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गोपी गीत
यदि में कर्म न करूँ, तो लोगों की बड़ी हानि होगी। क्योंकि हे अर्जुन! मनुष्यमात्र मेरी कर्तव्यशीलता को देखकर ही अपने कर्तव्यपालन में तत्पर रहता है। यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँगे। सभी लोग मुझे ही संकर करने वाला कहेंगे और समस्त प्रजा का विनाशक मैं कहलाऊँगा। हे भारत! कर्म में आसक्त रहने वाला अज्ञानी पुरुष जैसे कर्म करता है, वैसे ही अनासक्त रहने वाला विद्वान ज्ञानी पुरुष भी लोगों के शिक्षणार्थ कर्म करता रहे।
इस सन्दर्भ से स्पष्ट हो रहा है कि लोकशिक्षा में बाधक बनने वाला कोई भी अनैतिक कर्म भगवान् के द्वारा किया जाना कथमपि संभव नहीं है।
श्रीमद्भागवत में प्रयुक्त काम, रमण, रति आदि शब्दों के कुत्सित अर्थों का मन में आना ही कुत्सित-मलिन हृदय होने का प्रमाण है। उनके निर्दुष्ट अर्थों का परिज्ञान प्राचीन प्रामाणिक व्याख्याओं से कर लेना चाहिये। भगवान स्वयं अपने श्रीमुख से गीता में कहते हैं-
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।
जिनके चित्त, प्राण मुझमें ही लगे हुए हैं, जो निरन्तर मेरे ही गुणों की चर्चा परस्पर किया करते हैं, मेरी ही लीलाओं का वर्णन करते हुए सर्वदा प्रसन्न हुआ करते हैं, वे मुझ वासुदेव में निरन्तर ‘रमण’ करते हैं। निरन्तर मेरा ध्यान करने वाले को और प्रेमपूर्वक मुझे भजने वालों को मैं तत्त्वज्ञान करा देता हूँ, जिससे वे मेरे पास आ पहुँचते हैं।
प्रथम श्लोक में साधनावस्था का वर्णन है। अभी साधक को भगवान की प्राप्ति नहीं हुई है। द्वितीय श्लोक में साधक भक्त की मानसिक स्थिति का वर्णन है, जिसके फलस्वरूप उसे भगवान की प्राप्ति बताई गई है। यहाँ मन की भावना से ही वह भगवान को देखता है, सुनता है और रमण करता है। भक्त का भगवान में यह रमण करना कुत्सित इन्द्रियों का कार्य नहीं है। यह परम पवित्र मानसिक भाव है। इसी मानसिक भाव से वह भगवान चिन्तन करता है, उनके स्पर्श का अनुभव करता है और उनके साथ भाषण करता है। निष्कर्ष यह है कि भगवान पर कुत्सित क्रियाओं का आरोप करना, अपनी ही कुत्सित क्रियाओं को उजागर करना है।
भक्ति के शान्त, दास्य, सख्य, माधुर्य आदि अनेक भाव रहते हैं। ये सभी भाव समान कोटि के ही समझने चाहिये। अपने-अपने क्षेत्र में सभी भाव श्रेष्ठ है। जिस भक्त को जो भाव प्रिय हो उसके लिये वही भाव सर्वोत्तम है। हनुमान जी ने दास्यभाव को ही सर्वोत्तम समझकर उसे ही स्वीकार किया। वसुदेव-देवकी तथा नन्द-यशोदा ने वात्सल्यभाव को ही सर्वोत्तम समझकर उसे ही स्वीकार किया। राधारानी और गोपीजनों ने माधुर्यभाव को ही सर्वोत्तम समझकर उसे ही स्वीकार किया। इस माधुर्यभाव में प्राकृत साधारण लौकिक स्त्री-पुरुषों की तरह कामवासनाजनित अंग-संग आदि कोई कुत्सित क्रिया नहीं है। यह तो परम-पवित्र भाव है। भक्त अपने भगवान को इस भाव में सर्वथा आत्मसमर्पण कर देता है और उन्हीं के मधुर चिन्तन, मधुर नामस्मरण, मधुर भाषण, मधुर मिलन आदि में मग्न रहता है।
‘कृष्णस्तु भगवान स्वयम्’-भगवान श्रीकृष्ण साक्षात् परब्रह्म-परमेश्वर हैं। वे समस्त दोषों से सर्वदा और सर्वथा ही रहित हैं, वे समस्त कल्याणमय गुण-गणों से सर्वदा और सर्वथा सम्पन्न हैं। उनके नामस्मरणमात्र से उनके गुण उनकी लीलाओं के श्रवण-मनन-चिन्तन-कथन से ही मलिन-से-मलिन मनुष्य परम पवित्र होकर दुर्लभ परमपद को प्राप्त हो जाता है। अतः साक्षात उनमें किसी भी दोष की कल्पना कैसे की जा सकती है? उनमें दोष की कल्पना करना अपने ही दोषों का उद्घाटन करना है।
(‘गोपी गीत- करपात्री जी महाराज’)
क्रमश:
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