Wednesday, 2 January 2019

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गोपी गीत

श्रीमद्भागवत के रहस्यवेत्ता श्रीधरस्वामी की अद्वैतमतपरक प्रामाणिक व्याख्या सर्वत्र प्रसिद्ध और आदरणीय है। कतिपय सम्प्रदायाचार्यों का अन्यान्य विषयों में उनसे मतैक्य न रहने पर भी ‘भक्ति’ के विषय में सभी आचार्यों का उनसे मतैक्य है, भक्तिरस के विषय में सभी आचार्य श्री श्रीधरस्वामी को उत्कृष्ण आदरदृष्टि से देखकर उनका सम्मान करते हैं।

भक्ति और ज्ञान दोनों ही अन्तरंग भाव हैं, अतएव वे अन्तरंग में रहनेवाले परमेश्वर का साक्षात् स्पर्श करते हैं। इन्द्रियों के द्वारा होने वाले कर्म ‘ज्ञान’ अथवा ‘भक्ति’ के सहायक होकर ही भगवत्प्राप्ति के साधन होते हैं। कर्म प्रायः तीन प्रकार के होते हैं-निष्काम, सकाम और निरर्थक। निरर्थक कर्मों का उपयोग कहीं भी नहीं होता। सकाम कर्म दो प्रकार के होते हैं-शास्त्रानुकूल और शास्त्रप्रतिकूल। शास्त्रप्रतिकूल कर्म इस लोक में कुछ दिनों तक के लिये सफल हो सकते हैं, परन्तु भविष्य में परिणाम अच्छा नहीं है। शास्त्रानुकूल सकाम कर्मों से इस लोक और परलोक में सुख की प्राप्ति तो होती है, किन्तु भगवत्प्राप्ति नहीं हो पाती। भगवत्प्राप्ति तो निष्कामकर्म से ही होती है, जो सर्वदा सात्त्विक और शास्त्रानुकूल ही होते हैं। श्रीमद्भागवत में भगवान के लिये किये जाने वाले कर्मों को ही निष्काम कर्म माना गया है। भगवदर्थ रहित कर्म किसी काम के नहीं। श्रीमद्भागवत में तो भगवदर्थ कर्मों को ‘कर्म’ ही नहीं माना है, उन्हें निर्गुण कहा है। वे तो ‘भक्ति’ के ही अन्तर्गत होने से स्वयं भक्तिस्वरूप ही हैं। भगवत्प्राप्ति के लिये अनेक साधन बताये हैं, उन सब साधनों में से सर्व-साधारण के लिये और अधिकारभेद से रहित तथा सर्वकालोपयोगी भगवन्नाम के जप (स्मरण) का आश्रय करना ही सुसाध्य है। इससे भी भगवत्प्रसाद, भगवत्प्रेम और साक्षात्कार प्राप्त हो सकता है।

कतिपय गीत भी भागवत में उपलब्ध होते हैं। जब मन अपनी व्यथा, अन्तर्वेदना और अनुभूति को अपने भीतर संवरण नहीं कर पाता, धैर्य का बाँध टूट जाता है, तब अपने-आप ही-किसी को सुनाने के लिये नहीं-जो उद्गार निकलते हैं, उन्हें ‘गीत’ नाम से कहा जाता है। वे गीत संसार की कटुता के अनुभव से, ज्ञान से, विरह से, प्रेम से, प्रेम करने की इच्छा से, विरह की संभावना से अथवा अन्य कारणों में भी हृदय के द्वारा उमड़ पड़ते हैं-एकान्त में भी, लोगों के सामने भी, किसी की अपेक्षा न करके भी और किसी को सम्बोधित करके भी, परन्तु ऐसे प्रसंग बहुत अल्प हैं और जितने है, उनमें अधिकांश गोपियों के ही हैं। गोपियाँ तो प्रेम, विरह की मूर्तिमान स्वरूप ही हैं। इन गोपियों के गीतों को पढ़कर एक बात पत्थर का हृदय भी पिघल सकता है। ये गोपियाँ जिसके विरह से व्याकुल होकर तड़प रही हैं, वह श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण है।

श्रीकृष्ण का एक-एक अंग, पूर्ण श्रीकृष्ण है। श्रीकृष्ण का मुखमण्डल जैसे पूर्ण श्रीकृष्ण है, वैसे ही श्रीकृष्ण का पदनख भी पूर्ण श्रीकृष्ण है। श्रीकृष्ण की सभी इन्द्रियों से सभी कार्य हो सकते हैं। उनके कान देख सकते हैं, उनकी आँखें सुन सकती हैं, उनकी नाक स्पर्श कर सकती है, उनकी रसना सूँघ सकती है। उनकी त्वचा स्वाद ले सकती है। वे हाथों से देख सकते हैं, आँखों से चल सकते हैं। श्रीकृष्ण का सभी कुछ श्रीकृष्ण होने के कारण वह सर्वथा पूर्णतम है। इसी कारण उनकी रूपमाधुरी नित्यवर्धनशील, नित्य नवीन सौन्दर्यमयी है। अतः उनकी रासलीला को काम-क्रीड़ा कहना जघन्य पाप है। वह उनकी सांकल्पिक दिव्यलीला है। जैसे सृष्टि के आरंभ में ‘स ऐक्षत एकोऽहं बहुस्याम्’- भगवान के ईक्षणमात्र से जगत् की उत्पत्ति होती है, वैसे ही रास के प्रारंभ में भगवान के प्रेममय वीक्षण से शरत्काल की दिव्य रात्रियों की सृष्टि होती है। चाँदनी, विविधपुष्पसमृद्धि, शीतल-मन्द-सुरभित पवन आदि समस्त उद्दीपन-सामग्री भगवान के द्वारा वीक्षित है, लौकिक नहीं। गोपियों ने अपने मन को भगवान श्रीकृष्ण के मन में मिला दिया था, उनके पास स्वयं मन न था। तब श्रीकृष्ण ने विहार के लिये नवीन दिव्य मन की सृष्टि की। योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की यही योगमाया है, जो रासलीला के लिये दिव्य स्थल, दिव्य सामग्री एवं दिव्य मन का निर्माण किया करती है। और उस पर भी श्रीकृष्ण की मोहक बाँसुरी बजती है।

भगवान कृष्ण की बाँसुरी जड़ को चतन और चेतन को जड़, चल को अचल और अचल को चल, विक्षिप्त को समाधिस्थ और समाधिस्थ को विक्षिप्त बनाती ही रहती है। गोपियाँ तो वैराग्य की प्रतिमूर्तियाँ थीं, उन्हें सांसारिक किसी पदार्थ की कामना नहीं थी। वे तो भगवान के चरणों पर सर्वथा समर्पित हो चुकी थीं। भगवान की बाँसुरी सुनकर वे ऐसी चल दीं, जैसे हिमालय से निकलकर समुद्र में गिरनेवाली ब्रह्मपुत्र नदी की धारा चल देती है। उसे कोई रोक नहीं सकता। गोपियों के आने पर उनके हृदय को और अधिक निर्मल बनाने की दृष्टि से अथवा विप्रलम्ब के द्वारा उनके भाव को और अधिक पुष्ट करने के लिये, अथवा साधारण प्राकृत लोगों के उपदेशार्थ, अथवा गोपियों के अधिकार-प्रकाशनार्थ भगवान श्रीकृष्ण गोपियों से कुछ समय तक वार्तालाप करते रहे। गोपियाँ श्रीकृष्ण को अन्तर्यामी, योगेश्वर, परब्रह्म के रूप में जानती थीं। सच्चिदानन्दघन, सर्वान्तर्यामी, प्रेमरसस्वरूप, लीलारसमय परमात्मा भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लाह्दिनीशक्तिरूपा आनन्द चिन्मय रस प्रतिभाविता अपनी ही प्रतिमूर्ति से उत्पन्न अपनी प्रतिबिम्बस्वरूपा गोपियों से जो आत्मक्रीड़ा की है, इस दिव्यक्रीड़ा का ही नाम ‘रास’ है। इसमें न कोई जड़ शरीर था और न प्राकृत अंग-संग था। यह था चिदानन्दमय भगवान का दिव्य विहार, जो दिव्य लीलाधाम में सर्वदा होता है।

वियोग ही संयोग का पोषक होता है। अभिमान और मद ही भगवान की लीला में बाधक बनता है। तथापि भगवान को दिव्य लीला में दिव्य मान और दिव्य मद भी इसलिये हुआ करते हैं कि उनसे लीला में रस की और अधिक पुष्टि हो। भगवान की इच्छा से ही गोपियों में लीलानुरूप मान और मद का संचार होते ही भगवान श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गए। हृदय में लेशमात्र भी मान और मद के रहते हुए वह व्यक्ति भगवान के सम्मुख रहने का अधिकारी नहीं है।
(‘गोपी गीत- करपात्री जी महाराज’)

क्रमश:

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