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गोपी गीत
हे दयित! महोदधि के तीर पर रहने वाले पक्षीगण की तरह ही हम भी दिशा-विदिशाओं में आप ही को खोजती हुई इस अन्धकारमयी रात्रि में गहवनों में भटकती हुई गम्भीर विपज्जाल में फँस गयी हैं। हे प्रभो! क्या यह आपके लिये अशोभनीय नहीं है? ‘विषवृक्षोऽपि संवद्धर्य स्वयं च्छेत्तुमसाम्प्रतम्।’ विष-वृक्ष अरोपण करने पर उसका भी छेदन कोई नहीं करता। हे सखे! आपसे मिलन की हमारी इस आशा-कल्पलता को तो सवयं आप ही ने कात्यायनी-अर्चन के अनन्तर वरदान देकर सम्बलित किया। ‘इमाः क्षपा मया रंस्यथ’ इन क्षपाओं में, इन दिव्य ब्रह्म रात्रियों में तुम्हें हमारा संगम प्राप्त होगा, तुम ब्रह्म-संस्पर्श को प्राप्त करोगी, तुम्हें ब्राह्म-तादात्म्यप्राप्ति होगी; तुम्हें ब्रह्म-रति, परमात्म-रति, आत्मरतिपूर्ण रूप से प्राप्त होगी। इस प्रकार से वरदान देकर आपने ही हमारे हृदय की आशा-कल्पलता का अभिसिंचन एवं अभिवर्द्धन किया परन्तु अब अपने दर्शनों से भी वंचित कर आप स्वयं ही उस कल्पलता का छेदन कर रहे हैं। क्या यह न्यायसंगत अथवा उचित है? हे प्रभो! केवल आपके दर्शन की लालसा से ही हम अपने प्राणों को भी धारण कर पा रही हैं।
गोपांगनाजनों का सम्पूर्ण जीवन ही भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के प्रति तत्सुखसुखित्व-भाव प्रधान है। अपने प्रियतम्, प्राणधन, श्यामसुन्दर का सुख ही उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य है। उनके सम्पूर्ण असन, वसन एवं भूषण भी श्रीश्यामसुन्दर के ही मनोरंजनार्थ हैं। शेषावतार का भी यही सिद्धान्त है। भगवान् शेषों हैं, जीवमात्र शेष हैं; भगवान् सर्वांगी हैं, प्राणी-मात्र उनके अंग हैं, उपकर हैं। भगवान् को शेषी और अपने-आपको शेष जानते हुए भगवत्चरणों में पूर्ण समर्पित हो जाना ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।
गोपांगनाएँ कह रही हैं, ‘दिक्षु तावकाः त्वयि धृतासवः त्वां विचिन्वते’ हे दयित! भीषण कान्तार में आपको खोजती हुई, भटकने के कारण परिश्रान्तक्लान्त तथा आपके विप्रयोगजन्य तीव्र ताप से संत्रस्त, त्वदीयाभिमानिनी और तुमसे स्वीकृता ‘तावकाः’ हम व्रज वनिताएँ अत्यन्त दुःखित हो रही हैं। हे श्यामसुन्दर! आप प्रत्यक्ष होकर हमारी इस दारुण स्थिति का अनुभव करें। आपके प्राकट्य से ही हमारे दुःखों का अन्त हो जायगा। हे दयित! यदि आपको स्तावकत्व ही तुष्टिकर हो तो हम ‘तावकाः’ तुम्हारी होते हुए भी ‘स्तावकाः’ स्तुति करने वाली भी हो रही हैं। आपको स्तुति प्रिय है अतः हम आपकी प्रेयसीजन आपकी स्तुति करती हुई वन-वन में आपको खोजती हुई भटक रही हैं। भगवान जिसको एक बार स्वीकार कर लेते हैं उसकी उपेक्षा कदापि नहीं करते। एक कथा है-एक बार किसी गोपांगना ने कहा, ‘हे श्यामसुन्दर! तुम्हारे नूपुर बजते हैं जिसके कारण हमारे घर के लोग सास नन्द आदि सतर्क हो जाती हैं अतः तुम इन नूपुरों को उतार दो।’
भगवान ने कहा, ‘हे सखी! तुम स्वयं ही खोल दो इन नूपुरों को।’ वह सखी ज्यों ही नूपुर खोलने को उद्यत हुई वैसे ही एक अन्य सखी वहाँ आ पहुँची और कहने लगी, ‘हे सखी! यह क्या अनर्थ कर रही हो? जिस किसी को भी एक बार भगवत्-चरणारविन्दों का आश्रय प्राप्त हो जाता है वह कदापि उनके विलग नहीं हो सकता। यदि तुम इन नूपुरों को हटा दोगी तो फिर यही परम्परा चल पड़ेगी। अतः हे सखी! इन नूपुरों को कदापि न खोलना।’ तात्पर्य कि एक बार भगवान् द्वारा स्वीकृत हो जाना ही भक्त का परम सौभाग्य है।
गोस्वामी कहते हैं, ‘एक बार कहहुँ नाथ तुलसिदास मेरो।’ गोपांगनाएँ भी कह रही हैं-‘श्यामसुन्दर! ‘तावकास्त्वयि’ हम तो तुम्हारी ही हैं, साथ ही तुम्हारे द्वारा स्वीकृता भी हैं। ‘त्वदीयत्वाभिमानवत्यः वयं गोपीजनाः’ हमें अभिमान है कि हम आपकी हैं।” गोस्वामी तुलसीदस कहते हैं, ‘मैं सेवक, रघुपति पति मोरे, अस अभिमान जाय जनि भोरें।’ मैं भगवान् का हूँ यह भाव ही भगवदीयत्वाभिमान, त्वदीयत्वाभिमान है। एक सन्त थे; उनका कहना था कि लौकिक चक्रवर्ती नरेन्द्र का पुत्र होकर व्यक्ति गौरव का अनुभव करता है परन्तु अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड-नायक सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान् के पुत्र होने का गौरव भुला देता है; वेदवाक्य है ‘अमृतस्य पुत्राः’ अमृत अर्थात् अनन्त-ब्रह्माण्ड-नायक, परमात्मा, सवेश्वर, सर्वशक्तिमान्; 'अमृतस्य पुत्र, अर्थात भगवान का पुत्र। वस्तुतः गौरव तो प्रभु का पुत्र होने में ही है।
श्रीमद्भागवत में ही ‘वेणुगीत’ के प्रसंग में कहा गया है,
“गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुर्दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम्।
भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसं ह्रदिन्यो हृष्यत्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवो यथार्याः।”
गोपांगनाओं को यह जानकर कि दामोदर की अधर-सुधा पर हमारा ही अधिकार है विशेष दर्प हो गया; इस अभिमान के कारण ही भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गए; इस परित्याग के कारण उनके दर्प का उदमन हो गया। अतः अब वे कह रही हैं, हे दयित! ‘तावकाः वयं’ हम आपकी हैं, त्वदीयत्वाभिमानिनी हैं, एतावता स्वभावतः ही आपके विप्रयोगजन्य तीव्र ताप से संत्रस्त हैं। ‘दयित’ जैसे सम्बोधन द्वारा वे अपने प्रति भगवान् के हृदय में भास्वती भगवती अनुकम्पा शक्ति के आविर्भाव की स्पृहा प्रदर्शित करती हैं। वे अनुभव करती हैं कि मानो भगवान श्रीकृष्ण उनको उपालम्भ दे रहे हैं।
(गोपी गीत- करपात्री जी महाराज)
क्रमश:
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