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गोपी गीत
अतिशयता एवं समता से रहित भगवान असाम्यातिशय हैं; स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण तथा आधि भौतिक, आधि दैविक एवं आध्यात्मिक तीनों जगत् के ईश्वर हैं, अधीश्वर हैं, अनन्त कोटि ब्रह्माण्डनायक सर्वेश्वर, आप्तकाम, पूर्णकाम हैं।स्वाराज्यरूपी लक्ष्मी अर्थात् स्वस्वरूप से देदीप्यमान एवं स्वरूप से अवेद्य जो अपरोक्ष स्व प्रकाश भगवत् सत्ता है वह स्वाराज्य है; उस स्वाराज्य रूपी लक्ष्मी के कारण जो आप्तकाम समस्तकाम है। प्रस्तुत प्रसंगानुसार केवल मात्र ‘किरीट कोट्या’ अंश की ही व्याख्या वांछित है। नियमानुसार आचार्यगण के पाद-पीठ की ही पूजा होती है। अनन्त ब्रह्माण्ड नायक परमात्मा, सर्व शक्तिमान् प्रभु के चरणारविन्द रत्नमय पाद पीठ पर विराजमान हैं। भगवान के चरणाम्बुरूह अतिशय कोमल हैं तथा देवगणों के मुकुट-किरीट अत्यन्त कठोर हैं एतावता विशेष सतर्कता सावधानी के साथ नियमबद्ध होकर मुकुट किरीट के अग्रभाग से ही पाद पीठ मात्र का संस्पर्श करते हुए नमस्कार करना पड़ता है।
किरीटकोट्य-डितपादपीठः’
नमस्कार करते हुए असंख्य मुकुट किरीट के अग्रभागों द्वारा रत्न-जटित पाद पीठ के संस्पर्श से जो शब्द होता है वही मानो भगवत् संस्तवन है। अस्तु, जो रस गोलोकधाम अथवा वैकुण्ठधाम में सर्वथा अप्राप्य है वह व्रजधाम में सहज प्राप्त है। अवधधाम में भी भगवान राघवेन्द्र रामचन्द्र वृक्ष के नीचे और उनके भक्त बन्दर लोग वृक्ष के ऊपर बैठे हुए हैं। अपने उत्कर्ष एवं भक्तजनों के अपकर्ष को सर्वथा विस्मृत कर उनसे तादात्म्य-भाव स्थापित कर लेना ही अनन्त-ब्रह्माण्ड-नायक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वेश्वर प्रभु के सौशील्य की महिमा है। तादात्म्य भाव स्थापित होने पर ही प्रेम निर्भरता का भाव उमड़ने लगता है।
इच्छा मात्र से ही अंगल्या-निर्देश के द्वारा ही अखण्ड-भूमण्डल के सम्पूर्ण दैत्य-दानवादि का संहार करने में समर्थ हैं तथापि स्वसौशील्यवशात् कह भगवान राघवेन्द्र रामचन्द्र हनुमान् के प्रति कहते हैं-
‘सुन सुत तोहि उऋण में नाहीं, देख्यो कर विचारि मनमाही।’
अर्थात, हे कपे! तुम्हारे किये गये प्रत्येक उपकार के बदले मैं अपने प्राणों को दे दूँ तो भी तुम्हारे ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकता। इस उक्ति से विशुद्ध स्नेहाभिव्यक्ति अपनी चरम सीमा को पहुँच जाती है। राघवेन्द्र रामचन्द्र अथवा मथुरानाथ, द्वारकानाथ आदि स्वरूप ऐश्वर्य एवं माधुर्य दोनों ही भावों से संयुक्त हैं परन्तु व्रजेन्द्रनन्दन, नित्य निकुन्जमन्दिराधीश्वर, श्यामसुन्दर, श्रीकृष्णचन्द्र स्वरूप में विशुद्ध रूप से माधुर्यभाव का ही प्रस्फुटन हुआ है। विशुद्ध माधुर्यपूर्ण भगवत् स्वरूप का प्राकट्य ही व्रजधाम की विशेषता है; इस विशेषता के कारण ही व्रजधाम विशेष उत्कर्ष को प्राप्त हो रहा है।
भगवान अज हैं, उत्पत्ति स्थिति एवं लय से परे हैं तथापि अपनी मंगलमयी लीला शक्ति से अनेक रूपों में उत्पन्न होते हैं। वेद-वाक्य हैं, ‘अजायमानो बहुधा विजायते’ जो वस्तुतः अजायमान है जो कदापि उत्पद्यमान नहीं है वह भी ‘सम्भवाम्यात्ममायया’ अघटित घटना-पटीयसी मंगलमयी शक्ति द्वारा बहुधा वराह, वामन, राम एवं कृष्ण आदि अनेक स्वरूपों में प्रकट होते हैं। अज, अव्यक्त, अनन्त, सच्चिदानन्दघन भगवान का अपनी अघटित घटनापटीयसी, भास्वती शक्ति द्वारा प्राकट्य ही उनका दिव्य जन्म है। अनादि-काल से प्राणी अपने ही जन्म-कर्म का वर्णन, श्रवण एवं चिन्तन करता आ रहा है, लौकिक कर्मों का अधिकाधिक चिन्तन अधिकाधिक कर्म बन्धन एवं तज्जनित जन्म-मरण श्रृंखला का कारण बन जाता है किन्तु भगवान श्रीकृष्ण के जन्म एवं कर्म के आधिकाधिक श्रवण, मनन तथा चिन्तन से सम्पूर्ण कर्म-बन्धनों का समूल उन्मूलन हो जाता है, वह मुक्तिप्रद होता है। श्रीमद्भगवद्गीता वाक्य है-
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।
अर्थात, हे अर्जुन! जो मेरे दिव्य जन्म एवं कर्मों का श्रवण, मनन एवं चिन्तन करते हैं वे लौकिक कर्म-बन्धन से मुक्त होकर मुझे प्राप्त हो जाते हैं। एतावता, परात्पर प्रभु श्रीकृष्णचन्द्र के व्रजधाम में आविर्भाव के कारण सम्पूर्ण संसार का मंगल हो रहा है; संसार के मंगल का हेतु बनकर व्रजधाम विशेष उत्कर्ष को प्राप्त हो रहा है।
(‘गोपी गीत- करपात्री जी महाराज’)
क्रमश:
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