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गोपी गीत
संसार में सभी लोगों की इचछा दुःख (क्लेश) निवृत्ति की रहती है। आज के यांत्रिकयुग का मानव शारीरिक कष्ट से पीड़ित हो रहा है, अनेकविध चिन्ता, भय आदि मानस क्लेशों से सन्तप्त हो रहा है। कुछ लोग दुःख और क्लेश को अल्प समय तक ही सही भूल जाने के लिये मादक द्रव्यों का सेवन करने लगे हैं। किन्तु नशे की खुमारी उतरते ही बेचारे अधिक दुःखी हो जाते हैं। उनका शरीर जर्जर हो जाता है, मन और बुद्धि शिथिल हो जाती है। कुछ लोग बाद्य, संगीत अथवा यन्त्रादि बाह्य साधनों से दुःख-क्लेश का विस्मरण करना चाहते हैं, किन्तु उससे भी अल्पकाल के लिये ही विस्मरण हो पाता है। जिनका अन्तःकरण निरन्तर सन्तप्त और व्याकुल होता रहता है, उनको तो ये बाह्योपचार एक क्षण भी शान्ति नहीं दे सकते। मादक पदार्थ के सेवन से कुछ देर के लिये दुःख को भुलाया जा सकता है, किन्तु भूत के समान दुःख पुनः सवार हो जाता है। जीवन की समस्त चिन्ताओं से, समस्त क्लेशों से और विपत्तियों से छुटकारा पाने की इच्छा हो तो भक्तिरसायन का ही सेवन करना होगा। इसके समान सस्ती, सुलभ अन्य महौषधि विश्व में नहीं है।
'हरिस्मृति: सर्वविपद्विमोक्षणम'
यह स्मरणभक्ति ही समस्त विपत्तियों (क्लेशों) का समूल नाश कर देगी। जब मन भगवान् के चरणारविन्द में शरणागत होकर तन्मय हो जायगा तब जगत् और उससे होने वाले क्लेशों की प्रतीति नहीं होगी। इस प्रकार अपने आराध्यदेव में मन को विलीन कर देने से देह-गेह की भी सुध नहीं रहेगी। उस अवस्था में पहुँच जाओगे जहाँ सुख-शान्ति और परमानन्द की सतत वर्षा होती रहती है।
प्रेममयी भक्ति का प्रत्यक्ष दर्शन विरह में ही होता है। एक समय की बात है कि भगवान श्रीकृष्ण ने नन्दबाबा और यशोदा मैया तथा अपने सखा-सखियों को अपना कुशल समाचार देने और उनके कुशल समाचार ले जाने के लिये अपने परम सखा उद्धव जी को व्रज में भेजा।
भक्तशिरोमणि उद्धवजी ने व्रज में आकर व्रजवासियों के साथ कई मास बिता दिये। प्रतिदिन-प्रतिक्षण ही सबके साथ श्रीकृष्ण की चर्चा में जीवन के दिन सफल होते रहे। तदनन्तर एक दिन जब मथुरा लौटने के लिये उद्धव जी रथ में बैठे, तब उन्होंने सभी से पूछा-भगवान् कृष्ण से आपका क्या सन्देश कहूँ?
तब ‘नन्दादयोऽनुरागेण प्रावोचन्नश्रुलोचनाः’ नेत्रों से आँसुओं की धारा सतत बह रही है, ऐसी स्थिति में नन्दबाबा आदि लोग आकर कहने लगे- ‘आप भगवान को हमारी ओर से यह कहना-
‘मनसो वृत्तयो नः स्युः कृष्णपादाम्बुजाश्रयाः’
हमारे मन की वृत्तियाँ आपके चरणारविन्द में सर्वदा लगी रहें। और-
‘वाचोऽभिधायिनीर्नाम्नाम्’
हमारी वाणी आपके नामस्मरण में सदा लगी रहे। और-
‘कायस्तत्प्रव्हणादिषु’
हमारी काया (देह) आपको प्रणाम करने में सदा लगी रहे।’ इस प्रकार जीवनभर की भलाई के पथस्वरूप मन, वचन और काया के सुधार की माँग कर चुकने पर उद्धवजी ने पूछा-बस? या और भी कुछ कहना है?’ तब उन्होंने कहा, अभी और कहना बाकी है।
कर्मभिभ्राम्यमाणानां यत्र क्वापीश्वरेच्छया।
मंगलाचरितैर्दानैर्मतिर्नः कृष्ण ईश्वरे।।
ईश्वरेच्छा से कर्मचक्र के द्वारा घुमाए हुए लोग जहाँ कहीं भी हों,वहाँ-वहाँ इस जन्म में हमने जो मंगलमय आचरण किये हों, उनके फलस्वरूप हमारी बुद्धि सर्वदा ईश्वर में बनी रहे। भक्तों को भगवत्प्रेम का उन्माद, वियोग-संयोग दोनों अवस्थाओं में होता रहता है। भगवान श्रीकृष्ण के साथ रहने वाली, श्रीकृष्ण से विहार करने वाली द्वारिका की श्रीकृष्ण-पत्नियों का मन भगवान की लीला में इतना तन्मय हो जाता है कि उन्हें स्मरण ही नहीं रहता कि हम श्रीकृष्ण के समीप हैं। एक ही समय उन्हें कभी दिन को प्रतीत होती है, कभी रात्रि की। वे न जाने क्या-क्या बोल रही हैं- हे पक्षी! तू इस समय इस नीरव नीशीथ में क्यों जग रहा है? इस विलाप का क्या अर्थ है? क्या श्रीकृष्ण को मुस्कान और चितवन ने तुझ पर भी जादू डाल दिया है?
(‘गोपी गीत- करपात्री जी महाराज’)
क्रमश:
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