महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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वे खटिया से उठने का उपक्रम कर रहे थे कि तुलसीदास उनके पास पहुँच गए। एक हाथ पीठ और एक उनकी छाती पर रखकर धीरे धीरे सहलाते हुए वे बोले -“आप आयु में मुझसे बड़े हैं, ब्राह्मण हैं, बैठे बैठे मेरा प्रणाम स्वीकार करें।बस-बस, आपको आनन्द अवश्य हुआ है, यह माना, पर उसे रोग का कारण न बनाएँ। शांत हो जाइए मेरे लिए तो सबका घर अपना ही घर है। सहज रूप से सबके घर पहुँच जाता हूँ। इसमें आश्चर्य की क्या बात है।”
बुड्ढा रो पड़ा, उनके हाथ पर अपने दोनों हाथ रखकर बोला- “जैसा सुना था वैसा ही आपको पाया। सुना है गंगा आपके सहपाठी रहे।”
“हाँ, महाराज।”
“तनिक दूर के नाते से वे हमारे भाई लगते हैं।”
“यह जानकर प्रसन्न हुआ। मैं आपसे आज एक भिक्षा माँगने आया हूँ। मुझे घर दिखाने के लिए जटाशंकर मिल गए हैं। उन्हीं के साथ यहाँ तक आ सका।”
“अरे महाराज, मैं निर्धन ब्राह्मण, अंधा अभागा। भला आपको क्या दे सकता हूँ? पुत्र- पुत्रवधु नौका से गंगा पार कर रहे थे सो गंगा जी में ही समा गए। उसके छह महीने बाद ही में अन्धा हो गया। यह पौत्र है, इसे थोड़ा बहुत पढ़ाता हूँ।यह मेरी सेवा करके फिर श्याम जी शास्त्री के यहाँ वेद पढ़ने जाता है। बस यही मेरा धन है, बल है, सहारा है।”
“मैं इसी बालक को आपसे माँगने आया हूँ।”
अंधे बाबा चौंके, कहा -“काहे के लिए महाराज?”
“राम जी की सेवा कराने के लिए।आज्ञा है? आपकी सेवा के समय यह सदा आपके पास रहेगा। या आप चाहे तो मेरे साथ अस्सी घाट चलें, वही रहे, मैं स्वयं आपकी सेवा करूँगा।” कहकर तुलसीदास बाबा की खाट पर ही बैठ गए।
बाबा गदगद हो गए, बोले- “आपकी मैं क्या बड़ाई करूँ गोसाईं जी महाराज, आप ऐसा प्रस्ताव लेकर इस समय पधारे हैं कि मेरी वाणी बोल करके भी भीतर से गूँगी हो गई है। पहले में अपने मन की बात आपसे कहता चाहता हूँ?”
“आप बड़े है महाराज, कहिए कहिए।”
“पिछले एक पखवारे से मेरा मन मुझे सचेत कर रहा है कि मेरा अन्तकाल अब निकट है।अपने जाने की चिन्ता नहीं किन्तु तब से रामू की चिन्ता मुझे अवश्य सता रही है। यही मेरे वंश का एकमात्र आशा दीप है।”
सुनकर तुलसीदास गंभीर हो गए, फिर उनके घुटने पर टिका हाथ अपने दोनों हाथों मे दबाकर उन्होंने कहा- “पण्डित जी, हानि-लाभ जीवन-मरण यश- अपयण विधि हाथ, फिर भी मैं वचन देता हूँ कि ऐसी स्थिति में यह बालक मेरे पास रहेगा और मैं स्वयं इसे पढ़ाऊँगा।”
कृतज्ञता के भावावेश में बुड्ढा बैठे ही बैठे उनके घुटने पर झुक के रो पड़ा, कहने लगा- “साक्षात् परमात्मा ही मेरी चिन्ता हरने के लिए आ गए हैं। बस अब मुझे कुछ नहीं कहना है । रामू, इधर आ पूत।”
रामू आगे बढ़ा, उसने घुटने पर हाथ रख कर कहा- “हाँ बाबा।”
उसका हाथ तुलसीदास के हाथ में रखते हुए गद्गद वाणी में वृद्ध बोला-“अब आज से यही तेरे माता पिता गुरु सभी कुछ हैं। मैं नहीं जानता कि यह तुझे अपने किस काम के लिए मुझसे माँगने आए हैं, पर अब तू इन्हीं का है।अब चाहे जितने दिन जिऊँ मुझे चिन्ता नहीं है।”
जिन क्षेत्रों में प्लेग की महामारी फैली हुई थी उनमें लगभग पाँच सौ लड़के काम कर रहे थे।उनमें से अधिकाँश बारह से पंद्रह वर्ष तक की आयु के थे। घूरे साफ हो रहे हैं। नीम के काढ़े से रोगियों का उपचार हो रहा है ।शव उठाए जा रहे हैं। लड़के बारी बारी से परिश्रम कर रहे हैं।बड़ी लगन से सेवा कर रहे हैं। इस समय सभी का डेरा अस्सी घाट के पास खुले मैदान में झोंपड़ियों में पड़ा है। नियम से सबके व्यायाम, विश्राम और खाने का प्रबन्ध स्वयं गोस्वामी जी की देख रेख में उनके बरसों पहले गंगाराम के द्वारा जमा करवाए गए धन से हो रहा है। टोडर और जयराम साहु प्रबंधक हैं। बालकों के पुण्य ने नगर के अन्य पुण्यशीलों के भीतर भी उत्साह जगाया।तभी एकाएक गली गली में अफवाह उड़ी-
“अरे, मोहना, कुछ सुना?”
“क्या भया भगेलू ?”
“हमने सुना है किसी जादूगर ने अपने कुछ चेले छोड़ें हैं। वो भैया, कुप्पों में भरकर कोई रसायन अपने साथ लातें हैं और जहाँ छोड़ा नहीं, वहीं चूहे मरने लगते हैं और बस बीमारी फैलती चली जाती है।”
“अरे, नहीं भगेलू, किसी की उड़ाई हुई बात है।”
“उड़ाई हुई? अरे, मैं अपनी आँखों देखी कह रहा हूँ। मेरे सामने चार कुप्पे वाले पकड़े गए। उन्होंने सब कबूल दिया।”
“क्या कबूला? ”
“यही कि हमारे जादूगर उस्ताद ने कहा है कि बनारस भर में ये दवा छिड़क आओ, जिससे वहाँ के सब लोग मर जाएँ और उनके घरों का रुपया टका मालमता आसानी से लूट लें।”
“अरे नही, गप्प है।”
“गप्प, अच्छा तो गप्प ही सही। नाई नाई बाल कितने कि जिजमान आगे आएँगे। दो चार दिनों में आपहीं देख लेना। अब किसी की जिन्दगी का कोई भरोसा नहीं है।”
सामने से एक खोमचे वाले को जाते देखकर भगेलू ने आवाज लगाई- “अरे ओ कचौड़ी वाले, यहाँ आना भाई। कौन जाने कल जिये कि मरें, आज कचौड़ी तो खा ही लें।”
जादूगर के कुप्पों की अफवाह काशी में बड़ी तेजी से फैली। गली गली में घबराहट फैल गई। मौहल्ले मौहल्ले में रातों में पहरे बैठने लगे। दिन और रात में पचासों बार जहाँ तहाँ- वो आए, की भेड़िया गुहार मच जाती थी। बेचारे कई निरपराधी लोग जादुगर के शिष्य माने जाकर पीटे गए। नगर में एक आंतक सा छा गया।
तुलसीदास ने सुना, वे उत्तेजित हो गए। कहा- “यह निश्चय ही किसी दुष्ट बुद्धि के द्वारा उपजाई हुई बात है। अपने क्रूर विनोद से वह इन बेचारे मरे हुओं को मार रहा है।” लोगो का भयातंक देखकर तुलसी विचार में पड़े। जन जन की असीम निराशाजनित घोर अनास्था का उचित उपचार होना ही चाहिए। आस्था हीन मनुष्य का जीवन ही उसका असह्य बोझ बन जाता है। यह स्थिति भयावह है। गोस्वामी जी ने टोडर और जयराम साहु को बुलाकर कहा- “मै अब इस महामारी को बाँधूँगा। काशी की दसों दिशाओं में संकट-मोचन हनुमान जी की मूर्तियाँ स्थापित करूँगा। इसके निमित्त भी धन चाहिए कैसे जोगाड़ होगा साहू जी?”
क्रमशः
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