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गोपी गीत
अस्तु लक्षणा द्वारा ही ‘कृष्णलान् श्रपयेत्’ का तात्पर्य समझना होगा। ‘उष्णीकरणे लक्षणा’ अर्थात् श्रपण का लक्षण है उष्णीकरण में। एतावता ‘कृष्णलान श्रपयेत्’ का गौणार्थ हुआ कि यवाकार सुवर्ण-खण्ड कृष्ण्लों को उष्ण करो। इसी तरह ‘सर्व विष्णुमयं जगत्’ जैसे कथन का अर्थानुभव भी लक्षणा के आधार पर ही सम्भव है। अस्तु ‘सर्व विष्णुमयं जगत्’ जैसी उक्ति का तात्पर्य है कि भगवान् विष्णु ही चेतनाचेतनात्मक सम्पूर्ण वस्तुस्वरूप हैं। श्रीमद्भागवत में एक कथा आती है-
तेनैव साकं पृथुकाः सहस्रशः स्निग्धाः सुशिग्वेत्रविषाणवेणवः।
स्वान् स्वान् सहस्रोपरिसंख्ययान्वितान् वत्सान् पुरस्कृत्य विनिर्ययुर्मुदा।
ग्वाल बाल अपने अपने सहस्राधिक संख्यात बछड़ों को कृष्ण के असंख्यात बछड़ों के साथ मिलाकर उनके साथ खेलने चले। ऐसे समय में ब्रह्मा द्वारा संपूर्ण ग्वाल बालों का उनके बछड़ों सहित अपहरण कर लिए जाने पर भगवान् कृष्ण स्वयं ही भूषण वसन अलंकारादि सर्वोपकरण सहित सम्पूर्ण ग्वाल बाल मण्डली एवं बछड़ों के चेतनाचेतनात्मक रूप में प्रकट हो गये।
भागवत वाक्य है-
यावद् वत्सपवत्सकाल्पकवपुर्यावत् कराङ्घ्रद्यादिकं यावद् यष्टिविषाणवेणुदलशिग् यावद्विभूषाम्बरम्। यावच्छीलगुणाभिधाकृतिवयो यावद् विहारादिकं सर्वं विष्णुमयं गिरोऽंगवदजः सर्वस्वरूपो बभौ।
परात्पर प्रभु श्रीकृष्ण ने जड़ चेतनात्मक सम्पूर्ण रूपों में प्रकट होकर ‘विष्णुमयं जगत्’ जैसी उक्त को प्रमाणित कर दिय। परात्पर प्रभु परमेश्वर की योगमाया के द्वारा असम्भव भी सम्भव हो जाता है। परब्रह्म का अघटित घटना पटीयान् स्वात्मयोग ही योगमाया है,जैसे स्वप्न के अनतर्गत सूक्ष्मातिसूक्ष्म नाड़ियों में जगत् प्रपन्च दृश्यमान होता है वैसे ही भगवान् की योगमाया द्वारा व्रजधाम में यह अपूर्व चमत्कार सम्भव हुआ।वस्तुतः सूक्ष्म जगत् ही मूल तत्त्व है; इस मूल तत्त्व, सूक्ष्म जगत् का प्रसरण ही स्थूल जगत् है। पुण्डरीकाकार हृत् पिण्ड के मध्य में दहर आकाश है। ‘यावान् वा अयमाकाशः’ बाह्याकाश की तरह ही हृत्-पुण्डरीकान्तर्गत दहराकाश भी अत्यन्त विस्तृत है। इस दहराकाश में ही सम्पूर्ण विश्व-प्रपन्च सूक्ष्मरूप से विद्यमान है। श्रीमद्भागवत में परात्पर परब्रह्म के इस अघटित-घटना-पटीयान् स्वात्मयोग को ही सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। नन्दगेहिनी यशोदा रानी भी अपने बालक पुत्र श्रीकृष्ण के मुखारविन्द में सम्पूर्ण व्रज के साथ ही साथ अपने को और स्वयं बालक कृष्ण को भी देखकर भयभीत हो विचारने लगती हैं। ‘अथो अमुष्यैव ममार्भकस्य यः कश्चनौत्पत्तिक आत्मयोगः’ अर्थात् यदि प्रतिबिम्बन्यायानुसार ही श्रीकृष्णचन्द्र के मुखारविन्द में विश्व-प्रपन्च दृष्ट हो रहा है तो भी दर्पण में स्वयं कदापि प्रतिबिम्बित नहीं होता; साथ ही, इस घटना में आसुरी, तामसी अथवा दैवी-माया की भी कल्पना सम्भव नहीं अतः निश्चय ही मेरे इस बालक में जो ये सब चमत्कार हैं वे सब उसके ही औत्पत्तिक अघटित घटना पटीयान् स्वात्मयोग के कारण की सम्भव हो रहे हैं। परब्रह्म प्रभु के इस अघटित-घटना-पटीयान्-स्वात्मयोग के द्वारा ही सम्पूर्ण चेतनाचेतनात्मक विश्व-प्रपन्च की प्रतीति हो रही है। एतावता ‘विष्णुमयं जगत’ ही तथ्य है तथापि भगवत्-प्राकट्य का अभाव होने पर इस तथ्यपूर्ण अभिव्यक्ति का भी गौणार्थ हो जाता है, उसमें असम्भावना एवं अप्रामाण्य-दोष आ जाता है। ‘न तस्य हेतुभिस्त्राणमुत्पतन्नेव यो हतः।’ अर्थात् जो उत्पादन-काल में ही हत हो गया हो उसका संत्राण सम्भव नहीं। एतावता ‘तव जन्मना व्रजोऽधिकं जयति।’ हे प्रभो! आपके आविर्भाव से इस दोष का सम्पूर्णतः परिष्कार हो गया; स्वभावतः उत्कर्ष को प्राप्त गोष्ठ किंवा व्रज-पद-वाच्य, मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेद-राशि प्रभु के प्रत्यक्षीकरण से अधिकाधिक उत्कर्ष को प्राप्त हो रहा है।
प्रह्लाद अपने भगवान् को सर्व-व्यापी, सर्व-स्वरूप कह रहा है। प्रह्लाद का पिता हिरण्यकशिपु कुद्ध है; वह प्रमाण चाहता है। वादी के प्रति किसी पदार्थ की सिद्धि पारार्थानुगमन द्वारा प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय एवं निगमन के आधार पर की जा सकती है। भक्त प्रह्लाद ने प्रतिज्ञा की; भक्त-वत्सल भगवान् ने भक्तानुग्रहार्थ प्रकट होकर प्रमाण दिया, पाषाणखण्ड से जिसमें सूच्यग्र का भी प्रवेश सम्भव नहीं, अणु-परमाणु का प्रवेश सम्भव नहीं, सिंहाद्रिचूड़ामणि के रूप में आविर्भूत होकर भगवान् ने अपनी सर्व-व्यापकता एवं सर्व-स्वरूपता विश्वात्मता को सिद्ध कर दिया।
एतावता आपके आविर्भाव से स्वभावतः उत्कर्ष को प्राप्त वेद-राशि अधिकाधिक उत्कर्ष को प्राप्त हो रही है। ‘वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः’ सम्पूर्ण वेदों का एकमात्र वेद्य, ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’ सब वेद परमतत्त्व का निरूपण करते हैं; ‘वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्’ ‘किं विधत्ते किमाचष्टे किमनूद्य विकल्पयेत्। इत्यस्यां हृदयं लोके नान्यो मद्वेद कश्चन।।’ वेद किसका विधान करते हैं? वेद किसका अभिधान करते हैं? वेद किसका अनुवाद करते हैं? वेद किसका अवशेष करते हैं? ‘इत्यस्यां हृदयं लोके नान्यो मद्वेद्व कश्चन।’ इसका रहस्य भगवान् से भिन्न कोई नहीं जानता। अन्ततोगत्वा कहते हैं ‘मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्यापोह्यते त्वहम्। एतावान् सर्ववेदार्थत्’ वेद मेरा ही विधान एवं अभिधान करते हैं; साथ ही संपूर्ण अनात्म पदार्थों का अपोहन कर मेरा ही अवशेष रखते हैं, यही सम्पूर्ण वेदार्थ है। वेदार्थ-स्वरूप, वेद-वेद्य, वेदों के महातात्पर्य का विषयीभूत, सच्चिदानन्द, परात्पर, परब्रह्म ही श्रीकृष्ण स्वरूप में ब्रजधाम में नन्दगेहिनी यशोदारानी के मंगलमय अंक में आविर्भूत हुआ।
(गोपी गीत- करपात्री जी महाराज)
क्रमश:
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