेरे दालान को पार कर एक कोठरीं में ले गया।वहाँ दिया जल रहा था और एक दमे का रोगी अंधा वृद्ध बैठा दोनों हाथों से अपनी छाती दबाए हुए धीरे धीरे हांफ रहा था।
रामू बोला- “बाब़ा, गोसाईं जी महाराज पधारे हैं।”
“कौन गुसाईं, रामू ? हम दीन दरिद्रन के यहाँ तो बस एक गोसाईं धोखे से आय सकते है।”
जटाशंकर ने पूछा- “कौन से गोसाईं आ सकते हैं बाबा?”
रामू ने तब तक चटाई बिछा दी थी और गोसाईं जी को जब बैठने का सविनय संकेत कर रहा था तभी अंधे बाबा अपने दम को बाँधकर धीरे-धीरे बोले- “हम दीन दुखियन का गुसाईं तो एके है भइया, रामायण वाला।”
राम सोत्साह बोला- “वही आए हैं बाबा।”
उत्साह के आवेग में जब कलेजे में हलचल मची तो अंधे बाबा का दम फूल गया।
क्रमशः

Thursday, 10 August 2023

152

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
152-

यहाँ कुछ लोग अकारण ही हमारे शत्रु हैं। हमारी रामायण की रक्षा के लिए भी टोडर ने तुम्हीं लोगों को कष्ट दिया था।”
“कष्ट महाराज? भरे ई तौ हम पंचो का सुख है, जो आपकी सेवा करने का अवसर मिलेगा। आप निसा खातिर रहैं। हमारी बिरादरी का एक एक लठैत आपकी सेवा में हाजिर रहेगा। जिसे चाहें बानर बनाय लें और जिसे चाहे पहरेदार। बाकी एक हमारी अरदास है। आज्ञा होय तो अरज करूँ?”
“कहो कहो”
“पहले इस बीच में एकाध दुइ छोटी छोटी लीलाएँ आप करवाय ले तो फिर बड़े काम में हाथ डालने पर और आनंद आएगा।”
तुलसीदास इस सुझाव से खिल उठे, बोले- “तुमने बहुत अच्छी बात कही है हिरदै। अच्छा, पहले दो छोटी छोटी लीलाएँ करेंगे, एक नागनथैया लाला और दूसरी नरसिंह लीला।”
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“अन्यायी कालिय नाग और क्रूर हिरण्यकशिपु दोनों ही के अत्याचारों का सामना नवयुवक ही करतें हैं। एक में कृष्ण की गोप मण्डली है, दूसरे में सत्य-निष्ठ प्रह्लाद। मेरी इन लीलाओं का नगर में, विशेष रूप से युवकों की टोली में , बड़ा ही असर पड़ा वेनीमाधव। अब राम लीला के लिए हर वर्ग में बड़ी उत्सुकता और उत्साह बढ़ गया था। 
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एक दिन टोडर के साथ अपने अस्सी घाट वाले स्थान पर गोसाईं जी बैठे बातें कर रहे हैं। वे कह रहे थे- “हमनें हर बिरादरी में और हर मोहल्ले में सबसे बात कर ली है टोडर। जिस मोहल्ले में जो लीला होगी उसका खर्चा और प्रबंध उसी महल्ले वाले करेंगे और रामायण मैं सुनाऊँगा।”
टोडर बोले- “महात्मा जी, आप जो चाहेंगे वह अवश्य होगा, लेकिन यह‌ न भूलें कि इस नगर के कट्टर शैवपंथी, वल्लभ संप्रदाय वाले और उनके साथ ही साथ बटेसुर महराज जैसे प्रभावशाली दुर्जन लोग आपकी सभाओं में तरह तरह से विध्न डालनें में कोई कसर न उठा रखेंगे।”
गोसांईं जी शांत स्वर में बोले- “टोडर, अबकी यह विध्न डालेंगें तो राम जी की दया से सारा नगर इनके विरुद्ध जायगा। मैं इसीलिए रामलीला प्रदर्शन के साथ रामचरित मानस सुना रहा हूँ। मेरे वानर सब प्रकार के असुरों को दण्ड देने के लिए तैयार रहेंगे।”

उसी समय घाट के एक अधेड़ व्यक्ति घबराए हुए तुलसीदास जी के पास आए, कहा- “अरे बड़ा गजब हुई गया गुसाईं जी महाराज। पूरा कलिकाल आ गया। चारों चरन ठेक के कलजुग खड़ा होइ गवा है ससुरा। कुछ न पूछो।”
“क्या हुआ श्रीधर?”
“अरे एक कोई ससुर वैरागी रहा, वह तांत्रिक रहा, तौन किसी बड़े हाकिम की बड़ी पतुरिया को लैके भाग गवा। अब जितने छोटे बड़े साधू बैरागी हैं सब पकड़े जाय रहे हैं। भला बताओ इ कहाँ का न्याव है महाराज? ”
“तो तात्रिकों को कौन पहिचनवा रहा है भाई?”
“सब मिली भगत है, महाराज। बटेसुअर मिसिर को किसी ने नही पकड़ा महराज, उन्होंने सुना है कि पांच सौ रुपये रिसपत चटाय दी और….”
मुँह की बात मुँह में ही रह गई और आठ दस सरकारी प्यादों को लेकर जमादार और एक ब्राह्मण युवक तुलसीदास की कोठरी के सामने आ पहुँचा। टोडर ने इस ब्राह्मण को बटेश्वर मिश्र के साथ कई बार देखा था। उनके कान खड़के। वह युवक वैसी ही शान और शेखी के साथ, जैसी केवल मूर्ख और दम्भी दिखला सकतें हैं, आगे बढ़ा और चिल्लाकर बोला- “यही है तुलसीदास। इन्हें सम्मोहिनी विद्या सिद्ध है। बड़ी बड़ी सुन्दर स्त्रियों को नित्य फँसाना ही इनका काम है। आज इस शठ के पाप का घड़ा भर गया सो आय फँसा है।” कहकर अपने कंधे पर लटकी हुई लाल झोली से एक काठ की डिबिया निकाली और जल्दी जल्दी मंत्र बुदबुदाते हुए उसका सिदूंर बिजली की फुर्ती से तुलसीदास की छाती पर उछाल दिया। ह ह ह ह ह, बकरे की मिमियाहट की तर्ज पर भैंस की डकराहट जैसी वह हँसी उस कायर वीर के गले से निकलने लगी।
टोडर का हाथ अपनी तलवार की मूठ पर चला गया। तुलसीदास ने दृढ़ता पूर्वक उनका हाथ पकड़ लिया। उनके चेहरे पर परम शांति विराज रही थी।
बटेश्वर का वह कायर वीर शिष्य अपने इस भीषण तांत्रिक प्रहार के बाद भी अपने गुरू जी के गुरुभाई को वैसी ही ज्ञात मुद्रा में देखकर कुछ कुछ भयभीत तो अवश्य हुआ पर दस सिपाहियों की शक्ति उसे अपने गुरू की तंत्र शक्ति से अधिक बल दे रही थी। हँसते हुए बोला-  “हें हें हें हें हमारे गुरू जी से टक्कर लेने चला था। जाने ससुर कौन नीच जात, ठगहारी विद्या करके दो चार मंत्रों के बल पर सच्चे गुरुओं से होड़ ले रहा था।जाओ बेटा, अब चक्की पीसो हें हें हें हें।”
सिपाहियों में दो पठान तुलसीदास को अयोध्या की बाबरी मस्जिद के पास फकीरों के बीच में नित्य रात को देखा करतें थे। उनसे बातें भी हुआ करतीं थीं। उन दिनों यह दोनों पठान अपने सरदार के साथ अयोध्या की मस्जिद पर तैनात थे।दोनों ने आपस में एक दूसरे से बातें की और फिर एक ने तुलसीदास से पूछा- “साधु बाबा, पहले तुम्हारे दाढ़ी मुच्छा था?”
तुलसीदास ने पठान को ध्यान से देखा, पूछा-“आप नूर खां पठान हैं और ये वली खां हैं।कैसे है आप लोग?”
तुलसीदास का स्वर इतना सहज और शांत था कि जैसे यह सिपाही उन्हें पकड़ने नही वरन‌ साधारण आन्तुकों की तरह बोलने बतियाने आए हैं। वली खा ने जमादार से कहा -"हुजूर, हम दोनों इनको अजुध्या से जानता है, ये बाबरी मस्जिद में रोज हमारे फकीरों के साथ उठता बैठता सोता था। बहुत उम्दा गाता है हुजूर ! ऊपर वाले का सच्चा, दुनिया वाले का दोस्त है।”
जमादार ही नहीं, साथ आया हुआ हर सिपाही इस बात में एक मत था कि अब तक जितने वैरागी पकड़े है उनमे यह निराला है। जमादार बोला-“इनके लिए खासतौर से कोतवाल साहब का हुक्म है। इस बिरहमन के गुरू ने कोतवाल साहब की बेगम का कुछ काम किया था।उसकी पहुँच थी, उसी ने इनका पता दिया है।”
“हूँ ” फिर तुलसी की ओर देखकर जमादार ने विनीत स्वर में कहा- “साईं, हम खतावार नहीं , महज हुक्म के बन्दे हैं।
तुलसीदास मुस्कराए, कहा- “चलिए चलिए, आप अपना फर्ज अदा कीजिए और हमे भी अपने मालिक की मर्जी पूरी करने दीजिए।”

“तुलसी जस भविव्यता तैसी मिले सहाइ। 
आपुनु आवइ ताहि पै ताहि तहा ले जाइ॥”
क्रमशः

153

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
153-

जब कोतवाल के सामने तुलसीदास पेश किए गए तो उनकी बेगम साहबा भी पर्दे के पीछे मौजूद थीं। कोतवाल ने उन्हें सर से पैर तक घूरकर देखा और पूछा-“सुना है, तुमने बहुत शोहरत हासिल की है। तुम बड़े बड़े पण्डितों को भी अपने जादू से बाँध लेते हो।”
तुलसीदास बोले- “मैं जादू टोने नहीं करता, केवल रामनाम जपता हूँ और इसी का प्रचार करता हूँ।”
पर्दे के पीछे से बेगम साहबा ने कोतवाल साहब के कानों मे फरमाया- “मेरी बाँदी बतलाती है, यह बहुत बड़ा फकीर है। इससे कोई करिश्मा दिखलाने को कहिए।” 
कोतवाल ने तुलसीदास से कहा-“हमें अपना कोई कमाल दिखला सकते हो।” 
तुलसीदास हँसे, बोले-“कमाली तो एक ही है या फिर उसका सिपहसालार है।” 
“कौन है उसका सिपहसालार?”

“हनुमान बजरंगवली” - यह कहकर वे सहसा आावेश में आ गए। ऊँचे सशवत स्वर में उनके मुख से एक छप्पय स्रोते सा उमड़कर बह चला।आँखें सामने वाले खम्भे पर ऐसी सध गईं जैसे वहाँ उनका हनुमान हठीला दृढ़ आस्था का स्तम्भ बनकर प्रत्यक्ष खड़ा हो। वे उसे ही अपना छप्पय सुना रहे थे-

“सिधु-तरन, सिय सोच-हरन, रवि वबलवरन-तनु। 
भुज विशाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु॥
गहन दहन निरदहन लंक निःसंक बंक, भुव। 
जातुधान बलवान माच मद दमन  पवन सुव॥ 
कह तुलसीदास सेवत सुलभ, सेवक हित संतत निकंट। 
गुन गनत, नमत, सुमिरत, जपत, समन सकल-सकट विकट॥”

नगर में गोस्वामी तुलसीदास जी के पकड़े जाने की खबर बिजली सी फैली।
काशी की ऐसी कौन सी गली थी, जिसे तुलसीदास ने अपना न बना लिया हो। शहर में सैकड़ों ऐसे युवक थे जिन्होंने उन्हीं की प्रेरणा से हनुमान अखाड़े आयोजित किए थे। ब्राह्मण, राजपूत, गोप, अहिर, गोड, कहार, केवट, नाऊ, जुलाहे, छोटी कौमों के मुसलमान, तमोली, छोटे-छोटे सौदागर सभी तो रामबोला बाबा को अपना मानते थे। उनके पकड़े जाने के समाचार ने क्या छोटे, क्या बड़े सभी के मनों में बड़ी कड़वाहट उत्पन्न कर दी। सारी काशी में बटेश्वर मिश्र की थू थू हो रही थी। टोडर ने भूख प्यास सब बिसार कर दौड़ धूप आरंभ की। जयराम साहु बोले- “अबकी भिड़के ही दिखा दो टोडर। अकबर जैसे न्यायप्रिय बादशाह के राज्य में भी ऐसी मनमानियाँ हो रहीं हैं। मिश्र जी जैसे घमण्डी स्वार्थी आपसी ईर्प्या द्वेष में सारे नगर की नाक कटा रहे हैं। एक बार इनसे निबटे बिना निस्तार नहीं। आगे जो होगा सो भुगत लेगें।”
टोडर बोले- "हिरदे अहीर महात्मा जी का बड़ा भक्त है। अच्छे लड़वैये ठाकुर समरसिह भी दे देंगे।”
जयराम बोले- “दो सौ लठैत मैं भी दूँगा।ये कोतवाल बड़ा ही दुष्ट आदमी है, और ये बक्शी, जिसकी पतुरिया भागी है, एक नम्बर का धूर्त है। इन लोगों ने हमें दुखी कर रखा है।”
“ठीक है, अब आपकी सलाह मिल गई है तो आज रात तक हम भी कुछ कर दिखाएँगे।”
टोडर हिरदै से मिले तो वह बोला- “भैया, कासी जी का अहिर खून उबल रहा है। जब आप सब लोग पीठ पर हो तो हम भी आज इन्हें ऐसा सबक सिखाएँगे की छठी का दूध याद आ जाएगा। हमारे गुसाईं बाबा हमारे लड़कों को रामलीला में बानर सेना बनाने वाले थे, सो आज कोतवाल की कोतवाली पर हमारी वानर सेना ही टूटेगी। देख लेना,पहली रामलीला वानर लीला से ही हो होयगी।टोडर बोले -“ठीक है, पर हमला खूब सोच विचार के बड़े संगठित ढंग से होना चाहिए, हिरदे। सिपाहियों पर ऐसे अचानक टूटों कि उनसे कुछ करते धरते न बनें। फिर कहीं पर अहिर टूटेगें, कहीं पर केवट और कहीं पर ठाकुर बृंदहार धमकेंगे और हिरदै, कल सबेरे काशी जी में बटेश्वर मिश्र कहीं चलता फिरता न दिखाई दे।”
“भैया, हम बिरमहत्या न करेंगे। उस धर्मराक्षस को हनुमान जी आप ही समझेंगे।”

रात पहर भर भी न बीती थी कि छावनी में हुल्लड़ मच गया।मुगल पठान सिपाही अचानक में घिर गए। कइयों की मुश्कें कस गईं। सैकड़ों तोपचियाँ विद्रोहियों के कब्जे में आ गईं।लठैतों का आक्रमण इतना व्यापक और फुर्तीला था कि सिपाही बिना लड़े ही उनके जादू में बँधकर परास्त हो गए।कोतवाली पर सारे शरीर में सेंदुर लगाए लाल लंगोटेधारी अहिर युवा बानर टूट पड़ें थे। हरम में ऐसा हाय तोवा मचा कि बेगम बाँदिया बेहोश हो हो गईं। अफीम की पिनक में गाना सुनते और झूमते हुए कोतवाल साहब की दाढ़ी नुची। उन्होंने कैदखाने के जमादार को बुलाके हुक्म दिया कि तुलसीदास को फौरन छोड़ दो। तुलसीदास बोले- “जब तक सब वैरागी नही छोड़े जाएँगें तब तक मैं बंदीगृह से नहीं निकलूँगा।” 
सारे बरागी छोड़े गए। नगर में रात के तीसरे पहर सैकड़ौं मशालों के साथ तुलसीबाबा और सारे वैरागियों का जुलूस निकला। पूरा नगर जाग पड़ा। एक विचित्र उत्साह काशी के जन जन में लहरा उठा था। तुलसीदास और काशी उस रात सदा के लिए एक हो गए।
टोडर की इच्छा भी पूरी हुई। बटेश्वर मिश्र नया सूर्योदय न देख पाया।कोतवाली के सिपाहियों ने अपनी इस अपमान भरी पराजय का बदला लेने के लिए रात ही मे बटेश्वर मिश्र के घर जाकर उन्हें सोते से जगाया, बाहर बुलाया और कत्ल कर डाला।

नगर में इस विद्रोह से जहाँ युवकों में जान आई, वहाँ दूसरी ओर शासन तंत्र भी चूर चूर हो गया। सभी आला हाकिम इस बात से चिन्तित थे कि आगरे के किले मे जब यह समाचार पहुँचेगा तो बादशाह न जाने हमारी क्या दुर्गति करे। इस घबराहट में वसणी, दीवान, मीर अदल, कोतवाल,छोटे बड़े सिपहसालार सब आपस में एक दूसरे को दोषी तथा अपने को सतर्क स्वामिभक्‍त सेवक सिद्ध करने के लिए आगरे में अपने पक्ष के आला हाकिमों के पास मूल्यवान भेटें और संदेश भिजवाने लगे। अकवर के दरवार मे काशी के इस युवक विद्रोह की इतनी और इतनी प्रकार की सूचनाएँ पहुँची कि बादशाह ने काशी जौनपुर सूबे के लिए पुराने सुबेदार का तबादला करके अब्दुरहीम खानखाना को सूबेदार बनाकर व्यवस्था सँभालने के लिए भेजा।वह अभी आागरे से चल भी न पाए थे कि उनके आने की सूचना काशी में पहुँच गई । उस समय नगर में अकाल ग्रस्त जनसमूह मारा मारा डोल रहा था। श्रमजीवी, किसान आदि सभी भिखारी बन गए थे। पेट भरने के लिए लोग अपने बेटे-बेटियों तक को बेच देते थे।
क्रमशः

154

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
154-

भूतभावन भोलानाथ की नगरी करुणा से चीत्कार कर रही थी और प्रायः उसी समय राजा टोडरमल के पुत्र राजा गोवर्धनधारी काशी के पण्डित शिरोमणि नारायण भट्ट जी, विश्वनाथ जी का नया मन्दिर बनवाकर शिवलिंग की प्रतिष्ठा कराने आए थे। मन्दिर में बड़ी धूमधाम थी। पण्डित मण्डली में हर जगह राजा गोबर्धन, धारीदास टंडन की जै-जैकार हो रही थी। फकीरों को अन्न दिया जा रहा था। नगर मे सबको शांत किया जा रहा था। एक भिखारी बोला- यहाँ सब बड़े बड़े पण्डित दिखाई दिए पर हमारे रामबोला बाबा के दरसन नहीं भये।” 
“अरे भइया, जो गरीबों का साथ दे उसे बड़े लोग अपने बीच में नहीं बैठाते हैं। बाबा हमारे तुम्हारे हैं कि इनके हैं।” “सच्ची कहा मंगलू, बाबा हमार हैं। सुना है बिचारो की बाँह मे गिल्टी निकल आई है। आज कल वे बहुत पीड़ा पाय रहे हैं।”
तुलसीदास की कोठरी में टोडर आदि कई भक्तों की भीड़ जमा थी। तुलसी अपनी पीड़ा से विकल थे। बार-बार हनुमान को गोहराते थे- “है हनुमान हठीले, तुमने पहाड़ उठाया, लंका जलाई, बड़े-बड़े बलशाली राक्षसों को चुटकी बजाते मसल डाला, मेरी यह जरा सी पीर नही हरी जाती? मेरी ही सहायता करते समय क्या तुम बूढ़े हो गए हो? तुम्हारी शक्ति क्षीण हो गई है ? आओ मेरे साहब, मेरा कष्ट हरो। बड़ा काम करने को पड़ा है। राम जी का काम है हनुमान हठीले, मेरी लाज रखो।” 

तभी एक सरकारी ओहदेदार के आने की सूचना मिली। टोडर उठकर बाहर गए। हाकिम को मुजरा इत्यादि करने के बाद उससे बातें करने पर टोडर ने जाना कि नये सूबेदार बनारस आये हैं और गोसाईं जी से मिलना चाहते हैं।
टोडर ने कहा- “हुजूर, भीतर चलकर महात्मा जी की हालत अपनी आँखों से देख लें। इस समय तो गिल्टी में बड़ी पीड़ा होने से वे कराह रहे हैं।”
हाकिम टोडर के साथ भीतर आया, सब लोग अदब से उठ खड़े हुए। हाकिम ने गोसाईं जी को झुककर सलाम की और कहा- “हुजूरे आली खानेखाना ने मुझे आपकी मिजाजपुर्सी के लिए भेजा है।”
“उनसे हमारा सलाम कहिएगा। उनके कुछ दोहे हमने सुने हैं। उन्हें हमारी सराहना की सूचना दीजिएगा और इस कृपा के लिए मेरा आभार भी प्रकट कीजिएगा।”
दूसरे दिन पैदलों और घुड़सवारों की सेना के साथ अपने हाथी पर अब्दुरहीम खानेखाना गोस्वामी तुलसीदास जी के दर्शनार्थ पधारे।उनके आने की सूचना पहले ही भेज दी गई थी। बड़ा सरकारी प्रबंध हुआ था। सूबेदार को देखने के लिए बाबा के निवास स्थान के आस पास बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई थी। तुलसी और रहीम बड़े प्रेम से मिले। खानेखाना साधारण आसन पर बैठकर एक दूसरे से बातें करने लगे। उनके बंदी बनाए जाने के कारण रहीम ने क्षमा माँगी।उनके उपचार के लिए अपने खास हकीम को भिजवाने की बात भी कही। रहीम ने अकवर बादशाह के सम्बंध में कहा- "महाबली सब प्रकार अन्याईयों को कुचल रहें हैं। वे ऐसे धर्म का प्रतिपादन करते है जो मानव मात्र को एक कर सके।”
तुलसी बोले- "इसमें कोई संदेह नहीं कि अकबर शाह के काल में बड़ी व्यवस्था आई है। फिर भी समाज और शासन को और अधिक संगठित और न्यायशील होना चाहिए।”
“आपका कहना यथार्थ है गोस्वामी जी, अच्छा, तो अब आज्ञा लूँगा। स्वस्थ हो जायें तो एक दिन मुझे दर्शन देने की कृपा अवश्य करें। एक और निवेदन भी करना चाहता हूँ। मेरी इच्छा है कि आप जैसे महात्मा महाकवि को राज्य संरक्षण मिलना चाहिए।मैं यदि शाहंशाह सलामत को आपको कोई जागीर प्रदान करने के लिए लिखूँ तो क्या आप उसे स्वीकार करेंगे?”
तुलसी हँसे, बोले-“आपकी बड़ी कृपा है खानखाना साहब, परन्तु ….
हम चाकर रघुवीर के, पढ़ौ लिखौ दरबार। 
तुलसी अब का होहिंगें, नर के मनसबदार।”

काशी की अँधेरी गलियों दर गलियों का जाल अपने कुतरे जाने की आशंका से सहसा चौकन्ना हो उठा था और उसे कुतरने वाले थे चूहे। घरों, खंडहरों और मैदानों के अँधेरें बिलों से रेंगते लड़खड़ाते चूहे निकलते, दो चार डग भरते और मर जाते थे। बिल्लियाँ तक अब उन्हें बिलों से बाहर देखकर नहीं झपटती थीं। एक घर से एक लड़का मरा हुआ चूहा दुम से पकड़कर हिलाता हुआ बाहर निकला और घूरे पर छोड़ आया। लौटकर घर पहुँचा तो माँ ने कहा- “अरे सिबुआ, तुम्हें बेटा एक बार और जाना पड़ेगा।”
"क्यो माँ“
“अरे बेटा, भंडारे वाली कोठरी के भीतर पाँच सात चूहे एक के पीछे एक लड़खड़ाते भए निकते और मर मर गए। ये क्या हुई गया है राम?” 
दूसरे दिन घर घर में तेज बुखार फैल गया था। नगर के छोटे बड़े किसी भी वैद्य हकीम को दम मारने का अवकाश नही था। गिरजादत्त वैद्य के बैठक और चबूतरे पर भीड़ जमा थी। एक कह रहा था- "ये तो भगवान का कोप भया है भैया।”
दूसरा बोला-“पण्डित गंगाराम ज्योतिषी हमारे लाला से कहते रहे, भेरौं कि ये रुद्र बीसी पड़ी है जो न हुई जाय सो थोड़ा है।” 
तीसरे ने कुछ सोच भरी मुद्रा में कहा- “भाई, हमनें तो इन दुइ तीन दिनों में यह अजमाया कि जिस घर से चूहे मरतें हैं, उसी घर में ये जानलेवा ज्वर आता हैं। हमारे पड़ोस में एक बुढ़िया, उसकी बहुरिया और पोते पोती, चारों के चारों पड़े हैं। चारों की बाँह में गिल्टियाँ निकली भई है। हमसे बिचारी का दुःख न देखा भया सो दवा लेवे आए हैं। यहाँ तो पानी देनेवाला भी कोई नही है।” पहले ने चिन्तित दुःखी स्वर में कहा-“हमरी घर में से बुखार में पड़ी है। अब हम भी जाने किसी दिन पड़ जायें। कौन ठिकाना। श्मशानों की ओर लाशें जा रहीं हैं। किसी के मुँह से बोल नहीं निकलता।किसी भी गली में घुसों, दो चार घरों से आती रोने चिल्लाने की आवाजें सुनने वाले के कलेजे पर आरियाँ चलाए बिना नही रहतीं।”

तुलसीदास रात के समय अकेले उदास मन, गलियों से गुजरते हुए कहीं जा रहें हैं। एक द्वार की कुण्डी खटखटाते हैं। एक तगड़ा सा युवक कुप्पी लिए बाहर निकलता है। गोस्वामी जी को देखते ही आश्चर्य चकित होकर जल्दी से कुप्पी चौखट पर रखकर चरण छूने को झुक कर पूछता है- “अरे बाबा, आप इतनी रात में?” 
“जटा शंकर, मैं तुमसे एक भिक्षा माँगने आया हूँ। 
“पहले भीतर तो चलें। हुकुम करें बाबा।” 
क्रमशः

158 last

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी  158- फूटि-फूटि निकसत लोन राम राय को। कैलास फड़क उठे, बोले- "मित्र, तुम महात्मा तो हो ही पर खरे, कवि पहले ह...