30-
गोपी गीत
द्वितीय श्लोक-
शरदुदाशये
साधुजातसत्सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा।
सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका
वरद निघ्नतो नेह किं वधः॥2॥
अर्थात्, हे वरद हे सुरतनाथ हम आपकी अशुल्क दासिका हैं। शरद्कालीन जलाशय मध्यस्थित सर्वोत्कृष्ट सरसिज के कर्णिकान्तर निहित श्री के सौन्दर्य को भी चुरा लेने वाली अपनी दृष्टि से आपने हमें आहत किया है; क्या यह दृशावध, दृष्टि द्वारा वध हनन नहीं है?
भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र को सम्बोधित करती हुई गोपांगनाएँ ‘वरद’ तथा ‘सुनतनाथ’ जैसे सम्बन्धों का प्रयोग करती हैं। वरद अर्थात् सर्वप्रकार के अभीष्ट-दाता; प्राणी निरन्तर विभिन्न कामनाएँ करता रहता है परन्तु सर्वेश्वर सर्वज्ञ भगवान् की आराधना से ही अभीष्ट-सिद्धि सम्भव है अतः भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ही ‘वरद’ वरदाता हैं।
शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गंधात्मक सम्पूर्ण सम्भोग ही सुरत है; सुरत के अधिपति ही ‘सुरतनाथ’ हैं; भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ही सुरतनाथ हैं।
गोपांगनाएँ कह रही हैं हे वरद! हे सुरतनाथ! वरद के द्वारा सम्पूर्ण अभीष्टों की सिद्धि तथा सुरतनाथ द्वारा सम्पूर्ण सुरत की प्राप्ति होना ही उचित है परन्तु आप द्वारा तो हम अशुल्क-दासिकाओं का हनन ही हो रहा है। आपके लोकोत्तर कल्याण गुण-गणों एवं अद्भुत सौन्दर्य-माधुर्य पर मुग्ध होकर हम आपके हाथों बिना मूल्य ही बिक गयी हैं। साधारणतः दासिका क्रीता होती हैं; गोपांगनाएँ अपने को अक्रीता दासिकाएँ कह रही हैं; अशुल्क दासिका का तात्पर्य है अधम दासिकाः। जीव गोस्वामी एवं सनातन गोस्वामी के मतानुसार गोपांगनाएँ अपने प्रति अशुल्क-दासिका जैसे विशेषण प्रयोग द्वारा अपने दैन्य को ही अभिव्यक्त कर रही हैं।
गोपांगनाएँ कह रही हैं कि ‘वरद’ एवं ‘सुनतनाथ’ के द्वारा भी हम अशुल्क दासकाओं का वध ही किया जा रहा है; वध भी ऐसा जो केवल दृष्टिमात्र से किया जा रहा हो। आपकी यह दृष्टि ‘चोरिका’ भी है, आप स्वयं भी चैराग्रगण्य है; ‘चैराग्रगण्यं पुरुषं नमामि’। अति दुर्लध्य दुर्ग का उल्लंघन कर अत्यन्त निगूढ़ वस्तु अथवा साधु के धन को भी चुरा ले जाना ही चोर-शिरोमण का विशेष गुण है; आपकी दृष्टि में ये सब गुण विशेषतः विद्यमान हैं।
‘शरदुदाशये साधुजातसत्सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा।’ शरद्कालीन स्वच्छ सरोवर के मध्यस्थित श्रेष्ठ कमल-कर्णिकान्तर निवासिनी श्री को सुरक्षित रखने के हेतु वह ‘साधुजात’, उत्कृष्ट कमल यह समझते हुए कि शीताधिक्यवशात् क्रीड़ा-प्रसंग से भी शरद्-कालीन अगाध सरोवर में आपका प्रवेश न होगा उसके मध्य में उत्पन्न हुआ; इतने पर भी भयभीत हो वह सरसिज-सम्राट अपने चारों तरफ सैकड़ों कमलरूप रक्षकों को स्थिर कर स्वयं भी सहस्रपत्रयुक्त हो सावधान हो गया; कमल-नाल तथा पत्र में उत्पन्न कटक ही मानों उस सरसिज-सम्राट् के शस्त्रास्त्र हैं। इतने पर भी ‘चौरजारशिखामणिः’ जैसी आपकी ख्याति से आतंकित उस सरोज-सम्राट् ने अपनी श्री को अपनी कर्णिका में मानों अपने उदर में छिपा लिया; तब भी आपकी दृष्टि ने कमलकोष-निवासिनी श्री का अपहरण कर ही लिया। दुर्लघ्य दुर्ग का उल्लंघन कर अति निगूढ़ वस्तु को चुरा लेने में आप सिद्धहस्त हैं; आपकी दृष्टि भी चोरिका’ है।
‘साधुजातः सम्यक्तया जातः सरसिजः तस्य उदरे या श्रीः शोभा तां मुष्णाति इति श्री मुट्यता दृशा अशुल्का दासिकाः निघ्नतः’ साधुजात कमलकोष-निवासनी श्री का अपहरण करने वाली अपनी दृष्टि से आपने हम अशुल्कदासिकाओं का हनन किया है; ‘नेह किं वधः?’ क्या यह हनन नहीं है? हे मदनमोहन! आपके इन अत्यन्त सुन्दर नेत्रों द्वारा मोहित हुई हम गोपांगनाएँ अब आपके दर्शन से भी वंचित होकर विप्रयोगजन्य तीव्र ताप से संतप्त मृतप्राय हो रही हैं; क्या यह आप द्वारा हमारा वध नहीं है?
(गोपी गीत- करपात्री जी महाराज)
क्रमश:
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