Wednesday, 16 January 2019

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गोपी गीत

‘श्रीमद्भागवत’ में एक पुरंजन-पुरंजनी आख्यान है। जीवरूप पुरंजन मायावश अपने परम अन्तरंग सखा को भूलकर बुद्धि-पुरंजीन का अत्यंतानुरागी हो अनवरत उसी के चिन्तन में तन्मय हो गया। उस समय पुण्य-परिपाक से पतिरूप गुरु की आराधना से संतुष्ट होकर श्री हंसरूपधारी भगवान् प्रकट हुए तथापि पुरंजनी में आसक्त् जीव-रूप पुरंजन अपने सनातन सखा को न पहचान सका। पुरंजन के फलोन्मुख पुण्य-पुंज एवं स्वानुग्रहवशात् भगवान् ने उसको अपने विशुद्ध स्वरूप का दर्शन एवं उपदेश दिया।

‘अहं भवान् न चान्यस्त्वं त्वमेवाहं विचक्ष्व भोः।
न नौ पश्यन्ति कवयश्छिद्रं जातु मनागपि।’

मैं ही तुम्हारा पारमार्थिक स्वरूप हूँ, तुम मुझसे पृथक् नहीं हो, मैं ही तुम और तुम ही मैं हूँ। परमात्मा के साथ अपने इस अभिन्न सम्बन्ध को भूल जाने से ही जीव अनेकार्थकूलक संसृति-चक्र में भटकता रहता है।

‘बृहदारण्यक’ का कथन है कि सुषुप्ति-काल में जीवात्मा परमात्मा में मिल जाता है। दृष्टान्त है-‘स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपश्रयत एवमेव खलु सौम्य तन्मनो दिशं दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपश्रूयते।’जैसे सूत्र में बँधा शकुनि पक्षी दिशा-विदिशा में भ्रमण करता हुआ परिश्रान्त हो विश्रान्ति के लिए पुनः बंधन-सूत्र के आश्रय-काष्ठ का ही समाश्रयण करता है वैसे ही नाना प्रकार के कर्मों से परतन्त्र जीव जाग्रत एवं स्वप्न की अवस्थाओं में स्वाश्रयभूत प्रभु से वियुक्त होकर भिन्न-भिन्न विषयों में भटकता हुआ पुनः विश्रान्ति के लिये जाग्रत् एवं स्वप्न के हेतु-भूत अविद्या-काम-कर्मों के क्षीण होने पर भगवान् का ही अबलम्बन करता है।

श्रुतियों ने जीव को प्रभु का अंश कहा है। ‘यथाऽग्नेः क्षुद्राविस्फुलिंगा ब्युच्चरन्ति, एवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः।’ अर्थात् जैसे अग्नि से विस्फुलिंग का निर्गम होता है उसी तरह परमात्मा से ही सम्पूर्ण लोक एवं जीवों का निर्गम होता है।

जैसे महाप्रलय में समस्त प्रपन्च समष्टि ब्रह्म में विलीन हो जाता है वैसे ही सुषुप्ति में भी समस्त प्रपन्च का विलयन श्रुति ने कहा है। अतः सुषुप्ति में उपाधियों के विलीन हो जाने पर जीव परमात्मा से मिलता है। जैसे जब तक जल सावरण एवं द्रुत रहता है तब तक उसकी चंचलता एवं मलिनता से प्रतिबिंब भी चंचल एवं मलिन प्रतीत होने लगता है वैसे ही जब तक अन्तःकरण निद्रारूप आवरण से रहित रहता है तब तक उसमें प्रतिबिम्बित चिदानन्द-तत्त्व भी उसकी व्याकुलता एवं मलिनता से व्याकुल एवं मलिन-सा रहता है। यही बात ‘ध्यायतीव लेलायतीव’ इस श्रुति में कही गई है। जिस समय अविद्या परिणाम अन्तःकरण अविद्यामय हो जाय या निद्रारूप गाढ़ आवरण से आवृत हो जाय उस समय जैसे जल में सावरण एवं घनीभूत भाव में प्रतिबिम्ब बिम्ब ही हो जाता है ठीक वैसे ही सुषुप्ति में जीव परमात्मा से मिल जाता है। इस तत्कालीन तादात्म्य के कारण उस जीव में उस समय विशेष में किसी प्रकार के अनर्थ का योग नहीं होता। श्रुति का कथन है, ‘सत्ता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति, स्वमपीतो भवति।’[1] ‘स्वपिति’ क्रिया ‘स्वप्’ धातु के लट् लकार का रूप है। ‘अपिधानं पिधानं' के समान अकार का लोप हो जाता है ‘स्वप् अपीतो भवति तस्मात् स्वपिति’ ऐसा श्रोत निर्वचन है। अर्थात् सुषुप्ति-काल में जीवात्मा सत्पदवाच्य परमात्मा के साथ सम्पन्न हो जाता है।

जिस जीव को एक दिन भी निद्रा न आई हो वह व्याकुल हो उठता है और प्रजागर दोष के निवारणार्थ सहस्रों उपचार करता है। निद्रा-राहित्य से सन्तप्त जीव को दिव्यातिदिव्य सौख्य-सामग्रियाँ प्राप्त होने पर भी निरर्थक ही प्रतीत होती हैं; यहाँ तक कि उनकी प्रतीति भी उसके लिए दुःसह हो उठती है और सब कुछ त्यागकर वह केवल गाढ़ निद्रा प्राप्त करने के लिए अत्यन्त व्यग्र हो उठता है। क्या यह निष्प्रपन्च-अद्वैत-सुख की महत्ता नहीं है? सर्व-सौख्य-सम्पन्न द्वैत-दर्शन से उद्विग्न होकर अनन्त-कोटि-ब्रह्माण्ड-नायक भगवान् भी विश्रांति के लिए अद्भुत अद्वैत-सुख का समाश्रयण करते हैं। अस्तु द्वैत में चाहे जितना भी सुख जहाँ भी जैसे प्राप्त हो वह संपूर्णतः निष्प्रपन्च अद्वैत-ब्रह्मसुख की अपेक्षा न्यून ही नहीं अपितु दुःखरूप भी है। कहा जाता है कि सौन्दर्य-माधुर्यादि गुण-सम्पन्न, सगुण, साकार, भगवान् में ही आनन्द है; अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, निराकार, निर्विकार, परमात्मा पाषाणवत् शुष्क है; उसमें सुख का लेश भी नहीं है। विवेचन से यह सुस्पष्ट हो जाता है कि आनन्द सर्वत्र ही अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अगंध एवं अदृश्य है।
(गोपी गीत- करपात्री जी महाराज)

क्रमश:

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