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गोपी गीत
स्वभावतः ही जीवमात्र परमात्मा का परमांतरंग, परम घनिष्ठ है तथापि भगवत्-प्रपत्ति, भगवत् शरणागति अनिवार्यतः अपेक्षित है। मधुसूदन सरस्वती ने शरणागति के तीन प्रकार कहे हैं ‘तस्यैवाहं ममैवासौ, सोऽहम् इत्येव।’ अर्थात् मैं उसका हूँ, वह मेरा है अथवा मैं ही वह हूँ ये तीनों ही भाव भगवत्-प्रपत्ति, भगवत्-शरणागति के अन्तर्गत आते हैं। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं, ‘मैं सेवक रघुपति पति मोरे, अस अभिमान जाहि जनि भोरे।’ इन्हीं भावों से प्रेरित गोपांगनाएँ भी भगवान श्रीकृष्ण परमात्मा को कभी मेरे प्राण वल्लभ, मेरे प्राणनाथ, मेरे प्रियतम आदि सम्बोधनों से पुकारती हैं तो कभी अपने को ही उनकी प्रेयसी, प्रियतमा, सखी आदि कहने लगती हैं। ‘गीत-गोविन्द’ में वर्णन है ‘मधुरिपुरहमिति भावन शीला’ भाव-विभोर राधारानी कह उठती हैं, ‘देखो सखी, मैं ही तो कृष्ण हूँ।” भृंगी कीटन्यायतः ऐसे कथत सर्वतः तथ्य ही हैं। जैसे भृंगी कीट का ध्यान करते-करते कीट ही हो जाती है वैसे ही राधारानी भी श्रीकृष्णचन्द्र का निरन्तर चिन्तन करते-करते श्रीकृष्णचन्द्र स्वरूप ही हो जाती हैं, उनसे अभिन्न एवं तादात्म्य भाव को प्राप्त हो जाती हैं। गोस्वामी जी कहते हैं-
“आनन्द सिन्धु मध्य तव बासा, बिनु जाने कत मरत पियासा।”
“बरफ पूतरी सिन्धु बिच, बदति पियास पियास।”
जैसे बरफ की पुत्तलिका, स्वयं ही उसी जल से निर्मित होते हुए भी पानी में निरन्तर निवास करते हुए भी अज्ञानवशात् प्यास से व्याकुल रहती है वैसे ही आनन्द सिन्धु परमात्मा से अभिन्न, अभेद्य एवं तादात्म्य होते हुए भी अज्ञ जीवात्मा परमात्मा से वियोग का अनुभव करते हुए दुःखी रहता है। परमात्मा में अपने सर्वस्व का पूर्ण रूप से अर्पण कर देने पर कोई भिन्न सत्ता ही नहीं रह जाती। अतः सहज ही चिन्दा का आधार एवं विषय दोनों ही समाप्त हो जाते हैं। यह उत्कृष्टाति-उत्कृष्ट भावना सर्वकल्याणकारिणी है। ऐसी सर्वोत्कृष्ट भावनाएँ सहसा ही नहीं बन जातीं अतः सर्वप्रथम बौद्धिक प्रयास द्वारा चिन्तन एवं मनन अनिवार्य है। निरन्तर विचार करते रहो कि हे प्रभो! हम आपके हैं, हमारा-आपका कोई नाता जुड़ जाय। ‘मोहि तोहि नाते अनेक, मानिये जो भावै।’ अथवा ‘गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।’
अर्थात प्रभु ही गति, भर्ता, स्वामी, सुहृद्, साक्षी एवं आधार हैं। जीवात्मा और परमात्मा में विविध सम्बन्ध हैं। सूरदास कहते हैं-
“जीव हौं तू ब्रह्म; दीन हौं तू दयालू।
तू दानी हौं भिखारी, हौं प्रसिद्ध पातकी, तू पाप-पुंज-हारी।”
जीवात्मा एवं परमात्मा के बीच अनेकानेक सम्बन्धों में जो कोई भी मान्य हों अन्ततोगत्वा सबका लक्ष्य ‘तवाऽस्मि’ की सुदृढ़ अनुभूति ही हैं। नागोजी भट्ट कहते हैं ‘अभयं सर्वभूतेभ्यः तात्कालिकं च आत्यन्तिकं ‘ अर्थात् एक बार भगवत् शरणागति, भगवत्-प्रपत्ति का भाव सुदृढ़ हो जाने पर भगवदीयत्वाभिमान जागरूक हो जाने पर सम्पूर्ण भयों से तात्कालिक एवं आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है। जनन-मरणाविच्छेद-लक्षणा संसृति से निर्भीक हो जाना ही आत्यन्तिक निवृत्ति है।
गोपांगनाएँ कह रही हैं, हे दयति! त्वदीयत्वाभिमान ही सर्वश्रेष्ठ, सर्वकल्याणकारी एवं सर्व प्रकार के भयों से तात्कालिक तथा आत्यन्तिक निवृत्ति का एकमात्र कारण है। तथापि हम आपकी परमानुरागिणी, परम प्रेयसी, त्वदीयत्वाभिमानिनी, ‘तावकाः’ व्रजवनिताएँ आपके विप्रयोगजन्य तीव्रताप से सन्तप्त हो इतस्ततः भटक रही हैं। ‘निषेव्य सरितां पत्युस्तटीं पक्षिगणश्चरन्। यत् पिबेत् सरसस्तोयं तद्धि लज्जा महोदधेः।’ अर्थात् महोदधि के तीर पर रहने वाले पक्षीगण को भी जल पीने के लिये किसी सरोवर के तीर पर ही जाना पड़ता है। अहो! समुद्र के लिये यह कैसी लज्जा की बात है? हे प्रभो! हम व्रजांगनाएँ भी आप अनन्त-ब्रह्माण्डनायक परात्पर, परब्रह्म, प्रभु की प्रेयसी सखियाँ होते हुए भी आपके मुखारविन्द के दर्शन से वंचित रहें, आपके पादारविन्द को नखमणि चन्द्रिका का दर्शन भी हमारे लिये अत्यन्त दुर्लभ हो जाय, आपके दामिनी-द्युति-विनिन्दक पीताम्बर का दर्शन भी सम्भव न हो, आपके सौन्दर्य-माधुर्य-सौरस्य सौगन्ध्य सुधा जल निधि स्वरूप के रसास्वादन से वंचित रहें यह कहाँ तक न्यायोचित है?
(‘गोपी गीत- करपात्री जी महाराज’)
क्रमश:
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