गोपी गीत- 1
श्रीहरिः शरणम्
यत्कीर्तनं यत्स्मरणं यदीक्षणं
यद्वन्दनं यच्छवणं यदर्हणम्।
लोकस्य सद्यो विधुनोति कल्मषं
तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः।।
श्रीमद्भागवत कल्पवृक्ष के समान है। इसका भक्ति-प्रेमपूर्वक पाठ करके अपने अभीष्ठ फल को प्राप्त किया जा सकता है। कल्पवृक्ष के पास जाकर फल चाहने वाले को तद्विषयक इच्छा (प्रार्थना) जैसे अनिवार्य होती है, वैसे ही इस भागवत-कल्पवृक्ष के समीप अपने अभीष्टफल की प्राप्ति के लिये अपने चित्त की वृत्ति को प्रेममय बनाकर प्रगाढ अनुरागात्मिका भक्ति को प्रकट करना अनिवार्य है।
यह श्रीमद्भागवत, आत्मीय-परमसुहृत्, आप्त के समान वास्तविक हित की मन्त्रणा देने वाला मन्त्री है। भवसागर में डूबते हुए लोगों का उद्धारक (तारक) है। संसाराटवी (महान् वन) में भ्रान्त होकर भटकने वालों के लिये उनके श्रेयोमार्ग का विश्वस्त प्रदर्शक है।
श्रीमद्भागवत के अध्ययन से तत्तवज्ञान होता है, किन्तु अनुरागात्मिका श्रीकृष्ण-भक्ति के बिना वह सहजगम्य नहीं है। अतः तत्त्वज्ञान का मुख्य साधन श्रीकृष्ण-भक्ति ही है।
श्रीमद्भागवत समस्त सुख-सन्तोष-शान्ति, कल्याण का देनवाला और ‘आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक’-तीनों प्रकार के दुःखों (तापों) को नष्ट करने वाला है।
श्रीमद्भागवत ज्ञान-भक्ति-वैराग्य का अथाह (गंभीर) समुद्र है।
श्रीमद्भागवत के अध्ययन अथवा श्रवण से मनुष्य यह समझ पाता है कि प्रत्येक प्राणि में परमेश्वर का निवास है। यह ज्ञान जब मनुष्य को हो जाता है, तब अधर्म से उसका अभिनिवेश समाप्त हो जाता है। क्योंकि दूसरों को दुःखी करना अपने (स्वयं) को ही दुःखी बनाने के समान है। तब सच्चे धर्म में उसकी स्थिति सहजभाव से हो जाती है। उसका हृदय दया से आर्द्र हो जाता है। वह वास्तव में अहिंसक रहता है। परस्पर प्रेम और प्राणिमात्र के प्रति दया का भाव स्थापित करने के लिये इससे बढ़कर अन्य कोई साधन नहीं है।
निष्कर्ष यह है कि मन की वृत्तियों को प्रेममय बनाना आवश्यक है। भगवच्चरणारविन्द में, भगवत्सौन्दर्य के दर्शन में, भगवान के गुण-गणों के श्रवणी-कीर्तन में तथा भगवान की मधुरलीला के माधुर्य में जिनकी मनोवृत्ति प्रेममय हो जाती है, उनका मन सांसारिक सुखाभासों में नहीं उलझा करता। वे तो वास्तविक सुख-आनन्द की अभिलाषा किया करते हैं। जिसके मन को भाव प्रेममय हो जाता है, उसी को भगवान अपना भक्त समझते हैं।
इस प्रेममयी भक्ति की महिमा को कहते हुए यशोदानन्दन भगवान श्रीकृष्णचन्द्र अपने सखा भक्तप्रवर उद्धव से कह रहे हैं-
न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता।
भक्त्याऽहमेकया ग्राह्यः श्रद्धयात्मा प्रियः सताम्।
भक्तिः पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि संभवात्।।
धर्मः सत्यदयोपेतो विद्या वा तपसान्विता।
मद्भक्त्याऽपेतमात्मानं न सम्यक् प्रपुनाति हि।
कथं विना रोमहर्ष द्रवता चेतसा विना।
विनाऽऽनन्दाश्रुकलया शुध्येद् भक्त्या विनाऽऽशयः।
वाग गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं
रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च।
विलज्ज उद्गायति नृत्यते च
मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति।
क्रमश:
(‘गोपी गीत-करपात्री जी महाराज’ के सौजन्य से)
No comments:
Post a Comment