Wednesday, 2 January 2019

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गोपी गीत

भक्त भगवान के समीप रहने पर भी वह उनका दर्शन नहीं कर पाता। भक्त के उत्कट प्रेमभाव को देखकर वे उनके मान और मद को दूर कर देने के लिये अनुग्रह कर ही देते हैं। विरहजनित तड़पन में गोपियाँ मद और मान से रहित होकर विशुद्ध प्रेम में डूब गईं। गोपियाँ रातभर उस महान् वन में भगवान् श्रीकृष्ण को ढूँढ़ती फिरीं और सब प्रयत्न करके थक गईं, फिर भी उनका कहीं पता न लगा, तो घबड़ाकर उनके प्रेम में फूट-फूटकर रोने लगीं।उनका समस्त अंहकार मान नष्ट हो गया।इस समय वे पूर्णरूप से कृष्णमयीं थीं।उन गोपियों को प्रेम से रोती देखकर भगवान् से न रहा गया और अन्धकार में छिपे हुए भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत मुस्कराते हुए प्रसन्नवदन से उनके सम्मुख आकर खड़े हो गए। ये परमभागवत गोपियाँ ही थीं, उनसे जगत् के किसी प्राणी की तिलमात्र भी तुलना नहीं की जा सकती। गोपियों के शरीर मन प्राण सभी कुछ श्रीकृष्णमय हो गये थे।

उनके प्रेमोन्माद का यह गीत ‘गोपी-गीत’ नाम से प्रसिद्ध है। यह गीत गोपांगनाओं के प्राणों का प्रत्यक्ष प्रतीक है। आज भी यह भगवद्-भक्तों को भावमग्न करके श्रीकृष्ण के लीलालोक में पहुँचा देता है। सरसहृदय से पाठ करने मात्र से ही गोपियों की महत्ता तथा उनके उच्चस्तरीय अधिकार, उनकी भक्तिप्रवणता का ज्ञान पवित्र अन्तःकरणवाले व्यक्तियों को हो जाता है।

गोपियों के अलौकिक प्रेमोन्माद को देखकर श्रीकृष्ण भी अन्तर्हित न रह सके। उनके सामने ‘साक्षात् मन्मथमन्मथ’ के रूप से प्रकट हुए और उन्होंने मुक्तकण्ठ से स्वीकार किया कि गोपियां! मैं तुम्हारे प्रेममय भाव का चिरऋणी हूँ। यदि मैं अनन्तकाल तक भी तुम्हारी सेवा करता रहूँ, तो भी तुमसे उऋण नहीं हो सकता। मेरे अन्तर्धान होने का प्रयोजन तुम्हारे चित्त को दुखाना नहीं था, प्रत्युत तुम्हारे प्रेम को और अधिक उज्ज्वल एवं समृद्ध करना था।

श्रीमद्भागवत महापुराण’ के दशम स्कन्ध का इकतीसवाँ अध्याय ‘गोपी-गीत’ नाम से प्रसिद्ध है। यह अत्यन्त भावपूर्ण गीत है; जितना ही अधिकाधिक इसके पठन-पाठन, श्रवण-मनन एवं अर्थानुसन्धान में प्रवृत्त हुआ जाय उतना ही इसके लोकोत्तर दिव्य रस की अधिकाधिक उपलब्धि होती है।गोपाङ्‌गना-जनों के गीत का अर्थ एकमात्र भगवान श्रीकृष्ण परमात्मा ही जान सकते हैं। ‘कृष्णैकगम्यो वागर्थः’ गोपाङ्‌गनाओं का यह वागर्थ एकमात्र भगवान श्रीकृष्ण द्वारा ही गम्य है। जिन रहस्यात्मक वाक्यों का अर्थ केवल अपने रहस्यज्ञ को ही जताना अभीष्ट हो उसको इतर जन भी जानने का प्रयास करें यह सर्वथा अनुचित है एतावता गोपाङ्‌गनाओं के वागर्थ का वर्णन करना भी एक प्रकार से उनके प्रति अपराध ही है। हमारे इस अपराध को जानते हुए भी वे देवियाँ, व्रजसीमन्तिनी-जन हम पर अनुग्रह करें। श्री गोपाङ्‌गना-जनों के अनुग्रह से श्री श्रीधर स्वामी ने इस गीत का अभिप्राय समझा।

गोपांगना जनों ने इस अभिलाषा से कि जैसे हम लोग आनन्दकन्द, परमानन्द, व्रजचन्द्र, श्रीकृष्ण के वेणु-निनाद से मंत्र-मुग्ध हो उनके सन्निधान में व्रज तक खींची चली आयी हैं वैसे ही भगवान श्रीकृष्णचन्द्र भी हमारे इस गीत से आकृष्ट होकर हमको दर्शन देंगे, अपना गीत प्रारम्भ किया।गोपी-गीत’ के अन्त में 32वें अध्याय के प्रारम्भ में स्पष्टतः ही कहा गया है-

तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमानमुखाम्बुजः।
पीताम्बरधरः स्त्रग्वी साक्षान्मन्मथमन्मथः॥

अर्थात आनन्दकन्द, परमानन्द, व्रजचन्द्र, साक्षात्-मन्मथमन्मथ, श्रीकृष्णचन्द्र उन व्रज-वनिताओं का दुःख अपहरण करते हुए उनके मध्य में आविर्भूत हुए। अस्तु, आचार्यगण कहते हैं कि जैसे इस गीत के माहात्म्य से गोपाङ्‌गना-जनों के लिए भगवत्-दर्शन सुलभ हो गया वैसे ही जो भी इस गीत का श्रद्धा-भक्ति-समन्वित-श्रवण मनन करेंगे अथवा विवेचन में प्रवृत्त होंगे उनके लिए भी नन्दनन्दन, श्री नवलकिशोर श्रीकृष्णचन्द्र के दर्शन सुलभ हो जाएँगे।

व्रजधाम का विस्तार बहुत अधिक है। व्रज साहित्य के अनुसार ‘मध्ये गोवर्धनं यत्र’ गोवर्धन पर्वत के चतुर्दिक् प्रसारित भूमि-खण्ड ही श्रीमद् वृन्दावनधाम है जो व्रजधाम से उदव्याप्त है। व्रजधाम की स्तुति से ही गोपाङ्‌गनाएँ अपने गीता का प्रारम्भ करती हैं। श्री नन्दनन्दन, व्रजकिशोर के प्रेम में विभोर भावुकों का सर्वस्व श्री व्रजतत्त्व महामहिम, अलौकिक एवं अपार वैभवशाली तथा प्रकृति-प्राकृत-प्रपंचातीत है। भक्तजन भगवत्-प्राप्ति की आकांक्षा से इस भगवत-धाम की प्रदक्षिणा करते हैं। गोपाङ्‌गनाएँ भी स्तवन द्वारा ही व्रजधाम की वाणीमय परिक्रमा करती हैं।
(‘गोपी गीत-करपात्री जी महाराज’)

क्रमश:

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