Sunday, 6 January 2019

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गोपी गीत

सिद्धान्त है कि मानव-शरीर से सुख-दुःख-भोग की एक सीमा है। इस सीमा का अतिक्रमण होने पर प्राण अवश्य ही इस शरीर को त्याग कर देते हैं। मानव-शरीर के द्वारा इन्द्रलोक का विशिष्ट सुख तथा यमलोक का भयंकर त्रास दोनों को ही झेलना असम्भव है। जैसे नीम में निवास करने वाले कीड़े के लिये मिश्री के माधुर्य का अनुभव कदापि सम्भव नहीं या जैसे विष्ठा-भोगी शूकर को विशिष्ट सुस्वादु पक्वान्न का स्वाद कदापि उपलब्ध नहीं हो सकता वैसे ही मानव-शरीर से ऐन्द्रलोक के लोकोत्तर दिव्य-सुखों का अनुभव भी कदापि सम्भव नहीं होता। आग्निहोत्र, ज्योतिष्टोम, चातुर्मास, दर्शपूर्णमास आदि क्रिया-कलापों के बारम्बार अनुष्ठान से मानव-शरीर एवं अन्तःकरण को दिव्य, लोकोत्तर, सुखोपभोग के अनुकूल उच्चस्तरीय बनाया जा सकता है। योगभाष्यकार कहते हैं, ‘भोगमनु विवर्धते कौशलम् इन्द्रियाणाम्’ उच्चस्तरीय भोग के अभ्यास के कारण इन्द्रियों का कौशल भी तदनुसार ही उच्चस्तरीय बन जाता है। इसी तरह यमलोक की यातनाओं को सहन करने के लिए यातनामय शरीर आवश्यक होता है। कल्पना करें कि किसी प्राणी को उसके अपराध के लिए यह दण्ड दिया गया है कि उसे विषम विषसम्पृक्त-अग्निमय-तैल-कटाह में दीर्घावधि तक बैंगन की तरह भूना जाए। अत्यन्त हृष्ट-पुष्ट बड़े-से-बड़ा पहलवान भी खौलते हुए तेल के इस कड़ाहे में क्षण के लिये भी जीवित नहीं रह सकता। मानव-शरीर से इस भयंकर यातना का भोग कदापि शक्य नहीं; तदर्थ यमलोकान्तर्गत यातनामय शरीर ही आवश्यक है। यातनामय शरीर की ही यह विशेषता है कि भयंकरातिभयंकर त्रास को भोगते हुए भी विशिष्ट प्रतिबन्ध के कारण प्राणी मरता नहीं। इसी तरह विषम-विषसम्पृक्त-अग्निमय-तेल-कटाह-तुल्य आपके विरहजन्य तीव्र त्रास को भोगते हुए भी हमारे प्राण आपमें ही प्रसथापित होने के कारण निकल भी नहीं पाते।

कहा जाता है कि ‘विष्णु-पुराण’ में शिव की और ‘शिव-पुराण’ में विष्णु की निन्दा है। नीलकण्ठ लिखते हैं, कोई एक कौतुकी पति अपनी मुग्धा भार्या को कुपित कर उसके रोषजन्य कुटिल-भृकुटी-विलास का आनन्द प्राप्त करने के हेतु अपने घर के कुत्ते का वही नाम रख लेता है जो उसके साले का नाम है। कुत्ते का नाम ले-लेकर वह गृहस्वामी उसको बहुत गालियाँ देता है। उसके इस कौतुक से अपरिचित वह मुग्धा भार्या क्रोधित हो जाती है; रोष से उकसी भृकुटी कुटिल हो जाती है। उपर्युक्त कथा के व्याज से नीलकण्ठ महोदय, विष्णु एवं शिव पुराणों में प्राप्त परस्पर-विरोधी से प्रतीत होते इन उल्लेखों के तात्पर्य का स्पष्टीकरण करते हैं। अविवेकी प्राणी के मन में क्षोभ उत्पन्न कर उसकी एक निष्ठा को सुदृढ़ करना ही ऐसे उल्लेखों का आशय है। वस्तुतः न तो ‘शिव पुराण’ में विष्णु की निन्दा है न ‘विष्णु-पुराण’ में शिव की निन्दा है। ‘विष्णु-पुराण’ में विष्णु कार्य-कारणातीत शुद्ध-ब्रह्म हैं तो ‘शिव-पुराण’ में शिव कार्यकारणातीत शुद्ध-ब्रह्म हैं। जैसे कौतुकी पति द्वारा घर के कुत्ते को साले के नाम से पुकारे जाने पर भी गाली कुत्ते को ही दी जाती है वैसे ही कार्य-ब्रह्म को कहीं शिव और कहीं विष्णु का नाम देकर कह दिया गया है कि अमुक के भजने से नरक मिलता है। उपर्युक्त उल्लेखों में प्रयुक्त नरक शब्द का तात्पर्य ब्रह्मलोक से ही है।

महाभारत में एक कथा,अपने एक जापक पर प्रसन्न होकर भगवती गायत्री प्रकट हुई और कहा, ‘वरं ब्रूहि’ वर माँगो। उस साधक ने कहा, ‘माता! मैं अल्पज्ञ नहीं जानता कि श्रेयस्कर क्या है अतः आप ही कृपा कर उचित वर दे दें।’ भगवती ने वरदान दिया कि ‘जो नरक गायत्री-जापकों को होता है वह तुझे नहीं होगा।’ यह कैसी विडम्बना है? यहाँ सहसा ही सन्देह हो जाता है कि क्या गायत्री-जापक को नरक होता है? कदापि नहीं। यहाँ नरक का अर्थ है ब्रह्मसुख की तुलना में निम्नवर्गी सवर्गादि लोक। ‘तस्य स्थान वरस्येह सर्वे निरयसंज्ञिताः।’ माता के इस वरदान का आशय है कि गायत्री-जापक की ब्रह्मलोकादि में कहीं नहीं अटकना पड़ेगा; वह अधिष्ठान-तत्त्व के साक्षात्कार से ब्रह्मलोक भी नरकतुल्य ही है। जैसे स्वयंवरा कन्या जिसका वरण कर लेती है उसको ही अपने विशुद्ध स्वरूप का दर्शन कराती है वैसे ही भगवान् भी जिसको चाहें उसके लिये ही अपने विशुद्ध स्वरूप को प्रत्यक्ष कर देते हैं।

गोस्वामीजी कहते हैं, ‘जेहि चाहहुँ तेहि देहुँ जनाई।’ स्वयंवरा कन्या अपनी रुचि के अनुकूल वर-विशेष का ही वरण करती हैं; स्वयंवरा कन्या स्थानीय भगवान् के लिए तो प्राणी मात्र समानतः प्रिय हैं; ‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए।’ ऋग्वेद का कथन है, ‘अमृतस्य पुत्राः।’ प्राणी मात्र अमृत, अनन्त, अनादि, परात्पर परब्रह्म के पुत्र हैं। अस्तु, विशिष्ट-गुण-गण ही भगवत्वरेण्यता का आधार है। भगवत्-वाक्य है-‘ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्’ जो मुझे भक्तिपूर्वक भजता है उसको मैं भी भजता रहता हूँ। एतावता जो स्वाश्रमानुसार धर्मानुष्ठान करते हुए मनसा-वाचा-कर्मणा भगवत्-चरणारविन्दों में आत्मसमर्पण करता है भगवान् उसका ही वरण कर उसके लिए ही अपने विशुद्ध स्वरूप को प्रत्यक्ष कर देते हैं। तात्पर्य कि भगवदुन्मुख होने पर ही जीव में भगवत्-वरण्यता प्रादुर्भूत होती है।

“तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुन्जान एवात्मकृतं विपाकम्।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक्।।”

अर्थात, भगवत्-प्राप्ति हेतु किसी विशेष क्रिया-कलाप की आवश्यकता नहीं होती अपितु भास्वती भगवत्-अनुकम्पा की प्रतीक्षा मात्र ही करनी पड़ती है। यह प्रतीक्षा, यह बाट जोहना ही सर्वाधिक दुस्साध्य तप है। शबरी का बाट जोहना सुप्रसिद्ध है।
(गोपी गीत- करपात्री जी महाराज)

क्रमश:

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