Wednesday, 2 January 2019

गोपी गीत 22

22-
गोपी गीत

कहते हैं संसार में कैतवरहित प्रेम संभव नहीं होता; यदि कदाचित् सम्भव भी हो जाय तो उसमें विप्रलम्भ नहीं होता-यदि कदाचित् विप्रलम्भ भी हो जाय तो कौन जीवन-धारण कर सकता है? इसका उत्तर देती हुई वे कह रही हैं, ‘त्वयि धृतासवः’ हे श्यामसुन्दर! हमारे प्राण आपमें ही निहित हैं अतः प्रयाण भी नहीं कर सकते अन्यथा अवश्य ही स्थिर न रह पाते। आपमें निहित होने के कारण अपने प्राणों पर भी हमारा अधिकार नहीं रह गया है।

“यत्ते सुजात चरणाम्बुरुहं स्तनेषु
भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु।
तेनाटवीमटसि तद् व्यथते न किंस्वित्
कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः।”

उक्त श्लोक प्रसंग में भी गोपांगनाओं की उक्ति है, ‘भवदायुषाम-भवानेव-आयुर्यासां ता भवदायुषस्तासां भवदायुषां।’ विधाता ने प्राण तो हमें दिए परन्तु हमारी आयु आपके हाथों में दे दी। अतः अत्यन्त सन्त्रस्त होते हुए भी प्राण हमारे शरीर से निकल नहीं पाते; अथवा ‘त्वयि धृतासवः’ आपके मंगलमय मुखचंद्र के दर्शन की आकांक्षा एवं आपके लोकोत्तर सौगन्ध्य, सौरस्य, सौन्दर्य, माधुर्य-सुधा-जलनिधि स्वरूप का रसास्वादन करने की अभिलाषा के कारण ही हमारे प्राण हमारे शरीरों में स्थिर रह पा रहे हैं अन्यथा अवश्य ही प्रयाण कर जाते।

रुढ, अधिरूढ, मोहनाख्य, मदनाख्य एवं महाभाव आदि प्रेम की अत्यन्त उत्कृष्ट अवस्थाएँ हैं। रासेश्वरी, नित्य-निकुन्जेश्वरी राधारानी तो स्वयं ही माहाभावावतार-स्वरूपा हैं। कहते हैं, कहाँ ये व्यभिचार-दोष-दुष्टा वनचरी गोपालीगण। ऐसे वर्णन प्रातिभासिक हैं; भगवत्-महिमा का वर्णन ही इनका लक्ष्य है। ऐसे वर्णन इस बात का प्रमाण हैं कि अत्यन्त निकृष्ट कोटि की इन वनचरी वनिताओं द्वारा भी प्रेमपूर्वक भजे जाने पर अनन्त-कोटि-ब्रह्माण्डनायक अनन्त-अचिन्त्य-गुण-गणों के एकमात्र आस्पद, अघटित-घटना-पटीयान्, स्वप्रकाश, परात्पर परब्रह्म, परमेश्वर प्रभु भक्तों के अपकर्ष एवं अपने उत्कर्ष को विस्मृत कर भक्त-भावानुसार ही उनका अनुवर्तन करते हैं। गीता-वाक्य है, ‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तास्तथैव भजाम्यहम्।वस्तुतः भगवदीयत्वाभिमानिनी ये वनचरी व्रजवनिताएं भगवान् शुक एवं उद्धव द्वारा भी वन्दनीय हैं।उद्धव कहते हैं-

“आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां
वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।
या दुस्त्यजं स्वजनमार्य्यपथं च हित्वा
भेजुर्कुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्।”

अर्थात, मैं इन गोपांगनाओं के पाद-पंकज-रस का संस्पर्श करने वाले, वृन्दावनधाम के तृण, गुल्मलता, दूर्वादिकों में से कुछ भी बन जाऊँ। जीव-मात्र पंच-भूतात्मक पंच-कंचुकों से आवेष्टित हैं। मायाभिभूत प्राणी स्वभावतः ही अपने दुष्कर्म को बाह्य जगत से प्रावरित रखने का अटूट प्रयास तो करता ही है, साथ ही, स्वयं अपने भी अन्तस्तल से अपरिचित रहना चाहता है। व्यामोहजन्य इस आवरण के कारण ही प्राणी अपने को सर्वाधिष्ठान, सर्वव्याप्त, सर्वज्ञ के समक्ष भी पर्यवेष्टित रखने का निष्फल प्रयास करता हैं सिद्धान्त है कि यमपुरी में जीव द्वारा किए गये पुण्य-पाप का निर्णय पंचभूतों के अधिष्ठाता देवगणों को साक्षी पर आधारित रहता है क्योंकि प्राणी का कोई भी कर्म इन देवगणों से प्रावरित नहीं रह पाता; एतावता प्राणीमात्र का आत्यन्तिक कल्याण इसी में है कि वह अपने को सर्वान्तर्यामी के सम्मुख पूर्णतः निरावृत कर दे। स्वयं अपने-आपको पूर्णतः निरावृत कर देना ही भगवदीयत्वाभिमान किंवा प्रपत्ति, शरणागतति है।

जब प्राणी अपने को भगवान् के सम्मुख निरावृत कर देता है, जब उसमें भगवदीयत्वाभिमान उद्भुत होता है तब सर्वाधिष्ठान, सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ स्वप्रकाश प्रभु भी उसके पंच-कंचकरूप आवरण का छेदन कर उसको अपने विशुद्ध स्वरूप का दर्शन करा देते हैं। सर्वान्तर्यामी के सम्मुख निरावृत जीवोपस्थिति ही भगवान श्रीकृष्णचन्द्र द्वारा गोपियों के चीर-हरण किए जाने का रहस्य है। बाह्य एवं अन्तः सम्पूर्ण कल्मषों को हटा देने पर ही परात्पर प्रभु से तादात्म्य अभिन्न सम्बन्ध स्थापित हो सकता है।
(गोपी गीत- करपात्री जी महाराज)

क्रमश:

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