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गोपी गीत
‘सुरतनाथ’ अर्थात् ‘सुष्ठु रतानां नाथः, उपतापकः, सुरतानां नाथः’ जो आपमें सुरत है, जिनकी आप में सुष्ठु रति हैं वे ही सुरत हैं। साधारणतः सम्पूर्ण सांसारिक प्राणी पुत्र-कलत्र वित्तादिक अनात्मा में ही रमण करते हैं। जन्म-जन्मान्तरों के पुण्य-कुन्ज प्रस्फुटित होने पर ही कोई एक सौभाग्यशाली भगवत्-स्वरूप में सम्यक्तया रत हो पाता है; ‘सुष्ठु शोभनं परं ब्रह्म तत्र ये रमंते ते सुरताः’ भगवत्-तत्त्व हो परम शोभन, परमोत्कृष्ट है; इस परमोत्कृष्ट तत्त्व में सम्यक रति ही सुष्ठु-रति है; ब्रह्मज्ञानियों की आत्म-क्रीड़ा ही सुष्ठु-रति है। भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ही इस सुष्ठु-रति में सम्यक् तथा संलग्न जनों के अधिपति हैं; गोपांगनाएँ कह रही हैं हे सुरतनाथ! साधारणतः भी किसी प्राणी को क्लेश पहुँचाना अनर्थ करना है; फिर स्वयं सुरतनाथ द्वारा हम सुरत जनों को विप्रयोग-जन्य तीव्र ताप से सन्तप्त करना तो सर्वथा ही असंगत है।
‘नाथ’ शब्द का अर्थ है अन्तर्यामी; अन्तर्यामी अर्थात् प्रेरक अपनी मंगलमयी दृष्टि द्वारा जो सुरत के प्रेरक हैं वे ही सुरतनाथ हैं। सामान्यतः सुरत शब्द प्रेयसी-प्रेयान् के निगूढ़तम सम्बन्ध का वाचक ही होता है। सवंमान्य है कि भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र गोपांगनाओं के प्रेयान् तथा गोपिकाएँ श्रीकृष्णचन्द्र की प्रेयसीजन थीं, अतः प्रेयसी-प्रेयान् का सहज सम्बन्ध भी स्पष्ट भासित हो जाता है। स्थितिविशेष में वास्तविकता के असंदिग्ध बोधहेतु गम्भीर विश्लेषण अनिवार्य है। सम्पूर्णतः प्रेम परिपूर्ण, निरावरण, निगूढ़ संबंध ही सुरत है। प्रेमोत्कर्ष हो व्यवधानशून्यता का मूल-मंत्र है; जितना ही अधिकाधिक प्रेमोत्कर्ष होगा उतना ही अधिकाधिक व्यवधान-राहित्य स्वतः होता जाता है। जिस तरह लौकिक प्रेयसी-प्रेयान् के निगूढ़तम-सम्बन्ध-हेतु भी व्यवधान निराकरण अनिवार्य हो जाता है उसी तरह सर्वाधिष्ठान, सर्वान्तर्यामी श्रीकृष्णचन्द्र-सम्मिलन हेतु भी सम्पूर्ण व्यवधान-निराकरण अनिवार्य है। श्रीकृष्णचन्द्र ही समस्त जीवों के अन्तरात्मा हैं अतः समस्त प्राणियों के निरतिशय एवं निरुपाधिक प्रेम के आस्पद हैं। शुद्धाद्वैतवादानुसार भी जगत् ब्रह्ममय है तथापि मायाजन्य आवरण से आवृत है। भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र निरावण, परात्पर परब्रह्म हैं; परमानन्दघन भगवान् से भिन्न होकर परमार्थ सत्य का कोई अस्तित्व नहीं है; जैसे वायु आदि क्रम से आकाश के द्वारा समुद्भूत घटरूप उपाधि से आकाश में महाकाश एवं घटाकाश दो भेद हो जाते हैं वैसे ही परमात्मा से समुद्भूत द्वारा ही चैतन्यानन्दघन भगवान् में भी जीव और परमेश्वर दो भेद हो जाते हैं। जीवात्मा पंच-कंचुकों से आवृत है; पिता-माता के शुक्र-शोणित-सम्मिलन समुद्भूत, अन्नमय-कोष ही शरीर है।
शरीर ही प्रथम कोष है। द्वद्तिीय कोष प्राणमय है; प्राणमय कोष में ही मन एवं पन्च कर्मेन्द्रियाँ अधिष्ठित हैं। तृतीय कोष मनोमय है; मनोमय कोष के अनन्तर विज्ञानमय कोष है; इसमेुं बुद्धि एवं पन्च-ज्ञानेन्द्रियाँ अधिष्ठित हैं। पन्चम कोष है आनन्दमय; आनन्दमय कोष में ही प्रिय, मोदाः, प्रमोदाः आदि अधिष्ठित हैं। जीवात्मा इन पन्चकोषों रूप कंचुकों से आवेष्टित है एतावता अन्तःकरण उपलक्षित पन्चकोष, पन्च-कंचुकों से निरावृत होने पर ही ‘ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठा’ रूप पन्चकोषातीत शुद्धस्वरूप, सर्वाधिष्ठान, सर्वान्तर्यामी, परात्पर परब्रह्म, सच्चिदानन्दघन, श्रीकृष्णचन्द्र में सम्मिलन सम्भव है। ‘श्रीमद्भागवत’ में एक कथा है; जिस समय महाभारत-संग्राम के अनन्तर श्रीकृष्णचन्द्र हस्तिनापुर से श्री द्वारिका पधारे उस समय प्रोषित-भर्तृका, द्वारिकावासिनी श्रीकृष्ण-पट्टमहिषीगण प्रिय-सम्मिलन हेतु आसन एवं आशय से उठ चलीं। ‘उत्तस्थुरारात्सहसासनाऽशयात्।’ तात्पर्य कि श्रीकृष्णचन्द्र प्रेयसी-गण का देशकृत-व्यवधान निराकरणहेतु आसन से तथा वस्तुकृत-व्यवधान निरारणहेतु आशय से अभ्युत्थान हुआ। ‘आशेरते कर्मवासना यत्रासावाशयः।’
आसन-शब्द से अन्तःकरण जो समस्त कर्म-वासनाओं का आलय है, विवक्षित है। आशय पंचकोश का उपलक्षण है; तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्ण प्रेयसी-गण आशयोपलक्षित पंचकोष कंचुक-समावृतस्वरूप को प्रिय-सम्मिलन में बाधक समझकर उस पंचकोषात्मक-आवरण से पृथक् होकर, निरावृत होकर, प्रियतम श्रीकृष्णचन्द्र सम्मिलन हेतु अग्रसर हुईं। यह सम्पूर्णतः निरावृत-सम्मिलन ही गोपांगनाओं का भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के साथ सुरत-सम्बन्ध है। भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के साथ गोपांगनाओं का सम्बन्ध जल एवं तरंगवत् है। नन्ददास कहते हैं ‘तरंगन वारि ज्यौं’ अन्य सम्पूर्ण सम्मिलन में यत्किंचित् भेद रह ही जाता है परन्तु जल एवं तरंग का सम्बन्ध सर्वथा अभिन्न है; जैसे तरंग के अणु-परमाणु में, कण-कण में जल ही जल भरपूर है वैसे ही गोपांगनाओं के अन्तःकरण, अन्तरात्मा, प्राण, रोम-रोम परात्पर परब्रह्म, पुरुषोत्तम श्रीकृष्णचन्द्र स्वरूपमय है। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं; ‘गिरा अर्थ जल वीचि जिमि कहियत भिन्न न भिन्न, बंदउै सीताराम पद जिनहि परमप्रिय खिन्न’ अर्थात् उन सीता तथा श्रीराम के जो वाणी एवं अर्थ किंवा जल एवं तरंगवत् अभिन्नतः सम्बद्ध हैं चरणारविन्दों में नमन करता हूँ। कालिदास भी कहते हैं ‘वागर्थाविवि सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ।’ शब्द और अर्थ की तरह अभिन्न पार्वती एवं परमेश्वर की वन्दना करता हूँ।
(‘गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज’)
क्रमश:
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