Monday, 28 January 2019

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गोपी गीत

श्रीमद्भागवत-शब्द हैं ‘कामस्तु वासुदेवांशः’ काम वासुदेव भगवान् श्रीकृष्ण का अंश है अर्थात् पुत्र है। भगवान् श्रीकृष्ण साक्षान्मन्मथ हैं। देश-काल वस्तु-कृत परिच्छेद-रहित तत्त्व ही अनन्त ब्रह्म है; ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ तथापि जैसे स्वभावतः मधुर इक्षु-दण्ड के फल में लोकोत्तर माधुर्य अथवा मलयाचलोत्पन्न चन्दन-वृक्ष के पुष्प में लोकोत्तर सौरभ स्वाभाविक है वैसे ही तत्त्वज्ञ के अन्तःकरण पर अभिव्यक्त परब्रह्म के माधुर्यादि की अपेक्षा स्वयं अपनी ही परमाह्लादिनी लीला-शक्ति पर अभिव्यक्त भगवत्-स्वरूप के सौन्दर्य-माधुर्यादि अत्यन्त विलक्षण हैं। यही रस का विशेष उल्लास है।

जिस समय शुद्ध परब्रह्म अपनी अचिन्त्य लीला-शक्ति से कोटि-काम-कमनीय मनोहर श्रीकृष्णमूर्ति में प्रादुर्भूत हुआ उस समय प्रपंचातीत प्रत्यागभिन्न परमात्म-तत्त्व में निष्ठा रखने वाले मुनीन्द्र-योगीन्द्र के मन भी अनायास उस भगवन्मूर्ति की ओर आकृष्ट हो गये। जिस प्रकार सूर्य को दूरवीक्षण यन्त्र द्वारा देखने पर उसमें जो विचित्रता प्रतीत होती है वह केवल नेत्रों से देखने पर प्रतीत नहीं होती उसी प्रकार लीलाशक्त्युपहित सगुण ब्रह्म-दर्शन में जो आनन्दानुभव होता है वह अशेष-विशेष-शून्य शुद्ध परब्रह्म के साक्षात्कार में भी नहीं होता।

ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा, उभय वेष धरि की सोइ आवा।
सहज विराग रूप मन मोरा, थकित होत जिमि चन्द-चकोरा।
इनहिं विलोकत अति अनुरागा, बरबस ब्रह्म सुखहिं मन त्यागा।

अथवा,
यावन्निरन्जनमजं पुरुषं जरन्तम् सन्चिन्यामि सकले जगति स्फुरन्तम्।
तावत् बलात् स्फुरति हन्त! हृदन्तरे मे गोपस्य कोऽपि शिशुरन्जनपुन्जमन्जुः।

अथवा,
क्लेशे क्रमात् पन्चविधे क्षयं गतेयद् ब्रह्म सौख्यं स्वयमस्फुरत् परम्।
तद् व्यर्थयन् कः पुरतो नराकृतिः श्यामोऽयमामोदभरः प्रकाशते।

इत्यादि सहस्रों वचन इस प्रकार के हैं जिनसे यह सुस्पष्ट हो जाता है कि निराकार, निर्विकार, सच्चिदानन्द परात्पर परब्रह्म में पूर्णतः परिनिष्ठित, आत्मकाम, पूर्णकाम, परमनिष्काम, आत्माराम ब्रह्मविद्वरिष्ठ जन भी सगुण, साकार व्रजेन्द्र-नन्दन श्रीकृष्णचन्द्र का साक्षात्कार कर उस मधुर, मनोहर, मंगलमय मूर्ति में तन्मय हो गये; यही रसोल्लास का चमत्कार है।

जैसे, ज्वार आने पर समुद्र उद्वेलित हो जाता है उसी प्रकार अचिन्त्य दिव्य लीला-शक्ति के योग से सच्चिदानन्दघन परब्रह्म पूर्णतम पुरुष में जब विशेष रूप से रसोल्लास होता है तब वही रस-महासमुद्र होकर उद्वेलित हो उठता है। इस उद्वेलित रस-महासमुद्र का अत्यन्त अद्भुत चमत्कार है। भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के मुखचन्द्र के माधुर्यामृत का, श्रीअंग के लावण्यामृत का तथा पारादविन्द के सौगन्ध्यामृत का रसास्वादन आदि सम्पूर्ण उसी उच्चकोटि के सम्भोग के अन्तर्गत आते हैं। यही कामरूप तृतीय पुरुषार्थ है। बृहदारण्यक उपनिषद् के अनुसार ‘स एकाकी न रेमे- अतः ‘द्वितीयम् ऐच्छत्’ और स्वयं ही दो विभिन्न रूपों में प्रादुर्भूत हुआ, ‘एकं ज्योतिरभूद् द्वेधा राधामाधवरूपकम्’ एक ही ज्योति राधा और माधव दो रूपों में प्रादुर्भूत हुई। त्रिपुरा-रहस्य सिद्धान्तानुसार वहीं एक ज्योति राजराजेश्वरी त्रिपुरसुन्दरी भगवती जगज्जननी कामेश्वरी पराम्बा ललिता एवं राजराजेश्वर कामेश्वर स्वरूप में प्रादुर्भूत हुई। बृहदारण्यक में प्राप्त शतरूपा एवं मनु की कथा इसी भाव की द्योतक है; शतरूपा ने क्रमेण अनेक रूप धारण किये; मनु भी क्रमेण तत् तत् रूप धारण करते गये। पूर्णानुराग समुद्भूत सरोज ही व्रजधाम है; इस केशर का पराग है आनन्दकन्द, परमानन्द श्रीकृष्णचन्द्र और इस पराग की मकरन्द रस हैं श्री रासेश्वरी, नित्य-निकुन्जेश्वरी राधा-रानी। अतः एक ही रस, सरोज-स्वरूपही ज्योति राधा और माधव दो रूपों में प्रादुर्भूत हुई।

‘त्रिपुरा-रहस्य’ सिद्धान्तानुसार वहीं एक ज्योति राजराजेश्वरी वृन्दावन धाम, सरोज केशरस्वरूप अनन्तान्त गोपांगनाएँ, केशर (पराग) स्वरूप श्रीकृष्णचन्द्र एवं पराग-मकरन्द-रसस्वरूप राधारानी आदि विभिन्न रस-स्वरूपों में उल्लसित हुआ; इस सब रसों में वृन्दावन धाम ही मुख्य है; श्रीमद् व्रजधाम स्वयं ही महान् रस है, यमुना साक्षात् अनुराग-द्रव है, गोवर्धन पर्वत साक्षात् प्रेम-पुन्ज है, इसी तरह राधा-कुण्ड, कृष्ण-सरोवर आदि भी रसविशिष्ट ही हैं तथापि उनके तत् स्वरूप का दर्शन विशिष्ट भगवदनुगृहीत व्यक्तियों को ही हो सकता है।

इसी तरह भगवान श्रीकृष्णचन्द्र तथा राधारानी एवं गोपांगनाओं के सम्पूर्ण हास-विलास-परिहास भी विभिन्न रस ही हैं; उपर्युक्त सम्पूर्ण रसों का समूह ही रास है ‘रसानां समूहो रासः।’ इस रस-समूह में भी सावरण एवं निरावरण दो भेद हैं। वस्तुतः निरावरण में भी लीलाहेतु स्वेच्छया वैष्णवी-माया द्वारा ब्रह्मस्वरूप समावृत हो जाता है परन्तु वैष्णवीमाया द्वारा लीला-विशेष-विकास-हेतु उपयोगी भेद का ही स्फुरण होता है। ‘अथो अमुष्यैव ममार्भकस्य यः कश्चनौत्पत्तिक आत्मयोगः’ अपने पुत्र बालकृष्ण के मुख में सम्पूर्ण विश्व-प्रपन्च का दर्शन कर यशोदा रानी को भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के दिव्य स्वरूप का प्रबोध हो गया। वे विचार करने लगीं, ‘अरे! यह तो सर्वाधिष्ठान, सर्व-शक्तिमान्, सर्वेश्वर, अनन्तकोटि-ब्रह्माण्ड-नायक प्रभु हैं और मैं अत्यन्त तुच्छ मोहग्रसिता नारी इनको अपना पुत्र मानकर छड़ी दिखा रही हूँ।’ भयभीता माता के प्रकम्पित हाथों से छड़ी छूट गई। अनन्त-कोटि-ब्रह्माण्ड की ऐश्वर्याधिष्ठात्री महालक्ष्मी भगवान् श्रीमन्नारायण श्रीकृष्ण की सेवा के उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा में सतत व्रज का आश्रयण करती हैं। बालक कृष्ण को माता की छड़ी से भयभीत होते देखकर ऐश्वर्याधिष्ठात्री महालक्ष्मी को अवसर प्राप्त हो गया; ऐश्वर्याधिष्ठात्री शक्ति के प्राकट्य से बालक कृष्ण के मुख में सम्पूर्ण विश्व-प्रपन्च प्रतिभासित हो उठा।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)
क्रमश:

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