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गोपी गीत
अर्थात् जैसे प्रेयसी को प्रियतम के हृदय पर क्रीड़ा करना अथवा उनके पदयुग की परिचर्या करना दोनों ही में समान रूप से आनन्द प्राप्त होता है वैसे ही तत्त्वज्ञानी के लिए निर्विकल्प समाधि में लीन रहना अथवा भावित द्वैत में पूजन करना दोनों ही समान है; अथवा जैसे कोई नव-वधू सखियों द्वारा पूछे जाने पर सभा में बैठे अपने पति को अंगुल्या निर्देश से ही बता देती है; तात्पर्य कि आवरण एवं उसका अपनयन दोनों ही विशिष्ट रस के उद्बोधक हैं। रासलीला करते-करते भगवान का अन्तर्धान हो जाना भी एक प्रकार का प्रावरण ही है। सारस-पत्नी लक्ष्मणा केवल सम्प्रयोगजन्य रस का ही अनुभव करती है तथा चक्रवाकी विप्रयोगजन्य तीव्रताप के अनन्तर सहृदय-वेद्य सम्प्रयोगजन्य अनुपम रस का आस्वादन करती है; सारस-पत्नी लक्ष्मणा चक्रवाकी से कहती है-हे सखी! तुम्हारा हृदय बड़ा कठोर है। भादों की अमावस्या की रात्रि में तुम्हारे प्रियतम तुमसे दूर नदी के उस पार हैं तुम स्वयं नदी के इस पार हो; ऐसे भीषण अवसर पर भी तुम प्रियतम से वियुक्त होकर जी रही हो; तुम्हारा हृदय कितना कठोर है?
चक्रवाकी उत्तर देती हुई कहती है-हे सखी! तुम निरन्तर सम्मिलन-सुख का ही अनुभव करती हो अतः तुम नहीं जानती कि विप्रयोगजन्य तीव्र ताप के अनन्तर सम्प्रयोगजन्य आनन्द की कितनी लोकोत्तर अनुभूति होती है। भगवान श्रीकृष्ण के अन्तर्धान हो जाने के कारण उनके विप्रयोगजन्य तीव्र ताप से संत्रस्त हो गोपांगनाएँ उनकी स्तुति करते हुए उनको मना रही हैं। उनके विरह में गोपांगनाओं की स्थिति प्राण-विहीन तनु-सदृश हो रही थी; उनके प्राकट्य से लोकोत्तर आनन्दातिशय का अनुभव करती हुई वे सहसा ही उठ खड़ी हुई मानों ‘तन्वः प्राणमिवागतम्’ प्राणविहीन तनु में प्राण पुनः लौट आये हों। मूलप्रसंगानुसार कहना यही है कि निर्विशेष परब्रह्म का रस -विशेषोल्लास ही कामरूप तृतीय पुरुषार्थ है। निर्गुण, निराकार, परब्रह्म का अनुभव करने वाले ब्रह्मविद् वरिष्ठ सनकादिक, शुकादिक भी इस रसोल्लास-अनुभव के लिए लालायित रहते हैं। सृष्टि का मूल काम है। ईश्वर ने कामना की ‘सोऽकामयत बहु स्याम्।अपनी इस कामना से प्रेरित ‘मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम्।’
क्षुब्द हुआ कारण ब्रह्म प्रकृतिरूप अपनी योनि से संसृष्ट होकर उसमें गर्भाधान करता है; पुरुष के अंग का सार ही शुक्र है। ‘अंगादंगात् सम्भवति’ जैसे दूध के कण-कण में नवनीत विद्यमान रहता है वैसे ही पुरुष के अंग-अंग में रहने वाला सार-तत्त्व ही शुक्र है। यह शुक्र गर्भ में निक्षिप्त होकर गर्भ-पदवाची होता है। इसी तरह स्वप्रकाश चित् के अंग-अंग में व्याप्त चित्-प्रतिबिम्ब ही प्रकृति में निहित होता है; जैसे गर्भाधान का फल सन्तानोत्पत्ति है वैसे ही अनन्त, अखण्ड निर्विकार, परब्रह्म के चित्-प्रतिबिम्ब का प्रकृति में आधान होने पर प्रकृति से सम्पूर्ण विश्व-प्रपंच की सृष्टि हुई। सृष्टि का मूल काम कारणरूप है; सम्पूर्ण लौकिक काम कार्यरूप है।
भगवान स्वयं साक्षान्मन्मथमन्मथ हैं। कथा है कि स्वयं मन्मथ कामदेव भगवान पर विजय पाने हेतु चले परन्तु भगवान के पदनखमणि चन्द्रिका के दर्शनमात्र से ही मोहित हो उठे अतः गोपांगनाभाव को प्राप्त कर पदनखमणि-चन्द्रिका की आराधना-योग्य बनने का प्रयास करने लगे। मन्मथ अर्थात् मन को मुग्ध कर लेने वाला; कामदेव अत्यन्त मोहक है अतः मन्मथ है; भगवान मन्मथ के भी मन्मथ हैं, कामदेव को भी मोहित कर लेने वाले हैं। सामान्यतः ‘मोहि न नारि कै रूपा’ नारि अन्य नारी के रूप पर मोहित नहीं होती परन्तु विशिष्ट स्थिति में यह सामान्य नियम टूट जाता है; द्रौपदी के लोकोत्तर सौन्दर्य को देखकर स्त्रियों में भी अर्जुन बनकर उस सौन्दर्य-संस्पर्श की कामना जाग्रत हुई।
‘पाञ्चाल्याः पद्मपत्राक्ष्याः स्नायन्त्या जघनं घनम्।
याः स्त्रियो दृष्टवत्यस्ताः, पुम्भावं मनसा ययुः।’
अथवा-
‘रंगभूमि जब सिय पगु धारी। देखि रूप मोहे नर-नारी।
भगवती सीता के लोकोत्तर अपूर्व सौन्दर्य-माधुर्य पर मुग्ध हो स्त्रियाँ भी राम-सायुज्य प्राप्त कर उस माधुर्यानुभूति के लिए लालायित हो उठीं। तात्पर्य यह कि लोकोत्तर दशा में स्त्री का स्त्रीत्व तथा पुरुष का पुरुषत्व अपगत हो जाता है। अस्तु, भगवान श्रीकृष्णचन्द्र की पदनखमणिचन्द्रिका का सौन्दर्य-माधुर्य ऐसा अद्भुत अपूर्व था कि विश्व-मोहन मन्मथ स्वयं ही मुग्ध हो उठे, स्वयं कामदेव का पुंस्त्व-भाव भी अपगत हो गया। लौकिक-काम बन्धन का हेतु होता है परन्तु भगवत-सम्बन्ध से ग्राम्य-सुरत भी कल्याणकारी ही होता है। द्वारिका की पट्टमहिषियों एवं गोपांगनाओं को भगवत-सानिध्य-सुख भी प्राप्त हुआ। लौकिक-काम के द्वारा रागादि-जन्य अनेकानेक संस्कार बनते हैं, इन संस्कारों से विभिन्न वासनाएँ उद्यत होती हैं, वासनाएँ ही जन्म का मूल कारण हैं। जैसे भुना हुआ अन्न-बीज खाने के काम में आता है परन्तु अग्नि-सम्पर्क के कारण उनकी अंकुरोत्पादिनी शक्ति नष्ट हो जाती है वैसे ही भगवत-सम्बन्ध से कर्मों के जन्मान्तर-प्रादुर्भाव की शक्ति विनष्ट हो जाती है। अथवा जैसे दीपक-बुद्धि से भी चिन्तामणि की ओर प्रवृत्ति होने पर अन्ततोगत्वा चिन्तामणि की ही प्राप्ति होती है वैसे ही सर्वाधिष्ठान सर्वव्याम सर्वज्ञ प्रभु की ओर किसी भी बुद्धि से यहाँ तक कि जार-बुद्धि से भी प्रवृत्त होने पर भी परात्पर परब्रह्म प्रभु को ही प्राप्ति होती है।
‘नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप।
अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः।’
प्राणीमात्र के कल्याण-हेतु ही निर्विकार, निराकार, निगुर्ण सच्चिदानन्दघन परम-प्रभु का सगुण साकार स्वरूप में प्रादुर्भाव होता है अतः जिस किसी भाव से भी भगवदुन्मुख हो जाने पर ही प्राणी का निःश्रेयस कल्याण हो जाता है। कंस ने श्रीकृष्ण को अपना शत्रु एवं महाभय का कारण मानकर ही भगवत स्वरूप का चिन्तन किया।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)
क्रमश:
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