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गोपी गीत
गोपांगनाएँ कह रही हैं कि हे श्यामसुन्दर! आप सम्पूर्ण सुखों के दाता हैं तदपि आपको किन्चिन्मात्र भी प्रयास नहीं करना पड़ता; ‘दृशा सुरतनाथ’ केवल मात्र दृष्टि से ही आप सम्पूर्ण आनन्द को प्रदान करते हैं। भगवान् सत्य-संकल्प हैं; उनके संकल्पमात्र से सर्वाभीष्ट-सिद्धि हो जाती है। ‘निःश्वसितमस्य वेदावीक्षितमेतस्य पंचभूतानि। स्मितमेतस्य चराचर मस्य च सुप्तं महाप्रलयः।’ भगवान् का सहज श्वास ही अनन्त विद्याओं के उद्गम-स्थल, मंत्र-ब्राह्मणात्मक वेद-राशि-स्वरूप में प्रस्फुटित हुआ। ‘जाकी सहज श्वास श्रुति चारी, सो प्रभु पढ़ यह कौतुक भारी।’ भगवान् का वीक्षण ही अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों का मूल पंचमहाभूत स्वरूप में प्रस्फुटित हुआ; भगवान् के स्मित से ही अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड प्रफुल्लित होकर प्रत्यक्ष हो गए और भगवान् के नेत्रनिमीलन कर लेने पर समस्त विश्व का प्रलय हो गया। कहावत है-‘छूछी भरे भरी ढरकावै जब चाहे तब फेर भरावै।’ गोपांगनाएँ कह रही हैं हे श्यामसुन्दर! आप तो दृशैव वान्छा कल्पतरु हैं; दृष्टिमात्र से ही सम्पूर्ण वान्छाओं की पूर्ति करने वाले हैं। आप ही सुरतनाथ, सर्व-सम्भोगाधिपति हैं; आप ही अनन्त ब्रह्माण्ड के ब्रह्मादिक देवशिरोमणियों को भी दिव्यातिदिव्य सुख प्रदान करते हैं तथापि हम गोपांगनाएँ जिन्होंने आपमें ही अपने सर्वस्व को समर्पित कर दिया है सुरत-सुख से वंचित हो दुःखिनी ही हैं। हे श्यामसुन्दर! आपकी प्रेयसी, प्रियतमा होते हुए भी हम व्रजसीमन्तनी-जन आपके सुरत-सुख से वंचित हैं; दीपक तले ही अँधेरा है।
उपर्युक्त उक्ति का ‘सुष्ठु शोभना रतिः सुरतिः, सा अस्ति यस्य स सुरतः तत् संबुद्धौ हे सुरत।’ अर्थ भी किया जा सकता है। ‘सुष्ठु शोभना रतिः’ अर्थात् भोगापवर्ग कामधेनुः जिसके मंगलमय पादारविन्द की रति, प्रीति, अनुरक्ति ही सुष्ठु-शोभना हैं भोगापवर्ग कामधेनु है। ‘नाथ’ शब्द ईश्वरवाचक है; अतः ‘सुरतनाथ’ अर्थात् सुरत के प्रेरक। सुरतनाथ का एक अर्थ सुरत-याचक भी है। साधक की अभिलाषानुसार ही विभिन्न सम्बोधनों का प्रयोग किया जाता है; भगवान् अनन्तकोटि ब्रह्माण्डाधिपति हैं, आप्तकाम, पूर्णकाम, परम-निष्काम, सर्वाभीष्टदाता, सबके सर्व मनोरथों को पूर्ण करने वाले हैं। धर्ममार्गानुसार भगवान् के धर्मपालक, धर्मज्ञ, ब्रह्मण्य, यज्ञपते आदि, अध्यात्म ज्ञानमार्गानुसार ज्ञाननिधे, योगेश्वर, सुव्रत आदि विभिन्न सम्बोधन हैं। पूजा के लिए लक्ष्मीपते, जगत्पते आदि अनेकानेक सम्बोधन व्यवहृत होते हैं। सुरतनाथ सम्बोधन का सुरत के प्रेरक जैसा अर्थ भगवदीय ऐश्वर्य का अभिव्यन्जक और ‘सुरत के याचक’ जैसा अर्थ माधुर्यभाव का प्रेरक है। माधुर्य-भावानुसार आप्तकाम, पूर्णकाम, परम निष्काम, आत्माराम को भी सकाम मान लिया जाता है।
श्रीमद्भागवत-कथन है, ‘भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः। वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामु पाश्रितः।’
षड्-भगयुक्त, अचिन्त्य, अनन्त, कल्याण-गुण-गणों के आस्पद भगवान् ने अपनी अघटित-घटना-पटीयसी, मंगलमयी, माया-शक्ति के द्वारा मन बनाया तात्पर्य कि आप्तकाम, पूर्णकाम, परम निष्काम, आत्माराम में भी सकामता आरोपित की गयी। ‘ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै।’ उस सर्वेश्वर, सर्वाधिष्ठान, परात्पर-परब्रह्म प्रभु को भी प्रेम-विभोर गोपालियों ने छछिया भरि छाछ पर नाच नचा दिया; ‘तद् वशो दारुयन्त्रवत्’ सूत्रधार के संकेत पर नाचती कठपुतली की तरह ही भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र अपनी सर्वेश्वरता, सर्वनायकता, सर्वशक्तिमत्ता को भुलाकर गोपालियों के इशारों पर नाच रहे हैं। एतावता गोपांगनाएँ आनन्दकन्द, परमानन्दकन्द श्रीकृष्ण के प्रति सुरतनाथ, सुरत के याचक जैसा सम्बोधन करती हैं। श्रीकृष्ण न केवल याच्ञा ही करते हैं, अपितु रागातिशय में नवनीत-चौर्य जैसा कर्म भी करते हैं। भक्त कहता है-
‘प्रथयति नवनीतचौरतां ते व्रजयुवतीजनाजारतां जनो यः।
वितरसि निजरूपमीश! तस्मै स्वकृतधिया परि गोपनाय नूनम्।’
अर्थात, हे कृष्ण! जो तुम्हारी नवनीत-चौर्य एवं व्रज-युवती-जन जार लीला को गाता है उसकी तुम शीघ्र ही अपना रूप प्रदान कर देते हो। परन्तु यह स्वरूप-दान अपने कृत्यों को छिपाने के लिए दी गई घूस, उत्कोचमात्र है। ऐसी माधुर्यपूर्ण लीला-दृष्टि से ही भगवान् श्रीकृष्ण, सुरत के याचक, सुरतनाथ हैं। एतावता भगवान् श्रीकृष्ण सुरत के प्रेरक भी हैं, सुरत के याचक भी हैं। भगवदनुकम्पा-वशात् ही प्राणी में भगवत्-सम्मिलन की उत्कट उत्कण्ठा उद्भूत होती है।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)
क्रमश:
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