34-
गोपी गीत
प्रेमास्पद में प्रेम के उत्कर्ष से आनन्दोद्रेक होता है; आनन्दोद्रेक से सम्पूर्ण जगत् का विस्मरण हो जाता है। ऐसे ही सुषुप्ति-काल में प्राज्ञ परमात्मा के सम्मिलनजन्य आनन्द से प्रपन्च का विस्मरण एवं सप्रपन्च ब्रह्म में सातिशय प्रेम अद्भुत होता है। सुषुप्ति में सावरण ब्रह्मानन्द की ही प्राप्ति होती है। जैसे मेघ-समावृत सूर्य ही मेघ का अवभासक है वैसे ही अज्ञान से समावृत अज्ञान का प्रकाशक निष्प्रपंच-अद्वैत स्वप्रकाशानन्दरूप आत्मा है जो सुषुप्ति-काल में जीव को मिलता है। जागर के अन्त में और सुषुप्ति के पूर्व तथा सुषुप्ति के अन्त और जागर के पूर्व में कुछ क्षण निष्प्रतिबिम्ब दर्पण की तरह शुद्ध निर्दृश्य, चिद्रूप, अखंडभान का दर्शन होता है। जैसे लक्षणा-ज्ञान एवं परिचय के लिए अन्य दृश्य की ओर से दृष्टि व्यावर्तनपूर्वक तत्परता से प्रयत्न करने पर स्पष्ट रूपेण ध्रुव का परिचयपूर्वक दर्शन होता है ठीक इसी तरह सदा ही सुषुप्ति एवं जागर के अन्त में यद्यपि सभी को निर्दृश्य शुद्ध-दृक्-रूप, स्वयं-प्रकाश, अखण्डभान का दर्शन होता है तथापि परिचयपूर्वक सुस्पष्ट साक्षात्कार नहीं हो पाता। तत्परतापूर्वक उसी के साक्षात्कार से जीव सदा के लिए बन्धन-मुक्त हो जाता है।
सुषुप्ति-काल में अवद्यिा-काम-कर्म-विशिष्ट जीव सबीज ब्रह्म का सायुज्य प्राप्त करता है। भगवान् योगमाया-समावृत हैं, जीवात्मा वासनायुक्त है; ‘नाहम् प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।’ अतः जाग्रत् एवं स्वप्न-अवस्था के हेतुभूत अविद्या-काम-कर्मवशात् वासना के पुनः उद्भूत होने पर सुषुप्तिदशा भंग हो जाती है। निरावरण, परात्पर परब्रह्म सम्मिलन हेतु जीव के स्वयं सर्वोपाधि-विनिर्मुक्त हो अग्रसर होने पर ही व्यवधानरहित ब्रह्म सायुज्य संभव हो सकता है। जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति तीनों ही उपाधि संयुक्त अवस्थाएँ हैं। माता-पिता के शोणित-शुक्रजन्य स्थूल शरीर, बहिर्मुख मन, इन्द्रियाँ एवं बुद्धि जाग्रत अवस्था की, अर्द्ध-निद्रा अर्ध-विलीन मन स्वप्नावस्था की तथा अविद्या सुषुप्तावस्था की उपाधियाँ हैं। ‘अविशुद्ध सत्त्वप्रधाना प्रकृतिः।’ अविशुद्ध सत्त्व-प्रधान-भूत जो प्रकृति है वही अवद्यिा है। सर्वोपाधि-विवर्जित, अखण्ड बोध, अनन्त चिद्-प्रकाश सत्ता ही निरावरण ब्रह्म है। निरावरण ब्रह्म ही तुरीय-तत्त्व है। निरावरण सच्चिदानन्द तुरीय-तत्त्व ही रूपान्तर से तरीयातीत-तत्त्व भी कहा गया है।
परिचय एवं अनुभव के अभाव में प्रवृत्ति नहीं होती। सुषुप्ति-काल में प्राप्त सावरण-ब्रह्म-सम्मिलनजन्य आनन्दानुभव जीवात्मा को निरावरण ब्रह्म-सायुज्य हेतु प्रेरित करता है। जीवात्मा का निरावरण परब्रह्म-सम्मिलन अभिव्यक्त करने हेतु ही द्वारकास्थ पट्टमहिषी-गणों का दृष्टान्त दिया जाता है। वे पट्टरानियाँ भी देशकृत-व्यवधान-निराकरण हेतु आसन से और वस्तुकृत-व्यवधान-निवारण हेतु आशय से उठकर श्रीकृष्ण-परमात्मा-सम्मिलन हेतु अग्रसर हुईं। गोपांगनाओं की महिमा तो द्वारकास्थ पट्टरानियों से सहस्र गुणाधिक है; द्वारकास्थ् पट्टरानियाँ अत्यन्त सौभाग्यशालिनी होते हुए भी इन प्रेम-विहला गोपालियों के भाग्य को सिहाती रहती हैं। उनके इस लोकोत्तर अद्भुत सौभाग्य को प्राप्त करने के लिए ललचाती रहती हैं। वस्तुदृष्ट्या गोपांगनाएँ साक्षात् परमानन्दकन्द श्रीकृष्ण-भगवान् की शक्ति-स्वरूपा ही हैं। समुद्र एवं तरंग, चन्द्र एवं चन्द्रिका, भानु एवं प्रभा आदि अचेतन संश्लेष हैं अतः अपेक्षाकृत बहिरंग हैं; गंगाजल एवं उसकी शीतलता, पवित्रता, मधुरता का सम्बन्ध संपूर्णतः अन्तरंग है अतः इनसे रहित गंगाजल की कल्पना भी संभव नहीं; इसी तरह गोपांगनाएँ परमानन्द भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दसिंधु की तरंग हैं; माधुर्यसार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री, रासेश्वरी, नित्य-निकुन्जेश्वरी, वृषभानुनंदिनी राधारानी ही इस आनन्दकन्द परमानन्द सुधा-सिन्धु की अन्तरंग हैं।
आनन्द सुधा-सिन्धु श्रीकृष्णचन्द्र तथा आनन्द सुधा-सिन्धु-माधुर्य-सर्वस्व-सार नित्य-निकुन्जेश्वरी राधारानी का सर्वव्यवधानशून्य तादात्म्यापत्ति ही सुरत है। यहाँ सुरत शब्द से किसी प्रकार का पाशविक सुरत विवक्षित नहीं है। एतावता ‘सुरतनाथ’ पद-प्रयोग से यही विवक्षित है कि गोपांगनाएँ कह रही हैं कि हे श्यामसुन्दर! मदन-मोहन! आप ही सर्व-प्रकार के सानिद्य सुख के अधिपति सुरतनाथ हैं; आपकी ही अनुकम्पा से सम्पूर्ण लौकिक सुख-सानिद्य प्राप्त होते हैं। ऐतरेयोपनिषद् का वाक्य है ‘एषह्येवानन्दयाति’ सर्वाधिष्ठान, स्वप्रकाश भगवान् ही लौकिक प्राणियों के लिए शब्द-स्पर्श-रूप-रस एवं गन्धात्मक संपूर्ण आनन्द को प्रदान करते हैं।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)
क्रमश:
No comments:
Post a Comment