Sunday, 6 January 2019

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गोपी गीत

गोपांगनाएँ कुल-वधू हैं। परम पतिव्रता, साध्वी, सती, कुलांगना के लिए स्वभाव-सुलभ सहज लज्जा का लोकोत्तर महत्त्व होता है; किसी भक कुलांगना के लिए लज्जा का त्याग मरण से कोटिगुणाधिक दारुण दुःखदायक हो जाता है; इस दुस्सह दुःख को सहकर भी गोपांगनाएँ अपने श्यामसुन्दर के समक्ष निरावृत रूप से उपस्थित हुईं; मानो अनन्त-ब्रह्माण्डनायक, अखिलेश्वर, परात्पर, पूर्णतम, पुरुषोत्तम, परमात्मा, श्रीकृष्णचन्द्र के सान्निध्य में जीव ही निरावृत होकर निश्चलभाव से उपस्थित हुआ। अतिशय सौभाग्यशाली है वह प्राणी जिसने भगवत्-सन्निधान में, अपने अन्तर्यामा के सन्निधान में अपने को सर्वथा अनावृत कर दिया। भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के प्रति तत्-सुख-सुखित्व एवं तादात्म्यभाव के कारण ही गोपांगनाएँ बंदनीय हैं।

अत्यन्त ममत्व भाव वाली कुछ गोपांगनाएँ सदा ही मानभरी रहती हैं; इनके अनुग्रह की सतत वांछा स्वयं भगवान श्रीकृष्णचन्द्र भी करते हैं। वे मानिनी नायिकाएँ कहती हैं-“यासां अस्माकं जन्मना ते प्रिय अधिकं जयते, शश्वत इन्दिरा चापि श्रयते, ताः तावकाः धृतासवः त्वां विचिन्वते इति धृत्यतां।” हे श्यामसुन्दर! मदन-मोहन! हम गोपांगनाओं के जन्म से ही व्रजधाम अधिकाधिक उत्कर्ष को प्राप्त हो रहा है। महाज्ञानी उद्धव भी गोपांगना-पाद-पंकज-रज-संस्पर्श हेतु ही वृन्दावनधाम के वृक्ष, लता, गुल्म, अथवा तृण भी बन जाने के लिए विशेषतः उत्कण्ठित हो उठते हैं। व्रजधाम में वैकुण्ठाधिपति भगवान्, श्रीमन्नारायण विष्णु स्वयं ही व्रजेन्द्रनन्दन, व्रजचन्द्र, नवल-किशोर गोपीजन-वल्लभ रूप में सूत्रधार’संचालित दारु-यंत्रवत् व्रजवनिताओं का अनुसरण कर रहे हैं। एतावता स्वभावतः ही वैकुण्ठधाम की परम-प्रेयसी, परम-साध्वी, पति-परायणा, इन्दिरा भी अपने प्राणधन, प्राणनाथ का अनुसरण करती हुई उनकी सेवा के उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा में यही विराजमान है। अपने से अधिकाधिक उत्कृष्ट गोपांगना-जनों की विद्यमानता के कारण स्वयं भगवती इन्दिरा को भी अपने भगवान् श्रीमन्नारायण को सेवा के उपयुक्त अवसर को प्रतीक्षा करते हुए व्रज में सदा निवास करना पड़ रहा है। अहो, जिसके कृपा-कटाक्ष की प्रतीक्षा-ब्रह्मेन्द्रादि देवाधिदेव भी करते रहते हैं वह वैकुण्ठाधिष्ठात्री, महालक्ष्मी इन्दिरा भी जहाँ सेविका रूप से रहने के लिए लालायित हों उस सर्वोच्च विराजमान व्रजभूमि का अद्भुत ऐश्वर्य निश्चय ही अवर्णनीय है। एतावता हमारे ही जन्म के कारण व्रजधाम अधिकाधिक उत्कर्ष को प्राप्त हो रहा है।

एक बहु-प्रसिद्ध आख्यान है। रुक्मिणी की मंगल शय्या पर विराजमान भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के मुखारविन्द से हठात् ‘हे राधे’ जैसा उद्गार प्रकट हो जाता था। किसी भी स्त्री के सम्मुख उसकी सपत्नी का सोत्कण्ठ, सस्नेह स्मरण उसके लिये अवश्य ही सन्ताप-विशेष का कारण होता है ऐसा समझकर बचाते हुए भी, संकोच करते हुए भी भावना के अतिशय उद्रेक में, स्वप्न-स्थिति की असावधानी में यदा कदा भगवान् के अधरों पर राधारानी का नाम आ ही जाता था। प्रसंगवशात् किसी अन्य के द्वारा भी राजेश्वरी, नित्य निकुन्जेश्वरी, राधारानी के उल्लेखमात्र से भी भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के मुख से एक दीर्घ उष्णोच्छ्वास निकल ही जाता, वृषभानु-दुलारी राधारानी के नाम स्मरण मात्र से ही भगवान् को रोमान्च हो जाता, उनकी आँखें आनन्दाश्रु परिपूरित हो जातीं और वे गद्गद हो उठते। इतना ही नहीं, राधारानी की अंतरंग सखियों ललिता, विशाखा, रंगदेवी, स्वदेवी के स्मरण मात्र से भी भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र रोमान्चित हो उठते।

राधारानी को इस अद्भुत महिमा, इस लोकोत्तर उत्कर्ष का अनुभव करती हुई अनन्त ब्रह्माण्ड की महाशक्ति रुक्मिणी, परम सुन्दरी, परम गुणशालिनी सत्यभामा एवं परस्पर उत्तरोत्तर गुणशालिनी जाम्बवती, कालिन्दी आदि अष्ट पटरानियाँ भी राधारानी एवं उनकी अंतरंग सखी-वृन्द के दर्शनों के लिए अत्यन्त उत्कण्ठित हो तदर्थ भगवान् से प्रार्थना करने लगीं। भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ने भी उनको उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा का आदेश देते हुए आश्वासन दिया। कुछ समय बाद ही खग्रास सूर्य-ग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र में मेला लगा। इस मेले में देश के कोने-कोने से जनता एकत्रित हुई। व्रजवासी भी आये, नन्द यशोदा आए, व्रज-वनिताओं के साथ राधारानी भी पधारीं। वसुदेव-देवकी पधारे, रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, कालिन्दी आदि अष्ट पटरानियों एवं षोडश सहस्र रानियों को साथ ले भगवान श्रीकृष्ण भी पधारे। गोपांगनाएँ कृष्ण-दर्शन के लिए व्याकुल थीं, श्रीकृष्णचन्द्र की पटरानियाँ गोपांगनाओं के दर्शनों के लिए उत्सुक थीं एतावता मिलन-वेला निर्धारित की गई। इसी समय रासेश्वरी राधारानी की संदेशवाहिका गोपिका आई; उसके अतुलित तेज एवं सौन्दर्य को देखकर रुक्मिणी, सत्यभामा आदि अष्ट-पटरानियाँ उस सखीविशेष को ही राधारानी समझ स्वागतार्थ अग्रसर हुईं। अष्ट पटरानियों को स्वागतार्थ अग्रसर होते देखकर आगन्तुका सखी संकुचित हो कहने लगी, ‘महारानियो, आपका स्वागत है; मैं तो राधारानी की दासी की भी दासी हूँ।’ यथार्थतः व्रजवनिताएँ वृषभानुनंदिनी, रासेश्वरी, नित्य निकुन्जेश्वरी, श्रीकृष्ण प्राणेश्वरी भगवती राधारानी की कायव्यूहरूपा, रश्मिरूपा एवं अंगोपांगभूता हैं एतावता उनके भी अनन्त वैभव, सौन्दर्य, माधुर्य तथा लावण्य एवं लोकोत्तर अतुलित तेज को देखकर महाभागा रुक्मिणी, सत्यभामा आदि अष्ट पटरानियाँ भी बारम्बार मुग्ध हो गईं। सखी-परिकर के आगमन के अनन्तर राधारानी पधारीं।
(गोपी गीत- करपात्री जी महाराज)

क्रमश:

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