Tuesday, 18 December 2018

गंगाबाई जमुनाबाई

*जय जय श्री हित हरिवंश ।।*

गंगा-जमुनाबाई~~~~~~~

ये दोनों उपासिका ब्रज के कामबन नामक गाँव की रहने वाली थी।बादशाह अकबर के शासनकाल में यह डाकुओ का केंद्र था, एक दिन भरतपुर के दरोगा ने चढ़ाई कर डाकुओ को नष्ट कर दिया, उस समय यह बहने 8-9 वर्ष की थी। ये सैनिको से बच कर जंगल में की दिन भूखी प्यासी रही।

संयोगवश एक दिन यह मनोहर दास नामक व्रद्ध को मिली , वह इन्हें मथुरा ले आया। वह संगीत का ज्ञाता था उसने इन्हें नृत्य और संगीत की शिक्षा दी, इनके बड़े होने पर आगरा में इनका सौदा दो हजार में राजा मानसिंह से तय कर मथुरा लौट आया। मथुरा में तीव्र ज्वर के कारण मरणासन अवस्था में कन्याओं को गड़ा हुआ अपना 30 हजार रु. का धन बता चल बसा।

गो. हित हरिवंश जी के शिष्य परमानन्द दास जी कभी-कभी मनोहर दास के यहां जाकर कन्याओ का कीर्तन सुनते थे। मनोहर दास के देहांत के उपरांत कन्याए वैराग्य में जा चुकी थी, वह उन्हें वृन्दावन ले आये जहाँ उन पर कृपा कर श्री हित हरिवंश जी ने निज मन्त्र दिया और वे कन्याए श्री राधावल्लभ जी की उपासना में लग गयी।
एक दिन उन्हें पालक पिता मनोहर दास स्वप्न में आये और बताया वह मथुरा में अमुक स्थान पर प्रेतयोनी में है , तब उन कन्याओ ने उस स्थान पर साधू सेवा कर उनका चरणामृत छिड़का तो वह मुक्त हो गया परन्तु इसके साथ ही गंगाबाई-जमुनाबाई के जीवन की सबसे बड़ी चुनोती उनके सामने आ गई।
उस समय मुगल-शासन की ओर से अजीजबेग नाम का एक व्यक्ति मथुरा का हाकिम था। वह बड़ा ही स्त्री -लंपट था। पालक पिता के व्रहद आयोजन की सुचना के साथ उनके रूप-सौंदर्य की प्रशंसा भी उस तक पहुंची।
उस दुष्ट ने उन्हें बुलवाकर एकांत स्थान में बन्द  कर दिया, वे दोनों अपने इष्ट श्री राधावल्लभ लाल का निज मन्त्र जाप करने लगी, रात्रि में उस स्थान पर जब वह दुष्ट पहुँचा तो वहाँ एक विशालकाय सिँह पहरा दे रहा था , सिँह की गर्जना सुन वह वहां से भाग गया तथा अगले दिन उन्हें मुक्त कर चरणों में गिर गया। उसने श्री राधावल्लभ जी का बड़ा उत्सव किया तथा दोनों बहनो से पश्चाताप किया और माँ कह कर ताउम्र सम्बोधित किया।

गंगा जमुना बाई के सम्बन्ध में जानकारी "रसिक-अनन्य -परिचवली " में भी मिलती है।

गंगा-यमुना तियन में परम् भागवत जान। तिनकी वाणी सुनत ही बढ़े भक्ति उर आन।।

*जय जय श्री हित हरिवंश।।*

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