Wednesday, 2 January 2019

8

8-
गोपी गीत

श्रीकृष्ण के लिये ही, श्रीकृष्ण को सुख पहुँचाने के लिये ही, श्रीकृष्ण की निज सामग्री से ही श्रीकृष्ण को पूजकर, श्रीकृष्ण को सुखी देखकर वे अपने को सुखी समझती थीं। प्रातःकाल निद्रा टूटने के समय से लेकर रात्रि में सोने तक वे जो कुछ भी करती थीं। वह सब अपने आराध्य प्रियतम श्रीकृष्ण के लिये ही करती थीं। यहाँ तक कि उनकी निद्रा भी श्रीकृष्णमय होती थी। स्वप्न और सुषुप्ति दोनों में ही वे श्रीकृष्ण की शान्त व मधुरलीला देखती और अनुभव करती थीं। रात को दही जमाते समय श्यामसुन्दर की मधुर छबि का ही ध्यान करती हुई प्रेममयी प्रत्येक गोपी यह अभिलाषा करती थी कि मेरा दही सुन्दर जमे, श्रीकृष्ण के लिये। उसे बिलोकर मैं बढ़िया-सा और बहुत-सा माखन निकालूँ और उसे उतने ही ऊँचे छीके पर रखूँ जितने पर श्रीकृष्ण का हाथ आसानी से पहुँच सकें, फिर मेरे प्राणधन श्रीकृष्ण अपने सखाओं को साथ में लेकर हँसते और क्रीड़ा करते हुए घर में पदार्पण करें, माखन लें और लुटावें और आनन्दमग्न होकर मेरे आँगन में नाचें और मैं किसी कोने में छिपकर उनकी लीला को अपनी आँखों से देखकर जीवन को सफल कर सकूँ और अचानक ही उन्हें पकड़कर हृदय से लगा लूँ।

गोपियों का तो सर्वस्व श्रीकृष्ण भगवान का था ही, सम्पूर्ण जगत् ही उनका है। वे भला किसकी चोरी करें। चोर तो वास्तव में वे लोग हैं, जो भगवान की वस्तु को अपनी मानकर ममता-आसक्ति में फँसे रहते हैं और दण्ड के पात्र होते हैं। वास्तव में गोपियों ने प्रेमाधिक्य के कारण उन्हें प्रेम का नाम ‘चोर’ कहकर पुकारा है। क्यों वे उनके चित्तचोर तो थे ही।

गोपियाँ क्या चाहती थीं, यह बात उनकी साधना से ही स्पष्ट हो जाती है। वे चाहती थीं-श्रीकृष्ण के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण, श्रीकृष्ण के साथ इस प्रकार घुल-मिल जाना कि उनका रोम-रोम, मन, प्राण, सम्पूर्ण आत्मा श्रीकृष्णमय हो जाय। शरतकाल में उन्होंने श्रीकृष्ण की वंशी-ध्वनि की चर्चा आपस में की थी। हेमन्त के पूर्व ही अर्थात् भगवान के विभूतिस्वरूप मार्गशीर्ष के मास में उन्होंने अपनी साधना आरंभ कर दी थी। विलम्ब को वे सहन नहीं कर पा रही थीं। शीतकाल में वे प्रातःकाल ही यमुना-स्नान के लिये जातीं, उन्हें अपने शरीर की भी परवाह नहीं थी। बहुत-सी कुमारी गोपबालाएँ एक साथ हो जातीं। उनमें ईर्ष्या-द्वेष नहीं था। वे ऊँचे स्वर से श्रीकृष्ण का नाम-संकीर्तन करती हुई जातीं, उन्हें गाँव और जातिबान्धवों से संकोच नहीं होता था। वे घर में ही हविष्यान्न का ही भोजन करतीं, वे श्रीकृष्ण के लिये इतनी व्याकुल हो गई थीं कि उन्हें माता-पिता तक का संकोच नहीं होता था। वे भगवती देवी की वालुकामय मूर्ति को विधिवत् बनाकर उसकी पूजा और मन्त्रजप करती थीं। अपने इस कार्य को सर्वथा उचित और प्रशस्त मानती थीं। उन्होंने अपना कुल, परिवार, धर्म, संकोच और व्यक्तित्व सब कुछ भगवान के चरणारविन्द में सर्वथा अर्पण कर दिया था। वे यही जपती रहती थीं कि एकमात्र नन्द-नन्दन श्रीकृष्ण ही हमारे प्राणों के स्वामी हों। श्रीकृष्ण तो वस्तुतः उनके स्वामी थे ही।

वैधी भक्ति का पर्यवसान रागात्मिका भक्ति में है और रागात्मिका भक्ति पूर्ण समर्पण के रूप में परिणत हो जाती है। उसी को चीरहरण की लीला के द्वारा बताया गया है। श्रीकृष्ण चराचर प्रकृति के एकमात्र अधीश्वर हैं। समस्त क्रियाओं के कर्ता, भोक्ता और साक्षी भी वे ही हैं। ऐसा एक भी व्यक्त या अव्यक्त पदार्थ नहीं है जो उनके सामने न हो। वे भगवान् ही सर्वव्यापक, अन्तर्यामी हैं। सम्पूर्ण विश्व के वे ही ‘आत्मा’ हैं। उन्हें स्वामी, गुरु, पिता, माता, सखा, पति आदि के रूप में मानकर लोग उन्हीं की उपासना करते हैं।

श्रीमद्भागवत दशमस्कन्ध का श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पाठ करते रहने पर यह रहस्यमय तथ्य समझ में आता है। गोपियाँ श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप को जानतीं थीं, पहचानती थीं। वेणु-गीत, गोपी-गीत, युगलगीत और श्रीकृष्ण के अन्तर्धान हो जाने पर गोपियों के अन्वेषण में इस बात को कोई भी पवित्र भाव का व्यक्ति समझ सकता है।

श्रीमद्भागवत में रासलीला के पाँच अध्याय उसके पाँच प्राण माने जाते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण की परम अन्तरंगलीला, निजस्वरूपभूता गोपिकाओं और ह्लादिनी शक्तिस्वरूपा श्री राधारानी के साथ होने वाली भगवान् की दिव्यातिदिव्य क्रीड़ा इन अध्यायों में कही गई है। ‘रास’ शब्द का मूल ‘रस’ है और ‘रस’ स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ही है-‘रसो वै सः’ कहा गया है। जिस दिव्य-क्रीड़ा में एक ही ‘रस’ अनेक रसों के रूप में होकर अनन्त-अनन्त रस का आस्वादन करे, एक रस ही रससमूह के रूप में प्रकट होकर स्वयं ही आस्वाद्य-आस्वादक, लीला, धाम और विभिन्न आलम्बन एवं उद्दीपन के रूप में क्रीड़ा करे- उसका नाम ‘रास’ है। इस रासपञ्चाध्यायी के अन्तर्गत इकतीसवाँ अध्याय ‘गोपी-गीत’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह भागवतसार सर्वस्वरूप ही है। गोपियाँ अपने प्रिय श्रीकृष्ण को खोजती हुई उन्हें बुला रही हैं, गोपबालाएँ सोचती हैं कि हम लोग आनन्द-कन्द-परमानन्द-व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण की वेणुध्वनि से मंत्रमुग्ध हुई-सी उनके समीप खिंची चली आई, वैसे ही वे भी हमारे इस गीत से आकृष्ट होकर हमें दर्शन देने आएँगे, अतएव उन्होंने अपना ‘गीत’ आरम्भ किया। इस गोपी-गीत में सुबोधिनीकार के कथनानुसार उन्नीस प्रकार की गोपियाँ हैं। उन्होंने अपने-अपने अधिकारानुसार 19 प्रकार की स्तुति की है। उसके परिणामस्वरूप भगवान् प्रसन्न होकर गोपियों के समक्ष प्रकट हो गए।
(‘गोपी गीत-करपात्री जी महाराज’)

क्रमश:

No comments:

Post a Comment

158 last

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी  158- फूटि-फूटि निकसत लोन राम राय को। कैलास फड़क उठे, बोले- "मित्र, तुम महात्मा तो हो ही पर खरे, कवि पहले ह...