महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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जब कोतवाल के सामने तुलसीदास पेश किए गए तो उनकी बेगम साहबा भी पर्दे के पीछे मौजूद थीं। कोतवाल ने उन्हें सर से पैर तक घूरकर देखा और पूछा-“सुना है, तुमने बहुत शोहरत हासिल की है। तुम बड़े बड़े पण्डितों को भी अपने जादू से बाँध लेते हो।”
तुलसीदास बोले- “मैं जादू टोने नहीं करता, केवल रामनाम जपता हूँ और इसी का प्रचार करता हूँ।”
पर्दे के पीछे से बेगम साहबा ने कोतवाल साहब के कानों मे फरमाया- “मेरी बाँदी बतलाती है, यह बहुत बड़ा फकीर है। इससे कोई करिश्मा दिखलाने को कहिए।”
कोतवाल ने तुलसीदास से कहा-“हमें अपना कोई कमाल दिखला सकते हो।”
तुलसीदास हँसे, बोले-“कमाली तो एक ही है या फिर उसका सिपहसालार है।”
“कौन है उसका सिपहसालार?”
“हनुमान बजरंगवली” - यह कहकर वे सहसा आावेश में आ गए। ऊँचे सशवत स्वर में उनके मुख से एक छप्पय स्रोते सा उमड़कर बह चला।आँखें सामने वाले खम्भे पर ऐसी सध गईं जैसे वहाँ उनका हनुमान हठीला दृढ़ आस्था का स्तम्भ बनकर प्रत्यक्ष खड़ा हो। वे उसे ही अपना छप्पय सुना रहे थे-
“सिधु-तरन, सिय सोच-हरन, रवि वबलवरन-तनु।
भुज विशाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु॥
गहन दहन निरदहन लंक निःसंक बंक, भुव।
जातुधान बलवान माच मद दमन पवन सुव॥
कह तुलसीदास सेवत सुलभ, सेवक हित संतत निकंट।
गुन गनत, नमत, सुमिरत, जपत, समन सकल-सकट विकट॥”
नगर में गोस्वामी तुलसीदास जी के पकड़े जाने की खबर बिजली सी फैली।
काशी की ऐसी कौन सी गली थी, जिसे तुलसीदास ने अपना न बना लिया हो। शहर में सैकड़ों ऐसे युवक थे जिन्होंने उन्हीं की प्रेरणा से हनुमान अखाड़े आयोजित किए थे। ब्राह्मण, राजपूत, गोप, अहिर, गोड, कहार, केवट, नाऊ, जुलाहे, छोटी कौमों के मुसलमान, तमोली, छोटे-छोटे सौदागर सभी तो रामबोला बाबा को अपना मानते थे। उनके पकड़े जाने के समाचार ने क्या छोटे, क्या बड़े सभी के मनों में बड़ी कड़वाहट उत्पन्न कर दी। सारी काशी में बटेश्वर मिश्र की थू थू हो रही थी। टोडर ने भूख प्यास सब बिसार कर दौड़ धूप आरंभ की। जयराम साहु बोले- “अबकी भिड़के ही दिखा दो टोडर। अकबर जैसे न्यायप्रिय बादशाह के राज्य में भी ऐसी मनमानियाँ हो रहीं हैं। मिश्र जी जैसे घमण्डी स्वार्थी आपसी ईर्प्या द्वेष में सारे नगर की नाक कटा रहे हैं। एक बार इनसे निबटे बिना निस्तार नहीं। आगे जो होगा सो भुगत लेगें।”
टोडर बोले- "हिरदे अहीर महात्मा जी का बड़ा भक्त है। अच्छे लड़वैये ठाकुर समरसिह भी दे देंगे।”
जयराम बोले- “दो सौ लठैत मैं भी दूँगा।ये कोतवाल बड़ा ही दुष्ट आदमी है, और ये बक्शी, जिसकी पतुरिया भागी है, एक नम्बर का धूर्त है। इन लोगों ने हमें दुखी कर रखा है।”
“ठीक है, अब आपकी सलाह मिल गई है तो आज रात तक हम भी कुछ कर दिखाएँगे।”
टोडर हिरदै से मिले तो वह बोला- “भैया, कासी जी का अहिर खून उबल रहा है। जब आप सब लोग पीठ पर हो तो हम भी आज इन्हें ऐसा सबक सिखाएँगे की छठी का दूध याद आ जाएगा। हमारे गुसाईं बाबा हमारे लड़कों को रामलीला में बानर सेना बनाने वाले थे, सो आज कोतवाल की कोतवाली पर हमारी वानर सेना ही टूटेगी। देख लेना,पहली रामलीला वानर लीला से ही हो होयगी।टोडर बोले -“ठीक है, पर हमला खूब सोच विचार के बड़े संगठित ढंग से होना चाहिए, हिरदे। सिपाहियों पर ऐसे अचानक टूटों कि उनसे कुछ करते धरते न बनें। फिर कहीं पर अहिर टूटेगें, कहीं पर केवट और कहीं पर ठाकुर बृंदहार धमकेंगे और हिरदै, कल सबेरे काशी जी में बटेश्वर मिश्र कहीं चलता फिरता न दिखाई दे।”
“भैया, हम बिरमहत्या न करेंगे। उस धर्मराक्षस को हनुमान जी आप ही समझेंगे।”
रात पहर भर भी न बीती थी कि छावनी में हुल्लड़ मच गया।मुगल पठान सिपाही अचानक में घिर गए। कइयों की मुश्कें कस गईं। सैकड़ों तोपचियाँ विद्रोहियों के कब्जे में आ गईं।लठैतों का आक्रमण इतना व्यापक और फुर्तीला था कि सिपाही बिना लड़े ही उनके जादू में बँधकर परास्त हो गए।कोतवाली पर सारे शरीर में सेंदुर लगाए लाल लंगोटेधारी अहिर युवा बानर टूट पड़ें थे। हरम में ऐसा हाय तोवा मचा कि बेगम बाँदिया बेहोश हो हो गईं। अफीम की पिनक में गाना सुनते और झूमते हुए कोतवाल साहब की दाढ़ी नुची। उन्होंने कैदखाने के जमादार को बुलाके हुक्म दिया कि तुलसीदास को फौरन छोड़ दो। तुलसीदास बोले- “जब तक सब वैरागी नही छोड़े जाएँगें तब तक मैं बंदीगृह से नहीं निकलूँगा।”
सारे बरागी छोड़े गए। नगर में रात के तीसरे पहर सैकड़ौं मशालों के साथ तुलसीबाबा और सारे वैरागियों का जुलूस निकला। पूरा नगर जाग पड़ा। एक विचित्र उत्साह काशी के जन जन में लहरा उठा था। तुलसीदास और काशी उस रात सदा के लिए एक हो गए।
टोडर की इच्छा भी पूरी हुई। बटेश्वर मिश्र नया सूर्योदय न देख पाया।कोतवाली के सिपाहियों ने अपनी इस अपमान भरी पराजय का बदला लेने के लिए रात ही मे बटेश्वर मिश्र के घर जाकर उन्हें सोते से जगाया, बाहर बुलाया और कत्ल कर डाला।
नगर में इस विद्रोह से जहाँ युवकों में जान आई, वहाँ दूसरी ओर शासन तंत्र भी चूर चूर हो गया। सभी आला हाकिम इस बात से चिन्तित थे कि आगरे के किले मे जब यह समाचार पहुँचेगा तो बादशाह न जाने हमारी क्या दुर्गति करे। इस घबराहट में वसणी, दीवान, मीर अदल, कोतवाल,छोटे बड़े सिपहसालार सब आपस में एक दूसरे को दोषी तथा अपने को सतर्क स्वामिभक्त सेवक सिद्ध करने के लिए आगरे में अपने पक्ष के आला हाकिमों के पास मूल्यवान भेटें और संदेश भिजवाने लगे। अकवर के दरवार मे काशी के इस युवक विद्रोह की इतनी और इतनी प्रकार की सूचनाएँ पहुँची कि बादशाह ने काशी जौनपुर सूबे के लिए पुराने सुबेदार का तबादला करके अब्दुरहीम खानखाना को सूबेदार बनाकर व्यवस्था सँभालने के लिए भेजा।वह अभी आागरे से चल भी न पाए थे कि उनके आने की सूचना काशी में पहुँच गई । उस समय नगर में अकाल ग्रस्त जनसमूह मारा मारा डोल रहा था। श्रमजीवी, किसान आदि सभी भिखारी बन गए थे। पेट भरने के लिए लोग अपने बेटे-बेटियों तक को बेच देते थे।
क्रमशः
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