Monday, 28 January 2019

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गोपी गीत

भगवदनुसन्धान में तत्पर होने पर प्राणी के प्राकृत शरीर का क्षय एवं अप्राकृत, रसमय शरीर की क्रमशः अभिवृद्धि होने लगती है। श्रवण, मनन, निदिध्यासन के द्वारा अन्नमयादि कोषों से युक्त होकर स्वस्वरूप होने पर जीव को ब्रह्म का अभिन्न अनुभव होता है। उपाधि को बाध कर त्वं पदार्थ शोधन कर लेने पर ही तत्पदार्थ का अभेद अनुभव सम्भव हो सकता है।

मैत्री सदा समान में ही होती है। सच्चिदानन्दघन परब्रह्म अभौतिक है; जीवात्मा भौतिक है अतः परस्पर असम है; असम का योग कदापि सम्भव नहीं अतः परमात्म-सम्मिलन हेतु जीवात्मा में अभौतिकता का उद्बोधन अनिवार्य हो जाता है। सच्चिदानन्दघन, परात्पर परब्रह्म, रसस्वरूप हैं अतः जीवात्मा में रसात्मा का उद्बोधन होने पर ही रसानुभूति सम्भव है। जीवात्मा में रस-बोधनहेतु भू-शुद्धि, भूत-शुद्धि, प्राण-प्रतिष्ठा एवं विभिन्न न्यासादिक क्रियाओं से लौकिक स्वरूप की भौतिकता, देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि अहंकार की जड़ता का प्रशमन किया जाता है। भूत-शुद्धि द्वारा भगवदुपासनोपयोगी नवीन देह का निर्माण होने पर सम्यक् उपासना सम्भव होती है। यही कारण है कि नारदजी के दिव्य-देह का निर्माण हुआ। विशिष्ठ साधक अपनी भावनाओं द्वारा ही वायु-बीज से शोषण, अग्नि-बीज से दहन एवं पन्चभूतात्मक बीजों से तत्-तत् भूतों के लय द्वारा प्राण-प्रतिष्ठा करते हैं; मन्त्र-न्यास, अक्षर-न्यास एवं अन्य विभिन्न न्यासों के ,द्वारा उस नव-निर्मित दिव्य-देह की अलौकिकता एवं रसात्मकता अभिवृद्धिंगत की जाती है।

उपासना-संस्कार-संस्कृत दिव्य-देह की अलौकिकता एवं रसात्मकता की विशेष अभिवृद्धि-हेतु यमुना-स्नानादि किया जाता है। जैसे पारद में निघर्षित गन्धक पारद हो जाता है अथवा सिद्धरस में निक्षिप्त वस्तु उस रस-विशेष से प्रभावित हो जाती है वैसे ही सच्चिदानन्दघन, परात्पर, रस-स्वरूप, परब्रह्म प्रभु का निरन्तर अनुसन्धान करते रहने से प्राकृत देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकारादिक भी अप्राकृत रस-स्वरूप परब्रह्म-स्वरूप बन जाते हैं। अस्तु, नारदजी को भी अपने उपासना-संस्कार-संस्कृत दिव्य-देह में भी कुसुम-सरोवर-स्नान से विशेष रसात्मकता अनुभूत हुई; तदनन्तर उनको नित्यनिकुन्जेश्वर श्रीकृष्ण एवं नित्यनिकुन्जेश्वरी राधारानी का दर्शन प्राप्त हुआ। मूलप्रसंगानुसार तात्पर्य यह कि भगवदीय स्वेच्छा से लीला-हेतु ही लीला एवं लीला परिकरान्तर्गत सम्पूर्ण रसमय स्वरूप में भी विकासक्रमानुसार विभिन्न प्रावरण स्वीकृत है। वेणु-गीत द्वारा इन प्रावरणों का अपनयन हुआ।

भगवान ने वंशी-वादन के व्याज से अपनी अधर-सुधा का संचार कर समस्त वृन्दारण्य एवं तदन्तर्वर्ती लता-गुल्मादि एवं गोपांगनाओं को स्व-स्वरूप प्रदान किया। वेणु-छिद्रो से निरावरण परब्रह्म श्रीकृष्णचन्द्र के मंगलमय मुखचन्द्र का मधुर अधर-सुधा-रस वेणु-गीत रूप में प्रसरित होते हुए गोपांगना-जनों के उपासना-संस्कृत दिव्यकर्णकुहरों द्वारा उनके अन्तस्त्ल में प्रविष्ट हो उनके लौकिकत्व के बाधन तथा श्रीकृष्ण-परम-अनुराग-सम्बर्द्धन में सहायक हुआ। श्री वल्लभाचार्य के मतानुसार वेणु-वादन द्वारा प्रसरित यह अधर-सुधा-रस तीन प्रकार का है-गीत, नाद एवं रव। ‘गीत’ भगवद्भीग्या, ‘नाद’ देवभोग्या एवं ‘रव’ सर्वाभोग्या सुधा है। श्रीमद् वृन्दावन-धाम के तृण, लता, गुल्मादि तथा पशु-पक्षी आदि सम्पूर्ण लीलापरिकररूप देवगण देव-भोग्या अधर-सुधा के अधिकारी हुए। यहाँ ‘देव’ शब्द का तात्पर्य लौकिक देव से नहीं, अपितु-

‘द्योतनात्मकत्वात् देवाः भगवतस्वरूपभूताः खगमृगवृक्षलतादयः।’
अर्थात् प्रकाशस्वरूप भगवान के स्वरूपभूत होने के कारण खग-मृग-वृक्ष-लता आदि ही से है।

‘बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं,
बिभ्रद्वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्।
रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दैः,
वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः॥

‘रश्च वश्च रवम्’, ‘र’ अग्निबीज है; इससे विवक्षित है विप्रयोगात्मक शृगांर-रस-समुद्र। ‘व’ अमृतबीज है; इससे विवक्षित है संप्रयोगात्मक-श्रृंगार-रस-समुद्र; दोनों ही एककालावच्छेदेन उद्वेलित हैं; तात्पर्य कि संप्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक-उभयविध एककालावच्छेदेन उद्बबुद्ध-श्रृंगार-रस-समुद्र।

एकमात्र भगवान हो सकल-विरुद्ध धर्माश्रय हैं अतः निरावरण रसस्वरूप परब्रह्म ही रव है। भगवान का अधर इस अनुपम सुधा-रस का कोषाध्यक्ष है। ‘अधरः लोभः’ अधर मूर्तिमान् लोभ ही है। मूर्तिमान लोभ स्वयं ही कोषाध्यक्ष है अतः इस निरतिशय-सुमधुर-अधर-सुधा का वितरण भी अत्यन्त सकुचित है।

निरावरण विशुद्ध रसमय स्वरूप में भी लीला हेतु प्रावरण (आच्छादन) एवं उसका अपनोदन स्वीकृत होता है; ये आच्छादन एवं अपनोदन दोनों ही विशिष्ट रस के उद्बवोधक हैं। विभूति-वर्णन में कहा है ‘कनककपिशं वैजयन्तीं च मालां’ अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण का पीताम्बर साक्षात माया है; जैसे माया ब्रह्म को प्रावरित किए रहती है वैसे ही दामिनी-द्युति-विनिन्दक-पीताम्बर निखिल-रसामृत-मूर्ति सच्चिदानन्दघन परात्पर परब्रह्म प्रभु श्रीकृष्ण को आच्छादित किये रहता है; जैसे मायाजाल में फँसा प्राणी परब्रह्म-स्वरूप का दर्शन नहीं कर पाता वैसे ही जिनकी दृष्टि दामिनी-द्युति में ही उलझी रह जाती है वे दामिनी-द्युति-विनिन्दक-पीताम्बर-समावृत संप्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उभयविध एककालावच्छेदेन उद्बुद्ध-श्रृंगार-रस-स्वरूप श्रीकृष्णचन्द्र स्वरूप का अनुभव नहीं कर पाते हैं। वस्तुतः सावरण रस ही अधिकाधिक प्रिय होता है। रामचरितमानस में एक अत्यन्त रोचक उदाहरण प्राप्त होता है। वनवास-काल में ग्राम-वधुओं के प्रश्न का उत्तर देती हुई जनक-नन्दिनी जानकी अपने प्राणनाथ राघवेन्द्र रामचन्द्र की ओर घूँघट-पट की ओट से झाँक देती हैं-

‘बहुरि बदनु बिधु अन्चल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी।।
खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि।’

शुष्क बहिर्मुख प्राणी सावरण रस की सरसता का अनुभव नहीं कर पाता। वेदान्ती भी मानते हैं-

‘प्रियतमहृदये वा खेलतु प्रेमरीत्या पदयुग-परिचर्या प्रेयसी वा विधत्ताम्।
विहरतु विदितार्थो निर्विकल्पे समाधौ ननु भजनविधौ वा तुल्यमेतद्व्द्वयं स्यात्।’
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)

क्रमश:

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