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गोपी गीत
भक्ति की महिमा बड़ी अद्भुत है। भक्ति वह अनुपम वस्तु है कि वह जिसके पास होती है, वह जो कुछ चाहता है, वही उसे मिल जाता है। भगवान स्वयं गीता में कहते हैं-
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप।
परन्तु हे परन्तप अर्जुन अनन्य भक्ति के द्वारा ही मुझे इस प्रकार से देखा जा सकता है, मेरे यथार्थस्वरूप को जाना जा सकता है तथा मेरे साथ एकीभाव को भी प्राप्त किया जा सकता है।
श्रीमद्भागवत का दशमस्कन्ध तो भक्तिरस के अथाह सागर का ज्वारभाटा-स्वरूप ही है। इस दशमस्कन्ध में भगवान की विविधि मधुर लीलाओं का वर्णन है, जो सहृदय भक्तों के हृदय को भक्तिरस से आप्लावित कर देता है। किन्तु इस संसार में कुछ ऐसे भी नर-पशु या नर-कृमि हैं, जिनके हृदय का निर्माण ब्रह्मा ने मानों पाषाण से किया होगा। वे भाग्यहीन नर-पशु भगवान पर भी आक्षेप करके अपनी नरपशुता अथवा पाषाणहृदता को प्रकट किया करते हैं।
उनके आक्षेप ये हैं-
जबकि भगवान का अवतार सज्जनों के संरक्षणार्थ और दुर्जनों के संहारार्थ तथा धर्म के स्थापनार्थ होता है। अतः भगवान को आदर्श के रूप में रखा जाता है। तब उनकी लीलाओं में चोरी, कपट, काम, रमण आदि के प्रसंग क्यों आते हैं?
विद्याव्यासंग तथा श्रीकृष्ण की भक्ति-सुधारस का निरन्तर पान करने वालों के मन में इस प्रकार के कुतर्क-तरंग कभी उठते ही नहीं। श्रीमद्भागवत एवं श्रीमद्भगवद्गीता के अनुशीलन से वे कुतर्क-तरंग स्वयं ही शान्त हो जाते हैं, भगवान् का प्रत्येक कार्य सभी के लिये आदर्शरूप है।जिसके शरण जाने पर अथवा जिसका नामस्मरण करने मात्र से साधारण प्राकृत मनुष्य में भी झूठ, कपट, चोरी, व्यभिचार आदि दोष नहीं रहते, तब प्रत्यक्ष भगवान में उन दोषों की कल्पना करने का दुःसाहस भाग्यहीन नर-पशु के सिवा अन्य कर ही कैसे सकता है?
भगवान ने कभी दुर्जनों को प्रोत्साहन देते हैं और न कभी धर्म की जड़ ही उखाड़ते हैं।वे स्वयं अपने श्रीमुख से कहते हैं-
यद् यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किन्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः।
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत
कुर्याद्।
विद्वाँस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम।
श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण का ही अनुकरण अन्य लोग किया करते हैं। श्रेष्ठ पुरुष के प्रमाणित व्यवहार का आचरण ही अन्य लोग करते हैं। अतः हे अर्जुन! यद्यपि मेरे लिेय इस संपूर्ण त्रिलोकी में कुछ भी कर्तव्य करने को नहीं है एवं प्राप्तव्य कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जो मुझे प्राप्त नहीं है। तो भी मैं कर्म करता रहता हूँ।
(गोपी गीत- करपात्री जी महाराज)
क्रमश:
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