Sunday, 6 January 2019

24

24-
गोपी गीत

श्रीकृष्णचन्द्र एवं राधारानी के युगलरूप दर्शन से अहंकार एवं अज्ञान का समूल उन्मूलन तथा अनन्य अनुराग का अंकुर उद्भूत होता है। गोपांगनाएँ कहती हैं, ‘यासां अस्माकं जन्मना व्रजो जयति’ हे श्यामसुन्दर! हम गोपांगनाओं के कारण ही व्रजधाम इस विशेष उत्कर्ष को प्राप्त हो रहा है, ‘शश्वत् इन्दिराऽपि अत्र श्रयते’ हम लोगों के जन्म के कारण ही वैकुण्ठेश्वरी भगवती इन्दिरा भी यहाँ सतत आश्रयण करती हैं; एतावता व्रजधाम की शोभा प्रभा, आभा, कांति एवं श्री स्वभावतः निरन्तर वृंद्धिगत होती रहती है तथापि हम तो आपको खोजती हुई दिशा-विदिशा में भटकती हुई संत्रस्त हो रही हैं। क्या यह असंगत नहीं?

हे दयित! ‘हितं वदामः’ हम तो आपके हित का ही कहती हैं। जिन गोपांगनाओं के कारण आपके व्रजधाम का उत्कर्ष हो रहा है वे ही आपके विप्रयोगजन्य तीव्र-ताप से संतप्त हो रही हैं। ‘दिक्षु’ प्रत्यक्ष होकर इस दृश्य को देखो सिद्धान्त है कि सम्पत्ति, समृद्धि एवं लक्ष्मी-प्राप्ति की सार्थकता यही है कि सम्पूर्ण स्वजन, परिजन, प्रियजन एवं सम्पूर्ण सृहृद्वर्ग निर्दुःख हो जायँ, परम-प्रसन्न हो जायँ। ‘मार्कण्डेय पुराण’ में एक प्रसंग है; देवी मदालसा अपने पुत्रों को उपदेश देती हुई कह रही हैं, ‘हे पुत्र! तुम धन्य-धान्य प्राप्त कर अपने सुहृद्-वर्ग को सदा आनन्दित करते रहना क्योंकि धन-धान्य का परम फल यही है कि सम्पूर्ण सुहृद्-स्वजन निर्दुःख हों अन्यथा वह धन-धान्य, वह सम्पत्ति-समृद्धि सब निरर्थक हो जाता है।’ गोपांगनाएँ कहती हैं, हे प्राणधन! हे प्राणनाथ! आपकी समृद्धि अतुलित है, आप सम्राट्-विराट् चक्रवर्ती नरेन्द्र हैं, आपका व्रज भी लोकोत्तर शोभा, आभा, प्रभा को प्राप्त हो रहा है तथापि हम तो आपके विप्रयोगजन्य तीव्र संताप से संत्रस्त हो इतस्ततः भटक रही हैं। हे दयित! ‘दृश्यताम् समृद्धिवैयर्थ्यम् आगत्य’ आकर अपनी समृद्धि की व्यर्थता को ही देख लो। ‘दिक्षु’ प्रत्यक्ष होकर इस दृश्य को देखो।
‘त्वयि धृतासवः, त्वयि धृताः असवः’ हमारे प्राण आपमें समर्पित हो चुके हैं। हमारा बाह्यकरण एवं अन्तःकरण दोनों आपमें ही नियोजित हैं।हमारे श्रोत्र, स्वर, घ्राण, नेत्रादि इन्द्रियों सहित बुद्धि और मन भी सदा-सर्वदा आपमें ही आयोजित हैं। आपके गुण-श्रवण में हामरे श्रोत्र, आपके ही गुण-गणवर्णन में हमारे स्वर, आपके ही परमपावन चरित्र के चिन्तन में हमारी बुद्धि आपके मुखारविन्द-दर्शन की लालसा में हमारा मन सदा-सर्वदा संलग्न रहता है; यही कारण है कि अत्यन्त कातर होते हुए भी, अत्यन्त सन्तप्त होते हुए भी हमारे प्राण बाहर निकल नहीं पाते; आपकी विरहजन्य इस रिक्तता के रहते हुए भी इसमें मृत्यु का प्रवेश नहीं होने पाता। जनकनंदिनी जानकी भी अपने प्राणनाथ, राघवेन्द्र रामचन्द्र के वियोग से सन्तृप्त मृत्यु की कामना करती हैं तथापि न तो उनके प्राण ही निकल पाते हैं न मृत्यु का ही प्रवेश हो पाता है। ‘नाम पाहरु दिवस-निसि ध्यान तुम्हारा कपाट, लोचन जिन पद यन्त्रिका, प्राण जाहिं केहि बाट।” प्राण बाहर जा नहीं सकते क्योंकि ध्यानरूप कपाट अहर्निश लगे रहते हैं, बन्द रहते हैं। ‘ध्यान मनसा सह सर्वेन्दियाणां पिधान’ मनसहित सर्वेन्द्रिय रूप द्वार को लगा देना, ढँक देना ही ध्यान है। द्वार के बन्द हो जाने पर उसके बाहर अथवा भीतर किसी की भी गति क्योंकर सम्भव हो सकती है? अतः हमारे प्राण भी निकलने में असमर्थ हैं। आपके मुखारविन्द का दर्शन हो इस चक्षु-उपलक्षित सर्वेन्द्रिय रूप द्वार को खोलने की कुन्जिका है।

यह कुन्जिका भी हमसे दूर आप ही के पास है। अतः न तो यह द्वार खुल ही जाते हैं न हमारे प्राण बाहर निकल ही पाते हैं। इतने पर भी आपके नाम रूप ‘पाहरू’ द्वारपाल अहर्निश पहरा दे रहे हैं। ‘प्राण जाहिं केहि बाट’ ये प्राण किस रास्ते से बाहर जायँ? यही एकमात्र कारण है कि आपके वियोगजन्य दारुण दुःख से अतिशय पीड़ित होते हुए भी प्राण बाहर जाने में असमर्थ हैं, विवश हैं। हमारी यह देह तो आपके विरह-ताप की अतिशयता से जल रही है तथापि प्राण सुरक्षित हैं; वे नहीं जलते क्योंकि आप ही उनका अधिष्ठान हैं। इन प्राणों की सुरक्षा का एक और भी कारण है। समुद्र में उन्मज्जन, निमज्जन करते हुए क्रीड़ा करने का आपको अभ्यास है अतः आप स्वयं ही अपने वियोगजनित दुःख-कातर हमारे अन्तःकरणार्णव में क्रीड़ा करना चाह रहे हैं। आपकी क्रीड़ा-स्थली बने रहने के कारण ही यह विरहातुर प्राण विनाश को प्राप्त नहीं हो पाते।
(गोपी गीत- करपात्री जी महाराज)

क्रमश:

No comments:

Post a Comment

158 last

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी  158- फूटि-फूटि निकसत लोन राम राय को। कैलास फड़क उठे, बोले- "मित्र, तुम महात्मा तो हो ही पर खरे, कवि पहले ह...