भाग- 2
गोपी गीत
मेरे प्रति वृद्धिगत हुई भक्ति जिस प्रकार भक्त को मेरे समीप ले आती है उस प्रकार न तो योग, न ज्ञान, न धर्म, न स्वाध्याय, न तप, न दान ही उसे ला सकता है। मैं तो सत्पुरुषों का प्रिय आत्मा हूँ। एकमात्र श्रद्धापूर्ण भक्ति से ही मेरी प्राप्ति होना सुलभ है। अधिक क्या बताऊँ, कुत्ते का मांस खाने वाले चण्डाल को भी मेरी भक्ति पवित्र कर देती है। मनुष्य में सत्य, दया आदि से युक्त धर्म तथा तपस्या से युक्त विद्या भी हो, किन्तु मेरी भक्ति यदि न हो तो वे धर्म और विद्या, उनके हृदय को पूर्णतया पवित्र नहीं कर सकते। मेरे प्रति प्रेम से जब तक शरीर पुलकित नहीं हो जाता, हृदय द्रवित नहीं हो उठता, आनन्दाश्रुओं की झड़ी नहीं लग जाती, तब तक अन्तःकरण कैसे शुद्ध हो सकता है। भक्ति के आवेश में जिसकी वाणी गद्गद हो गई है, चित्त द्रवित हो गया है, जो कभी रोता है, कभी हँसता है, कभी संकोच को त्यागकर ऊँचे स्वर से हरि-गुणों को गाने लग जाता है और कभी नाचने लगता है, वही मेरा भक्त स्वयं तो पवित्र होता ही है, साथ ही तीनों लोकों को भी पवित्र कर देता है। भक्ति से भगवान् वश में हो जाते हैं। भगवान स्वयं कहते हैं-
‘अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।
साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः।
नाहमात्मानमाशासे मद्भक्तैः साधुभिर्विना।
श्रियं चात्यन्तिकीं ब्रह्मन् येषां गतिरहं परा।
ये दारागारपुत्राप्तान् प्राणान् वित्तमिमं परम्।
हित्वा मां शरणं याताः कथं ताँस्त्यक्तुमुत्सहे।
मयि निर्बद्धहृदयाः साधवः समदर्शनाः।
वशीकुर्वन्ति मां भक्त्या सत्स्त्रियः सत्पर्ति यथा।
साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्।
मदन्यत् ते न जानन्ति नाऽहं तेभ्यो मनागपि।
मैं सर्वथा भक्तों के अधीन हूँ और अस्वतन्त्र की तरह हूँ। मेरे साधु हृदय में भक्तों ने मेरे हृदय को अपने हाथ में कर रखा है। मैं उन भक्तों का सदा ही प्रिय हूँ। हे ब्रह्मन्! अपने भक्तों का एकमात्र आश्रय मैं ही हूँ। उनको अन्य किसी का आश्रय है ही नहीं। इसलिये अपने उन साधुस्वभाव वाले भक्तों को छोड़कर न तो मैं अपने-आप को चाहता हूँ और अपनी अर्धान्गिनी लक्ष्मी को ही। जो मेरे भक्त अपने पुत्र, कलत्र (स्त्री), घर, कुटुम्बीजन, प्राण, धन, इहलोक और परलोक सबको छोड़कर केवल मेरी शरण में आ गये हैं; भला, उन भक्तों को मैं कैसे छोड़ सकता हूँ? जिस प्रकार सती स्त्री अपने पातिव्रत्य से सदाचारी पति को अपने वश में कर लेती है, वैसे ही अपने हृदय को मुझमें प्रेमबन्धन से बाँध रखने वाले समदर्शी साधुपुरुष भक्ति के द्वारा मुझे अपने वश में कर लेते हैं। अधिक क्या कहूँ, वे मेरे प्रेमी साधुपुरुष मेरे हृदय हैं और मैं उन प्रेमी साधुपुरुषों का हृदय हूँ। वे मेरे अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते तथा मैं भी उनके अतिरिक्त और कुछ नहीं जानता। भगवान ने यहाँ तक कह दिया है-
अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यङ्घ्रिरेणुभिः।
मैं उन भक्तों के पीछे-पीछे सदा इसलिये चलता रहता हूँ कि उनकी चरण-रज से पवित्र हो जाऊँ।
(‘गोपी गीत-करपात्री जी महाराज’)
क्रमश:
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