Sunday, 6 January 2019

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गोपी गीत

मतंग महर्षि के कथन पर अनन्त विश्वास करती हुई शबरी जीवन-पर्यन्त भगवदागमन की प्रतीक्षा करती रही; भगवत्-सम्मिलन की आशा सँजोए जीवन-पर्यन्त पलक-पाँवड़े बिछाए रही।

मया तु सन्चितं वन्यं विविधं पुरुषर्षभ।।
तवार्थे पुरुषव्याघ्र पम्पायास्तीरसम्भवम्।

प्रतिदिन अपने आँगन को लीप-पोतकर सजा-सँवारकर भगवान् के बैठने योग्य बना देती और पम्पा-तीर से मीठे-मीठे फल लाकर रखती। और तब अपलक नेत्रों से भगवत्-दर्शन की राह देखती रहती। शबरी के भावुक हृदय पर निराशा-पिशाची का अधिकार कदापि नहीं हो पाया। अन्ततोगत्वा भगवान् शबरी के घर पधारे; उसके द्वारा संग्रहीत फलों को विशेष रुचि के साथ स्वीकार किया। इसी तरह गोपांगनाएँ भी शान्त एवं एकाग्र चित्त से निमेषोन्मेष विवर्जित नयनों से निर्वृत्तिक होकर तन्मय होकर भगवान् श्रीकृष्ण के आगमन की प्रतीक्षा करती हैं। इस प्रकार बाट जोहने जैसा दुस्साध्य तप करते हुए प्राणी में निर्वृत्तिक-तन्मयता उद्बुद्ध होती है; निर्वत्तिक तन्मयता ही समाधि का स्वरूप है।

निमेषोन्मेष-विवर्जित निर्बत्तिक शान्त, एकान्त, एकाग्र, तन्मय चित्त से प्रभु के मंगमय आगमन की प्रतीक्षारूप साधना करने वाले मुक्त्-पद के भिक्षुक नहीं, अपितु दायभागी होते हैं। ‘मुक्तिपदे स दायभाक्।’ मंगलमयी भास्वती भगवदनुकम्पा की प्रतीक्षा ही अन्तिम साधन है; इस प्रतीक्षारूप साधन के लिए ही विशेष प्रयास अपेक्षित है। जन्म-जन्मान्तरों के अनेकानेक कर्मजन्य संस्कारवशात् जीव स्वभावतः प्राकृत-प्रपन्चरत रहता है एतावता प्रभु वरेण्य गुण से रिक्त ही रहता है। कदाचित् जन्म-जन्मान्तरों के पुण्य-पुन्ज के कारण प्रभु का मंगलमय अनुग्रह प्राप्त होने पर जीव में भगवदीयात्वाभिमान उदित हो जाता है; भगवदीयत्वाभिमान ही भगवद्-वरेण्य गुण है। जीव एवं सर्वेश्वर प्रभु द्वारा परस्पर वरण अन्योन्याश्रित है। अस्तु गोपांगनाएँ भी प्रार्थना कर रही हैं ‘तावकाः त्वयि धृतासवः’ हे मदन-मोहन! श्यामसुन्दर! हम आपकी हैं; त्वदीयत्वाभिमानिनी हैं; आपको खोजती हुई इस वन-प्रान्तर में इतस्ततः भटकती हुई अत्यंत संत्रस्त हो रही हैं। हे दयित! ‘दृश्यताम्’ प्रत्यक्ष होकर हमारी इस दशा को देखो।
एतावता आपके आविर्भाव के कारण ही इन्द्रियों का आवास-स्थान यह जड़ देह, गोष्ठ किंवा व्रज अधिकाधिक उत्कर्ष को प्राप्त हो रहा है। आपका अनुसरण करती हुई इन्दिरा‚ अघटित घटना पटीयसी मंगलमयी माया शक्ति भी इस देह’ गोष्ठ किंवा ब्रज में सतत आश्रयण कर रही हैं अतः देह, व्रज की शोभा, आभा, प्रभा, कांति एवं दान्ति पूर्णतः प्रस्फुटित हो रही हैं। ‘जासु सत्यता ते जड़ माया भास सत्य इव।’ आपकी सत्ता के कारण ही जड़ माया भी सत्यवत् प्रतीत हो रही है; आपकी सत्ता के कारण ही जड़ माया में भी ऐश्वर्य एवं माधुर्यरूप चमत्कृति प्रत्यक्षतः भासित हो रही है।

‘दयित दृश्यतां दिक्षु तावकास्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्यते।’ हे सर्वेश्वर! आप उन विद्वानों के लिये प्रत्यक्ष हो जावें। ‘के ते विद्वांसः? ये त्वयि धृतासवस्तवां विचिन्यते।’ हे प्रभो! आप उन विद्वानों के लिए जो आपमें ही अपने प्राण एवं अन्तःकरण को धारण कर आपका ही अनुसन्धान कर रहे हैं प्रत्यक्ष हो जावें। ‘मच्चिता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्। कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।’ जो भक्त निरंतर भगवद्स्वरूप का ही चिन्तन-मनन करते हैं, जिनके हृदय सदा ही भवद्दर्शन हेतु उत्कंठित रहते हैं, जिनके प्राण, अन्तःकरण, अन्तरात्मा, सदा ही भगवत्-सान्निध्य हेतु लालायित रहते हैं ऐसे अपने अन्तः एवं बाह्य-करण तथा प्राणों को आपमें समर्पित कर आपका अनुसन्धान करने वाले विद्वद्वर के लिए आप प्रत्यक्ष हो जावें। यह अनुसन्धान ही सर्वातिशय महत्त्वपूर्ण है; इस अनुसन्धान की अपनी विशेष शैली है। तैत्तिरीय उपनिषद् का वचन है-
‘तस्माद्वा एतस्मात् अन्नरसमयात् अभ्योऽन्तरआत्मा प्राणमयः’ ‘तस्माद् वा एतस्माद प्राणमयात् अन्योऽन्तरआत्मा मनोमयः’
‘तस्माद् वा एतस्मान्मनोमयात् अन्योऽन्तरआत्मा विज्ञानमयः’
‘तस्माद्वा एतस्माद् विज्ञानमयात् अन्योऽन्तरआत्मा आनन्दमयः
‘तस्य प्रियमेव शिरः
मोदो दक्षिणः पक्षः
प्रमोद उत्तरः पक्षः
आनन्द आत्मा ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा।’

‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ सत्य ज्ञान एवं अनन्त आनन्दस्वरूप सच्चिदानन्दघन परब्रह्म ही सर्वाधिष्ठान है; इस ब्रह्म से ही आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से अप और अप से पृथ्वी, पृथ्वी से औषधियाँ उद्भूत हुईं। इन औषधियों से अन्न एवं अन्न से पुरुष, आत्मा से यह देहादि क्रमेण उद्भूत हुए। यद्यपि ‘आत्मनः आकाशः’ कह दिया गया है तदपि यहाँ अघटित-घटना-पटीयसी माया शक्ति के द्वारा सम्बन्ध समझ लेना चाहिए। उदाहरणार्थ ‘अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः’ स्वर्गकामी अग्निहोत्र करें ऐसा कहा जाता है तथापि अग्निहोत्र का तात्कालिक फल स्वर्ग-प्राप्ति नहीं, अपितु तज्जन्य अपूर्व है।
(गोपी गीत- करपात्री जी महाराज)

क्रमश:

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