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गोपी गीत
एक वृक्ष पर शोभन पंखयुक्त दो पक्षी, हंस निवास करते हैं। इन दोनों में साजात्य एवं सख्य सम्बन्ध भी है। तात्पर्य कि इस शरीररूपी एक ही वृक्ष पर जीवात्मा एवं परमात्मारूपी दो हंस निवास कर रहे हैं। दोनों में परस्पर सख्य एवं साजात्य तथा तादात्म्यभाव है-परमात्मा सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् पालक सखा और जीवात्मा अल्पज्ञ, अल्पशक्तिमान पोषित सखा है। दोनों ही सर्वदा संग रहते हैं तथापि परमात्मा-सखा पुष्कर-पत्र-इव सदा असंग ही रहता है। ‘असंगोनहि सज्यते’परमात्मा असंग है, पुष्कर-पत्रवत निर्लेप है।
शंकराचार्य कहते हैं, ‘उदासीनः स्तब्धः सत तमगुणः संगरहितः। भवांस्तातः कातः परमिहभवेज्जीवनगतिः।।’
अर्थात, हे प्रभो! आप अनन्त ब्रह्मण्ड नायक हैं। आप ही हमारे पिता हैं तथापि आप सर्वदा निःसंग, उदासीन, स्तब्ध, निर्गुण, निर्विकार हैं। हे तात! इस स्थिति में पुत्रों की गति अवश्य ही अत्यन्त शोचनीय होगी। हे तात! आप हममें प्रेम न करें तथापि हमारे हृदय में जो आपका निवास-स्थान है सदा ही विराजमान रहे। आपके विराजमान रहने से भी हमारा परम कलयाण हो जायगा। जिस हृदय में सर्वेश्वर, सर्वाधिष्ठान, स्वप्रकाश, परमात्मा प्रकट हो जाते हैं उसके सम्पूर्ण दुःख-दारिद्रî का स्वभावतः ही समूल उन्मूलन हो जाता है।
गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं- “मम हृदय भवन प्रभु तोरा। तहँ बसे आई बहु चोरा।”
अर्थात, हे प्रभु! हमारा हृदय यद्यपि वस्तुतः आपका ही निवास-स्थान है तथापि वहाँ बहुत से चोर घुस आए हैं।
“नहिं माने विनय निहोरा, नाथ करहिं बरजोरा।
कहैं तुलसीदास सुनु रामा, लूटहिं तस्कर तव धामा।”
हे नाथ! तस्कर हमारे अनुनय-विनय का नहीं सुनते, हे राम वे तुम्हारे ही भवन को लूटे ले रहे हैं।
हे नाथ हम तो दुःखी हैं ही; हमें एक चिन्ता सर्वाधिक सता रही है; हमारी एकमात्र चिन्ता है कि कहीं तुम्हारा अपयश न हो। जीवात्मा के प्रति परमात्मा की असंगता का तात्पर्य यह है कि अनात्मा किंवा जड़ जगत् किंवा प्रकृति और प्राकृत-प्रपन्च एवं प्रकृति-प्राकृत-विकार से परमात्मा असंश्लिष्ट है। वस्तुतः जीवात्मा और परमात्मा का असाधारण सम्बन्ध है। अद्वैतवाद के अनुसार ‘युज्यतेऽने नेतियुक् सम्बन्धः सामानः अविशेषः युक् तादात्म्यलक्षणसम्बन्धो ययोस्तौ।’ जीवात्मा एवं परमात्मा दोनों का तादात्म्य संबंध है। जैसे समुद्र एवं तरंग का अथवा कटक-मकुट या कुण्डल एवं सुवर्ण का अथवा महाकाश एवं घटाकाश का तादात्म्य सम्बन्ध है, वैसे ही परमात्मा एवं जीवात्मा का भी तादात्म्य, अविच्छेद्य, अभेद सम्बन्ध है। तुलसीदास कहते हैं, ‘कहियत भिन्न न भिन्न’ अथवा ‘सो तैं तोहि ताहि नहि भेदा। वारि बीचि जिमि मावहिं वेदा।’
शंकराचार्य कहते हैं-
“सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाऽहं न मामकीनस्त्वम।
सामुद्रो हि तरंगः क्वचन समुद्रो न तारंगः।।”
अर्थात हे नाथ, यथार्थतः आपके और हममें कोई भेद है ही नहीं तथापि समुद्र की तरंग की तरह हम भी आपके हैं। परमात्मा एवं जीवात्मा के इस तादात्म्य एवं अभिन्न सम्बन्ध के रहते हुए भी उनमें प्राधान्याप्राधान्य भाव-विवक्षा है। जैसे समुद्र एवं तरंग में तादात्म्य सम्बन्ध होते हुए समुद्र प्रधान है और तरंग गौण है ‘क्वचन समुद्रो न तारंगः।’ जैसे समुद्र की ही तरंग होती है, तरंग का समुद्र कदापि नहीं होता, वैसे ही परमात्मा प्रधान और जीवात्मा गौण है। गौण होते हुए भी जीवात्मा स्वभावतः ही परमात्मा का तरंगवत् अभेद्य, अभिन्न अंश है तथापि जन्मजन्मान्तर के संस्कारवशात प्राणी अपने को कर्ता एवं भोक्ता मानने लगता है, फलतः वह अपने आनन्दमय शुद्ध स्वरूप से विमुख हो अनेकानेक कर्मफलों से बाधित हो जाता है। इस विपरीत दिशा में प्रवाहित भाव-धारा को पुनः मूलोन्मुखी बना लेना ही भगवत्-प्रपत्ति, भगवत्-शरणागति है। प्रपत्ति अर्थात पूर्णतः प्रतिष्ठा-प्राप्ति। जीवात्मा के देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार से युक्त स्वत्व को निर्विकार, विशुद्ध, सर्वाधिष्ठान, स्वप्रकाश, परमात्मा में पूर्णतः प्रस्थापित कर देना, समर्पित कर देना ही भगवत्-प्रपन्नता है।
(‘गोपी गीत- करपात्री जी महाराज’)
क्रमश:
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