Monday, 28 January 2019

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गोपी गीत

विप्रयोगजन्य तीव्र-ताप से विदग्ध होकर गोपांगनाजन श्रीकृष्णचन्द्र में दोषारोपण भी करने लगती हैं। जैसे ज्ञानीजन विषयों से विरत रहने के हेतु उनमें अनेकानेक दोषानुसन्धान करते हैं वैसे ही गोपांगनाएँ भी प्रणय-कोप-वशात् श्रीकृष्णचन्द्र में ही दोषानुसन्धान कर उनके प्रति उपेक्षा-प्रदर्शन का अभिनय करती हैं। ज्ञानी कहते हैं ‘मोक्षमिच्छसि चेत्तात! विषयान् विषवत् त्यज’ हे तात! मोक्ष की इच्छा हो तो शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्धात्मक सम्पूर्ण विषयों को विषसदृश जानकर उनका परित्याग कर दो। शंकराचार्यजी कहते हैं-

चेतश्चन्चलतां विहाय पुरतः सन्धाय को टिद्वयम।
तत्रैकत्र निधेहि सर्वविषयानन्यत्र य श्रीपतिम्।

अर्थात हे चित्त! चंचलता छोड़कर तू अपने सामने एक तराजू रख ले, तराजू के एक पलड़े पर अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड के सुख और दूसरे पलड़े पर श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द की मधुर मनोहर मंगलमयी मूर्ति के सौन्दर्य-माधुर्य को रखकर तू स्वयं अपनी ही बुद्धि से तौल ले। जो तुझे वस्तुतः गम्भीर प्रतीत हो उसको ही ग्रहण कर ले। हे चंचल चित्त! विचार कर देख! अनन्त ब्रह्माण्ड के अनन्तानन्त वैषयिक सुख भी श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्द परमानन्दसुधाजलनिधि का बिन्दुमात्र भी नहीं है। भाव-विभोर गोपांगनाएँ कह रही हैं-

‘मृगयुरिव कपीन्द्रं विव्यधे लुब्धधर्मा
स्त्रियमकृत विरूपां स्त्रीजितः कामयानाम्।
बलिमपि बलिमत्वाऽवेष्टयद्ध्वाङ्क्षवद्ये-
स्तदलमसितसख्यैर्दुस्त्यजस्तत्कथार्थः।

अर्थात हे सखी! इन श्रीकृष्णचन्द्र के तो जन्मजन्मान्तरों का कौटिल्य विख्यात है। रामावतार में इन्होंने निरपराध वानरेन्द्र बालि को पेड़ की ओट से ऐसे मार डाला मानो वह जन्म-जन्मान्तर का द्वेषी हो। सर्वस्व समर्पण करने वाले दानव-राज बलि को वामनरूप धरकर ठग लिया और रसातल को भेज दिया। कथा है, श्रीमद् नारायण भगवान विष्णु वामनरूप धारण कर दानवेन्द्र बलि की सभा में पहुँचे। बलि की प्रार्थना पर वामन भगवान ने तीन पग पृथ्वी की कामना की। दानवेन्द्र बलि ने पुनः आग्रह किय, परन्तु बटुकरूपधारी भगवान ने उत्तर दिया, ‘असन्तुष्टा द्विजा नष्टा’ असन्तुष्ट द्विज नष्ट हो जाते हैं, सन्तोष ही ब्राह्मण का मुख्य धन है। बलि ने पुनः आग्रह करने पर वामन-रूपधारी भगवान विष्णु ने तीन पग पृथ्वी माँगी और दो ही पग में सब कुछ नाप लिया। पुनः तृतीय पग पृथ्वी की माँग की। बलि ने पूछा-‘हे देव! भोक्ता बड़ा है अथवा भोग्य? भगवान ने उत्तर दिया-‘भोक्ता ही सदा बड़ा है।’ उस पर बलि ने अपनी पीठ भगवान के सम्मुख करते हुए तीसरे पग से भूमि नाप लेने के लिए कहा। भगवान ने अपना पैर बलि की पीठ पर रखकर उसको पाताललोक भेज दिया। गोपांगनाएँ कहती हैं ‘ध्वांक्षवद्यः’ जेसे कौआ जिस पत्तल में खाता है उसी में छेद करता है वैसे ही वामन-रूपधारी भगवान ने बलि की बलि लेकर उसको पातालपुरी में पहुँचा दिया। हे सखी! ‘कज्जलमपि सुसख्ये’ सब कालों में बड़ी मित्रता है; काले सब एक ही से होते हैं। गुंजायमान भ्रमर को देखकर उसमें श्रीकृष्ण की उत्पेक्षा करती हुई परस्पर कहती हैं, ‘देख सखि! यह भ्रमर भी तो हमारे कृष्ण की तरह ही काला है, उन्हीं की तरह यह भी पीताम्बरधारी है; इसके भी अधर अरुण हैं और यह भी सदा ही मुख से वंशीनाद की तरह नाद करता है। कृष्ण की तरह यह भी सदा ही नई-नई कलियों का मकरन्द-पान किया करता है। काले सब बुरे होते हैं; हे सखि! ‘तदलमसितसख्यैः’ अतः काले लोगों का संग नहीं करना चाहिए।’

श्रवसोः कुवलयमक्ष्णोरन्जनम्।
उरसो महेन्द्रमणिदाम।
वृन्दावनतरुणीनाम्।
मण्डनमखिलं हरिर्जयति।

अर्थात, भगवान श्रीकृष्णचन्द्र ही व्रज-युवतियों के कानों में कुण्डल, आँखों में अन्जन, उरोजो में मृगमद एवं नीलमणि-माला आदि विभिन्न रूपों में विराजमान हैं। व्रज-युवतियों के सम्पूर्ण भूषणादि प्राकृत-प्रस्तर-खण्ड नहीं, अपितु परमानन्दकन्द भगवत-स्वरूप हैं। गोपांगनाओं का उद्गार है-

‘ईदृशा पुरुषभूषणेन या, भूषयन्ति हृदयं न सुभ्रुव:।
धिक् तदीय कुलशीलयौवनं, धिक् तदीय गुणरूपसम्पद:।’

अर्थात जिसने अपने उरस्थल को ऐसे परम पुरुष परमेश्वर पुरुषश्रेष्ठ से अलंकृत नहीं किया उसके सौन्दर्यादिक सम्पूर्ण गुण-गणों को धिक्कार है। तात्पर्य कि ऐसे व्यक्ति की गुण-गण-राशि भी निरर्थक ही है। श्रीकृष्ण-विप्रयोगजन्य तीव्र सन्ताप से सन्त्रस्त गोपांगनाओं में श्रीकृष्ण-निर्वेद का भाव उद्बबुद्ध होता है और वे परस्पर कहने लगती हैं-‘हे सखि! कालों का साथ ही बुरा है; आज से हम भी आँखों में अन्जन, उराजों में मृगमद तथा इन्द्रनीलमणिमाला, नील साड़ी, नील कंचुकी आदि भी नहीं धारण करेंगी। ‘धूलिर्धृता मस्तके’ काले बालों में भी धूलि मल लेंगी।’ परन्तु क्या करें? हे सखि! यह कृष्ण तो हमारे अन्तःकरण में व्याप्त हो गया है अतः व्यसन की तरह दुस्त्यज है। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, ‘स्वभावो भजनं हरेः।’ आप्तकाम, पूर्णकाम, परम निष्काम ज्ञानीजन किसी प्रयोजन-सिद्धिहेतु भजन नहीं करते अपितु भजन ही उनका स्वभाव बन जाता है।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)
क्रमश:

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