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गोपी गीत
धरित्री-मण्डल के वृक्ष, लता एवं तृणोद्गति में भगवत्-संस्पर्श-जन्य रोमांच की कल्पना करती हुई गोपाङ्गनाएँ धरित्री से प्रश्न करती हैं,
‘किन्ते तपः क्षिति कृतं बत केशवाङ्घ्रिस्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि।
अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद्वा आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन।।’
अर्थात, धरित्री बहन तुमने ऐसी कौन महत् तपस्या की है जिसके कारण तुम्हें मदनमोहन, श्यामसुन्दर, व्रजेन्द्रनन्दन के पादारविन्द का संस्पर्श प्राप्त हुआ? धरित्री ने उत्तर दिया, सखि तुम्हारे व्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दर तो कुछ ही समय पूर्व आविर्भूत हुए परन्तु हमारे अंग-प्रत्यंग में तो यह रोमान्चरूप वृक्ष लता दूर्वादि तो प्राचीनकाल से ही विद्यमान हैं; एतावता हमारे इस रोमान्चोद्गम का कारण तुम्हारे श्यामसुन्दर श्रीकृष्णचन्द्र के पादारविन्द का संस्पर्श कदापि नहीं हो सकता। अस्तु, तुम्हारी यह कल्पना व्यर्थ है। गोपाङ्गना-जन पुनः कहती हैं, हे सखि! मदनमोहन श्रीकृष्णचन्द्र के पादारविन्द-संस्पर्श के बिना यह लोकोत्तर आनन्दोद्रेक कथमपि सम्भव नहीं, वामनावतार के प्रसंग में अथवा उससे भी पूर्व वाराहावतार के प्रसंग में तुमको जो भगवात्-संस्पर्श प्राप्त हुआ, उसी के फलस्वरूप तुमको यह रोमान्च हुआ है। भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ने वराह-वपु धारण कर रसातल में निमग्न् धरित्री का उद्धार किया उस परिरम्भणजन्य आनन्दोद्रेक के कारण ही तुम रोमान्च-कंटकित हो रही हों। ‘आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन’ हे धरित्री बहन! इस अद्भुत रोमान्चोद्गति का एकमात्र कारण भगवत्-संस्पर्श ही हो सकता है; और यह संस्पर्श निस्सन्देह किसी पुण्य-पुन्ज का ही फल है अतः हम तुमसे पूछती हैं कि वह कौन तपस्या है जिसका यह लोकोत्तर फल तुम्हें प्राप्त हुआ है ताकि हम भी तुम्हारी जैसी तपस्या कर भगवत्-चरणारविन्द-संस्पर्श का, श्रीकृष्ण-परिम्भण का सौभाग्य प्राप्त करें।
लोकोत्तर सौभाग्यशालिनी होने पर भी गोपाङ्गनाएँ कभी धरित्री के सौभाग्य पर तो कभी नील-नीरधर घनश्याम में चमकती दामिनी को देखकर उसकी सौभाग्यातिशयता पर मुग्ध हो कहने लगती हैं,
‘तडितः पुण्यशालिन्यो याः सदा घनजीवनाः।
तेन सार्द्ध व्यदृश्यन्त नादृश्यन्त च तं विना।।’
अर्थात, हे सखि यह तड़ित्, यह दामिनी बड़ी सौभाग्यशालिनी है। यह अपने प्रियतम घनश्याम के वक्षःस्थल पर ही विचरण करती हुई सदा दृष्टि गोचर होती है। नील-नीरधर के दर्शन न हों तो दामिनी के दर्शन भी कदापि संभव नहीं। इस घनश्याम-निर्भर तड़ित के प्रति ईर्ष्यालु व्रजवनिताएँ आकांक्षा करती हैं कि हमारे अस्तित्व भी व्रजेन्द्रनन्दन, मदनमोहन श्यामसुन्दर से संश्लिष्ट हों तथा उनके ही प्राकट्य पर निर्भर हों।
मेघ-श्याम-संवलित तड़ित् से गोपांगना-जन पूछती हैं, हे आलि! हे सखि! हे तड़ित्! यह बताओ कि तुमने किस पवित्र काल में, किस पवित्र देश में, किस पवित्र क्षेत्र में कौन पवित्र तपस्या की और कितनी की? यह लोकोत्तर सौभाग्य जो तुमको प्राप्त हुआ है बिना तपस्या के सम्भव नहीं। ये जो नीलनीरधर श्यामघन अम्बुधर हैं ये तो हमारे श्यामसुन्दर के उरस्थल तुल्य हैं। भगवान् के वक्षस्थल तुल्य इस गम्मीर नील-नीरधर पर तुम सदा विराजमान रहती हो, सदा ही उसके संग रमण करती हो। हे तड़ित्! तुम बड़ी सौभाग्यशालिनी हो, धन्य-धन्य हो! इसलिए हमें भी बताओ, हम भी तुम्हारे जैसा तप करें, तुम्हारा जैसा ही सौभाग्य प्राप्त करें। भाव-विभोर गोपाङ्गनाएँ ऐसी अनेक कल्पनाएँ करती रहती हैं। विशेष भावोत्कर्ष-प्राप्त भक्त-हृदय में ही ऐसी असाधारण भाव-लहरियाँ उत्थित होती हैं; भगवत्ससान्निध्य-प्राप्त भक्त को ही भगवत् संस्पर्श एवं दर्शन अत्यन्त दुर्लभ प्रतीत होता है। जैसे किसी रंक को चिन्तामणि की प्राप्ति प्रतीत होती है वैसे ही लोकोत्तर सौभाग्यशालिनी राधारानी को भी कृष्ण-दर्शन एवं संस्पर्श अत्यन्त ही दुर्लभ प्रतीत होता है।
श्री मन्नारायण भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के निरावरण चरणाविन्द के संस्पर्श का सौभाग्य वृन्दावनधाम को ही प्राप्त हुआ; गोवर्धन-पर्वत के चतुर्दिक् विस्तृत विशाल भूमिखण्ड ही वृन्दावन-धाम है; ‘मध्ये गोवर्धनं तत्र।’ यह वृन्दावनधाम भी व्रज-धाम से उद्व्याप्त है।
(‘गोपी गीत- करपात्री जी महाराज’)
क्रमश:
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