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गोपी गीत
कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण का जो लोग पूजन नहीं करते वे जीवित होते हुए भी मृत तुल्य ही हैं, ऐसे लोगों से बात तक नहीं करनी चाहिए।
गोपियों के प्रेम प्रशंसा भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने श्रीमुख से की है। उद्धव जैसे ज्ञानी भक्तों ने मुक्तकण्ठ से उनके अनुपम प्रेम की सराहना की है। गोपियाँ यदि स्वैरिणी, कुलटा होतीं, तो भगवान उनकी प्रशंसा कैसे करते और क्यों उद्धव जैसे ज्ञानी भक्त उनकी चरण-धूलि की कामना करते? गोपियों की भक्ति सर्वथा अव्यभिचारिणी और अहैतुकी थी। उनका भगवान श्रीकृष्ण के प्रति पवित्र भाव था। तदनुसार ही उनकी रासलीला भी अत्यन्त पवित्र थी। उनका चलना, बोलना, मिलना, नाचना, गाना सभी कुछ पवित्र था, आनन्द और प्रेम से परिपूर्ण था। भगवान की भक्ति की साधना करने पर काम-क्रोधादि दोषों का समूलोन्मूलन तक हो जाता है, तो भगवद्-भक्ति की आदर्शभूत गोपियों में कामादि दोषों की कल्पना करना अपने ही दूषित हृदय का परिचय देना है। उनका रास भगवान के प्रेम का मूर्तरूप था। प्रेममय भगवद्-भक्ति की भागीरथी के पवित्र जल में स्नान किये बिना मनुष्य-जीवन सुख-शान्तिमय नहीं बन सकता।
श्रीमद्भागवत में नवधा भक्ति का निरूपण किया गया है-
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्।
यह नव प्रकार की भक्ति और दसवीं प्रेमलक्षणा भक्ति तथा ग्यारहवीं पराभक्ति है। भक्ति की प्रथम सीढ़ी बाह्योपासना है और दूसरी सीढ़ी आन्तरोपासना है।
पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य और सख्य-ये पाँचों भक्तिमार्ग के बहिरंग साधन हैं और स्मरण, आत्मनिवेदन ये अन्तरंग साधन हैं और श्रवण तथा कीर्तन ये दो बाह्यान्तर मिश्र साधन हैं। इन साधनों से बहिर्मुख वृत्ति को अन्तर्मुख किया जाता है। भक्ति का मुख्य लक्षण यही है कि भक्त की बहिर्मुख वृत्तियाँ लौकिक पदार्थों की ओर से हटकर अन्तर्मुख बन जायँ, जिससे वह मनोवृत्ति अपने भगवान के आराध्यस्वरूप में विलीन हो सके।
इस प्रकार अन्तर्मुख कराई गई मनोवृत्तियाँ संयज के द्वारा अपने कारण में लीन हो जाती हैं। प्रधानरूप से रहनेवाली अहं-वृत्ति को मूल स्वरूप में शमन कर देना ही भक्ति की पराकाष्ठा है। एवंच अहंकार-वृत्ति को अपने मूल कारणरूप भगवान् में विलीन कर देना ही आन्तरोपासना है।
‘सा परानुरक्तिरीश्वरे’
परमेश्वर के प्रति निरतिशय प्रेम का होना ही पराभक्ति है। सांसारिक पदार्थों के प्रति जो प्रेम होता है, उसे ‘राग’ कहते हैं। धनादि विषयों के प्रति जो प्रेम रहता है, उसे ‘आसक्ति’ कहते हैं। किन्तु ‘भक्ति’ तो परमेश्वर के प्रति रहने वाले ‘प्रेम’ को ही कहा जाता है।
आजकल के शिक्षित कहलाने वाले दरिद्रवृत्ति के भाग्यहीन लोग ‘भक्त’ शब्द का दुरुपयोग करते दिखाई देते हैं। यह बेचारा बड़ा भक्त है, अर्थात् यह पुरुषत्व (पौरुष प्रयत्न) से हीन है अथवा पाखण्डी है। इस प्रकार से भक्ति का मजाक उड़ाते पाए जाते हैं। वास्तविक (यथार्थ) भक्त को समझने वाले बहुत थोड़े ही सात्त्विकवृत्ति वाले भाग्यवान् लोग होते हैं। यांत्रिकभक्ति करने वाले लोग ही अधिक संख्या में दृष्टिगोचर होते हैं।
साधन भक्ति के प्रभाव से मनुष्य क्या नहीं कर सकता, अर्थात् सब कुछ कर सकता है। विशुद्ध भक्ति और भगवच्चरणारविन्द में उत्कट प्रेम होने पर मनुष्य में दैवी ऐश्वर्य प्रकट होने लगता है। जो व्यक्ति केवल परमेश्वर को ही अपना सर्वस्व (सर्वेसर्वा) समझता है, वह असम्भव से असम्भव कार्य को सम्भव कर देता है। ध्रुव जैसा छोटा-सा-बालक घने वन में अकेला बैठकर भगवद्भक्ति में तन्मय हो जाता है।
आधारं महदादीनां प्रधानपुरुषेश्वरम्।
ब्रह्म धारयमाणस्य त्रयो लोकाश्चकम्पिरे।
ध्रुव की साधना भक्ति से सम्पूर्ण त्रिलोकी कम्पित हो उठी। यह भगवद्भक्ति का पराक्रम है।
(‘गोपी गीत- करपात्री जी महाराज’)
क्रमश:
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