Wednesday, 16 January 2019

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गोपी गीत

एक कथा है कि किसी एक चातुर्मास्य में अनेकानेक ऋषि-महर्षि कहीं किसी एक स्थान पर एकत्रित हुए; उनके यहाँ एक दासी रहा करती थी; इस दासी का पुत्र, नारद भी अपनी माता के संग ही ऋषि-महर्षियों की सेवा में लगा रहता था।चातुर्मास्य के सम्पूर्ण होने पर ऋषि-महर्षि-गण उत्तराखण्ड की ओर चले गये। अनायास प्राप्त हुए इस सत्संग के कारण बालक नारद के कोमल हृदय में भगवद्-भक्ति के संस्कार उद्भूत हुए; संयोगवशात् उनकी माता का भी देहान्त हो गया; अस्तु, सर्व-विनिर्मुक्त हो बालक नारद भगवद्ध्यान में तल्लीन हो गया।

‘ध्यायतश्चरणाम्भोजं भावनिर्जितचेतसा।
औत्कण्ठ्याश्रुकलाक्षस्य दृद्यासीन् मे शनैर्हरिः।’

अर्थात् भगवान के पाद-पंकजों का ध्यान करते हुए बालक नारद के हृदय में उत्कण्ठा का अतिशय उद्रेक हुआ जिसके कारण उनके कण्ठ गद्गद हो गये और नेत्रों से आनन्दाश्रु-धारा प्रवाहित हो चली। ऐसे समय में भक्त-हृदय में भगवान् के दिव्य स्वरूप का प्रस्फुरण हो गया, भक्त को भगवान् का साक्षात्कार, भगवत्-स्वरूपानुभूति हुई। ‘आनन्द सम्प्लवेलीनो नापश्यमुभयं मुने।' भगवान् के आविर्भाव के कारण ऐसे आनन्द-समुद्र का जिसमें सम्पूर्ण अन्तः एवं बाह्य जगत् का विलीनीकरण हो गया, प्रस्फुरण तो हुआ तथापि यह दिव्य स्वरूप कुछ ही क्षणों में विलुप्त हो गया; अब तो नारद अत्यन्त व्याकुल हो तड़फड़ाने रोने लगे।

नारद को अत्यन्त व्याकुल देखकर आकाशवाणी हुई-
‘हन्तास्मिन् जन्मनि भवान् न मां द्रष्टुमिहार्हति। अविपक्वकषायाणां दुर्दर्शोऽहं कुयोगिनाम्।’ अर्थात हे नारद! अब इस जन्म में तुझे मेरा दर्शन न हो सकेगा। सम्पूर्ण कषाय-दोषों के उन्मूलन न हो जाने की अवधि तक मेरा दर्शन दुर्लभ ही है।
‘सकृद्यत् दर्शितं रूपमेतत्कामाय तेऽनघ।’ अर्थात भगवत्-सम्मिलन में तुम्हारी कामना को प्रबलतम कर देने के लिए ही मैंने एक बार तुम्हें अपने सौन्दर्य-माधुर्य-पूर्ण दिव्य-स्वरूप का बोध करा दिया। जैसे वंशी में लगे बडिश से आकर्षित मीन स्वतः ही जाल में खिंची चली आती है वैसे ही एक बार एक क्षण के लिए भी प्रभु के अनन्त सौन्दर्य-माधुर्ययुक्तआनन्दमय लोकोत्तर दिव्य-स्वरूप का साक्षात्कार हो जाने पर मीनोपलक्षित जीव भगवत्-सम्मिलन की उत्कट उत्कण्ठावशात् खिंचा चला आता है; इस जाल में फँसकर जीव सर्व-बन्धन-विनिर्मुक्त हो जाता है।

‘को ह्येवान्यात् कः प्राण्यात् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्।’ अर्थात्, यदि परमानन्द-स्वरूप भगवान् भक्त के हृदय में किसी न किसी काल में, किसी न किसी रूप में प्रकट न हों तो उनके विप्रयोगजन्य तीव्र ताप को कौन कह सकता है? ‘बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।’ बहुत जन्मों के अन्त में ज्ञानी को भगवत्-प्राप्ति होती है। जब तक किसी प्रकार का परिचय अथवा आस्वादानुभव न हो तब तक आकर्षण असम्भव है। यह परिचय एवं आस्वादानुभव ही भगवत्-प्रेरणा, भगवदनुग्रह है। इसलिए कहा गया है-‘न वै जनो जातु कथंचनाव्रजेन्मुकुन्दसेव्यन्यवदंग संसृतिम्।।’ मुकुन्द-सेवी अन्य जनों की तरह संसृति-चक्र में नहीं फँसता। ‘येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः। आरुह्य कृच्छेण परं पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः।’ अर्थात्, हे अरविन्दाक्ष! आपके चरणारविन्दों में प्रीति न होने के कारण विमुक्तमानी भी अविशुद्ध-बुद्धि है। सम्यक्-ज्ञान न होने पर ज्ञानाभास के प्रभाव से मान सम्भव हो जाता है परन्तु जो वस्तुतः ज्ञानी नहीं है वह सर्वदा ही विमुक्तमानी रहता है।

गोस्वामीजी कहते हैं-‘प्रेम-भगति जल बिनु रघुराई। अभ्यंतर मल कतहुँ कि जाई।’ प्रेम-भक्ति-स्वरूप-जल से धोये बिना अभ्यंतर-मल कदापि नहीं छूटता। ‘छूटै मल कि मलहिं के धोए। घृत कि पाव कोउ वारि बिलोए।’ जैसे जल को बिलोकर मक्खन प्राप्त करने का प्रयास सर्वथा निरर्थक होता है वैसे ही भगवद्-विषयक अनुरक्त् से रहित हो विमुक्तमानी भी अविशुद्ध-बुद्धि तथा ज्ञान-मान-मत्त हो जाते हैं। ‘अनादृतयुष्मदङ्घ्रयः’ ऐसा ज्ञान-मान-मत्त ही प्रभु-चरणारविन्दों का अनादर करता है। ‘आरुह्य कृच्छेण परं पदं ततः।’ जन्म-जन्मान्तरों के पुण्य-परिपाक-वशात् दिव्यातिदिव्य सुर-दुर्लभ-पद को प्राप्त कर लेने पर भी विमुक्तमानी अविशुद्ध-बुद्धि पतित हो जाता है। ‘तथा न ते माधव तावकाः क्वचिद् भ्रश्यन्ति मार्गात्वयि बद्धसौहृदाः।

त्वयाऽभिगुप्ता विचरन्ति निर्भया विनायकानीकपमूर्धसु प्रभो।’

भगवत्-चरणारविन्द का अनुरागी कदापि पतित नहीं होता; वह तो सदा ही विघ्नराजों के अधिपति के भी सिर पर पैर रखता हुआ भय-रहित होकर विचरता है।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)

क्रमश:

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