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गोपी गीत
भावुकों ने ‘व्रजे वने, निकुन्जे च श्रेष्ठमत्रोत्तरोत्तरम्’ जैसी कल्पना की है; तदनुसार व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र, वृन्दावनचन्द्र श्रीकृष्णचन्द्र एवं नित्यनिकुन्जमन्दिराधीश्वर श्रीकृष्णचन्द्र स्वरूप उत्तरोत्तर पूर्ण, पूर्णतर एवं पूर्णतम मान्य हैं। पूर्णतम स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण चन्द्र के निरावरण चरणारविन्द-संस्पर्श के सौभाग्यातिशय को प्राप्त कर व्रजधाम ‘पूर्वतोवा सर्वतोवा’ अधिक उत्कर्ष को प्राप्त हो रहा है।
उपासना के अन्तर्गत नाम, रूप, लीला एवं धाम चारों का ही विशेष महत्त्व हैं; सम्पूर्ण धामों में भी व्रजधाम सर्वाधिक शीर्ष स्थानीय है; ‘सर्वेषां धाम्नां कं शिरः स्थानीयं’ संसार के समस्त पुरी एवं धामों में व्रजधाम ही अग्रगण्य है। ‘काश्यादिपुर्यो यदि सन्तु लोके तेषां तु मध्ये मथुरैव धन्या।’ काशी आदि पुरियों में मथुरा ही विशेष धन्य है। काशीपुरी की बड़ी महिमा है क्योंकि ‘मरणं यत्र मंगलं’ काशीपुरी में मृत्यु मोक्षप्रद है परन्तु मथुरा में ‘या जन्म मौन्जी धृति मृत्यु दाहैर्नृणां चतुर्धा विदधाति मुक्तिम’ जन्म, मौन्जी-बन्धन, मृत्यु आदि विशेष संस्कारों में से किसी एक का हो जाना ही कल्याणप्रद है अतः मथुरापुरी की विशेषतः महामहिम है।
‘जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः’ पद का तात्पर्य कुछ विद्वानों के मतानुसार यह भी है कि व्रजधाम वैकुण्ठधाम की अपेक्षा भी अधिकाधिक उत्कर्ष को प्राप्त हो रहा है। वैकुण्ठधाम में अनन्त-ब्रह्माण्ड की ऐश्वर्याधिष्ठात्री शक्ति, वैकुण्ठेश्वरी भगवती, लक्ष्मी एका हैं अतः उनको अपने प्राण-वल्लभ श्रीमन्नारायण, भगवान विष्णु की सेवा के लिए उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती किन्तु व्रजधाम में लक्ष्मी-तुल्य अनेकानेक गोपाङ्गनाएँ हैं। ‘श्रिय कान्ताः’ इत्यादि वचनों से सुस्पष्ट हो जाता है कि व्रजधाम को प्रत्येक कान्ता साक्षात श्रीस्वरूपा हैं। व्रजधाम में वैकुण्ठाधिपति भगवान श्रीमन्नारायण भगवान विष्णु स्वयं ही व्रजेन्द्रनन्दन, नवलकिशोर, गोपिकावल्लभरूप में सूत्रधार-संचालित-दारुयंत्रवत् स्वानुरागिणी गोपालियों का अनुवर्तन कर रहे हैं; एतावता, स्वभावतः ही परम-प्रेयसी, परम-साध्वी, पति-परायणा, वैकुण्ठेश्वरी इन्दिरा भी अपने प्राणधन, प्राणनाथ का अनुसरण करती हुई स्वयं भी हीनभाव, दास्यभाव से व्रजधाम में निरन्तर आश्रयण कर रही है। यहाँ शंका की जा सकती है कि संभवतः वैकुण्ठेश्वरी इन्दिरा विशेषतः महामहिम व्रजधाम की शोभा निरखने हेतु ही व्रज में आश्रयण कर रही हैं। यह शंका सर्वथा निराधार है क्योंकि वैकुण्ठधाम का ऐश्वर्य अद्वितीय है; साथ ही साथ, किसी भी अपूर्व शोभा के निरीक्षण हेतु निरन्तर आश्रयण सर्वथा अवांछनीय है।
‘श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि’ जैसी उक्ति से यह सुस्पष्ट हो जाता है कि वैकुण्ठेश्वरी इन्दिरा निरन्तर व्रजधाम में हीनभाव, दास्यभाव से ही आश्रयण कर रही हैं। यह भी कहा जा सकता है कि वैुण्ठनाथ श्रीमन्नारायण विष्णु ही व्रजधाम में अवतरित हुए हैं अतः पति-परायणा, भगवती, वैकुण्ठेश्वरी इन्दिरा भी अपने प्राणनाथ का अनुगमन करती हुई व्रजधाम की श्रीवृद्धि हेतु व्रज का निरन्तर आश्रयण कर रही हैं। परन्तु ‘श्रयते’ पद, आत्मने पद का प्रयोग ‘स्वात्म सौभाग्यातिशयं सूचयित’ अपने ही सौभाग्यातिशय का ही सूचक है यतः आश्रयण क्रिया का फल स्वात्मगामी है। अस्तु, वैकुण्ठेश्वरी भगवती इन्दिरा का व्रजधाम में सतत आश्रयण व्रजधाम की श्रीवृद्धि का हेतु न होकर सौभाग्यातिशय के आविर्भाव हेतु ही है। गीत के आरम्भ में प्रयुक्त ‘जयति’ पद प्रयोग की भी सार्थकता इसी अर्थ में सम्भव है।
जिस व्रजधाम में प्रवेश करने मात्र से ही ‘यत्र प्रविष्टः सकलोऽपि जन्तुः आनन्दसच्चिद्धनतामुपैति’ प्राणी मात्र सच्चिदानन्दघन्त्व को प्राप्त हो जाता है वह व्रजधाम स्वयं आनन्दघनस्वरूप है इसमें किसी प्रकार की भी विप्रतिपत्ति संभव नहीं। व्रजधाम का महत्त्वातिशय स्वभावतः सिद्ध है अतः इस उत्कर्ष-वृद्धि से व्रज का महत्त्व नहीं बढ़ता अपितु उन गुणगणों का गुणत्व ही प्रत्यक्ष हो उठता है। अस्तु, जैसे निरतिशय बृहत् स्वरूप ब्रह्म भी जीवानुग्रहार्थ षड्भग एवं षड्भगोपलक्षित अनन्तानन्त कल्याणगुण-गुणों को अंगीकार कर लेते हैं, वैसे ही स्वभावतः आनन्दघनस्वरूप व्रजधाम भी भक्तानुग्रहार्थ ही उत्कर्षरूप गुण को प्राप्त हो रहा है। ‘ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीगना।’ अर्थात जिनमें ज्ञान, वैराग्य, धर्म, यश, श्री एवं ऐश्वर्य ये छहों गुण सम्पूर्णतः विद्यमान हों वे ही भगवान हैं। संपूर्ण गुणगणों का प्रयोजन स्वाश्रय में आनन्दातिशय एवं महत्तवातिशय का आधान तथा सर्व-प्रकार के अनर्थ का निवर्हण ही है। भगवान निरतिशय ब्रह्मस्वरूप हैं ‘निरतिशयं बृहत् ब्रह्म’ अनन्त-पद-समभिव्याहृत, अनन्त ब्रह्म हैं अतः गुण-गणों द्वारा उनमें महत्तवातिशय एवं आनन्दातिशय का आधान अथवा अनर्थ का निवर्हण होगा यह कल्पना भी सर्वथा निर्मूल है। अनन्त कोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत ब्रह्मदि देवशिरोमणियों को प्राप्त आनन्द भी इस अनन्त-आनन्द-सिन्धु का बिन्दु-मात्र है; इस बिन्दु का उद्गम स्थान अचिन्त्य, अनन्त, ब्रह्मानन्द-सुधा-सिन्धु, परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र ही हैं। भगवान स्वयं ही कहते हैं, ‘मा भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षम्।’ अर्थात मैं निर्गुण निरपेक्ष हूँ, गुण-गुण अपनी गुणत्वसिद्धि हेतु ही मुझे भजते रहते हैं। इसी तरह ‘भूषणानां-भूषणानि अंगानि यस्य सः’।
(‘गोपी गीत- करपात्री जी महाराज’)
क्रमश:
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