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गोपी गीत
हनुमान्जी ‘ज्ञानिनामग्रगण्यम्’ हैं तत्रापि-
‘यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनम मृतत्र तत्र कृतमस्तकान्जलि।
वाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुति नमत राक्षसान्तकम्।’
अर्थात जहाँ-जहाँ राघवेन्द्र रामचन्द्र के मंगलमय पवित्र चरित्रामृत का प्रवाह प्रवाहित होगा, वहाँ-वहाँ हनुमान्जी सर झुकाए, आँखों में आँसू भरे अवश्य ही पधारेंगे; यही उनका स्वभाव है।
ज्ञानी शिरोमणि सनकादिकों को भी एक व्यसन है।
‘आसा वसन व्यसन यह तिन्हहीं! रघुपति चरित होई तहँ सुनहीं।’
मूल प्रसंगानुसार गोपांगनाएँ कह रहीहैं, हे प्रभो! आप सुरतनाथ हैं तथापि हमारा तो वध ही कर रहे हैं। कहा जा चुका है कि एकाकी होने के कारण हिरण्यगर्भ को अरमण हुआ अतः हिरण्यगर्भ ने इच्छा की ‘जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीय।’ भगवदिच्छा ही आदिकाम है। सृष्टि के आरम्भ में जैसा भाव रहता है, उत्तरकालीन प्रपन्च भी उसी का अनुसरण करता है। ‘रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति।’ परात्पर परब्रह्म प्रभु ही रसस्वरूप हैं; भगवद्-निष्ठ रस ही लोक में विभिन्न स्वरूपों में प्रसृत होता है। अस्तु, तृतीय पुरुषार्थ काम के अप्रकट रहने पर आश्रय के अभाव में रसाभिव्यक्ति असम्भव हो जाती है। जैसे, अश्व-निर्माण में समर्थ होने पर भी जब तक अश्व निर्माण नहीं कर लेता तब तक अश्वपति नहीं कहलाता वैसे ही, हे प्रभो! आप ही शब्द, स्पर्श,रूप, रस, गन्धात्मक सम्पूर्ण संयोग-सुख के प्रवर्तक एवं उद्गम-स्थल हैं, सुरतनाथ हैं अतः रस-विशिष्ट का प्रादुर्भाव अनिवार्य है। रसशास्त्र के अनुसार भी सम्पूर्ण रसाभिव्यक्ति भगवत-स्वरूप रस का ही परिणाम है। संसार के सम्पूर्ण समीचीन एवं असमीचीन पदार्थ सच्चिदानन्दघन भगवान के सद्-स्वरूप का ही परिणाम है। जैसे सामान्य मृत्तिका ही घटविशिष्ट मृत्ति का रूप में अथवा सामान्य सुवर्ण ही कुण्डलादि विशिष्टि सवुर्णरूप में परिणत होता है, वैसे ही शुभाशुभ-विनिर्मुक्त अखण्ड सत्ता ही शुभाशुभ पदार्थ विशिष्ट रूप से प्रकट होती है। वस्तुतः शुभाशुभ विशेषण-विनिमुक्त अखण्ड सत्ता ही परब्रह्म है। उसी प्रकार चित् भी भगवत-स्वरूप ही है। सत् एवं चित् में अभेद है; जिसकी सत्ता होगी उसका भान भी अवश्य ही होगा; जिसका भान होगा उसकी सत्ता भी अवश्य ही होगी।
अस्तु, संसार के सम्पूर्ण शुभाशुभ ज्ञान, शुभाशुभ विनिर्मुक्त भगवत चित् स्वरूप का ही परिणाम है तथापि शुभज्ञान ग्राह्य एवं अशुभ ज्ञान अग्राह्य। सच्चित्वत् आनन्द भी सम्पूर्ण प्रपन्च का कारण है।
'आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।'
जिस प्रकार सर्व विशेषणमुक्त सत् ब्रह्म है उसी प्रकार निर्विशेष आनन्द भी शुद्ध परब्रह्म ही है। शुभाशुभ-विशेषणशून्य सत्-तत्त्व हेयोपादेयरहित हैं। सततत्त्व ही सुख-दुःखादि शुभाशुभ-विशेषणविशिष्ट होकर हेय अथवा उपादेय हो जाता है क्योंकि कार्य-कारण में अभिन्नता होती है। जैसे मृत्तिका का परिणाम घट उससे अभिन्न होता हुआ भी मूत्तिका के विशेषण रूप से भी अभीष्ट है अथवा जैसे घटाकाष, महाकाश का अवच्छेदक है और उसका विशेषण भूत घट भी आकाश से अभिन्न है उसी प्रकार शुभाशुभ विशेषण भी सत्-तत्त्व से अभिन्न ही है, तथापि व्यवहारतः विशेषण भूत होकर उसका भेदक भी है।
अस्तु, सत् एवं चित् की तरह ही आनन्द भी शुभाशुभातीत ब्रह्मस्वरूप भूत ही है। शुद्ध आलम्बन एवं उद्दीपन के योग से जिस रस की अभिव्यन्जना होती है वह शुभ रस तथा अशुभ आलम्बन एवं उद्दीपन के योग से उद्बद्ध रसाभिव्यन्जना ही अशुभ है। शुभाशुभातीत विशुद्ध रसात्मक स्वरूप ही साक्षात परब्रह्म परमेश्वर है। देवता के आलम्बन एवं देव-विषय के उद्दीपन के संयोग से जिस रस की अभिव्यंजना होती है वह भक्ति के अन्तर्गत आ जाती है; रसस्वरूप परमात्मा के तत्-तत् देवतास्वरूप आलम्बन एवं उद्दीपन के संयोग से उद्बुद्ध भाव स्वयं ही रसात्मक हैं। लौकिक कान्त-कान्ता के संगम से प्रस्फुटित रसाभिव्यंजना भी मूलतः रसात्मक ही है तथापि लौकिक आलम्बन एवं उद्दीपन के संयोग से प्रस्फुटित होने के कारण अप्राकृतिक नहीं है। वस्तुतः श्रृंगार-रस ही अंगी-रस है, अन्य सम्पूर्ण रस श्रृंगार-रस के ही अंग हैं। भगवान ही सम्पूर्ण रस के अधिष्ठाता एव अधिपति हैं। भगवन्निष्ठ रस ही प्रसरित होकर संसार के भिन्न-भिन्न रसों में परिणत हो गया।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)
क्रमश:
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