Friday, 11 August 2023

155

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
155-

“मैं बैठने नहीं, तुम्हें उठाने के लिए आया हूँ पुत्र। काशी में राम दुआ से अब हनुमान अखाड़ों की कमी नहीं रही।” “नहीं बाबा, अरे पचास से ऊपर अखाड़े वालों को तो मैं जानता हूँ। इनके सारे दगलं मैं ही कराता हूँ।”
तभी गोसाईं जी ने बातों की जटा बढ़ाने वाले जटाशंकर को बीच में ही टोककर कहा- “बेटा, इस शंकर शहर सरोवर के नर नारी रूपी मच्छ-मछलियाँ इस समय बड़ें ही व्याकुल हैं। जैसे नदी के जीवों में माजा की बीमारी पड़ती है न, और उतरा-उतरा कर तट पर मृत जीवों के ढेर के ढेर आकर बिछ जातें हैं, वैसी ही दशा है।” 
“हा बाबा, बचपन में अपने गाँव के तालाब में देखा था। आज वही हाल काशी के नर नारियों का है, आपने ठीक कहा।” 
“पुत्र, व्यायाम प्रिय युवकों के एक बहुत बड़े दल को तुम जानते हो। इसलिए मैं तुम्हारे पास आया हूँ।” 
“आज्ञा करें, बाबा।” 
“क्या कहें जटाशंकर। अपनी इस परम पावन पुरी की दशा तो देख ही रहे हो। घूरों पर चूहों के ढेर पड़े हैं। कहने को तो महामारी का आज दसँवा दिन है पर नगर में ऐसे कितने ही घर है जहाँ मरे हुए शवों को सद्गति करने वाला भी कोई नही बचा है। बेटा, तुम हनुमान अखाड़े के युवा लोग इस समय यदि राम जी की सेवा करोगे तो तुम्हें अपार पुण्य मिलेगा। बोलो, हनुमान जी के नाम की लाज रखोगे? है तुममे राम सेवा करने का साहस?”
हट्टा कट्टा पहलवान जटाशंकर यह सुनकर एक बार तो सिर से पाँव तक सिहर उठा, परन्तु दूसरे ही क्षण वह सिहरन स्फूर्ति बनने लगी, बोला- “यों तो बाबा, यह काम जान से खेलने जैसा है, पर जब आपकी आज्ञा है तो फिर कुछ सोचने का सवाल ही नहीं उठता।”
“जीते रहो पुत्र, राम तुम्हारा सब विधि भला करेंगें। मैं आठों पहर रामरक्षा कवच मंत्र का पाठ करता रहूँगा। हनुमान जी की कृपा से कोई भी युवक इस ज्वर से पीड़ित नहीं हो पाएगा।”
जटाशंकर बोला- “हम तो आपका नाम लेके आग में भी कूद पड़ेंगे। बाकी औरौं के जी की बात मैं कैसे कहूँ। दो चार लोगों से बातें करके बताऊँगा।”
“मैं देखा चाहता हूँ कि परम योगेश्वर महामृत्युँजय की इस नगरी में अभी कितना पुण्य शेष है।”
“अरे बाबा, यों कहने को तो राम-राम शिव-शिव सभी जपते है पर आप जैसी भक्‍ती न हम जवानों में है और न बूढ़ो में। बाकी, मैं आपकी सेवा में हाजिर हूँ।”
“हाँ, यहाँ तो ऊँचे नीचे, बीच के धनिक, रंक, राजा, राय सब श्रेणियों के लोगों को एक करके मैंने इतने दिनों में देख लिया। जब पीड़ा देखतें हैं तो पीठ फेर लेतें हैं। देखना चाहता हूँ कि इन पीड़ितों की सहायता करने का उत्साह तुम्हारे समान और कितनों लोगों के मनों में उमंगता है।” 
जटाशंकर बोला- “अच्छा तो ठहरिए, मैं घर मे अम्मां से कह आऊँ कि द्वार बन्द कर लें। आपको लेके कुछ अखाड़ों के गुरुओं के यहाँ चलूँगा। पहले एक बालक सरदार के यहाँ चलूँगा। आपके प्रभाव से लोगों को राजी करने में सुभीता होगा।” 
जटाशंकर कुप्पी लिए अपने घर की दहलीज तक गया और जोर से आवाज दी- “अम्मां, कुण्डी लगवाय लेव।हम गुसाईं बाबा के साथ एक काम से जाय रहे हैं।” कहकर वह उल्टे पावँ लौट आया। बाहर से किवाड़े उढ़का दिए और गुसाईं जी के साथ तीन चार छोटी छोटी गलियों को पार करके एक घर के सामने पहुँचा और जोर से आवाज लगाई- “ए राम ! रामचन्द्र ! ओ रामचंद्र!”तुलससीदास का मन मुदित हुआ।जब जटाशंकर के सहायक रामचंद्र हैं तो काम बना समझो। 
उसी समय भीतर से किसी पुरुष का स्वर आता है- “अरे कौन है?” 
“हम हैं बाबा, जटाशंकर, जरा राम को जगाय दीजै। अन्दर से खाँसते हुए पुरुष स्वर ने कहा- “अच्छा।” 
इतनी देर में जटाशंकर गोसाईं जी से कहने लगा- “है तो बाबा यह छोटा ही, चौदह पंद्रह बरस का लड़का ही पर ऐसा तेज और फुर्तीला है कि जब आपके सामने आवेगा तो आप भी कहेंगें कि वाह जटाशंकर क्या ततैया भिड़ छाँट के लाए हो।” गोसाईं जी ततैया भिड़ की उपमा सुनकर हँस पड़े।जटाशंकर बोला- “आपके चरणों की सौं बाबा, मैं झूठ नहीं कहता। ये लड़का दस बारह टोलों के लड़कों का मुखिया है समझ लीजिए।यदि यह हिम्मत दिखाजाए तो……।”
कुण्डी खुली, एक कसरती बदन का चौदह-पन्द्रह वर्ष की आयु का बालक मिट्टी की ढिबरी लिए एक हाथ से आँखें मींजते हुए आया।
“जे बजरंग दादा, अरे ! अरे ! अएरे ! ” कहकर ढिबरी वहीं पर रखकर दो सीढ़ियाँ उतरने के बजाय सीधे गली में ही कूद पड़ा और गोसाईं जी के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया।
झुककर उसे, उठते हुए गोसाईं जी बोले- “राम-राम ! आयुष्मान निष्ठावान हो। सुखी हो। अरे बस-बस, अब उठो बेटा। अभी जाड़ा गया नहीं तुम उधाड़े बदन हो। गली ठंडी है।”
गोसाईं जी के पीठ थपथपाकर उठने का आदेश देने से जिस समय रामू उठ रहा था, उसी समय जटाशंकर हसँकर कहने लगा- “आपके सामने बित्ता सा दिखा रहा है, हमको भी मानता है पर ऐसा विकट है कि जिससे भिड़ जाये…”
“जाओ दादा, पर गोसाईं बाबा हमारे घर आए, कैसा अचम्भा-सा लग रहा है। भीतर पधारें महाराज। घर में हमारे बाबा को छोड़कर और कोई नहीं है।” कहकर वह चौखट से ढिबरी उठाकर मुस्तैदी से खड़ा हो गया। उन्हें प्रकाश दिखाते हुए भीतर एक अंधेरे दालान को पार कर एक कोठरीं में ले गया।वहाँ दिया जल रहा था और एक दमे का रोगी अंधा वृद्ध बैठा दोनों हाथों से अपनी छाती दबाए हुए धीरे धीरे हांफ रहा था।
रामू बोला- “बाब़ा, गोसाईं जी महाराज पधारे हैं।”
“कौन गुसाईं, रामू ? हम दीन दरिद्रन के यहाँ तो बस एक गोसाईं धोखे से आय सकते है।”
जटाशंकर ने पूछा- “कौन से गोसाईं आ सकते हैं बाबा?”
रामू ने तब तक चटाई बिछा दी थी और गोसाईं जी को जब बैठने का सविनय संकेत कर रहा था तभी अंधे बाबा अपने दम को बाँधकर धीरे-धीरे बोले- “हम दीन दुखियन का गुसाईं तो एके है भइया, रामायण वाला।”
राम सोत्साह बोला- “वही आए हैं बाबा।”
उत्साह के आवेग में जब कलेजे में हलचल मची तो अंधे बाबा का दम फूल गया।
क्रमशः

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