Monday, 28 January 2019

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गोपी गीत

व्रजधाम की लीलाएँ माधुर्य-भावप्रधान हैं। ऐश्वर्यभाव माधुर्य-रस का विघातक है; भगवदैश्वर्य के प्राकट्य से माधर्यु-भाव-पूर्ण लीलाएँ सर्वथा असम्भव हो जाती हैं अतः भगवान श्रीकृष्ण ने तत्क्षण ‘वैष्णवी व्यतनोन्मायां पुत्रस्नेहमयीं विभुः’ वात्सल्यभाव-प्रधान पुत्र-स्नेहमयी वैष्णवीमाया का प्रसरण किया। भगवान ने लीला की; बालकृष्ण ने मिट्टी खाई; ग्वाल-बालों ने चुगली खाई; अग्रज बलदाऊ ने शिकायत की; क्रोध में भरी पुत्रहितैषिणी अम्बा छड़ी लेकर चलीं; पुत्र श्रीकृष्ण को पकड़कर अम्बा पूछ रही हैं ‘कस्मान्मृदमदान्तात्मन् भवान् भक्षितवान् रहः।’ अरे चपल! चन्चल! तूने मिट्टी खाई?

माता की छड़ी से भयभीत बालक कृष्ण कहते हैं, ‘नाहम् भक्षितवानम्ब सर्वे मिथ्याऽभिशंसनिः।’ माँ मैंने मिट्टी नहीं खाई। ये सब तेरे ग्वाल-बाल, दाऊ-भैया, सब मिलकर मुझे पिटवाने का उपक्रम किये हैं। विश्वास न हो तो ‘समक्षं पश्य मे मुखम्’ ले, देख ले मेरा मुँह। श्रीमुख में मृत्तिका है अतः बालकृष्ण मुँह खोलते नहीं तथापि नन्दरानी के कोप से रवि की रश्मियों के कारण उनका मुख-कमल खिल गया; इस प्रस्फुटित मुख-कमल में अखिल ब्रह्माण्ड का दर्शन कर नन्द-गेहनी यशोदारानी स्तम्भित हैं।

‘सूनोस्तनौ वीक्ष्य विदारितास्ये व्रजं सहात्मानमवाप शंकाम्।’
‘अहं ममासौ पतिरेष में सुतो व्रजेश्वरस्याखिलवित्तपा सती।
गोप्यश्च गोपाः सहगोधनाश्च मे यन्माययेत्थं कुमतिः स मे गतिः।’

भाव-विभोर भक्त कहता है, माता के भय में प्रभु झूठ बोल गये; इतना ही नहीं, एक झूठ को छिपाने के लिए अनेक झूठ बोल रहे हैं। वेदान्ती अर्थ करते हैं, ‘नाहम् किन्चिद् बाह्यं भक्षितवान् किन्तु सर्व मदन्तःस्थमेव।’ कोई ऐसी बाह्य वस्तु है ही नहीं जो मैं खाता हूँ।

‘उत्क्षेपणं गर्भगतस्य पादयोः किं कल्पते मातुरधोक्षजागसे?
किमस्ति नास्ति व्यपदेशभूषितं तवास्य कुक्षेः कियदप्यनन्तः।।’

हम सब अस्ति, नास्ति के व्यपदेश के विषय में रहने वाले आपके कुक्षिगत शिशु हैं। सम्पूर्ण चराचर विश्व-प्रपंच का प्रतिबिम्ब स्वयं दर्पण के अन्तर्गत ही है।

‘चिद्रूपदर्पणे स्फारे समस्तावस्तु दृष्टयः।
इमास्ताः प्रतिबिम्बन्ति सरसीव तटद्रुमाः।’

जैसे सरोवर के किनारे के वृक्ष सरोवर में प्रतिबिम्बित होकर दृष्टिगोचर होते हैं वैसे ही अखण्ड-भान-रूप शुद्ध दर्पण में सम्पूर्ण चराचर विश्व-प्रपंच प्रतिबिम्ब न्याय से भाषित होता है। जीवगोस्वामी कहते हैं, भगवान ने मुँह खोला नहीं तथापि कर्म-कर्तृ-प्रक्रिया के अनुसार मुँह खुल गया। ‘व्यादत्त-व्यारात् मातृकोप रविरश्मि लेशवशात् मुखनीलाम्बुजं विकसितं दधार इत्यर्थः।’ जहाँ सौकर्यातिशय अभिव्यक्ति हेतु कर्तृ-व्यापार की प्रतीक्षा न हो वहाँ कर्म-कर्तृ-प्रक्रियानुसार प्रत्यय प्रयोग होता है। भगवदीय मोहिनी शक्ति किंवा वैष्णवी माया-शक्ति ही सम्पूर्ण लीलाओं का प्राण है। वैष्णवी-माया-शक्ति द्वारा ही परात्पर परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्र अपने अनन्त अखण्ड दिव्य स्वरूप को और वृषभानुनन्दिनी राधारानी अपनी कृष्णाभिन्नता को परावृत कर लेती हैं; इस परावरण के कारण ही विप्रलम्भ एवं तज्जन्य दुःसह वेदना?

उत्सुकता, उत्कण्ठा, श्रृंगार एवं सम्मिलन आदि विभिन्न भावानाओं की तथा वेणु-गीत, युगल-गीत, गोपी-गीत, भ्रमर-गीत जैसे भावपूर्ण गीतों की अभिव्यक्ति सम्भव हुई। जिस प्रकार स्वेच्छा से भाँग पीकर यदाकदा स्वयं को भी मोहित किया जाता है उसी प्रकार भगवान का यह व्यामोहन भी लीला-हेतु स्वेच्छया ही होता है। यदि इस प्रकार आवरण न होता तो अपने से भिन्न रमण सामग्री की अपेक्षा भी क्योंकर सम्भव होती? अस्तु, स्वरूपभूत परमानन्द का आवरण होने पर लीला एवं लीलाओं की कल्पना हो जाती है।

बृहन्नारदीय पुराण में एक कथा है; एक बार महामुनि नारद ने भगवान श्रीकृष्णचन्द्र एवं नित्य-निकुन्जेश्वरी राधारानी के निकुन्ज स्वरूप-दर्शन की लालसा से दीर्घावधिपर्यन्त कठिन तपस्या की; उनकी तपस्या से प्रसन्न हो भगवती ने अपनी सखी को भेज दिया; उस सखी ने नारदजी को मथुरा एवं गोवर्धन-धाम के मध्य में स्थित कुसुम-सरोवर में स्नान कराया; स्नान के प्रभाव से नारदजी गोपांगना बन गये; तदनन्तर उस सखी ने नारदजी को सरोवर के किसी दूसरे कोण पर पुनः स्नान कराया; इस स्नान के प्रभाव से नारदजी लौकिक स्त्रीत्व-पुंस्त्व को कल्पना से ही विरत हो गये। तात्पर्य कि जब तक अन्तःकरण लौकिक स्त्रीत्व-पुंस्त्व की भावना से ग्रस्त रहता है तब तक रासलीला के लोकोत्तर रस का सम्यक् आस्वादन असम्भव है। वेदान्त के अद्वैतीय पक्षानुकूल भी त्वं पदार्थ का शोधन वांछनीय है; कर्ता, भोक्ता, अल्पज्ञ, अल्पशक्तिमान् जीवात्मा का परमात्मा से अभेद कदापि सम्भव नहीं; अतः भोग-त्याग-लक्षण द्वारा त्वं पदवाच्य जीवात्मा की अल्पज्ञता, अल्पशक्तिमत्ता एवं देहेन्द्रियादि नायकता का अपनोदन होने पर ही परमात्मा से अभिन्नता सिद्ध होती है।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)

क्रमश:

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