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गोपी गीत
निगमावटी के भयंकर वीथी जाल में, स्वर, क्रम, पदादि का निरन्तर अभ्यासरूप भ्रमण करने वाले परिश्रम क्लान्त? नितान्त खिन्न जनो प्रभु उपदेश को भी सुनते जाओ। इस दुर्गम वेदाटवी में अत्यन्त दुर्लभ संचारानन्तर आप लोगों को जो वेदार्थरूप फल प्राप्त होता है वही व्रजधाम में यशोदारानी के आँगन में उलूखल से बँधा हुआ है। श्रुतियों का वह गुप्त वित्त ही परमानन्द श्रीकृष्णचन्द्र स्वरूप में यशोदा के आँगन में धूलि धूसरित होकर नृत्य कर रहा है। गोपांगनाओं का विशुद्ध प्रेम ही यदुवंशियों के लोकोत्तर परम सौभाग्य मूर्ति श्रीकृष्णचन्द्र स्वरूप में प्रादुर्भूत हुआ है। निराकार, निर्विकार, परात्पर परब्रह्म ही श्यामरूप में प्रस्फुटित हो रहा है, जाओ, उसको पकड़ लो।
रामावतार भी वेदार्थावतार ही है-
‘वेद-वेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे।
वेदः प्राचेतसादासीत्साक्षात् रामायणात्मना।’
अर्थात् वेद-वेद्य, सच्चिदानन्दघन परब्रह्म का राघवेन्द्र रामचन्द्र स्वरूप में अवतरण हुआः साथ ही महर्षि वाल्मीकि के मुखारविन्द से रामायण रूप में शतकोटि प्रविस्तर श्लोक संयुक्त रामायण-रूप में वेदों का भी अवतरण हो गया। सिद्धान्त है कि देश राशि एवं वेदार्थ का साथ ही साथ अवतरण होता है। एतावता, ‘अपौरुषेयत्वेन अपास्तसमस्तपुन्दोषस्य अधिष्ठानभूतस्य वेद-वेद्यस्य निगमागम महातात्पर्यविषयीभूतस्य ब्रह्मणस्तव जन्मना आविर्भावेन अधिकं यथास्यात तथास्य’ अपौरुषेय होने के कारण पुरुषाश्रित समस्त दोषों से सर्वथा मुक्त स्वभावतः उत्कर्ष को प्राप्त वेद-राशि वेदान्त-वेय वेद के महातात्पर्य विषयीभूत परात्पर परब्रह्म के प्राकट्य से प्रामाण्य गुण संयुक्त होकर पूर्वतो वा सर्वतो वा विशेष उत्कर्ष को प्राप्त हो रही है।
‘जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि।’
पूर्वतो वा सर्वतो वा अधिकाधिक उत्कर्ष के कारण ही वेदों की अतुलित शोभा हो रही है।
‘दयित दृश्यतां दिक्षु तावकास्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते।’ जो अपने त्वक चक्षु श्रोत्रेन्द्रियादि को एकाग्र कर अपना अन्तरात्मा, अन्तःकरण एवं प्राणःसर्वस्व को आपमें ही समर्पित कर आपको ही भज रहे हैं, आपका ही अनुसन्धान कर रहे हैं, उनके लिए आप प्रत्यक्ष हो जावें।
भगवत् कथन है-
‘मच्चिता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।’
‘आसुप्ते रामृतेःकालं नयेद् वेदान्तचिन्तया’ जब तक निद्रा अथवा मृत्यु न आ जाय तब तक निरन्तर ब्रह्म चिन्तन में ही संलग्न रहो। भगवत् वरेण्य गुण गणों का संचयन ही सम्पूर्ण धर्मानुष्ठानों का प्रमुख फल है यद्यपि अर्थ प्राप्ति भी आनुषंगिक फल है। ‘नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृतः। कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता।’ अर्थ प्राप्ति का भी मुख्य-फल धर्माजन एवं गौण फल काम है। उद्देश्य भेद से कार्य में भी भिन्नता बन जाती है। जो श्रेष्ठ जन अपने तन मन को आपमें ही अर्पित कर निरन्तर आपके लोकोत्तर गुण-गणों का श्रवण एवं मनन करते हैं, जो सर्वदा आपके स्वरूप का ही चिन्तन करते हैं, जो आपके दिव्य स्वरूप के दर्शन की लालसा से ही प्राणों को धारण किये हुए हैं, ऐसे ‘तावकाः त्वां विचिन्वते’ जनों के लिए आप प्रत्यक्ष हो जावें, स्वानुग्रहवशात् प्रकट हो जावें।
‘अथापि ते देव पदाम्बुजद्वयप्रसादलेशानुगृहीत एव हि। जानाति तत्त्वं भगवन्महिम्नो न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन्।’ आपके चरणाम्बुजद्वन्द्व प्रसादलेश से अनुगृहीत प्राणी ही आपकी महिमा को जान सकता है। अन्यथा चिरकाल तक अतिशय परिश्रम के साथ अन्वेषण करने पर भी आपका परिचय सर्वथा असम्भव ही है।
‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूँस्वाम्।’
जब तक आप स्वयं कृपा कर दर्शन देना स्वीकार न करें तब तक प्रवचन, धारणा शक्तिमती मेधा एवं बहुधा श्रवण आदि किसी भी उपाय से आपका दर्शन संभव नहीं होता। अतः ‘दिक्षु’ आप प्रत्यक्ष होकर उनको देखें।
(गोपी गीत- करपात्री जी महाराज)
क्रमश:
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