Wednesday, 2 January 2019

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गोपी गीत

वस्तुत: पूर्णानुराग रस सार सरोवर समुद्भूत रस सार सरोज ही व्रज है; व्रजसीमन्तिनी गोपाङ्‌गनाएँ हो सरोज किञ्जल्क हैं; परमानन्दकन्द भगवान श्रीकृष्ण ही इन किञ्जल्कों का पराग है; नित्य निकुन्जेश्वरी, वृषभानुदुलारी राधारानी ही इस पराग की मकरन्द हैं। एतावता व्रजधाम स्वभावतः ही उत्कर्ष को प्राप्त है।

गोपाङ्‌गनाएँ कह रही हैं, ‘व्रजः इदानीं तव जन्मना अधिकं पूर्वतः अधिकं यथा स्यात् तथा जयति’ अर्थात्, हे श्यामसुन्दर! स्वभावतः उत्कर्ष को प्राप्त व्रजधाम आपके जन्म के कारण पूर्वापेक्षा अब विशेष उत्कर्ष को प्राप्त हो रहाहै। भगवान श्रीकृष्ण के व्रजेन्द्रनन्दन-स्वरूप में जन्म से अर्थात् प्रकट प्रकाश होने पर तो बाहुल्येन सभी प्राणियों का उत्कर्ष भासमान होता है।

‘जयति ते अधिकं जन्मना व्रजः’ में प्रयुक्त ‘अधिक’ जैसे सापेक्ष पद-प्रयोगात् ‘सर्वतो अधिकं’ अभिप्राय भी ग्रहण किया जा सकता है। ‘संकोचकाभावात्’ संकोचक के प्रत्यक्ष अभाव में सर्वात्मक तुलना ही लक्षित होती है अतः उपर्युक्त पद का एक अर्थ यह भी किया जा सकता है कि गोपाङ्‌गनाएँ कह रही हैं, ‘हे श्यामसुन्दर! आपके जन्म से व्रजधाम सर्वातिशायी उत्कर्ष को प्राप्त हो रहा है’। भागवत वाक्य है-

वृन्दावनं सखि! भुवो वितनोति कीर्ति यद्देवकीसुतपदाम्बुजलब्धलक्ष्मि।

अर्थात, हे सखि! वृन्दावनधाम के कारण सकल धरित्री-मण्डल की लोकोत्तर कीर्ति विस्तीर्ण हो रही है क्योंकि इस भूमि-खण्ड को ही देवकी-सुत व्रजेन्द्रनन्दन, कृष्णचन्द्र के व्यवधानशून्य निरावरण चरणारविन्दों का संस्पर्श प्राप्त हो रहा है। ब्रह्मा-रुद्रादि देवाधिदेव भी जिन भगवान के पादारविन्द-रज-संस्पर्श की सदा कामना करते हैं, उन्हीं के पादुकादि व्यवधानशून्य निरावरण चरणारविन्दों का संस्पर्श वृन्दावनधाम की भूमि को प्राप्त होता है। इस मंगलमय संस्पर्श का ही चमत्कार है कि वृन्दावन की भूमि रोमान्च-कंटकित हो रही है। वृन्दावनधाम की भूमि में जो विविध वृक्ष, लता, गुल्म एवं तृणादि उद्गत हैं वे ही मानों उदृप्त रोमान्चावलियाँ हैं। जैसे किसी रसिक को अपनी प्रियतमा के पादारविन्द-संस्पर्श से, किंवा जैसे गोपाङ्‌गना-जनों को अपने मदनमोहन, व्रजेन्द्रनन्दन, श्यामसुन्दर के चरणाम्बुज-संस्पर्शष से लोकोत्मर आनन्दोद्रेक होता है वैसे ही इस भूमि को भी भगवान के पादत्राणादि व्यवधान शून्य चरणारविन्द संस्पर्श से लोकोत्तर आनन्दोद्रेक हो रहा है।

‘आनन्द-वृन्दावन-चम्पू’ नामक ग्रन्ध के अनुसार ‘वृन्दावनं, वृन्दायाः वनं’ अथवा ‘वृन्दस्य-गुणसमूहस्य अवनं रक्षणम्‌ यस्मात् तत् वृन्दावनं’ अथवा ‘सकल-गुण वृन्दस्य अवनं, वृन्दावनं’ जहाँ सकल गुणों का रक्षण हो वह वृन्दावन, किंवा जो अचिन्त्य अनन्त कल्याण-गुण गणों का धाम हो वह वृन्दावन किंवा जालन्धर दैत्य पत्नी जिसके अनुराग से अत्यन्त उत्सुक होकर भगवान् पूर्णतम् पुरुषोत्तम सच्चिदानन्दघन प्रभु ने भी छद्मवेष धारण किया उस परमानुरागिणो तुलसी-स्वरूपा, भगवद्भक्ति-स्वरूपा वृन्दा का यौवनरूप वन, वृन्दावन। जैसे अनुरागिणो प्रियतमा को अपने प्रियतम के संस्पर्श से लोकोत्तर आनन्दोद्रेक होता है वैसे ही वृन्दावनधाम को भी इस समय लोकोत्तर आनन्द प्राप्त हो रहा है। भगवत-पादारविन्द-निवासिनी लक्ष्मी की शोभा, प्रभा से संयुक्त हो वृन्दावनधाम स्वयं ही आनन्दधाम बना हुआ सम्पूर्ण भू-मण्डल की कीर्ति को विस्तीर्ण कर रहा है।

यदा कदा अन्य सम्बन्ध से भी कथंचित् सम्बन्धित तत्त्व का लोकोत्तर माहात्म्य बढ़ जाता है। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं, ‘सैल हिमाचल आदिक जेते, चित्रकूट गुण गावहिं तेते।’ एक कथा है; एक बार विन्ध्य ने हिमाचल की अपेक्षा अधिक उत्कर्ष-प्राप्ति-हेतु अधिकाधिक बढ़कर सूर्य का मार्ग अवरुद्ध कर दिया। घबराकर देवताओं ने महर्षि अगस्त्य से रक्षा-हेतु प्रार्थना की। देवताओं से प्रार्थित महर्षि अगस्त्य विन्ध्य पर गए; विन्ध्य ने अति लघु स्वरूप धारण कर महर्षि के चरणों में प्रणिपात किया; महर्षि ने आशीर्वाद देते हुए आज्ञा दी ‘जब तक मैं न लौटूँ, तब तक तुम ऐसे ही रहना।’ तदनन्तर महर्षि अगस्त्य सह्यादि पर्वत के सन्निधान में तपस्यारत हो गए फलतः विन्ध्य के वांछित उत्कर्ष-प्राप्ति में विघ्न उपस्थित हो गया। रामावतार के अवसर पर अनन्त कोटि-ब्रह्माण्ड-नायक, परमात्मा प्रभु रामचन्द्र के चित्रकूट-निवास के कारण वही विन्ध्य बिना श्रम के ही विशेष उत्कर्ष को प्राप्त हो गया क्योंकि चित्रकूट विन्ध्य का ही अंष है। अत्यधिक श्रम करने पर भी विन्ध्य उत्कर्ष को प्राप्त नहीं हो सका परन्तु राघवेन्द्र रामचन्द्र के निवास के कारण बिना श्रम ही सर्वातिशायी माहात्म्य को प्राप्त हो गया। ‘विन्ध्य मुदित मन सुख न समाई। श्रम बिनु विपुल बड़ाई पाई।’ इसी तरह वृन्दावनधाम में ही अज, परात्पर परब्रह्म प्रभु का प्रत्यक्ष प्रादुर्भाव हुआ अतः वृन्दावनधाम के प्रसंग से सम्पूर्ण धरित्री-मण्डल को श्रीकृष्णचन्द्र के चरणारविन्द का संस्पर्श प्राप्त हुआ; अस्तु वृन्दावनधाम से सोश्लष्ट एवं संसृष्ट होकर धरित्री-मण्डल भी सौभाग्यशाली हो गया, धन्य-धन्य हो गया।
(‘गोपी गीत-करपात्री जी महाराज’)

क्रमश:

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