Wednesday, 2 January 2019

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गोपी गीत

हे चकवी तू आँखे बन्द करके किसे प्रणय का आमन्त्रण दे रही है? क्या तू भी हमारे समान ही श्रीकृष्ण के चरणों पर समर्पित की हुई पुष्पमाला को पहनना चाह रही हो? रे समुद्र! तू क्यों गरज रहा है? दिग्दिगन्त को प्रतिध्वनित कर देनेवाली तुम्हारी गम्भीर ध्वनि का क्या तात्पर्य है? क्या श्रीकृष्ण ने हमारी ही भाँति तुम्हारा भी कुछ छीन लिया है? अरे चन्द्रमा! तेरी क्या दशा हो रही है? आज रजनी को तू अपने करों से रंग उड़ेलकर क्यों नही रँग देता? क्या तू भी श्रीकृष्ण की मीठी-मीठी बातों में आकर अपना सर्वस्व खो चुका है? हे मलयानिल! हमने तो तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया है। फिर भी तुम हमारे अंग-प्रत्यंग का स्पर्श करके हृदय को क्यों गुदगुदा रहे हो? उसे तो यों ही श्रीकृष्ण की तिरछी चितवन ने टूक-टूक कर दिया है। अरे घनश्याम के समान श्यामल मेघ! तू तो उसका सखा है न? उनका ध्यान करते-करते तू भी ऐसा ही हो गया है। ये तेरी बूँदें नहीं, तेरे प्रेम के तेरे आँसू हैं। अब क्यों रोता है? उनसे प्रेम करने का फल भोग ले। अरे पर्वत! तुम्हारे इस गम्भीर, मौन और अचन्चल स्थिरता का यही अर्थ है न, कि तुम हमारी ही भाँति अपने शिखरों पर उनके चरणों का स्पर्श चाह रहे हो? नदियो! क्या तुम वियोगिनी हो? हाँ, तभी तो तुम हमारी ही भाँति कृश हो रही हो। अरे हंस! आओ, आओ, तुम्हारा स्वागत है। इस आसन पर बैठो, दूध पीयो, कहो उनका कुशल-मंगल अच्छे तो हैं? वे क्या कभी हमारा स्मरण करते हैं? हम वहाँ नहीं जायेंगी। क्या वे हमारे पास नहीं आयेंगे? उसी तरह गोपियों का हृदय और उनका प्रेम अनिर्वचनीय है। वे गोपियाँ प्रेममय हैं, श्रीकृष्णमय हैं, अमृतमय हैं। उनका हृदय, उनका प्रेम, उनके भाव का अमृतमय स्त्रोत कभी-कभी स्वयं वाणी के द्वारा बाहर निकल आता है। वे जब बोलना चाहती हैं, तब बोला नहीं जाता, जब मौन रहना चाहती हैं, तब बोल जाती हैं।

उनके दिव्य भाव दर्शनीय हैं- हे सखी जब सायंकाल हो जाता है, गायें व्रज में आने लगती हैं, उनके पीछे-पीछे ग्वाल बालों के साथ बाँसुरी बजाते हुए श्रीकृष्ण और बलराम व्रज में प्रवेश करते हैं, तब उनकी स्नेहभरी चितवन का रस जो लेता है, उसी का जीवन सफल है। उसी की आँखे धन्य हैं। कितना विचित्र वेष रहता है उनका-आम्र-मंजरियाँ, कोमल-कोमल पल्लव, पुष्पों के स्तबक और कमलों की माला! गोप बालकों के बीच में गाते हुए वे एक श्रेष्ठ नट के समान जान पड़ते हैं।

गोपियों! जिस वंशी की ध्वनि सुनकर उपवनों को रोमान्च हो आता है, उनमें कमल खिलने लगते हैं, वृक्षों से आँसू बहने लगते हैं, उनसे मद की धारा बहने लगती है। उस बाँसुरी ने कौनसी तपस्या की है? उलटे वह तो गोपियों को अधिकार छीन लेती है, अर्थात श्रीकृष्ण के अधरों की सुधा पी जाती है। हो न हो, उसका कोई महान् पुण्य अवश्य है। जब श्रीकृष्ण बाँसुरी बजाते हैं, तब उसी के स्वर में ताल मिलाकर मयूर नृत्य करने लगते हैं, वन्य हिंसक जीव भी अपना स्वभाव त्यागकर प्रेम में मुग्ध हो जाते हैं। उनके चरण-चिह्नों से चर्चित वृन्दावनधाम सम्पूर्ण भूमण्डल के यश का विस्तार कर रहा है। जब श्रीकृष्ण बाँसुरी बजाते हैं, तब हिरनियाँ अपने पतियों के साथ प्रेमभरी चितवन से उनके विचित्र वेष को देखकर सम्मान करती हैं। वे पशु होने पर भी धन्य हैं। उनका मधुमय संगीत और उनके मधुर मनोहर रूप लावण्य का अवलोकन कर दिव्य देवांगनाएँ अपनी सुध-बुध खो बैठती हैं, मूर्च्छित हो जाती हैं। गौएँ अपने कानों को खड़ा करके उस पीयूष रस का पान करती हैं। बछड़े अपने मुँह में लिये दुए दूध को न उगल पाते हैं और न निगल ही सकते हैं, उनके हृदय में होते हैं- श्रीकृष्ण और आँखों में आँसू। वन के पक्षी लतावेष्टित तरुओं की रुचिर शाखाओं पर बैठे-बैठे आँखें बन्द करके मूक होकर श्रीकृष्ण की बाँसुरी सुना करते हैं। नदियाँ कमलों के उपहार के साथ उनके चरणों का स्पर्श करती हैं। मेघ बिन्दुओं से पुष्पवर्षा करता हुआ उनका छत्र बन जाता है। गोवर्धन आन्दोद्रेक से फूलकर उनकी सेवा करता है। चर अचर हो जाते हैं और अचर चर हो जाते हैं। धन्य है श्रीकृष्ण की लीला! चलो, हम भी देखें।

गोपीजनवल्लभ वृन्दावनविहारी भगवान श्रीकृष्ण को दिव्य-मधुर-रसमयी लीलाओं का रहस्य अवगत करने का सौभाग्य विरले ही लोगों को होता है। जिस प्रकार भगवान चिन्मय हैं, उसी प्रकार उनकी लीला भी चिन्मयी होती है। सच्चिदानन्द रसमय साम्राज्य के परम उन्नत स्तर में यह लीला हुआ करती है। कभी-कभी तो ब्रह्मसाक्षात्कारसम्पन्न महात्मा लोग भी इस लीलारस सुधासिंधु की बूँद का आचमन तक नहीं कर पाते। भगवान श्रीकृष्ण की इस परमोज्जवल दिव्य लीला का यथार्थ प्रकाश तो भगवान की स्वरूपभूता ह्लादिनी शक्ति श्रीराधारानी वृषभानुनन्दिनी ही और तदंगभूता प्रेममयी गोपियों के ही हृदय में होता है और वे ही उन्मुक्त बन्धन होकर भगवान की इस परम अन्तरंग रसमयी लीला का आस्वादन करती हैं। क्योंकि ये ही श्रीकृष्णगतप्राणा श्रीकृष्णरसभावितमति हो चुकी थीं। गोपियों का तन, मन, धन सभी कुछ प्राणप्रियतम श्रीकृष्ण के चरणारविन्द में समर्पित हो चुका था। वे संसार में जी रही थीं-एकमात्र श्रीकृष्ण के लिये। घर में रहती थीं-श्रीकृष्ण के लिये। घर के सारे काम-काज करती थीं-श्रीकृष्ण के लिये। उनकी निर्मल और योगीन्द्रदुर्लभ पवित्र बुद्धि में श्रीकृष्ण के सिवा अपना कुछ था ही नहीं।
(‘गोपी गीत-करपात्री जी महाराज’)

क्रमश:

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