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गोपी गीत
वैयाकरण भी शब्द और अर्थ के तादात्म्य सम्बन्ध को मानता है। वेदान्त-सिद्धान्त है कि ‘परागर्थप्रमेयेषु या फलत्वेन सम्मता। संवित् सैवेह संविच्च संविदेषा स्वप्रभा (पंचदशी)।’अनादि, अनन्त, अखण्ड, नित्य-प्रबोध सत्ता ही संविद् है। भगवान् सच्चिदानन्द हैं। सत् अर्थात् अत्यन्त अबाध सत्ता; चित् अर्थात् अत्यन्त अखण्ड नित्य-प्रबोध; आनन्द अर्थात् सर्वोपद्रवविवर्जित-स्वात्मा। अर्थोपलक्षित सम्पूर्ण जगत् सदानन्द का परिणाम है; सम्पूर्ण शब्द चिदानन्द का परिणाम है। सत् में जो स्वप्रकाशत्व है वही उसकी संवित्रूपता है; संवित् में जो अत्यन्ताबाध्यता है वही उसकी सद्रूपता है तथा सद् संवित् में जो सर्वोपद्रव-रहितता है वही आनन्दरूपता है।
अस्तु, शब्द और अर्थ मूलतः एक ही हैं। ‘तदभिन्नाभिन्नस्य तदभिन्नत्वनियमात्’ तदभिन्नाभिन्न में तदभिन्नता ही होती है। यही ‘तरंगाभिन्न समुद्र, समुद्राभिनन तरंगान्तर’ अर्थात् समुद्र से अभिन्न तरंग, अथवा एक तरंग का दूसरी तरंग से अभिन्नता न्याय है। वस्तुतः प्रत्येक तरंग का अन्य तरंग से तथा समुद्र से अभिन्न सम्बन्ध है तथापि बाह्यतः भिननता की प्रतीति होती है। कहा जाता है, ‘सविता गोभी रसं भुङ्क्ते’ अर्थात सूर्यनारायण अपनी रश्मियों द्वारा धरित्री का भोग करते हैं; तात्पर्य कि धरित्री का रस सूर्यनारायण में लीन हो गया। भोक्ता द्वारा भोग्य का आत्मसात् कर लिया जाना ही भोग है। भोक्ता भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र का भोग्य गोपांगनाओं से तादात्म्य हो जाना, जीवात्मा का सर्वाधिष्ठान परमात्मा से सर्व-प्रकारेण व्यवधानराहित्य, तादात्म्यापत्ति स्थापित कर लेना ही सम्यक् भोग, सम्भोग किंवा सुरत है। आचार्यगण-मतानुसार गोपांगना पद जीव-वाच्य है। इसीलिए कहा जाता है कि गोपांगनाभाव बिना भगवत् पदप्राप्ति, मुक्ति सम्भव नहीं। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं-
‘प्रभा जाई कहँ भानु बिहाई। कहँ चन्द्रिका चन्द्र तजि जाई।’
‘प्राणनाथ तुम बिन जग माहीं। मो कहँ सुखद कतहुँ कोउ नाहीं।’
जैसे चन्द्रमा से चन्द्रिका, सूर्यनारायण से प्रभा, अथवा समुद्र से तरंग का अभिन्न सम्बन्ध है, वैसे ही परमात्मा से जीव का भी अभिन्न सम्बन्ध है। तद्यथा ‘प्रियया स्त्रिया संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचिद् वेद नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मनास्वम्परिष्वक्तो न बाह्यं किंचद् वेद नान्तरम्।’ अर्थात् जैसे कोई सती, साध्वी प्रेयसी प्रियतमा दीर्घ कालान्तर विदेश से लौटकर आए हुए अपने प्राणघन, प्रिय पति का आलिंगन कर आनन्दोद्रेक से विहल हो अन्य सम्पूर्ण बाह्य ज्ञान को भूल जाती है, वैसे ही जीवात्मा भी परमात्मा का आलिंगन कर सम्पूर्ण संसार को भूल जाता है। वस्तुतः ये सम्पूर्ण उदाहरण केवल संकेतमात्र हैं। परमात्मा एवं जीवात्मा के अभिन्न सम्बन्ध-बोध-हेतु जल एवं तरंग, चन्द्र एवं चन्द्रिका, भानु एवं प्रभा के उदाहरण प्रस्तुत किये जाते हैं; अथवा सर्वविध व्यवधानशून्य लौकिक प्रेयसी-प्रेयान् सम्बन्ध से भी उदाहरण दिया जाता है तथापि ये सम्पूर्ण उदाहरण सीमित हैं अतः अपर्याप्त हैं। अविद्या काम-कर्म के वशीभूत जीव स्वयं अपने-आपको परमात्मा से विमुक्त एवं भिन्न मान बैठता है।
‘जब ते जीव हरि ते बिलगानो, तब ते देह-गेह निज मानो।
मायाबस स्वरूप बिसरायो, तेहि भ्रमते दारुन दुख पायो।’
तथा
‘आनन्द-सिन्धु मध्य तब बासा, बिनु जाने कत मरसि पियासा।
सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा, बारि-बीचि इब गावहिं वेदा।’
आदि अनेक ऐसे वाक्य हैं। परमानन्द-रसार्णव-भगवान् में बर्फ-पुतली की तरह निमग्न जीव अपने प्रियतम को भूलकर अनन्त क्लेशों में निमग्न हो सन्तप्त हो रहा है। शास्त्र तथा आगमों के प्रबोधन से ही अज्ञान-विस्मरण एवं विभ्रम की निवृत्ति होती है।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)
क्रमश:
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