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गोपी गीत
भगवान श्रीकृष्णचन्द्र का जन्म मथुरा में हुआ था तथापि उनका लालन-पालन व्रज में, व्रजेन्द्र नन्दराय एवं यशोदारानी के मंगलमय अंक में हुआ अतः व्रजधाम का ही उत्कर्ष विशेष बढ़ा। भगवान श्रीकृष्ण के मथुरास्थ आविर्भाव के कारण भी व्रजधाम का ही उत्कर्ष बढ़ा। ‘व्रजो जयति सदैव किन्तु तव जन्मना अधिकं जयति’ स्वभावतः सर्वातिशयी उत्कर्ष को प्रापत व्रजधाम भी भगवान श्रीकृष्ण के आविर्भाव के कारण विशेष उत्कर्ष को प्राप्त हो रहा है। ‘श्रयते इन्दिरा शश्वदत्र हि’ पद का एक अन्वय ‘यया इन्दिरा अति श्रयते’ भी हो कसता है और ‘जयति ते अधिकं जन्मना व्रजः’ पंक्ति में प्रयुक्त ‘अधिक’ शब्द संयुक्त कर ‘अन्न शश्वद् अधिकं श्रयते’ भी सम्भव है। अनन्त ब्रह्मामाण्ड की ऐश्वर्याधिष्ठात्री वैकुण्ठेश्वरी भगवती इन्दिरा व्रजधाम में अधिकाधिक रह रही हैं। वैकुण्ठनाथ भगवान श्रीमन्नारायण विष्णु व्रजधाम में श्रीकृष्णस्वरूप में अवतरित हुए हैं अतः परिपरायण, सती साध्वी, वैकुण्ठेश्वरी भगवती इन्दिरा भी अपने पति का अनुसरण करती हुई व्रजधाम में ही निरन्तर अधिकाधिक आश्रयण करती हैं एतावता व्रजधाम का ऐश्वर्य प्रतिक्षण सवंर्द्धमान है। गोधन, सर्वातिशायी उत्कृष्ट धन हैं; ‘गोमये वसते लक्ष्मीः’ मान्य है कि गोबर में लक्ष्मी का वास है। गोबर ही खाद बनता है; उत्तम खाद से उत्तम खेती होती है; अन्न-धन से ही देश समृद्ध होता है। भागवत-वाक्य है, ‘तत आरभ्य नन्दस् व्रजः सर्वसमृद्धिमान’ भगवान श्रीकृष्ण के प्रादुभार्व काल से ही व्रजधाम की समृद्धि अनन्त प्रकार के धन धान्य एवं विविध प्रकार के ऐश्वर्य ‘अनपेक्षमाणापि’ व्रजवासियों द्वारा अनपेक्षित होते हुए भी स्वभावतः सततन संवर्द्धमान होते रहें।
भगवती लक्ष्मी स्वभावतः ही उदासीन का वरण करती हैं। समुद्र-मन्थन के प्रसंग से महालक्ष्मी का आविर्भाव हुआ। लक्ष्मी को प्राप्त करने के लिये सभी उत्सुक हो उठे। अन्ततोगत्वा यह निश्यय किया गया कि लक्ष्मी स्वयं ही जिसका वरण कर ले वही उनको प्राप्त कर सकता है। अपने सुकोमल हस्तारविन्दों में अरविन्दमाला लिये हुए भगवती लक्ष्मी उपस्थित देव-समुदाय पर दृष्टि घुमाती हुई विचार करने लगीं कोई ऐश्वर्यादि युक्त होते हुए भी कामादि दोषाक्रान्त है; कोई अचिन्त्य, अनन्त कल्याण गुण गण संयुक्त तथा सर्वनिरेक्ष स्वयं शिव होते हुए भी अमंगल वेषधारी है, कोई परम सुमंगल होते हुए भी अत्यन्त निरपेक्ष है, ‘सुमंगलः कश्चन काङ्क्षते हि माम्’ वह मेरी आकांक्षा ही नहीं करता। श्रीमन्नाराण ही पूर्णतम, पुरुषोत्तम, आप्तकाम, पूर्णकाम, परम निष्काम, सर्वगुण सम्पन्न, सर्व ऐश्वर्य सम्पन्न, परम सुमंगल हैं तथापि सर्व निरपेश भी हैं।
भगवती महालक्ष्मी ने अपनी वरमाला उन्हीं के गले में डाल दी। भगवान श्रीमन्नारायण ने भी उनको अत्यन्त स्नेह व सम्मान के साथ अपने वक्षःस्थल में निःसपत्न स्थान दिया। भगवान विष्णु की वामावर्त सुवर्णवर्णा रोमराजि भगवती लक्ष्मी की ही स्वरूपभूता है। ‘हारहास-उरसि स्थिर विद्युत्’ उपमावाली महाल्क्षमी सदा ही श्रमन्नारायण के वक्षःस्थल पर रहने वाली, वैकुण्ठधाम की एका-स्वामिनी, अनन्तानन्त ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री, महालक्ष्मी स्वयं ही विनय विनम्रा हो व्रजधाम में अधिकाधिक श्रयण कर रही हैं। एतावता स्वभावतः ही व्रजधाम अनन्त धन-धान्य से तथा व्रजवासी-जन अनन्तानन्त शक्तियों से परिपूर्ण हो रहे हैं अतः व्रजधाम विशेष उत्कर्ष को प्राप्त हो रहा है, व्रजधाम का प्रत्येक प्राणी परम पुरुषार्थ को प्राप्त हो रहा है, जंगल में भी मंगल हो रहा है। ‘सर्वेषामेव मंगलं जातं परम् दैवहतानां अस्माकमेव महद्दुःखमेतद्’' तब भी दैवहत हम व्रजाङ्गनाएँ आपकी परम अनुरागिणी एवं परम प्रेयसी होते हुए भी परम दुःखिनी हैं। तत्रापि, अधिक दुःख की बात यह है कि आप सर्वज्ञ, शिरोमणि एवं परम दयालु होते हुए भी हमारे दुःख का निवारण नहीं करते। दयालु भी जिसके प्रति कठोर जो जाय, सर्वज्ञ भी जिसके लिये ज्ञानहीन हो जाय उसके दुर्भाग्य के पारावार को कौन जान सकता है?
हे दयित! ‘दृश्यताम प्रत्यक्षीभूय’ आप प्रत्यक्ष होकर हमारे इस दुःख को देखें। ऐसा न हो कि आपके विप्रयोगजन्य तीव्र सन्ताप से सन्तप्त हो हम आपके मंगलमय मुखचन्द्र के दर्शन बिना ही मृत्यु को प्राप्त हो जायँ। भगवान श्रीकृष्ण की विरहजन्य वेदना से अत्यन्त संतप्त होती हुई भी गोपाङ्गनाएँ उनसे अपने दुःख निवारण हेतु नहीं अपितु केवल प्रत्यक्षीभूत होने के लिये ही प्रार्थना करती हैं क्योंकि भगवान परदुःखकातर हैं; अतः एक बार प्रत्यक्ष होकर गोपाङ्गनाओं के असीम दुःख का अनुभव कर लेने पर वे अवश्य ही स्वभावतः उसका निवारण कर देंगे।
‘तावकास्त्वयि धृतासवस्तवां विचिन्वते’ हे श्यामसुन्दर! हम आपकी सखियाँ आपके दर्शन से वंचित होकर आपके विप्रयोगजन्य तीव्रताप से सन्तप्त हो रही हैं। हे मदन-मोहन! आविर्भूत होकर हमारे कष्ट का अनुभव तो करो। सहसा ही, गोपाङ्गनाएँ अनुभव करती हैं कि भगवान श्रीकृष्ण उनसे प्रश्न कर रहे हैं कि ‘हे गोपाङ्गनाओ! केवल मात्र तुमसे ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व से ही हमारा सख्य है।’
(‘गोपी गीत- करपात्री जी महाराज’)
क्रमश:
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