Sunday, 6 January 2019

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गोपी गीत

अग्निहोत्र के सम्पूर्ण होते ही कार्याव्यवहितोत्तरक्षण में कार्य घटित नहीं होता। अग्निहोत्र सम्पूर्ण हो गया तथापि स्वर्ग-प्राप्ति कालान्तर में ही होगी। एतावता जैसे ‘तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्वं द्वारत्वम्’ अर्थात् अग्निहोत्रादिजन्य अपूर्व के द्वारा ही अग्निहोत्रादि स्वर्ग का जनक बनता है वैसे ही ‘मायया महदादिकक्रमेण आकाशः सम्भूतः।’ आत्मा से अघटित-घटना पटीयसी मंगलमयी मायाशक्ति द्वारा ही महदादिकक्रम से सम्पूर्ण प्राकृत-प्रपन्च प्रस्फुटित होता है। ‘तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्’ अनन्तकोटि-ब्रह्माण्ड, इस सम्पूर्ण चराचर विश्व-रूप घट को बनाकर परात्पर प्रभु स्वयं भी उसमें प्रविष्ट हो गए। छान्दोग्योपनिषद् का कथन है ‘आत्मनुप्रविश्य नाम-रूपे व्याकरवाणि’ उसने आकाश, वायु, तेज, जल एवं पृथ्वी का निर्माण किया अथवा तेज, अप एवं अन्नरूप तीन देवताओं का निर्माण कर स्वयं भी उसमें प्रविष्ट हो गया; तात्पर्य यह कि अपने से समुद्भत जगत् में ब्रह्म व्याप्त हो गया। जैसे ‘जातेंऽकुरे कथमिहोपलभेत बीजम्’ वट-बीज अपने समुद्भत वट-वृक्ष में लीन हो जाने पर भी उस वृक्षविशेष में ही अनुस्यूत रूप से दृष्टिगोचर होता है वैसे ही नाम-रूप-व्याकरण-कर्ता, सर्वाधिष्ठान, परात्पर परब्रह्म, परमेश्वर प्रभु भी अपने से ही समुद्भत विश्व-प्रपन्च में प्रविष्ट हो जाने पर भी उस प्रपन्च के अन्तर्गत ही अनुस्यूत रूप से प्रतिभासित होते हैं। विश्व-प्रपंचलीन सर्वाधिष्ठान परात्पर प्रभु के अनुसन्धान में प्रवृत्त होने पर क्रमशः अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवं आनन्दमय कोष का अनुभव होता है।

आनन्दमय कोष में ही सर्वाधिष्ठान, सच्चिदानन्दघन, स्वप्रकाश, शुद्ध ब्रह्म प्रतिष्ठित है। जगत् के सम्पूर्ण आनन्द, मोद-प्रमोद सविशेष हैं अतः उनमें वैषम्य है, वैविध्य है तथापि उन सबका अधिष्ठान एकमात्र स्वप्रकाश, विशुद्ध परब्रह्म ही है। ‘जो आनन्द-सिन्धु सुख-राशि, सीकर तें त्रैलोक्य सुपासि।’ जो आनन्द-सिन्धु हैं, सुखराशि है, जिसका क्षुद्रातिक्षुद्र सीकर कण भी ब्रह्मादिदेव शिरोमणियों को आनन्द प्रदान करने वाला है, वह ब्रह्म ही ‘पुच्छम् प्रतिष्ठा’ सर्वाधार, सर्वाधिष्ठान है। ‘ताति सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः’ संपूर्ण इन्द्रियों को संयत कर, मन, बुद्धि एवं प्राणों को संयत कर आत्मलीन होकर भगवत्-परायण हो जाना ही भगवदनुसन्धान का स्वरूप है। ऐसे ‘त्वयि धृतासवस्तवां विचिन्वते’ विद्वद्वर के लिए आप प्रत्यक्ष हो जावें। ‘अस्ति ब्रह्मेति चेद् वेद संतमेनं ततो विदुः’ जो ऐसे सर्वाधिष्ठान, स्वप्रकाश, सर्वेश्वर ब्रह्म को जान लेते हैं वे ही परमपूज्य संत हो जाते हैं। ‘असन्ने व स भवति असद् ब्रह्मेति वेद चेत्।' ब्रह्म नहीं है ऐसा समझने वाले असत् हो जाते हैं। ईश्वर-विमुख का समूल नाश हो जाता है, भक्त एवं संतजन सदा-सर्वदा सर्वत्र संपूज्य होते हैं।

गोपांगनाएँ कह रही हैं- हे श्याम-सुन्दर मदन-मोहन व्रजधाम का उत्कर्ष वैकुण्ठादपि अधिकाधिक हो रहा है तथापि हम व्रज-वनिताओं के लिए आपका दर्शन दुर्लभ ही हो रहा है। ज्योतिर्वित् दैवज्ञ गर्गाचार्य के कथन को सार्थक करने के लिए भी आपके दिव्य-स्वरूप का प्राकट्य होना ही चाहिए। आपके इस दिव्य प्राकट्य से हम व्रज-वनिताएँ भी वैकुण्ठवासिनी नारियों के तुल्य हो जावेंगी। अतः आपका प्राकट्य ही सर्वथा वांछनीय है।

इस श्लोक का निवृत्ति पक्षीय अर्थ भी है; वाणीमात्र, विशेषतः वेद-लक्षणावाणी, श्रुतियाँ, गोपदवाच्य हैं; एतावता मन्त्र-ब्राह्मणात्मक शब्द राशि भी गोष्ठ किंवा व्रज पद वाच्य हैं। गोपद-वाच्य श्रुतियों का आवास-स्थान वेद राशि ही गोष्ठ किंवा व्रज है। वेद राशि, व्रज स्वभावतः ही उत्कर्ष को प्राप्त है। वेदराशि-भिन्न संसार के सम्पूर्ण ग्रन्थ पौरुषेय हैं अतः उनमें पुरुषाश्रित प्रमाद, विप्र लिप्सा करणापाटवादि दूषणों के कारण अप्रामाण्य सम्भव है; वेद-राशि अपौरुषेय हैं अतः पुरुषाश्रित समस्त दोषों से मुक्त हैं एतावता प्रमाण है। अस्तु, गोष्ठ किंवा ब्रज-पद-वाच्य वेद-राशि स्वभावतः उत्कर्ष को प्राप्त है।

वेदार्थ का साक्षात्कार न होने तक तादृक उत्कर्ष पूर्णतः उद्भासित नहीं हो पाता। भागवत में एक श्लोक है ‘सर्वं विष्णुमयं गिरोऽंगवदजः सर्वस्वरूपो बभौ।’ सम्पूर्ण विश्व-प्रपन्च विष्णुमय है। वेद-राशि, उपनिषद् एवं पुराणों में सर्वत्र ही ऐसे वचन प्राप्त हैं। ‘विष्णुपुराण’ का वाक्य है ‘भूतानि विष्णुर्भुवनानि विष्णुः’ सम्पूर्ण भूत भी विष्णु ही हैं, सम्पूर्ण भुवन भी विष्णु ही हैं। भगवान् विष्णु अनन्त कोटि ब्रह्माण्डनायक, अचिन्त्य-अनन्त-कल्याण-गुण-गणों के आस्पद, सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान, सच्चिदानन्दघन, सर्वोपद्रव-विवर्जित परमानन्दघन हैं और विश्व-प्रपंन्च जड़, शेषात्मक, दुःखात्मक, अनेकात्मक, अनन्तोपद्रव-युक्त शोकद्रव है, एतावता अनुभव-विरुद्ध एवं असम्मानित होने के कारण ‘सर्व विष्णुमयं जगत्’ जैसी उक्ति में अप्रामाण्य की प्रतीति होने लगती है। तथ्य है कि ‘नहि शब्द शतमपि घटं पटयितुमीष्टे।’ सैकड़ों शब्द सम्पूर्ण शब्द भी घट को पट नहीं बना सकते। अस्तु वेदार्थ के सम्यक् बोध हेतु यदा-कदा वेद-वाक्य में भी लक्षणा आवश्यक हो जाती है। उदाहरणार्थ एक वेद वाक्य है, ‘कृष्णलान् श्रपयेत्।’ कृष्णलों को पकावें। यवाकार सुवर्ण-खण्ड ही कृष्णल हैं; रूप रस विपरिवृत्ति ही पकाना है; कृष्णलों का रूप रस विपर्यय कदापि सम्भव नहीं अतः ‘कृष्णलान् श्रपयेत्’ जैसे शब वेद-वाक्य भी निरर्थक ही प्रतीत होने लगते हैं।
(गोपी गीत- करपात्री जी महाराज)

क्रमश:

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