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गोपी गीत
‘आसीनः संविशंस्तिष्ठन् भुन्जानः पर्यटन् महीम्।
चिन्तयानो हृषीकेशमपश्यत्तन्मयं जगत।’
अर्थात जैसे तत्त्वविद्, ब्रह्मवरिष्ठ को जगत ब्रह्ममय दर्शित होता है, वैसे ही अत्यन्त भयवश कंस को भी सदा-सर्वदा-सर्वत्र भगवान हृषीकेष के ही दर्शन होते थे। परिणामतः भृंगी-कीट-न्याय से भयभीत कंस-शिशुपालादिक को भी परम-गति प्राप्त हुई। कुब्जादिकों ने काम-भाव से श्रीकृष्ण को भजा, वे भी परम-गति को प्राप्त हुईं।
‘कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च।
नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते।’
अर्थात् काम, क्रोध, स्नेह, सौहृद आदि किसी भी भावना से प्रेरित हो प्राणी के एक बार भगवतपरायण हो जाने पर भृंगी-कीट-न्यायतः उसमें भगवद्भाव का पूर्ण विस्तार हो जाता है तथा अन्ततोगत्वा उसको भगवत-दर्शन एवं भगवत-प्राप्ति हो जाती है।
सुष्ठु शोभना कामसुखप्रदत्वेऽपि भवबन्धनाननुबन्धिनी रतिमिथुनविहारो यस्य स सुरतः।
अर्थात् जिसका मिथुन-मिमित्तक लौकिक-व्यवहार भी शोभन है मुक्ति-पर्यवसायी है वह श्रीकृष्णचन्द्र ही सुरतनाथ है। गोपांगनाएँ कहती हैं कि “हे सुरतनाथ! हे वरद! आप ही सर्व-प्रकार के कल्याण के कर्ता तथा सुख के दाता हैं, आप ही प्राणी के सम्पूर्ण आनन्द के दाता भी हैं; आप सबके हितैषी भी हैं तथापि हमारे ही दुर्भाग्य के कारण केवल मात्र हमारे ही लिए स्वामी अथवा नाथ न होकर उपतापक हो रहे हैं; वरद न होकर बाधक हो रहे हैं।
विरह-व्याकुल गोपांगनाएँ प्रणयाधिक्यजन्य ईर्ष्या व्यक्त करती हुई कहती हैं, “सरसिज-सम्राट् की उस अत्यन्त निगूढ़ श्री का अपहरण करके आपने उसको अपने नेत्रों में स्थान दिया।
सर्वाधिक प्रिय को ही नेत्रों में बसाया जाता है अतः ऐसा प्रतीत होता है कि आपके यहाँ कुटिल मानिनी का ही अधिक सम्मान होता है। सरसिज-सम्राट् की वह श्री जो पद्मासना-योगिनी है, जो आपमें स्पृहा भी नहीं रखती तथापि आपने उसका हरण कर उसको अपने नेत्रों में स्थान दिया। आपके प्रति विशेषानुरागवशात् अपने-आप को सापत्न्यदोष से मुक्त रखते हुए हमने आपके नेत्रों में बसने वाली इस श्री का भी अनुसरण किया तथापि आपने हमारा ही दृशावध किया।”
जलन्धर दैत्य की सती-साध्वी, पति-परायणा पत्नी वृन्दा को आपने छलछद्म से ही प्राप्त किया। यहाँ तक कि सती वृन्दा के शाप को अंगीकार कर आप स्वयं पाषाणखण्ड, शालिग्राम बन गये तथापि उसकी ही कामना रखते हैं। शालिग्राम एवं तुलसी का सम्बन्ध अविच्छेद्य है। ‘छप्पन भोग छतीसों मेवा बिन तुलसी हरि एक न माने।’ शाप देने के बाद वृन्दा अपने पति के संग सती हो गई; उस चिता की राख में लोट-लोटकर श्रीकृष्ण ‘हा वृन्दे! हा वृन्दे! विलाप करने लगे। भूत-भावन भगवान विश्वनाथ ने आकर श्रीकृष्ण को सावधान किया। परम भक्त मुचुकुन्द को आपका दर्शन भी नहीं मिला और शबरी के घर पधारकर उसके फलों को भी आपने खाया।
इन एवं ऐसी अन्य कथाओं का तात्पर्य अत्यन्त गूढ़ है। कल्प-कल्पान्तरों के, जन्म-जन्मान्तरों के सुकृत-पुन्ज उद्भूत होने पर जीव प्रभु द्वारा स्वीकृत होते हुए भी कदाचित् माया-ग्रस्त हो जाता है। सम्पूर्ण भोग की तुलना में भोक्ता ही प्रधान होता है अतः भोक्ता जीव पर अनुग्रह कर उसके माया-जन्य-पाश का निवारण कर प्रभु उसको अंगीकार कर लेते हैं। अथवा स्नेहाधिक्यवश जीव अपने प्रेमास्पद प्रभु के सम्मुख इठला उठता है। ‘परवश जीव स्ववश भगवंता जीव अनेक एक श्रीकांता।’ जीव परतन्त्र है, भगवान स्वतन्त्र हैं; स्वभावतः जीवमात्र, सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान् का अनुसरण करता है। ‘वशीकृर्वन्ति मां भक्त्या सत्स्त्रियः सत्पतिं यथा।’[1] जैसे सत् स्त्री सत्पति का अनुसरण करती हुई उसको अपने वश में कर लेती है वैसे ही जीव भी भगवदनुसरण करते हुए भगवान को अपने वश में कर लेता है। अस्तु, भगवान में स्त्रीत्व और जीव में पुरुषत्व का भाव आ जाता है। ‘परतन्त्रतैव स्त्रीत्वं स्वतन्त्रतैव पुरुषत्वम्।’ परतन्त्रता ही स्त्रीत्व है, स्वतन्त्रता ही पुरुषत्व है। परस्पर भाव-परिवर्तन ही अत्यन्त उत्कृष्ट श्रृंगार-वर्णनान्तर्गत विपरीत-रति-वर्णन का रहस्य है।
एक कथा है; जीवगोस्वामी वृन्दावन धाम में रहा करते थे; मीराबाई भी यात्रान्तर्गत वहाँ पहुँची; जीवगोस्वामी की दर्शनेच्छा से मीराँबाई ने उनके पास सन्देश भेजा। उत्तर देते हुए जीवगोस्वामी ने कहला दिया, ‘मैं स्त्रियों से नहीं मिल सकता।’ प्रति-उत्तर में मीराँबाई ने कहलाया कि ‘आज तक तो मैं यही जानती थी कि वृन्दावन धाम में भगवान श्रीकृष्ण ही एकमात्र परम पुरुष हैं अन्यथा अन्य पुरुषों का दर्शन मुझे भी अभीष्ट नहीं।’ इस प्रति-उत्तर से गोस्वामीजी अत्यन्त प्रभावित हुए और स्वयं ही मीराँबाई से मिलने पधारे।
गोपांगनाएँ कह रही हैं, “हे प्रभो! सरसिज कर्णिकान्तर निवासिनी श्री को आपने चुरा लिया; यह भी ब्रह्मस्व है; सरसिज से ही ब्रह्मा प्रादुर्भूत होते हैं। ब्राह्मण के धन का अपहरण तो कठोरातिकठोर चोर-गण भी नहीं करते परन्तु आपने ब्रह्मस्व श्री को भी नहीं छोड़ा। इतना ही नहीं, यह पद्मासना श्री योगिनी है; इसकी प्रवृत्ति अन्तर्मुखी है, साथ ही आपसे विरत भी है तब भी आप उसको तो चुरा लाये परन्तु हम अनुरागिणी जनों का वध ही कर रहे हैं। सामान्य लौकिक रागी, कामुक व्यक्ति भी सुन्दरी-जनों का अपहरण तो कर लेते हैं, परन्तु संहार कदापि नहीं करते। हे वरद! हे सुरतनाथ! आप द्वारा हमारा वध क्योंकर उचित हो सकता है?” गोपांगनाओं की उपर्युक्त उक्तियाँ प्रणयकोपयुक्त हैं; प्रणय-कोप अत्यधिक स्नेहावेश का ही परिणाम है। जयदेव भी कहते हैं-
अटति भवानबलाकवलाय वनेषु न तत्र विचित्रम्।
प्रथयति पूतनिकैव वधूवधनिर्दयबालचरित्रम्।
अर्थात् हे प्रभा! आप जो वनों में भटक रहे हैं उसका एकमात्र प्रयोजन अबला-भक्षण ही है। इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं है क्योंकि पूतना-वध ही आपके निर्दय बाल-चरित्र की प्रशस्ति कर रहा है।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)
क्रमश:
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