Thursday, 10 August 2023

152

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
152-

यहाँ कुछ लोग अकारण ही हमारे शत्रु हैं। हमारी रामायण की रक्षा के लिए भी टोडर ने तुम्हीं लोगों को कष्ट दिया था।”
“कष्ट महाराज? भरे ई तौ हम पंचो का सुख है, जो आपकी सेवा करने का अवसर मिलेगा। आप निसा खातिर रहैं। हमारी बिरादरी का एक एक लठैत आपकी सेवा में हाजिर रहेगा। जिसे चाहें बानर बनाय लें और जिसे चाहे पहरेदार। बाकी एक हमारी अरदास है। आज्ञा होय तो अरज करूँ?”
“कहो कहो”
“पहले इस बीच में एकाध दुइ छोटी छोटी लीलाएँ आप करवाय ले तो फिर बड़े काम में हाथ डालने पर और आनंद आएगा।”
तुलसीदास इस सुझाव से खिल उठे, बोले- “तुमने बहुत अच्छी बात कही है हिरदै। अच्छा, पहले दो छोटी छोटी लीलाएँ करेंगे, एक नागनथैया लाला और दूसरी नरसिंह लीला।”
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“अन्यायी कालिय नाग और क्रूर हिरण्यकशिपु दोनों ही के अत्याचारों का सामना नवयुवक ही करतें हैं। एक में कृष्ण की गोप मण्डली है, दूसरे में सत्य-निष्ठ प्रह्लाद। मेरी इन लीलाओं का नगर में, विशेष रूप से युवकों की टोली में , बड़ा ही असर पड़ा वेनीमाधव। अब राम लीला के लिए हर वर्ग में बड़ी उत्सुकता और उत्साह बढ़ गया था। 
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एक दिन टोडर के साथ अपने अस्सी घाट वाले स्थान पर गोसाईं जी बैठे बातें कर रहे हैं। वे कह रहे थे- “हमनें हर बिरादरी में और हर मोहल्ले में सबसे बात कर ली है टोडर। जिस मोहल्ले में जो लीला होगी उसका खर्चा और प्रबंध उसी महल्ले वाले करेंगे और रामायण मैं सुनाऊँगा।”
टोडर बोले- “महात्मा जी, आप जो चाहेंगे वह अवश्य होगा, लेकिन यह‌ न भूलें कि इस नगर के कट्टर शैवपंथी, वल्लभ संप्रदाय वाले और उनके साथ ही साथ बटेसुर महराज जैसे प्रभावशाली दुर्जन लोग आपकी सभाओं में तरह तरह से विध्न डालनें में कोई कसर न उठा रखेंगे।”
गोसांईं जी शांत स्वर में बोले- “टोडर, अबकी यह विध्न डालेंगें तो राम जी की दया से सारा नगर इनके विरुद्ध जायगा। मैं इसीलिए रामलीला प्रदर्शन के साथ रामचरित मानस सुना रहा हूँ। मेरे वानर सब प्रकार के असुरों को दण्ड देने के लिए तैयार रहेंगे।”

उसी समय घाट के एक अधेड़ व्यक्ति घबराए हुए तुलसीदास जी के पास आए, कहा- “अरे बड़ा गजब हुई गया गुसाईं जी महाराज। पूरा कलिकाल आ गया। चारों चरन ठेक के कलजुग खड़ा होइ गवा है ससुरा। कुछ न पूछो।”
“क्या हुआ श्रीधर?”
“अरे एक कोई ससुर वैरागी रहा, वह तांत्रिक रहा, तौन किसी बड़े हाकिम की बड़ी पतुरिया को लैके भाग गवा। अब जितने छोटे बड़े साधू बैरागी हैं सब पकड़े जाय रहे हैं। भला बताओ इ कहाँ का न्याव है महाराज? ”
“तो तात्रिकों को कौन पहिचनवा रहा है भाई?”
“सब मिली भगत है, महाराज। बटेसुअर मिसिर को किसी ने नही पकड़ा महराज, उन्होंने सुना है कि पांच सौ रुपये रिसपत चटाय दी और….”
मुँह की बात मुँह में ही रह गई और आठ दस सरकारी प्यादों को लेकर जमादार और एक ब्राह्मण युवक तुलसीदास की कोठरी के सामने आ पहुँचा। टोडर ने इस ब्राह्मण को बटेश्वर मिश्र के साथ कई बार देखा था। उनके कान खड़के। वह युवक वैसी ही शान और शेखी के साथ, जैसी केवल मूर्ख और दम्भी दिखला सकतें हैं, आगे बढ़ा और चिल्लाकर बोला- “यही है तुलसीदास। इन्हें सम्मोहिनी विद्या सिद्ध है। बड़ी बड़ी सुन्दर स्त्रियों को नित्य फँसाना ही इनका काम है। आज इस शठ के पाप का घड़ा भर गया सो आय फँसा है।” कहकर अपने कंधे पर लटकी हुई लाल झोली से एक काठ की डिबिया निकाली और जल्दी जल्दी मंत्र बुदबुदाते हुए उसका सिदूंर बिजली की फुर्ती से तुलसीदास की छाती पर उछाल दिया। ह ह ह ह ह, बकरे की मिमियाहट की तर्ज पर भैंस की डकराहट जैसी वह हँसी उस कायर वीर के गले से निकलने लगी।
टोडर का हाथ अपनी तलवार की मूठ पर चला गया। तुलसीदास ने दृढ़ता पूर्वक उनका हाथ पकड़ लिया। उनके चेहरे पर परम शांति विराज रही थी।
बटेश्वर का वह कायर वीर शिष्य अपने इस भीषण तांत्रिक प्रहार के बाद भी अपने गुरू जी के गुरुभाई को वैसी ही ज्ञात मुद्रा में देखकर कुछ कुछ भयभीत तो अवश्य हुआ पर दस सिपाहियों की शक्ति उसे अपने गुरू की तंत्र शक्ति से अधिक बल दे रही थी। हँसते हुए बोला-  “हें हें हें हें हमारे गुरू जी से टक्कर लेने चला था। जाने ससुर कौन नीच जात, ठगहारी विद्या करके दो चार मंत्रों के बल पर सच्चे गुरुओं से होड़ ले रहा था।जाओ बेटा, अब चक्की पीसो हें हें हें हें।”
सिपाहियों में दो पठान तुलसीदास को अयोध्या की बाबरी मस्जिद के पास फकीरों के बीच में नित्य रात को देखा करतें थे। उनसे बातें भी हुआ करतीं थीं। उन दिनों यह दोनों पठान अपने सरदार के साथ अयोध्या की मस्जिद पर तैनात थे।दोनों ने आपस में एक दूसरे से बातें की और फिर एक ने तुलसीदास से पूछा- “साधु बाबा, पहले तुम्हारे दाढ़ी मुच्छा था?”
तुलसीदास ने पठान को ध्यान से देखा, पूछा-“आप नूर खां पठान हैं और ये वली खां हैं।कैसे है आप लोग?”
तुलसीदास का स्वर इतना सहज और शांत था कि जैसे यह सिपाही उन्हें पकड़ने नही वरन‌ साधारण आन्तुकों की तरह बोलने बतियाने आए हैं। वली खा ने जमादार से कहा -"हुजूर, हम दोनों इनको अजुध्या से जानता है, ये बाबरी मस्जिद में रोज हमारे फकीरों के साथ उठता बैठता सोता था। बहुत उम्दा गाता है हुजूर ! ऊपर वाले का सच्चा, दुनिया वाले का दोस्त है।”
जमादार ही नहीं, साथ आया हुआ हर सिपाही इस बात में एक मत था कि अब तक जितने वैरागी पकड़े है उनमे यह निराला है। जमादार बोला-“इनके लिए खासतौर से कोतवाल साहब का हुक्म है। इस बिरहमन के गुरू ने कोतवाल साहब की बेगम का कुछ काम किया था।उसकी पहुँच थी, उसी ने इनका पता दिया है।”
“हूँ ” फिर तुलसी की ओर देखकर जमादार ने विनीत स्वर में कहा- “साईं, हम खतावार नहीं , महज हुक्म के बन्दे हैं।
तुलसीदास मुस्कराए, कहा- “चलिए चलिए, आप अपना फर्ज अदा कीजिए और हमे भी अपने मालिक की मर्जी पूरी करने दीजिए।”

“तुलसी जस भविव्यता तैसी मिले सहाइ। 
आपुनु आवइ ताहि पै ताहि तहा ले जाइ॥”
क्रमशः

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