Tuesday, 15 August 2023

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महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
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“यह चिन्ता हमारी है महाराज। आप तो बस आज्ञा भर दें, काम हो जाएगा। मेरा धन और किस दिन काम आएगा।वैसे आपके रुपयों मे भी बड़ी राशि बाकी है।”
मित्रों से आश्वासन पाकर तुलसीदास उत्साह में आ गए। उन्होंने एक नये उत्साह की धूम बाँध दी। जगह जगह हनुमान जी के मन्दिरों की प्रतिष्ठा हुई। पूजा पाठ से वहाँ के लोगों मे उत्साह आता और तुलसी कहते- “घबराओ मत, हनुमान जी हर दिशा के पहरेदार बने बैठे हैं। वे हर जादूगर भूत प्रेत यक्षादि को मार डालेंगे। राम जी ने हनुमान जी को अब तुम्हारी सेवा के लिए यहाँ नियुक्त कर दिया है। घबराओ मत।”
मानसिक यंत्रणाओं से जड़ीभूत पागलों को होश में लाने वाला यह आस्था का महायज्ञ रचने में तुलसीदास स्वयं अपना आपा खोकर रमे हुए थे।
एक दिन टोडर और गंगाराम दोनों ने उनसे विनय की। गंगाराम ने कहा-“तुलसी दास, तुम निश्चय ही सिद्ध महात्मा हो, किन्तु तुम और तुम्हारा यह हनुमान दल जो इतना अधिक परिश्रम कर रहा है वह यदि…..।”
मुस्कराते हुए तुलसी ने बात काटकर कहा- “ज्योतिषाचार्य जी, तनिक प्रश्न कुण्डली बनाकर देख लो न। अरे यह राम का काम है। मेरी तो छोड़ दो, इन बच्चों का भी बाल बांका न होगा। श्रद्धा और विश्वास ऐसी संजीवन बूटी है कि जो एक बार घोलकर पी लेता है वह चाहने पर मृत्यु को भी पीछे ढकेल देता है, फिर भी देखते हो मैं कितना सतर्क हूँ , मैने केवल उन्ही बालकों और युवाओं को लिया है जो कसरत करते हैं। जब तक रक्‍त शुद्ध है तब तक कोई रोग छू नहीं सकता। यह भी देख रहे हो कि मैं नीम के काढ़े और पत्ती का कितना उपयोग करता हूँ।”
टोडर बोले- “राम जाने यह महामारी कब तक चलेगी। अभी तो इसका अंत नहीं दीखता।”
“अरे, चार दिन में गर्मी की ऋतु आते ही यह महामारी अपने आप चली जाएगी, और हनुमान जी की कृपा मान कर नर नारियों का श्रद्धा और विश्वास बढ़ेगा। राम रूपी नैतिकता का झण्डा भूत भावन की इस परम पावन नगरी से ही एक बार  सेतु से हिमाचल तक फिर फहराएगा। देख लेना।”
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बेनीमाधव गदगद होकर बोले- “पंडित गंगाराम जी ने स्वयं एक बार आपकी उस समय की भविष्यवाणी मुझे बतलाई थी। सचमुच शिव की काशी से ही इस बार राम की ज्योति जागी है।”
“बस, अब कोई विशेष बात तो हमारे जीवन में कहने को रह नही जाती पुत्र, फिर तो स्वयं तुम लोगों के देखते ही देखते जो तुलसी भाग्य से भी भोंडा था वह रामनाम के प्रताप से गोस्वामी तुलसीदास बनकर पुज रहा है। चलो आज मैं तुमसे भी उऋण हुआ। हमारी जीवनी कदाचित्‌ तुम्हें आस्था के संघर्ष की कथा बनकर प्रेरित करे। तुम्हारा उपकार होगा किन्तु एक बात ज्योतिषी तुलसीदास की भी गाँठ में बाँध लो।”
“वह क्‍या गुरू जी?” 
“कालांतर में तुम्हारा ग्रन्थ मेरे भक्तों के द्वारा वह न रह जाएगा जो तुम लिखोगे। वह कुछ का कुछ हो जाएगा। हाँ तुम अवश्य अमर हो जाओगे।” 
गुरू जी के चरणों में श्रद्धापूर्वक मस्तक नवाकर बेनीमाधव बोले- "अमरता मिलेगी तो मैं देखने नहीं आँऊगा।महाराज, किन्तु इस जीवन में आपके इस आस्था के महायज्ञ से प्रेरणा लेकर मैं अपने मन की काली छायाओं से मुक्त हो सका तो अपना अहोभाग्य मानूँगा। मैं एक बार अपने भीतर वह मन देखने के लिए तड़प रहा हूँ गुरू जी जिसकी निर्मलता से परम ज्योति आभासित होती है।आशीर्वाद दें कि इस जन्म में यदि उस दिव्य ज्योति को न देख पाऊँ तो भी मेरा मन निर्मल हो जाये। मेरे आस्था दुर्ग की नींव आपके चरणों के प्रताप से दृढ़ हो जाये।” 
सन्त जी के माथे पर हाथ फेरते हुए बाबा ने स्नेहपूर्वक कहा- “होगा, अवश्य होगा,जैसे ठग साहुकार के पीछे पड़ता है न, वैसे ही तुम राम जी के पीछे लग जाओ बेनीमाधव। उनका प्रसाद तुम्हे अवश्य मिलेगा। सत्य, आस्था और लगन जीवन सिद्धि के मूल हैं।”  “आपके कथा प्रसँग में केवल एक जिज्ञासा और है गुरू जी, आपके मित्र टोडर जी का क्या हुआ?”
यह प्रश्न सुनते ही बाबा की आँखें भर आईं। कुछ क्षणों के लिए वे भाव विगलित हो गए। फिर एक दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए 'राम' कहा और कुछ रुककर फिर बोले - “महामारी शांत होने के बाद मैं कुछ समय के लिए मथुरा चला गया था। लौटकर जाना कि कुचाली गोस्वामियों ने मेरे उपकारी को दण्ड देने के लिए धोखा देकर उसका वध कर डाला था। टोडर ऐसा परोपकारी मनुष्य इस कलिकाल में कम ही देखने में आता है। टोडर के स्मरणमात्र से ही मैं अब भी अपने आँसू नही रोक पाता भैया।” बाबा की आँखें फिर उलछला उठीं।

गोस्वामी तुलसीदास जी रोग शैया पर पड़े हैं। उनके सारे शरीर में फुंसियाँ ही फुंसियाँ निकल आई हैं। मवाद की कीलें सी पड़ जाती हैं। शरीर भर से निकलती है। आज चार दिन हो गए, न रातों की नींद आती है और न दिन को चैन पड़ता है। बीच बीच में मूच्छित हो जाते हैं। राजा, गयाराम, कैलास, जयराम साहु, स्व० टोडर के पुत्र और पौत्र तथा काशी के दो नामी वैद्य कोठरी के भीतर उन्हे घेरकर बैठे हैं। रामू नीम के उबाले पानी से उनके घाव धोता और एक लेप लगाता चल रहा है। झोपड़ी के बाहर दर्शनार्थियों की भीड़ खड़ी है। लोग उत्सुकतावश मना किए जाने पर भी दरवाजे से झाँक झाँक कर गोस्वामी जी के दर्शन करते हैं। कभी कभी वे जोर से कराहकर राम राम कह उठते हैं फिर पीड़ा शांत होने पर मुस्कराकर कहते हैं-“सुख से दु:ख भला जो राम को याद तो कराता रहता है।”
दरवाजे से झाँकते कई दर्शनाथियों की आँखों से आँसू बह रहे थे। बाबा उन्हें मुस्कराकर देखने लगे, कुछ देर तक टकटकी बाँधकर देखते रहे फिर गर्दन घुमाकर दीवार पर बनी सीताराम की छवि को देखते हुए हाथ बढ़ाकर कहतें हैं-“यह भी इनकी असीम करुणा है,

असन-बसन हीन, विषम-विषाद-लीन, 
देखि दीन दूबरों करै न हाय-हाय को? 
तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो, 
दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय
को।
नीच यहि बीच पति पाई भरुहाइगो, 
विहाय प्रभू-भजन बचन मन काय को। 
तातें तनु पेखियत घोर बरतोर मिस, 
क्रमशः

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