Monday, 28 January 2019

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48-
गोपी गीत

‘स्वमूर्त्या लोकलावण्यनिर्मक्त्या लोचनं नृणाम्।
गीर्भिस्ताः स्मरतां चित्तं पदैस्तानीक्षतां क्रियाः।’

अर्थात, भगवान के मंगलमय श्रीअंग के लावण्यामृत-सिन्धु के उच्छलित बिन्दुमात्र से ही समस्त ब्रह्माण्डान्तर्गत अनन्तानन्त वस्तुओं में लावण्य प्रस्फुटित हुआ। ‘सीकर ते त्रैलोक्य सुपासी।’ अस्तु, सम्पूर्ण रसाभिव्यक्ति भगवद्‌रूप का ही परिणाम है। ‘देवी भागवत’ में एक अत्यन्त मार्मिक कथा है; वृन्दावन धाम में कोई शोभा नामक नायिका थी। भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के संग वह रमण कर रही थी तभी राधारानी वहाँ पधारीं; राधारानी को देखकर वह नायिका भयभीत हो अन्तर्धान हो गई। इसी तरह कान्ति, आभा, प्रभा आदि भिन्न-भिन्न नाम की गोपांगनाएँ भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के संग विहार करती रहती हैं परन्तु राधारानी के आते ही भयभीत हो अन्तर्धान हो जाती हैं।

ऐसी सम्पूर्ण कथाओं का तात्पर्य यही है कि शोभा, आभा, प्रभा, कान्ति आदि समस्त लोकोत्तर कल्याण-गुण-गणों की अधिष्ठात्री देवियाँ मूर्तिमती होकर सच्चिदानन्द प्रभु से ही विहार करती हैं परन्तु नित्यनिकुन्जेश्वरी राधारानी के आ जाने पर लुप्त हो जाती हैं; नित्यनिकुन्जेश्वरी राधारानी की अद्भुत अद्वितीय कान्ति, शोभा, आभा, प्रभा की तुलना में अन्य सम्पूर्ण कान्ति, शोभा, आभा, प्रभा तेजहीना हो जाती हैं, फीकी पड़ जाती हैं, विलीन हो जाती हैं। परब्रह्मरूप सुख का विशेषोल्लास होने पर विविध प्रकार के वैषयिक सुख, विविध प्रकार के सविशेष रस संसार में प्रवृत्त होते हैं। परब्रह्म के निर्विकार रूप से अवस्थित रहने पर तृतीय पुरुषार्थस्वरूप काम, सम्पूर्ण रस भी परब्रह्म स्वरूप में ही अवरूद्ध रहता है। अस्तु, एक निर्विकार, अनन्त, अखण्ड परात्पर पर ब्रह्म परमात्मा का रूपरस ही परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र, नित्यनिकुन्जेश्वरी राधारानी, अनन्तानन्त व्रजांगनाएँ, विभिन्न लीलाएँ एवं लीला-परिकर, आलम्बर एवं उद्दीपन अनेकानेक स्वरूपों में विकसित होकर ‘रसानां समूहो रासः’ बन गया।

गोपांगनाएँ कह रही हैं, हे वरद! हे सुरतनाथ! हम सब आपकी अशुल्कदासिका हैं। ‘मार्गनिर्वाहकं द्रव्यं प्रतिबन्धनिवर्तकं शुल्कः।’ मार्ग-निर्वाहक एवं प्रतिबन्ध-निवर्तक द्रव्य ही शुल्क है।

भगवान श्रीकृष्णचन्द्र सुरतनाथ हैं अतः गोपांगनाएँ काम-रूप शुल्क की याचना करती हैं। सर्वाधिष्ठान परमानन्द स्वरूप, औपनिषद परम पुरुष स्वयं रस-स्वरूप हैं तथापि परब्रह्म के निर्गुण, निराकार, अदृश्य, अग्राह्य, अलक्षण, अव्यपदेश्य, निर्विकार रूप में अवस्थित रहने पर सम्पूर्ण सम्भोग-सुख अवरुद्ध हो जाता है; सविशेष एवं सप्रपंच स्वरूप में विकसित नहीं हो पाता। अतः हे प्रभो! आपका स्पष्ट प्राकट्य भी होना चाहिए। वैष्णव-सिद्धान्तानुसार राधा-कृष्ण की स्थिति प्रकृति एवं पुरुष की अवस्थिति से भी परे है; प्रकृति-पुरुष तो कुछ निम्नस्तरीय तत्त्व माना गया है।

‘दूरे सृष्टधादिवार्ता न कलयति मनाङ् नारदादिस्वभक्तान्।
श्रीराधामेव जानन् मधुपतिरनिशं कुन्ज-वीथीमुपास्ते।’

अर्थात, अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड का उत्पादन, पालन एवं संहार, कृष्ण का नहीं, अपितु ईश्वर का काम है। निर्गुण, निर्विकार, निष्क्रिय, निराकार स्वरूप कृष्ण सदा ही अपराशक्तिरूप रासेश्वरी, नित्यनिकुन्जेश्वरी राधारानी में ही अन्तर्लीन है। जैसे प्रकाश में अन्तर्निहित विमर्श का बोधक भी प्रकाश ही है वैसे ही रासेश्वरी नित्यनिकुन्जेश्वरी राधारानी में अन्तर्विलीन कृष्ण का भाव भी प्रतिक्षण राधारानी में ही होता है। ईश्वर ही भक्तानुग्रह में प्रतृत्त होता है। वेदान्त-सिद्धान्तानुसार भी-

त्वत्तोऽस्य जन्मस्थितिसंयमान् विभो वदन्त्यनीहादगुणादविक्रियात्।
त्वयीश्वरे ब्रह्मणि नो विरुद्धयते त्वदाश्रयत्वादुपचर्यते गुणैः।

श्रीदामाद्यैः सुहृद्भिर्न मिलति हरति स्नेहवृद्धिं स्वपित्रोः।
किन्तु प्रेमैकसीमां मधुररससुधासिन्धुसारैरगाधाम्।
अर्थात् आपके दो रूप हैं, ब्रह्म एवं ईश्वर। ब्रह्मरूप अविक्रिय, निर्गुण, निराकार, निष्क्रिय हैं। उत्पादकीयतत्त्व, पालनीयतत्त्व एवं संहारतत्त्व विक्रियाएँ हैं अतः गुणभाव में ये क्रियाएँ भी असम्भव हैं। ईश्वर रूप मायाविशिष्ट है, सगुण है अतः ईश्वर ही विश्व-प्रपंच की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहृति का कारण है। जैसे आनन्द-सिन्धु का रमण अपने अन्तरंग अभेद माधुर्यसार-सर्वस्व में ही होता है किंवा आत्मविद् तत्त्वज्ञ ब्रह्मविद् वरिष्ठ आत्मा में ही क्रीड़ारत रहता है वैसे ही अनन्त परमानन्द-सुधा-सिन्धु कृष्ण का माधुर्य-सार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री रासेश्वरी नित्यनिकुन्जेश्वरी राधारानी में ही रमण सम्भव है।

जैसे चन्द्र का अपनी चन्द्रिका से अथवा सूर्य का अपनी आभा, प्रभा, कान्ति से रमण अपेक्षाकृत बहिरंग है, वैसे ही पुरुष और प्रकृति का सम्बन्ध तुलनात्मक दृष्टि से कुछ बहिरंग ही है परन्तु कृष्ण एवं राधा का सम्बन्ध अमृत एवं उसकी परमान्तरंगा मधुरिमा किंवा गंगा-जल एवं उसकी शीतलता, पवित्रता की तरह ही परमान्तरंग एवं अभिन्न हैं। साक्षात परात्पर परब्रह्म परमेश्वर सच्चिदानन्दघन अपने माधुर्य-सार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री महाशक्ति राधारानी को अभिव्यक्त कर निरन्तर उसी में रमण करते हैं, निरन्तर उसी को स्वप्रकाशत्त्व, अवेद्यत्वे। सत्यपरोक्षत्त्व रूप से जानते हैं। वह वेदन का अगोचर होकर अपरोक्ष है। विपर्यय, संशय एवं अज्ञान का अविषय ही स्वप्रकाश है; वेदन का गोचर नहीं अतः अवेद्य हैं; अवेद्य अपरोक्ष होकर स्वप्रकाशत्त्व ही आत्मा है। अस्तु, पूर्णानुराग-रस-सार-सरोवर-समुद्भूत सरोज वृन्दावन धाम, सरोज-किंजल्क गोपसोमन्तिनीजन, किंजल्क-पराग श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द एवं पराग-मकरन्द नित्यनिकुन्जेश्वरी, रासेश्वरी, राधारानी यद्यपि स्वभावतः ही अभिन्न हैं तथापि रस-विशेष के विकास हेतु उनमें भी अवान्तर भेद स्वीकृत होता है।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)
क्रमश:

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